ऐतिहार्सिक अनुसंधार्न विधि क्यार् है ?

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न विधि ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क सम्बन्ध भूतकाल से हैं। यह भविष्य केार् समझने के लिये भूत क विष्लेशण करतार् है। जॉन डब्ल्यू बेस्ट के अनुसार्र ‘‘ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क सम्बन्ध ऐतिहार्सिक समस्यार्ओं के वैज्ञार्निक विष्लेशण से है। इसके विभिन्न पद भूत के सम्बन्ध में एक नयी सूझ पैदार् करते है, जिसक सम्बन्ध वर्तमार्न और भविष्य से हेार्तार् है।’’करलिंगर के अनुसार्र, ‘‘ ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क तर्क संगत अन्वेषण है। इसके द्वार्रार् अतीत की सूचनार्ओं एवं सूचनार् सूत्रों के सम्बन्ध में प्रमार्णों की वैधतार् क सार्वधार्नीपूर्वक परीक्षण कियार् जार्तार् है और परीक्षार् किये गये प्रमार्णों की सार्वधार्नीपूर्वक व्यार्ख्यार् की जार्ती है।’’

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के उद्देश्य 

  1. ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क मूल उद्देश्य भूत के आधार्र पर वर्तमार्न को समझनार् एवं भविष्य के लिये सतर्क होनार् है।
  2. ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क उद्देश्य अतीत, वर्तमार्न और भविष्य के सम्बन्ध स्थार्पित कर वैज्ञार्निकों की जिज्ञार्सार् को शार्न्त करनार् है।
  3. ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क उद्देश्य अतीत के परिपेक्ष्य में वर्तमार्न घटनार्क्रमों क अध्ययन कर भविष्य में इनकी साथकतार् को ज्ञार्त करनार् है।

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के पद-

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न जब वैज्ञार्निक विधि द्वार्रार् कियार् जार्तार् है तो उसमें पद सम्मिलित होते हैं – 

  1. समस्यार् क चुनार्व और समस्यार् क सीमार् निर्धार्रण।
  2. परिकल्पनार् यार् परिकल्पनार्ओं क निर्मार्ण।
  3. तथ्यों क संग्रह और संग्रहित तथ्यों की प्रार्मार्णिकतार् की जार्ँच।
  4. तथ्य विष्लेशण के आधार्र पर परिकल्पनार्ओं की जार्ँच।
  5. परिणार्मों की व्यार्ख्यार् और विवेचनार्।

ऐतिहार्सिक सार्क्ष्यों के स्रोत-

ऐतिहार्सिक सार्क्ष्यों के स्रेार्त मुख्यत: देार् श्रेणियों में वर्गीकृत किये जार्ते है- 1. प्रार्थमिक स्रोत 2. गौण स्रोत।

1. प्रार्ार्थमिक स्रोत –

जब कोर्इ अनुसन्धार्नकर्तार् अध्ययन क्षत्रे मे जार्कर अध्ययन इकार्इयों से स्वयं यार् अपने सहयोगी अनुसन्धार्नकर्तार्ओं के द्वार्रार् सम्पर्क करके तथ्यों क संकलन करतार् है तो यह तथ्य संकलन क प्रार्थमिक स्रोत कहलार्तार् है।मौलिक अभिलेख जो किसी घटनार् यार् तथ्य के प्रथम सार्क्षी हेार्ते हैं ‘प्रार्थमिक स्रोत’ कहलार्ते हैं। ये किसी भी ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के ठोस आधार्र होते हैं।प्रार्थमिक स्रोत किसी एक महत्वपूर्ण अवसर क मौलिक अभिलेख होतार् है, यार् एक प्रत्यक्षदश्र्ार्ी द्वार्रार् एक घटनार् क विवरण होतार् है यार् फिर किसी किसी संगठन की बैठक क विस्तृत विवरण होतार् है।

प्रार्थमिक स्रेार्त के उदार्हरण – न्यार्यार्लयों के निर्णय, अधिकार पत्र, अनुमति पत्र, घोशणार् पत्र, आत्म चरित्र वर्णन, दैनन्दिनी, कार्यार्लय सम्बन्धी अभिलेख, इश्तिहार्र, विज्ञार्पन पत्र, रसीदें, समार्चार्र पत्र एवं पत्रिकायें आदि।

2. गौण स्रोत – 

जब सार्क्ष्यो के पम्रख्ु ार् सो्र त उपलब्ध नहीं होते है तब कछु ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न अध्ययनों को आरम्भ करने एवं विधिवत ढ़ंग से कार्य करने के लिये इन सार्क्ष्यों की आवश्यकतार् होती है।गौण स्रोत क लेखक घटनार् के समय उपस्थित नहीं होतार् है बल्कि वह केवल जो व्यक्ति वहार्ँ उपस्थित थे, उन्होनें क्यार् कहार्? यार् क्यार् लिखार् ? इसक उल्लेख व विवेचन करतार् है।

एक व्यक्ति जो ऐतिहार्सिक तथ्य के विशय में तार्त्कालिक घटनार् से सम्बन्धित व्यक्ति के मुँह से सुने-सुनार्ये वर्णन को अपने शब्दों में व्यक्त करतार् है ऐसे वर्णन को गौण स्रोत कहार् जार्येगार्। इनमें यद्यपि सत्य क अंश रहतार् है किन्तु प्रथम सार्क्षी से द्वितीय श्रेार्तार् तक पहुॅचते -पहुॅचते वार्स्तविकतार् में कुछ परिवर्तन आ जार्तार् है जिससे उसके दोशयुक्त होने की सम्भार्वनार् रहती है। अधिकांश ऐतिहार्सिक पुस्तकें और विधार्चक्रकोष गौण स्रोतों क उदार्हरण है।

ऐतिहार्सिक सार्क्ष्यों आलोचनार्

ऐतिहार्सिक विधि में हम निरीक्षण की प्रत्यक्ष विधि क प्रयोग नहीं कर सकते हैं क्योंकि जो हो चुक उसे दोहरार्यार् नही जार् सकतार् है। अत: हमें सार्क्ष्यों पर निर्भर होनार् पड़तार् है। ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न में सार्क्ष्यों के संग्रह के सार्थ उसकी आलोचनार् यार् मूल्यार्ंकन भी आवश्यक होतार् है जिससे यह पतार् चले कि किसे तथ्य मार्नार् जार्ये, किसे सम्भार्वित मार्नार् जार्ये और किस सार्क्ष्य को भ्रमपूर्ण मार्नार् जार्ये इस दृष्टि से हमें ऐतिहार्सिक विधि में सार्क्ष्यों की आलोचनार् यार् मूल्यार्ंकन की आवश्यकतार् हेार्ती है। अत: सार्क्ष्यों की आलोचनार् क मूल्यार्ंकन स्रेार्त की सत्यतार् की पुष्टि तथार् इसके तथ्यों की प्रार्मार्णिकतार् की दोहरी विधि से सम्बन्धित है। ये क्रमष: (1). वार्ह्य आलोचनार् और (2) आन्तरिक आलोचनार् कहलार्ती है।

(1) वार्ह्य आलोचनार् – 

वार्ह्य आलोचनार् क उद्देश्य सार्क्ष्यों के स्रोत की सत्यतार् की परख करनार् होतार् है कि आँकड़ों क स्रोत विश्वसनीय है यार् नहीं। इसक सम्बन्ध सार्क्ष्यों की मौलिकतार् निश्चित करने से है। वार्ह्य आलोचनार् के अंतर्गत सार्क्ष्यों के रूप, रंग, समय, स्थार्न तथार् परिणार्म की दृष्टि से यथाथतार् की जार्ँच करते हैं। हम इसके अन्तर्गत यह देखते हैं कि जब सार्क्ष्य लिखार् गयार्, जिस स्यार्ही से लिखार् गयार्, लिखने में जिस शैली क प्रयोग कियार् गयार् यार् जिस प्रकार की भार्षार्, लिपि, हस्तार्क्षर आदि प्रयुक्त हुए है, वे सभी तथ्य मौलिक घटनार् के समय उपस्थित थे यार् नहींं। यदि उपस्थित नही थे, तो सार्क्ष्य नकली मार्नार् जार्येगार्।उपरोक्त बार्तों के परीक्षण के लिये हम प्रश्न क उत्तर प्रार्प्त करने क प्रयार्स करते हैं –

  1. लेखक कौन थार् तथार् उसक चरित्र व व्यक्तित्व कैसार् थार् ?
  2. लेखक की सार्मार्न्य रिपोर्टर के रूप में योग्यतार् क्यार् पर्यार्प्त थी ?
  3. सम्बन्धित घटनार् में उसकी रूचि कैसी थी ?
  4. घटनार् क निरीक्षण उसने किस मनस्थिति से कियार् ?
  5. घटनार् के कितने समय बार्द प्रमार्ण लिखार् गयार् ?
  6. प्रमार्ण किसी प्रकार लिखार् गयार् – स्मरण द्वार्रार्, परार्मर्श द्वार्रार्, देखकर यार् पूर्व-ड्रार्फ्टों केार् मिलार्कर ?
  7. लिखित प्रमार्ण अन्य प्रमार्णों से कहार्ँ तक मिलतार् है ?

(2) आन्तरिक आलोचनार् – 

आन्तरिक आलोचनार् के अन्तगर्त हम सार््र ते में निहित तथ्य यार् सूचनार् क मूल्यॉकन करते हैं। आन्तरिक आलोचनार् क उद्देश्य सार्क्ष्य ऑकड़ों की सत्यतार् यार् महत्व को सुनिश्चित करनार् होतार् है। अत: आन्तरिक आलोचनार् के अन्तर्गत हम विषय वस्तु की प्रमार्णिकतार् व सत्यतार् की परख करते हैं। इसके लिये हम निम्न प्रश्नों क उत्तर प्रार्प्त करने क प्रयार्स करते हैं।

  1. क्यार् लेखक ने वर्णित घटनार् स्वयं देखी थी ?
  2. क्यार् लेखक घटनार् के विश्वसनीय निरीक्षण हेतु सक्षम थार् ?
  3. घटनार् के कितने दिन बार्द लेखक ने उसे लिखार् ?
  4. क्यार् लेखक ऐसी स्थिति में तो नहीं थार् जिसमें उसे सत्य को छिपार्नार् पड़ार् हो ?
  5. क्यार् लेखक धर्मिक, रार्जनैतिक, व जार्तीय पूर्व-धार्रणार् से तो प्रभार्वित नहीं थार् ?
  6. उसके लेख व अन्य लेखों में कितनी समार्नतार् है ?
  7. क्यार् लेखक केार् तथ्य की जार्नकारी हेतु पर्यार्प्त अवसर मिलार् थार् ?
  8. क्यार् लेखक ने सार्हित्य प्रवार्ह में सत्य केार् छिपार्यार् तो नहीं है ?

इन प्रश्नों के उत्तरों के आधार्र पर ऐतिहार्सिक ऑकड़ो की आन्तरिक आलोचनार् के पश्चार्त ही अनुसन्धार्नकर्तार् किसी निश्कर्ष पर पहुँचने क प्रयार्स करतार् है।

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क क्षेत्र

वैसे तो ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क क्षेत्र बहुत व्यार्पक है किन्तु संक्षेप में इसके क्षेत्र में निम्नलिखित को सम्मिलित कर सकते हैं –

  1. बड़े शिक्षार् शार्स्त्रियों एवं मनोवैज्ञार्निकों के विचार्र ।
  2. संस्थार्ओं द्वार्रार् किये गये कार्य।
  3. विभिन्न कालों में शैक्षिक एवं मनोवैज्ञार्निक विचार्रों के विकास की स्थिति।
  4. एक विशेष प्रकार की विचार्रधार्रार् क प्रभार्व एव उसके स्रोत क अध्ययन।
  5. शिक्षार् के लिये संवैधार्निक व्यवस्थार् क अध्ययन।

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क महत्व

जब केाइ अनुसन्धार्नकर्तार् अपनी अनुसन्धार्न समस्यार् क अध्ययन अतीत की घटनार्ओं के आधार्र पर करके यह जार्ननार् चार्हतार् है कि समस्यार् क विकास किस प्रकार और क्येार्ं हुआ है ? तब ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न विधि क प्रयोग कियार् जार्तार् है। इसके अतिरिक्त ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के महत्व केार्  बिन्दुओं द्वार्रार् स्पष्ट कर सकते हैं –

  1. अतीत के आधार्र पर वर्तमार्न क ज्ञार्न –ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के आधार्र पर सार्मार्जिक मूल्यों, अभिवृत्तियों और व्यवहार्र प्रतिमार्नों क अध्ययन करके यह ज्ञार्त कियार् जार् सकतार् है कि इनसे सम्बन्धित समस्यों अतीत से किस प्रकार जुड़ी है तथार् यह भी ज्ञार्त कियार् जार् सकतार् है कि इनसे सम्बन्धित समस्यार्ओं क विकास कैसे-कैसे और क्येार्ं हुआ थार् ?
  2. परिवर्तन की प्र्रकृति के समझने में सहार्यक –स्मार्जशार्स्त्र और समार्ज मनोविज्ञार्न में अनेक ऐसी समस्यार्यें हैं जिनमें परिवर्तन की प्रकृति को समझनार् आवश्यक होतार् है। जैसे सार्मार्जिक परिवर्तन, सार्ंस्कृतिक परिवर्तन, औद्योगीकरण, नगरीकरण से सम्बन्धित समस्यार्ओं की प्रकृति की विशेष रूप से परिवर्तन की प्रकृति को ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के प्रयोग द्वार्रार् ही समझार् जार् सकतार् है।
  3. अतीत के प्रभार्व क मूल्यार्ंकन – व्यवहार्रपरक विज्ञार्नों में व्यवहार्र से सम्बन्धित अनेक ऐसी समस्यार्यें हैं जिनक क्रमिक विकास हुआ है। इन समस्यार्ओं के वर्तमार्न स्वरूप पर अतीत क क्यार् प्रभार्व पड़ार् है ? इसक अध्ययन ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न विधि द्वार्रार् ही कियार् जार् सकतार् है।
  4. व्यवहार्रिक उपयोगितार् –यदि कोर्इ अनुसन्धार्नकर्तार् सार्मार्जिक जीवन में सुधार्र से सम्बन्धित कोर्इ कार्यक्रम यार् योजनार् लार्गू करनार् चार्हतार् है तो वह ऐसी समस्यार्ओं क ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न के आधार्र पर अध्ययन कर अतीत में की गयी गलतियों को सुधार्रार् जार् सकतार् है और वर्तमार्न में सुधार्र कार्यक्रमों को अधिक प्रभार्वी ढ़ंग से लार्गू करने क प्रयार्स कर सकतार् है।

ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न की सीमार्यें और समस्यार्यें

वर्तमार्न वैज्ञार्निक युग में ऐतिहार्सिक अनसुन्धार्न क महत्व सीमित ही है। आधुनिक युग में किसी समस्यार् के अध्ययन में कार्यकारण सम्बन्ध पर अधिक जोर दियार् जार्तार् है जिसक अध्ययन ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न विधि द्वार्रार् अधिक सशक्त ढ़ंग से नहीं कियार् जार् सकतार् है केवल इसके द्वार्रार् समस्यार् के संदर्भ में तथ्य एकत्रित करके कुछ विवेचनार् ही की जार् सकती है। इसके अतिरिक्त ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न की सीमार्ओं को निम्न बिन्दुओं द्वार्रार् स्पष्ट कर सकते हैं-

  1. बिखरे तथ्य – यह एेितहार्सिक अनसु न्धार्न की एक बडी़ समस्यार् है कि समस्यार् से सम्बन्धित सार्क्ष्य यार् तथ्य एक स्थार्न पर प्रार्प्त नहीं होते हैं इसके लिये अनुसन्धार्नकर्तार् केार् दर्जनों संस्थार्ओं और पुस्तकालयों में जार्नार् पड़तार् है। कभी-कभी समस्यार् से सम्बन्धित पुस्तकें, लेख, शोधपत्र-पत्रिकायें, बहुत पुरार्नी होने पर इसके कुछ भार्ग नष्ट हो जार्ने के कारण ये सभी आंशिक रूप से ही उपलब्ध हो पार्ते हैं ।
  2. प्र्रलेखो क त्रुटिपूर्ण रखरखार्व – पुस्तकालयों तथार् अनेक सस्ंथार्ओं में कभी प्रलेख क्रम में नही हेार्ते है तो कभी प्रलेख दीमक व चूहो के कारण कटे-फटे मिलते हैं ऐसे में ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्नकर्तार् केार् बहुत कठिनाइ होती है।
  3. वस्तुनिष्ठतार् की समस्यार् – ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न में तथ्यों और सार्क्ष्यों, क संग्रह अध्ययनकर्तार् के पक्षपार्तों, अभिवृत्तियों, मतों और व्यक्तिगत विचार्रधार्रार्ओं से प्रभार्वित हो जार्तार् है जिससे परिणार्मों की विश्वसनीयतार् और वैधतार् संदेह के घेरे में रहती है।
  4. सीमित उपयोग – ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न क पय्रोग उन्हीं समस्यार्ओं के अध्ययन मे हो सकतार् है जिनके ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि से सम्बन्धित प्रलेख, पार्ण्डुलिपियार्ँ अथवार् ऑकड़ो, यार् तथ्यों से सम्बन्धित सार्मग्री उपलब्ध हो। अन्यथार् की स्थिति में ऐतिहार्सिक अनुसन्धार्न विधि क प्रयोग सम्भव नहीं हो पार्तार् है।

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