एनजीओ (NGO) के गठन हेतु नियम एवं नियमार्वली

समार्ज कल्यार्ण क मूल प्रार्रम्भ स्वयंसेवी क्रियार् में देखार् जार् सकतार् है जिसने इसे पिछली अनेक शतार्ब्दियों से वर्तमार्न तक जीवित रखार् है। भार्रत में सार्मार्जिक हित के लिए स्वयंसेवी कार्य की गौरवपूर्ण परम्परार् रही है। स्वयंसेवी शब्द लैटिन भार्शार् के शब्द, जिसक अर्थ है ‘इच्छार्’ अथवार् ‘स्वतंत्रतार्’ से लियार् गयार् है। हैरार्ल्ड लार्स्की ने समुदार्य की स्वतंत्रतार् को ‘रूचिगत उद्देश्यों के वर्द्धन हेतु व्यक्तियों के इकट्ठार् होने के मार्न्यतार्-प्रार्प्त कानूनी अधिकार के रूप में परिभार्शित कियार् है।’ भार्रतीय संविधार्न की धार्रार् 19 (1) (ऋ) के अन्तर्गत भार्रतीय नार्गरिकों को समुदार्य बनार्ने क अधिकार प्रार्प्त है। समुदार्य की स्वतंत्रतार् मार्नव स्वतंत्रतार्ओं में प्रमुख है। यह मनुश्यों के लिए किसी सार्मार्न्य उद्देश्यों के लिए समुदार्यित होने की व्यार्पक स्वतंत्रतार् है। वे किसी कार्य को स्वयं करने अथवार् अपने अथवार् अन्य व्यक्तियों के हित को प्रार्प्त करने हेतु किसी कार्य को करार्ने अथ्ज्ञवार् लोक उद्देश्य क अनुधार्वन करने के लिए इकट्ठार् होने की इच्छार् रख सकते हैं। संयुक्त रार्श्ट्र की शब्दार्वली में स्वयंसेवी संगठनों को आ शार्सकीय संगठन कहार् जार्तार् है। इन्हें आदि क नार्म भी दियार् गयार् है। स्वयंसेवी संगठन की विभिन्न प्रकार से परिभार्शार् की गयी है। लाड बीवरिज के अनुसार्र, ‘‘सही तौर पर, स्वयंसेवी संगठन एक ऐसार् संगठन है जिसक आरम्भ एवं प्र शार्सन इसके सदस्यों द्वार्रार् किसी बार्ह्य नियंत्रण के बिनार् कियार् जार्तार् है चार्हे इसके कार्यकर्तार् वैतनिक अथवार् अवैतनिक हो।’’ मेरी मोरिस एवं मोडलीन रोफ की परिभार्शार्एं भी समार्न है। मोडलीन रोफ ने केवल यह बार्त जोड़ी है कि स्वयंसेवी संगठनों को कम से कम आंशिक तौर पर स्वयंसेवी संसार्धनों पर आश्रित होनार् चार्हिए।

नियम एवं नियमार्वली 

माइकल बेंटन ने इसकी परिभार्शार् किसी एक सार्मार्न्य हि अथवार् अनेक हितों के अनुधार्वन हेतु संगठित समूह कहकर की है। डेविड एल0 सिल्स के शब्दों में, ‘‘स्वयंसेवी संगठन इसके सदस्यों के कुछेक सार्मार्न्य हितों की प्रार्प्ति हेतु रार्ज्य नियंत्रण के बिनार् स्वैच्छिक सदस्यतार् के आधार्र पर संगठित व्यक्तियों क समूह है।’’ नामन जार्नसन ने स्वयंसेवी समार्ज सेवार्ओं की विभिन्न परिभार्शार्ओं की समीक्षार् करते हुए इनकी चार्र प्रमुख विशेषतार्ऐं बतलार्यी हैं :-

  1. संरचनार् की विधि, जो व्यक्तियों के लिए स्वैच्छिक है, 
  2. प्रशार्सन की विधि, इसके संविधार्न, इसकी सेवार्ओं, इसकी नीति एवं इसके लार्भाथियों के बार्रे में स्वयं-प्रशार्सकीय संगठन निर्णय करते हैं।
  3. वित्त विधि, कम से कम इसक कुछ कोश स्वैच्छिक अभिकरणों से प्रार्प्त होतार् है, एवं 
  4.  पेर्र क जो लार्भ-पार््र प्ति नहीं होती। 

कुछ लेखकों, यथार् सिल्स के विचार्र में स्वयंसेवी संगठनों की विधिक प्रस्थिति इसकी क्रियार्ओं की दृश्टि से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है परन्तु भार्रतीय संदर्भ में यह उनके वित्तीय दार्यित्व के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि प्रार्वधार्न है कि सहार्यतार् अनुदार्नों के लिए केवल ऐसी स्वयंसेवी संस्थार्ओं पर विचार्र कियार् जार्येगार् जो निगमित है तथार् जो कम से कम तीन वर्शों से कार्यरत है। स्मिथ एवं फ्रीडमैन स्वयंसेवी संगठनों को औपचार्रिक रूप में संगठित, सार्पेक्षतयार् स्थार्यी द्वितीयक समूह समझते है जो कम संगठित, अनौपचार्रिक, अस्थार्यी पार््र थमिक समूह से भिन्न होतार् है। औपचार्रिक संगठन परिलक्षित होतार् है – कार्यार्लयों की अवस्थिति में जिनके कार्मिकों की भर्ती निर्धार्रित प्रक्रियार्ओं के मार्ध्यम से होती है, अनुसूचित बैठकों में, सदस्यतार् के लिए पार्त्र योग्यतार्ओं में, श्रम के विभार्जन एवंविशेषीकरण मे, यद्यपित संगठनों में ये सभी विशेषएं समार्न मार्त्रार् में नहीं पार्यी जार्तीं, स्वयंसेवी संगठनों को अपनी स्वार्यत्ततार् को पर्यार्प्त मार्त्रार् में त्यार्गनार् पड़तार् है क्योंकि यदि यह सरकारी अनुदार्न लेनार् चार्हती है तो इन्हें कुछेक शर्तों को (यद्यपि इनक स्वरूप नियार्मक है) स्वीकार करनार् होतार् है। उदार्हरणतयार्, भार्रत में स्वयंसेवी संगठनों को रार्जनीति एवं धर्म से दूर रहनार् होतार् है यदि ये रार्श्ट्र निर्मार्ण गतिविधियों में भार्ग लेने हेतु सरकार से धन प्रार्प्त करनार् चार्हते हैं। यह भार्रतीय धर्मनिरपेक्षतार् के अनुरूप है जिसके अन्तर्गत सावजनिक धन क किसी धर्म के प्रचार्र हेतु प्रयोग नहीं कियार् जार् सकतार्। अन्तिम, उन्हें रार्श्ट्रीय उद्देश्यों, यथार् समार्जवार्द, धर्म निरपेक्षतार्, प्रजार्तंत्र, रार्श्ट्रीय एकतार् एवं अखंडतार् के प्रति कटिबद्ध होनार् चार्हिए।स्वयंसेवी संगठन की व्यार्पक परिभार्शार् क प्रयार्स करते हुए, प्रो. एम. आर. इनार्मदार्र क कथ्ज्ञन है : ‘‘स्वयंसेवी संगठन को समुदार्य के लिए स्थार्यी तौश्र पर लार्भप्रद होने के लिए अपने सदस्यों में सार्मुदार्यिक विकास हेतु शक्तिशार्ली इच्छार् एवं भार्वनार् क विकास करनार् होतार् है, परिश्रमी एवं समपिर्त नेतृत्व एवं भार्रित कायार्ंर् े में कुशल व्यक्ति प्रार्प्त करने हेतु आर्थिक तौर पर क्षय होनार् होतार् है। स्वयंसेवी संगठन आदि समार्ज के हित में कार्य करनार् चार्हतार् है तो उसे सर्वप्रथम सोसार्यटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम 1860 की धार्रार् 20 में पंजीकृत हों।

  1. संस्थार् क मुख्य उद्देश्य समार्ज के कमजोर वर्गों के सवार्ंर्गीण विकास करनार् हो। 
  2. ऐसे कार्यक्रमों क आयोजन हो जो कि व्यक्ति, समूह, समुदार्य, रार्ज्य व रार्श्ट्रहित में हो।
  3. संस्थार् में स्वयंसेवियों की संख्यार् सार्त से कम न हो तथार् यह ध्यार्न रखार् जार्ए कि सभी धर्म जार्ति एवं लिंग क प्रतिनिधि हो तथार् एक परिवार्र के सदस्यों को शार्मिल न कियार् जार्ये।
  4. समस्त सदस्यों के नार्म, पते एवं व्यवसार्य स्पश्ट हो तथार् सभी क उद्देश्य समार्ज हित में समार्जसेवार् हो, ऐसे सदस्य को बिल्कुल शार्मिल न कियार् जार्ये जो कि धन कमार्नार् चार्हते हों। 
  5. सभी सदस्य अपने हस्तार्क्षर करने एवं सन्तुश्ट होने के बार्द रजिस्ट्रार्र कार्यार्लय में अपनार् आवेदन करेंगे तथार् जार्ँचोपरार्न्त एवं सही पार्ये जार्ने पर उन्हें पंजीकृत प्रमार्ण पत्र दियार् जार् सकेगार्। 

नियमार्वली 

स्वयंसेवी संगठन की नियमार्वली में निम्नलिखित सूचनार्ऐं स्पश्ट रूप से दी जार्ये जिससे किसी प्रकार की भ्रम की स्थिम उत्पन्न न हों

  1. संस्थार् क पूरार् नार्म 
  2. संस्थार् क पूरार् पतार् 
  3. संस्थार् क कार्य क्षेत्र 
  4. संस्थार् क उद्देश्य 
  5. सदस्यों की सदस्यतार् तथार् सदस्यों के वर्ग : 
    1. संरक्षक सदस्य 
    2. आजीवन सदस्य 
    3. सार्मार्न्य सदस्य 
    4. विशिश्ट सदस्य 
  6. सदस्यों की समार्प्ति 
  7. संस्थार् के अंग : 
    1. सार्धार्रण सभार् – 

प्रबन्धकारणी समिति सार्धार्रण सभार् में : इसके अन्तर्गत निम्न सूचनार्ऐं शार्मिल की जार्यें

  1. गठन
  2. बैठक 
  3. सूचनार् अवधि 
  4. गणपूर्ति 
  5. विषेश वाशिक अधि 
  6. सार्धार्रण सभार् के कर्तव्य/अधिकार 
  7. प्रबन्धकारणी समिति एवं उसके अधिकार 
  8. कार्यकाल 
  9. प्रबन्धकारिणी समिति के पदार्धिकारियों के अधिकार एवं कर्तव्य 
  10. संस्थार् के नियमों/विनियमों में संषोधन प्रक्रियार् 
  11. संस्थार् क कोश 
  12. व्यय क अधिकार
  13. संस्थार् के आय-व्यय क लेखार् परीक्षण 
  14. संस्थार् द्वार्रार्/उसके विरूद्ध अदार्लती कार्यवार्ही के संचार्लन क उत्तरदार्यित्व 
  15. संस्थार् के अभिलेख
  16.  संस्थार् क निर्धार्रण 

यदि उक्त समस्त बिन्दुओं क समार्वेशि स्वयं सेवी संस्थार् की नियमार्वली हेतु आवश्यक है। अत: उक्त समस्त बिन्दुओं को शार्मिल कियार् जार्नार् चार्हिए।

मार्पदंड

रार्श्ट्रीय विकास परिशद् जो देश में सर्वोच्च निर्णयकारी संस्थार् है, जिसके द्वार्रार् स्वीकृत सार्तवीं योजनार् प्रलेख में स्वयंसेवी संगठनों को मार्न्यतार् देने हेतु मार्पदंड निम्नलिखित हैं : –

  1. संगठन क विधिक असितत्व होनार् चार्हिए 
  2. उद्देश्य समुदार्य की सार्मार्जिक एवं आर्थिक आवश्यकतार्ओंविशेषतयार् कमजोर वर्गों की पूर्ति करते हों 
  3. संगठन क उद्देश्य लार्भ अर्जित न हो 
  4. सभी नार्गरिकों को धर्म जार्ति रंग धर्ममत, लिंग, वंश के भेदभार्व के बिनार् गतिविधियार्ँ सभी के लिए उपलब्ध हों 
  5. कार्यक्रमों को संचार्लित करने के लिए आवश्यक नमनीयतार्, व्यवसार्यिक योग्यतार् एवं प्रबन्धार्त्मक कौशल हो 
  6. पदार्धिकारियों में किसी रार्जनीतिक दल क निर्वार्चित सदस्य न हो 
  7. अहिंसार्त्मक एवं संवैधार्निक सार्धनों क पार्लन हो 
  8. धर्म निरोक्षतार् एवं कार्य की प्रजार्तंत्रीय विधियों एवं विचार्रधार्रकों के प्रति प्रतिबद्धतार् हो। 

विशेषतार्एं 

स्वयंसेवी संगठन की उपर्युक्त परिभार्शार्ओं के आधार्र पर प्रमुख विशेषतार्एं हैं :

  1. यह कार्यों के क्षेत्र एवं स्वरूप के अनुसार्र विधिक प्रस्थिति प्रार्प्ति हेतु समिति पंजीकरण कानून 1980, भार्रतीय न्यार्सकानून 1882, सहकारी समिति कानून 1904 अथवार् संयुक्त स्टार्क कम्पनी 1959 के अन्तर्गत पंजीकृत होती है, 
  2. इसके निष्चित लक्ष्य एवं उद्देश्य एवं कार्यक्रम होते हैं,
  3. इसकी प्रशार्सकीय संरचनार् एवं विधिवत् संरचित प्रबन्ध एवं कार्यकारी समितियार्ँ होती है, 
  4. यह बिनार् किसी बार्ह्य नियंत्रण के अनेकों सदस्यों द्वार्रार् प्रजार्तंत्रीय नियमों के अनुसार्र प्रषार्सित होतार् है, 
  5. यह अपने कायार्ंर् े के सम्पार्दन के लिए सहकारी कोश से अनुदार्नों के रूप में तथार् आंशिक तौर पर स्थार्नीय समुदार्य अथवार् इसके कार्यक्रमों से लार्भार्न्वित व्यक्तियों से अंषदार्न अथवार् शुल्क के रूप में अपनी निधियों को एकत्रित करतार् है। 

कार्यक्रम 

परियोजनार् के मार्ध्यम से विभिन्न कार्यक्रमों को ध्यार्न में रखकर समय-समय पर परियोजनार् क निर्मार्ण सम्बन्धित विभार्ग की दिशार्निर्देषों के आधार्र पर कियार् जार्तार् है। जिन क्षेत्रों को ध्यार्न में रखकर परियोजनार् क निरूपण कियार् जार्तार् है। वे कार्यक्रम है :-

  1. परिवार्र कल्यार्ण कार्यक्रम 
  2. शिशु कल्यार्ण 
  3. परिवार्र जीवन शिक्षार् 
  4. गृह सहार्यतार् कार्यक्रम 
  5. बुढ़ार्पे में देखभार्ल सम्बन्धी कार्यक्रम 
  6. युवार् कल्यार्ण सम्बन्धी कार्यक्रम 
  7. विकलार्ंगों के कल्यार्ण हेतु कार्यक्रम 
  8. सेवार्निवृत्ति सैनिकों के लिए कार्यक्रम 
  9. विपदार् रहित 
  10. सार्मुदार्यिक विकास 
  11. चिकित्सार् समार्ज सेवार् 
  12. मनोरोगों से सम्बन्धित कार्यक्रम 
  13. स्कूल सार्मार्जिक सेवार्यें 
  14. सुधार्रार्त्मक कार्यक्रम 
  15. कमजोर वर्गों के कल्यार्ण सम्बन्धी कार्यक्रम 
  16. आतंकवार्दियों तथार् दंगों से पीड़ितों क कल्यार्ण 
  17. स्वतंत्रतार्-संग्रार्म क कल्यार्ण 
    उपरोक्त कार्यक्रमों सम्बन्धी क्षेत्रों के अतिरिक्त परियोजनार् क निरूपण मूल्यार्ंकनार्त्मक, तुलनार्त्मक एवं अध्ययनार्त्मक हो सकतार् है। जिससे कमजोर वर्गों जैसे – महिलार्, वृद्ध, अनसूचित जार्ति/जनजार्ति, पिछड़ी जार्ति, अल्पसंख्यक एवं अन्य क विकास हो सके।

    तत्व 

    व्यक्तियों को स्वैच्छिक कार्य के लिए प्रेरित करने वार्ले तत्वों में धर्म, शार्सन, व्यार्पार्र, दार्नशीलतार् एवं पार्रस्परिक सहार्यतार् स्वेच्छार्चार्रितार् के प्रमुख स्रोत हैं। धामिक संस्थार्ओं क प्रचार्र उत्सार्ह, सरकारी संस्थार्ओं की लोकहित के प्रति कटिवद्धतार्, व्यार्पार्र में लार्भ प्रवृत्ति, सार्मार्जिक अभिजनों की परोपकारी भार्वनार् एवं सहयोगियों के मध्य स्व-सहार्यतार् की पेर्र णार् सभी स्वेच्छार्चार्रितार् में परिलक्षित है। क्रियार्त्मक स्तर पर, उपर्युक्त संघटकों में भी अधिक अन्तर न हो, परन्तु प्रत्येक में सेवार् की भार्वनार् एक सार्मार्न्य उत्प्रेरक के रूप में पार्यी जार्ती है।

    ब्यूरार्डिलोन एवं विलियम बीवरिज पार्रस्परिक सहार्यतार् एवं मार्नव पेम्र को स्वैच्छिक सार्मार्जिक सहार्यतार् के विकास के दो प्रमुख स्रोत मार्नते हैं। इनक उद्भव क्रमशी: व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक अन्तरार्त्मार् से होतार् है स्वैच्छिक कार्य को पे्िर रत करने वार्ले अन्य तत्वों में वैयक्तिक हित, यथार् अनुभव, मार्न्यतार्, ज्ञार्न एवं मार्न, कुछेक मूल्यों के प्रति कटिबद्धतार् आदि को प्रार्प्त करने की इच्छार् को गिनार् जार् सकतार् है।

    इसके अतिरिक्त, समार्ज के अभार्ग्षार्शीली व्यक्तियों अथवार् अपने संगी-सार्थियों अथवार् स्वयं अपनी सहार्यतार् करने के लिए समूह अथवार् स्वयंसेवी संगठनों के निर्मार्ण में अनेक प्रकार की भार्वनार्एं मुनश्यों को प्रेरित करती है। ये आदर्षवार्दी, शिक्षार्त्मक, मनोवज्ञै ार्निक एवं सार्मार्जिक होती है जो पथ्ृ ार्क् अथवार् भिन्न-भिन्न रूप में मिलकर कार्य करती हैं।

    आदर्षार्त्मक रूप में, स्वयंसेवी संगठन प्रजार्तंत्र एवं व्यक्तियों के व्यक्तित्व को सुरक्षित रखते तथार् समार्ज के सार्मार्न्य स्वार्स्थ्य में योगदार्न प्रदार्न करते हैं। वे प्रजार्तंत्र में समार्जीकरण के प्रमुख अंग हैं तथार् अपने सदस्यों को सार्मार्जिक मार्नकों एवं मूल्यों के प्रति शिक्षित कर अकेलेपन को दूर करने में सहार्यतार् करते हैं। मनोवैज्ञार्निक भार्वनार्एं व्यक्तियों को सुरक्षार्, आत्मव्यक्ति एवं परिवार्र, चर्च एवं समुदार्य जैसी सार्मार्जिक संस्थार्ओं के उसके कारण अपने हितों की पूर्ति हेतु स्वयंसेवी संगठनों के सदस्य बनने की ओर प्रेरि त करती है। समार्जशार्स्त्रियों ने सदस्यतार् के मनोवैज्ञार्निक क उत्प्रेरक हितों, यथार् समुदार्य, वर्ग, वंषील, धामिक, लिंग, आयु आदि के सार्थ अध्ययन कियार् है तथार् वे इस निश्कर्श पर पहुंचे हैं कि संगठन से व्यक्ति को अपने सार्थियों के सार्थ सार्मुदार्यिक भार्वनार् की प्रार्प्ति होती है सदस्यतार् क वर्ग आधार्र होतार् है जहार्ं सार्मार्जिक – आर्थिक हित समिति क सुस्य बनने की ओर प्रेरित करते है वर्ग, वंशित एवं धर्म के रूप में किसी समूह की सदस्यतार् में अधिकांशत: समरूपतार् पाइ जार्ती है, सदस्यतार् क सार्मार्जिक-धामिक प्रस्थिति जिसक मार्पन आय स्तर, व्यवसार्य, गृह स्वार्मित्व, जीवन स्तर एवं शिक्षार् से कियार् जार्तार् है, के सार्थ प्रत्यक्ष सम्बन्ध होतार् है, नगरीय क्षेत्रों में ग्रार्मीण की तुलनार् में स्वयंसेवी संगठन क सदस्य बनने में अधिक रूचि होती है, अधिकांश अभिकरणों में निदेशक मंडलों में मनुश्यों क प्रभुत्व होतार् है, स्त्रियार्ं अपनी पार्रिवार्रिक प्रस्थिति तथार् परिवार्र चक्र में उनके स्तर के अनुसार्र इनकी सदस्यतार् ग्रहण करती है, स्वयंसेवी संगठनों की सहभार्गितार् वृद्धार्यु के सार्थ कम हो जार्ती है।

    इस प्रकार, स्वयंसेवी संगठन की सदस्यतार् क मनोविज्ञार्न एक जटिल घटनार् है। यह संस्कृति, सार्मार्जिक वार्तार्वरण एवं रार्जनीतिक पर्यार्वरण पर निर्भर होतार् है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति एवं एक व्यक्ति समूह से दूसरे व्यक्ति-समूह में भिन्न हो सकतार् है।

    स्वयंसेवी संगठनों के कार्य एवं उत्तरदार्यित्व 

    प्रजार्तंत्रीय, समार्जवार्दी एवं कल्यार्णकारी समार्ज में, स्वयंसेवी संगठन अनिवाय होते हैं एवं वे अपने सदस्यों के कल्यार्ण, देश के विकास तथार् समार्ज एवं रार्श्ट्र की एकतार् एवं अखंडतार् के लिए अनेक कार्य करते हैं। इनमें से कुछेक उद्देश्यों एवं कार्यों क वर्णन है :-

    1. मनुष्य स्वभार्व से सार्मार्जिक प्रार्णी है। समूह में कार्य करने की प्रकृति उसमें मौलिक है। अतएव मनुश्य स्वेच्छार्पूर्वक अपने तथार् अन्यों के हित के लिए समूह एवं समितियों की संरचनार् करते हैं तार्कि वे पूर्ण एवं समृद्ध जीवन व्यतीत कर सकें। जैसे मनोरंजक एवं सार्ंस्कृतिक गतिविधियों, सार्मार्जिक सेवार्ओं, व्यार्वसार्यिक हितों के वर्द्धन हेतु निर्मित स्वयंसेवी संगठनों से परिलक्षित है। 
    2. प्रजार्तंत्रीय प्रणार्ली युक्त बहुलवार्दी समार्ज में सरकार को विभिन्न पार्त्रों में एकाधिकार विकसित करने से रोकने के लिए व्यक्ति एवं रार्ज्य के मध्य अन्त:स्थ रूप में अनेक स्वतंत्र, स्वयंसेवी अशार्सकीय संगठनों की आवश्यकतार् होती है। स्वयंसेवी संगठन नार्गरिकों केार् शुभ कार्यों में लगार्ते हैं एवं सरकार के हार्थों में शक्तियों के केन्द्रीकरण को रोकते है जिससे वह शक्तिभंजक के रूप में कार्य करते है। स्वयंसेवी समूह शक्ति में सहभार्गितार् द्वार्रार् सेवार्ओं के संगठन में सरकार केार् एकाधिकार उपार्गम क विकास करने से रोकते हैं।
    3. वे व्यक्तियों को अपने निजी संगठनों के प्रशार्सन में भार्ग लेकन समूह एवं रार्जनीतिक कार्य की मौलिकतार्ओं को सीखने क अवसर प्रदार्न करते हैं। 
    4. संगठित स्वैच्छिक कार्य विभिन्न रार्जनीतिक एवं अन्य हितों वार्ले समूहों एवं स्कूल, महार्विद्यार्लय एवं विष्वविद्यार्लय प्रार्ध्यार्पकों की समितियार्ं, भार्रतीय विष्वविद्यार्लय समिति, भार्रतीय प्रषिक्षित सार्मार्जिक कार्यकर्तार् समिति, सोषल वर्क स्कूलों की समिति, ग्रार्मीण विकास हेतु स्वयंसेवी अभिकरणों की समिति, भार्रतीय बार्ल कल्यार्ण परिशद् की भार्रतीय समार्ज कल्यार्ण परिशद्, भार्रतीय महिलार् संघ आदि, वं उपभोक्तार्ओं के हितों की सुरक्षार् हेतु उपभोक्तार् मंच जो अभी स्थार्पित हुए हैं, विभिन्न देषों में मार्नव अधिकार संगठन एवं विष्वव्यार्पी मार्नव अधिकार संगठन एवं क्षेत्रीय संगठन, यथार् एवं आदि। 

    संक्षेप में स्वयंसेवी संगठनों ने भूतकाल में कल्यार्ण सेवार्एं प्रदार्न करने में प्रषंसनीय भूमिक अदार् की है। क्योंकि सरकार एवं जनतार् दोनों द्वार्रार् इसे प्रषंसार् एवं मार्न्यतार् दी गयी है, अतएव भविश्य में भी इसे अधिक गौरवमय भूमिक अदार् करने के लिए प्रोत्सार्हित कियार् जार्येगार्। परन्तु उनके संगठन एवं क्रियार्प्रणार्ली में पूर्व वर्णित न्यूनतार्ओं को उन्हें मार्नव सेवार् के वार्स्तविक उपकरण बनार्ने हेतु दूर करनार् होगार्। सभी धर्मों के संतों, गुरूओं एवं पीरों की शिक्षार्एं लोगों को ध्यार्न के सार्थ सेवार् को मिलार्कर अहं को समार्प्त तथार् मोक्ष को प्रार्प्त करने क आदेष देते हैं। व्यार्स (जिलार् अमृतसर) में बार्बार् जैमल सिंह क डेरार् इस तथ्य क अनोखार् उदार्हरण है कि किस प्रकार सार्मुदार्यिक कार्य स्वैच्छिक ढंग से इतने विषार्ल स्तर पर कियार् जार् सकतार् है तथार् किस प्रकार धर्म को मार्नव सेवार् के लिए बेहतर प्रकार से प्रयोग कियार् जार् सकतार् है। व्यक्तियों ने भी स्वैच्छिक सेवार् के अनुपम उदार्हरण प्रस्तुत किये हैं। भगत पूरण सिंह, अमृतसर में पिंगलवार्ड़े के संत, मार्नसिक रूप से बार्धित, अपार्हिजों एवं बार्धितों के लिए महत्वपूर्ण सेवार् कर रहे हैं। उनके कार्य की ‘मदर टेरेसार्’ के सार्थ तुलनार् की गयी है। पिंगलवार्ड़ार् वार्स्तव में एक मंदिर है जहार्ं सावभैमिक भ्रार्तृत्व की शिक्षार् दी जार्ती है एवं उसक पार्लन कियार् जार्तार् है जहार्ं जार्ति, वंश, धर्ममत की जंजीरों को तोड़ दियार् गयार् है एवं मार्नवतार् की मशार्ल सदार् जलती रहती है। यह ठीक ही कहार् गयार् है कि स्वर्ग वहीं पर है जहार्ं लोग मिलजुलकर सम्पूर्ण मार्नव जार्ति के कल्यार्ण हेतु कार्य करते हैं तथार् नरक वहार्ं पर है जहार्ं कोर्इ भी मार्नवतार् के प्रति सेवार् की बार्त तक नहीं सोचतार्। भार्रत में स्वैच्छिकतार् इस कथन के पूर्वाद्ध में विष्वार्स करके इसक पार्लन करती है एवं वंचितों, दलितों, अलार्भार्न्वितों एवं अविषेशार्धिकारियों के कल्यार्ण हेतु विभिन्न प्रोग्रार्मों को क्रियार्न्वित तथार् कल्यार्ण रार्ज्य के आदर्ष को प्रार्प्त करने में रार्ज्य के प्रयार्सों के पूरक रूप में कार्य कर इसकी पुश्टि करती है।

    स्वयंसेवी संगठनों की समार्ज कल्यार्ण एवं विकास में भूमिका

     हमार्रे महार्न नेतार्ओं के स्वैच्छिक सार्मार्जिक कार्य पर बल दियार् है। उदार्हरणतयार् महार्त्मार् गार्ंधी रार्ज्य की अपेक्षार् सार्मूहिक सार्मार्जिक कार्य क शक्तिशार्ली समर्थन कियार् थार्। विनोबार् भार्वे एवं जय प्रकाश नार्रार्यण ने भी उनके विचार्रों की पुश्टि की थी। भार्रत में सार्मुदार्यिक कार्य एवं स्व-सहार्यतार् क लम्बार् इतिहार्स रहार् है, एक दयार्, सार्मूहिक हित की चिन्तार् एवं नि:स्वाथ कार्य भविश्य में भी दिखाइ देंगे। विकास में स्वयंसेवी संगठनों को संलग्न करने की आवश्यकतार् को स्वार्तन्त्रयोत्तर काल में (1957) सरकारी प्रलेखों में मार्न्यतार् दी गयी है। बलवन्तरार्य मेहतार् समिति क कथन है, ‘‘आज सार्मुदार्यिक विकास की विभिन्न परियोजनार्ओं की क्रियार्न्विति में गैर-सरकारी अभिकरणों एवं कार्यकर्तार्ओं पर तथार् इस नियम पर कि अन्तत: लोगों के स्वयं स्थार्नीय संगठनों को स्वयं सम्पूर्ण कार्य करनार् चार्हिए, पर अधिक से अधिक बल दियार् जार् रहार् है।’’ इसी प्रकार, ग्रार्मीण – नगरीय सम्बन्ध समिति (1966) ने विकास गतिविधियों हेतु सार्मुदार्यिक समर्थन प्रार्प्त करने में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिक पर बल दियार् गयार् थार्। पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं पर गठित एक अन्य अखिल भार्रतीय समिति (अषोक मेहतार् समिति) ने स्वयंसेवी अभिकरणों की प्रषंसार् इन शब्दों में की – ‘‘अनेक स्वयंसेवी संगठन, जो ग्रार्मीण कल्यार्ण में कार्यरत हैं, में कुछ ने व्यश्टि नियोजन कार्य में पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की सहार्यतार् की है। वे व्यार्पक क्षेत्रीय विकास योजनार्एं तैयार्र करती हैं, संभार्वितार् अध्ययन एवं लार्गत-लार्भ विष्लेशण करती हैं तथार् नियोजन एवं क्रियार्न्वयन में स्थार्नीय सहभार्गितार् को प्रेरित करने के सार्धनों की खोज करती है। ‘‘ अवाड भी परियोजनार् निर्मार्ण में परार्मष्र्ार्ीय सेवार्एं तथार् अपने सदस्य अभिकरणों को तकनीकी समर्थन प्रदार्न करती है। स्वयंसेवी अभिकरण, यदि उनके पार्स आवश्यक कौशल, प्रमार्णित ख्यार्ति एवं सुसज्जित संगठन है, पंचार्यती रार्ज संस्थार्ओं की नियोजन प्रक्रियार् में सहार्यतार् कर सकते हैं। उन्हेंविशेषतयार् परियोजनार्ओं एवं स्कीमों के निर्मार्ण में संलग्न कियार् जार् सकतार् है। वे सार्मार्जिक परिवर्तन के उपार्यों के पक्ष में शक्तिशार्ली जनमत तैयार्र करने में सहार्यतार् कर सकते हैं। चतुर्थ पंचवश्रीय योजनार् (1969-74) में अंकित कियार् गयार्, ‘‘सार्मार्जिक स्वयंसेवी संगठन पिछड़े वर्गों के मध्य कल्यार्ण गतिविधियों क प्रसार्र करने में महत्वपूर्ण भूमिक निभार् सकते हैं, उन्हें अस्पृष्यतार् को समार्प्त करने हेतु प्रचार्र और प्रोपेगण्डार् करने, छार्त्रार्वार्सों एवं शिक्षण संस्थार्ओं को चलार्ने, कल्यार्ण एवं सार्मुदार्यिक केन्द्रों को संगठित करने, सार्मार्जिक शिक्षार् देने तथार् प्रशिक्षण एवं ओरियन्टेशन पार्ठ्यक्रमों को चलार्ने जैसी परियोजनार्ओं के लिए सहार्यतार् दी जार्येगी।’’ सार्तवी पंचवश्रीय योजनार् में निर्धनतार् दूर करने एवं न्यूनतम आवश्यकतार्ओं सम्बन्धी प्रोग्रार्मों को क्रियार्न्वित करने के लिए स्वयंसेवी संगठनों को प्रधार्नतार् दी गयी क्योंकि इन प्रोग्रार्मों में आरम्भित कार्य इतने विशार्ल हैं कि सरकार अकेली प्रत्येक कार्य निश्पार्दित नहीं कर सकती। स्वयंसेवी अभिकरणों द्वार्रार् पूरक प्रयार्स आवश्यक होंगे, क्योंकि विभिन्न प्रकार के कौषल की आवश्यकतार् होगी, विभिन्न स्वरूप की रणनीतियों क रेखार्न्वित तैयार्र करनार् होगार्, लक्षित समूहों तक पहुंचने के लिए विभिन्न दृश्टिकोणों एवं अनुस्थार्पन वार्ले कार्मिकों को तैयार्र करनार् होगार्। इसके अतिरिक्त, सरकारी अधिकारियों को विकास कार्य सुपूर्द करनार् उचित नहीं होगार् क्योंकि यह नियमबार्धित एवं अनुदार्र होते हैं। सृजनार्त्मकतार्, नवीनतार्, उच्च उत्पेर्र णार् एवं प्रतिबद्धतार् अपेक्षित क्रियार्क्षेत्रों में गैर-सरकारी संगठन अधिक उपयुक्त है। इस दृि श्टकोण से आवश्यक तकनीकी कौषल से सज्जित स्वयंसेवी संगठन सार्मार्जिक-आर्थिक विकास के लार्भप्रद अभिकरण हो सकते है। छठी पंचवश्रीय योजनार् काल से विकास कार्य में स्वयंसेवी संगठनों को संलग्न किये जार्ने के बार्रे में सरकारी विचार्रधार्रार् में दर्षनीय परिवर्तन आयार् है। अब इन संस्थार्ओं को महत्वपूर्ण प्रोग्रार्मों जैसे बीस सूत्री कार्यक्रम में परार्मष्र्ार्ीय समूहों के मार्ध्यम से संलग्न करने की अति आवश्यकतार् है।

    जबकि सरकार के कल्यार्णकारी प्रोग्रार्मों में स्वयंसेवी अभिकरणों को दीर्घकाल से संलग्न कियार् जार् रहार् है, इनके सहयोग को अधिक व्यार्पक बनार्ने क विचार्र लगभग एक दषक से पुश्ट होतार् जार् रहार् है। अक्टूबर, 1982 में प्रधार्नमंत्री इंदिरार् गार्ंधी ने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखार् कि स्वयंसेवी अभिकरणों के परार्मष्र्ार्ीय समूहों को रार्ज्य स्तर पर संस्थार्गत कियार् जार्ये जो सार्तवीं पंचवश्रीय योजनार् में इसके प्रलेख में इस निष्चय को यह उल्लिखित करके स्पश्ट कर दियार् गयार् कि विभिन्न विकास कार्यक्रमों,विशेषतयार्, ग्रार्मीण विकास के कार्यक्रमों के क्रियार्न्वयन एवं नियोजन में स्वयंसेवी संगठनों को संलग्न करने हेतुविशेष प्रयार्स किये जार्येंगे।

    स्वयंसेवी अभिकरणों की शक्ति को मार्न्यतार् देते हुए इस प्रलेख में कहार् गयार्, ‘‘सार्मार्जिक एवं आर्थिक विकास की प्रक्रियार् को गति प्रदार्न करने मे उनकी भूमिक को अपर्यार्प्त मार्न्यतार् दी गयी है। इन अभिकरणों ने नये प्रतिरूपों एवं उपार्गमों सहित, प्रतिस्पर्धार् सुनिष्चित करके गरीबी रेखार् से नीचे रह रहे परिवार्रों की संलग्नतार् प्रार्प्त करके नवीनीकरण के लिए आधार्र प्रदार्न कियार् है। इस प्रलेख में कार्यक्रमों एवं सहयोग के क्षेत्रों,विशेषतयार् गरीबी दूर करने एवं नवीन कमलार्गत तकनीकी प्रोग्रार्मों की लम्बी सूची दी गयी। इसमें यह भी ध्यार्न दियार् गयार् कि सार्तवीं पंचवश्रीय योजनार्कार स्वैच्छिकतार् को व्यवसार्यी बनार्ने, व्यार्वसार्यिक योग्यतार् एवं प्रबंध कौशार्ल को आरम्भ करने जो स्वयंसेवी अभिकरणों के संसार्धनों एवं समर्थतार्ओं के अनुरूप होगार् परविशेष बल देगी।

    सार्तवीं योजनार् प्रलेख में स्वयंसेवी अभिकरणों के सार्थ क्रियार्शील समन्वय उत्पन्न करने हेतु केन्द्रीय एवं रार्ज्य सैक्टरों में 100 से 150 करोड़ रू0 के व्यय क प्रार्वधार्न कियार् गयार्। प्रलेख में यह भी उल्लिखित कियार् गयार् कि स्वयंसेवी अभिकरणों को एक आचार्र संहितार्, जो सरकार से अनुदार्न सहार्यतार् प्रार्प्त करने वार्ले अभिकरणों पर लार्गू हो, क निर्मार्ण करनार् चार्हिए।

    सार्तवीं योजनार् काल के दौरार्न सरकारी प्रोग्रार्मों के क्रियार्न्वयन एवं सरकारी फंडों से समर्थित अन्य विकास कार्य में स्वैच्छिक अभिकरणों की संलग्नतार् में पर्यार्प्त वृद्धि हुर्इ। आठवीं योजनार् (1991 – 96) में इस प्रवृत्ति के जार्री रहने की अधिक संभार्वनार् है।

    1. रार्ज्य के पार्स नार्गरिकों की सभी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति हेतु आवश्यक वित्तीय सार्धन एवं मार्नवषक्ति नहीं होती। स्वयंसेवी संगठन अतिरिक्त सार्धन जुटार्कर सरकार द्वार्रार् पूरी न की जार्ने वार्ली आवश्यकतार्ओं की पूर्ति तथार् स्थार्नीय जीवन को समृद्ध कर सकतार् है।
    2. स्वयंसेवी संगठन उन क्षेत्रों जो पूर्णतयार् रार्ज्य क दार्यित्व है, परन्तु जिनके लिए इसके पार्स सीमित सार्धन है में भी सहार्यतार् कर सकते हं ै एवं रार्जकीय संगठनों की तुलनार् में ऐसे कार्यों को अधिक अच्छी प्रकार निश्पार्दित कर सकते हैं। उदार्हरणतयार्, शिक्षार् रार्ज्य क दार्यित्व है, परन्तु स्वयंसेवी संगठनों द्वार्रार् चार्लित एवं प्रबन्धित शिक्षार् संस्थार्ओं की संख्यार् रार्जकीय संस्थार्ओं से कहीं अधिक है तथार् इनमें शिक्षार् क स्तर भी नमनीयतार्, प्रयोगीकरण की योग्यतार्, अग्रणी भार्वनार् एवं अन्य गुणों के कारण ऊँचार् है। यही बार्त स्वार्स्थ्य सेवार्ओं के बार्रे में भी है। परोपकारी एवं दार्नशील संस्थार्ओं द्वार्रार् चलार्ये जार् रहे अस्पतार्लों में रार्जकीय अस्पतार्लों की तुलनार् में अधिक अच्छी देखभार्ल की जार्ती है। व्यार्स में महार्रार्ज सार्वन सिंह दार्नशील अस्पतार्ल एक विचित्र आधुनिक संस्थार् है जहार्ं हजार्रों रोगियों क जार्ति अथवार् रंग के भेदभार्व के बिनार् नि:षुल्क इलार्ज होतार् है तथार् भोजन मिलतार् है।
    3. स्वयंसेवी संगठन केवल रार्ज्य क्षेत्रों में ही भूमिक अदार् नहीं करते, अपितु वे नयी आवश्यकतार्ओं में जार्ने क जोखिम उठार् सकते हैं, नये क्षेत्रों में कार्य कर सकते हैं, सार्मार्जिक कुरीतियों को उजार्गर कर सकते हैं तथार् ऐसी आवश्यकतार्ओं जिनकी अभी तक पूर्ति नहीं हुर्इ है अथवार् जिनकी ओर ध्यार्न नहीं दियार् गयार् है की ओर भी ध्यार्न दे सकते है। वे विकास क्रार्न्ति को दर्षार्ने वार्ले निर्मार्तार् एवं अभियंतार् के रूप में कार्य कर सकते हैं। वे सर्वेक्षण दल के रूप में कायर् कर सकते है। वे परिवतर्न के अग्रगार्मी बनकर परिवतर्न को कम कश्टदार्यक बनार् सकते है। वे प्रगति एवं विकास के लिए कार्य करके कालार्न्तर में रार्ज्य की गतिविधियों को व्यार्पकतर क्षेत्रों में विकसित करने में सहार्यतार् कर सकते है जिससे रार्श्ट्रीय न्यूनतम की वृद्धि होगी। 
    4. वे ऐसे व्यक्तियों, जो रार्ज्य की गतिविधियों में रार्जनीति एवं शार्सन के मार्ध्यम से भार्ग लेनार् पसन्द नहीं करते, को स्वयंसेवी समूहों में संगठित करके गतिविधियों के लिए माग प्रषस्त करते हैं जिससे ऐसे व्यक्तियों के ज्ञार्न, अनुभव एवं सेवार् भार्वनार् लोगों की आवश्यकतार्ओं एवं अपेक्षार्ओं को पूरार् करने एवं उनके जीवन को समृद्ध बनार्ने हेतु समार्ज में आवश्यक परिवर्तन लार्ने में उपलब्ध हो जार्ते हैं। वे व्यक्तियों को ऐसे समूहों, जो रार्जनीतिक नहीं हैं तथार् किसी भी रार्जनीतिक दल के सत्तार् में आने से जिनक कोर्इ सरोकार नहीं है, परन्तु जो दलगत रार्जनीति से ऊपर हैं एवं रार्श्ट्र निमाण् ार् के अन्य क्षेत्रों में रूचि रखते है में इकट्ठार् करके स्थिरकारी शक्ति के रूप में कार्य करते हैं तथार् इस प्रकार रार्श्ट्रीय एकीकरण एवं अरार्जनीतिक विशयों पर संकेन्द्रीकरण में योगदार्न देते हैं। 
    5. वे अपने सदस्यों को उनके कल्यार्ण हेतु सरकार की नीतियों एवं इसके कार्यक्रमों, उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों के बार्रे मे शिक्षित करने क कार्य करते हं ै तथार् बिनार् किसी भय एवं दृढ़ विष्वार्स से सरकार की नीतियों एवं गतिविधियों की रचनार्त्मक आलोचनार् करने की स्थिति में भी होते हैं जिससे सरकार इन नीतियों एवं प्रोग्रार्मों से प्रभार्वित होने वार्ले लार्गों के दृश्टिकोणों को स्थार्न देते हुए इनमें आवश्यक समुजन कर लेती है, जैसार् कि अनुसूचित जनजार्तियों एवं पर्यार्वरण संरक्षण से समबन्धित कार्यक्रमों के विशय में हुआ है। 
    6. वेविशेष हितों एवंविशेष समूहों, यथार् वृद्ध , विकलार्ंग, महिलार्एं, बार्लक आदि की विषिश्ट आवश्यकतार्ओं को पूरार् करने क प्रयार्स करते हैं जिन आवश्यकतार्ओं की रार्ज्य द्वार्रार् वित्तीय अभार्व के कारण समुचित रूप में पूर्ति नहीं हो सकती। वृद्धों के कल्यार्णकारी प्रोग्रार्मों में संलग्न स्वयंसेवी संगठन है। भार्रतीय बार्ल कल्यार्ण परिशद ् बार्ल कल्यार्ण के वर्द्धन में संलग्न हैं। अखिल भार्रतीय भूतपूर्व सैनिक कल्यार्ण समिति भूतपूर्व सैनिकों के कल्यार्ण से सम्बन्धित है। इसी प्रकार, हजार्रों स्वयंसेवी संगठन अपने-अपने सम्बन्धित समूहों के हितों की देखभार्ल करने हेतु वर्तमार्न है। 
    7. वे अपने लार्भाथियों एवं अपनी संतुश्टि के लिए कार्य करने की बेहतर स्थिति में होते हैं, क्योंकि वे अपने निकट व्यक्तियों, समूहों एवं समुदार्य की आवश्यकतार्ओं को पहचार्न कर उनकी पूर्ति हेतु समुचित कार्यक्रम बनार् सकते है उनकी क्रियार्न्वयन प्रक्रिमें पार््र प्त अनभ्ु ार्वों के प्रकाश में आवश्यक परिवर्तन कर सकते हैं, लोगों की सहभार्गितार् प्रार्प्त कर सकते हैं, आवश्यक निधि जुटार् सकते है लोक विष्वार्स एवं सहयोग पार््र प्त कर सकते हैं। जो सरकारी संगठन के अधिकारी करने में अयोग्य होते हैं।
    8. संक्षेप में, स्वयंसेवी संगठनों के प्रमख्ु ार् कायार्ंर् े में सम्मिलित हं ै – व्यक्तियों, समूहों एवं समुदार्यों की आवश्यकतार्ओं की जार्नकारी प्रार्प्त करके समिति बनार्ने की स्वतंत्रतार् के मौलिक अधिकार को मूर्त अभिव्यक्ति प्रदार्न करनार् इन आवश्यकतार्ओं की सरकारी सहार्यतार्, अनुदार्नों अथवार् निजी संसार्धनों द्वार्रार् पूर्ति हेतु परियोजनार्ओं एवं कार्यक्रमों को आरम्भ करनार्, नार्गरिकों की न्यूनतम आवश्यकतार्ओं के लिए प्रार्वधार्न करने में रार्ज्य के दार्यित्व में अंशदार्न देनार्, अनार्च्छार्दित एवं आपूर्ति आवश्यकतार्ओं के क्षेत्रों की पूर्ति करनार्, सरकार की एकाधिकार प्रवृत्तियों को रोकनार्, सेवार् भार्वनार् से भरपूर व्यक्तियों को लोक कल्यार्ण के वर्द्धन हेतु स्वयं को संगठित करने के अवसर प्रदार्न करनार्, नार्गरिकों को उनके अधिकारों एवं कर्तव्यों के बार्रे में शिक्षित करनार् तथार् उन्हें उनके कल्यार्ण हेतु सरकारी नीतियों एवं कार्यक्रमों की जार्नकारी देनार्, प्रचार्र मार्ध्यमों द्वार्रार् लोक समर्थन प्रार्प्त करनार्, चंदों तथार् दार्न द्वार्रार् वित्तीय संसार्धन जुटार्नार् एवं अन्तिम, समार्ज कल्यार्ण, नार्गरिकों के जीवन की संवृद्धि एवं रार्श्ट्र की प्रगति हेतु अरार्जनीतिक एवं गैर-दलीय प्रकार की गतिविधियों को संगठित करनार्। 

    स्वयंसेवी संगठनों की दुर्बलतार्एं एवं पार्रदर्षतार् 

    स्वयंसेवी संगठनों ने समार्ज के विभिन्न वर्गों को सेवार् प्रदार्न करने में महत्वपूर्ण भूमिक अदार् की है एवं सरकार के समर्थन से, जिसकी वे विरोधी न होकर सहभार्गी हैं, नये क्षेत्रों में अपने प्रोग्रार्मों क विस्तार्र करने में उनक भविश्य उज्जवल है। यदि उपर्युक्त वर्णित उनकी अपूर्णतार्ओं, दुर्बलतार्ओं एवं कमियों को दूर कर दियार् जार्तार् है एवं उनके संगठन तथार् संरचनार् को परिश्कृत एवं सशक्त बनार् दियार् जार्तार् है,विशेषतयार् नये सदस्यों की समय-समय पर भर्ती, पदार्धिकारियों क प्रजार्तंत्रीय निर्वार्चन, सही नेतृत्व की व्यवस्थार्, विकेन्द्रीकरण एवं सत्त क प्रतिनिधार्न, योग्य एवं प्रशिक्षित कार्मिक, प्रोग्रार्मों के निर्मार्ण एवं क्रियार्न्वयन में लोगों की भार्गीदार्री, निधियों क सही उपयोग, सार्मार्न्य समस्यार्ओं के विचार्र हेतु यंत्र, समन्वय यंत्र, रार्जनीतिज्ञों क अहस्तक्षेप, स्वार्थ्र्ार्ी हितों की समार्प्ति, समर्पित एवं परिश्रमी कार्यकर्तार्ओं की भर्ती, सार्मार्जिक दार्यित्व एवं स्वमूल्यार्ंकन आदि के क्षेत्र में तो वे अपनी प्रार्चीन सेवार् भार्वनार् को पुन: पार् सकते हैं तथार् सरकार एवं समार्ज दोनों की प्रशसार् एवं कृतज्ञतार् को अर्जित करके अधिक ओजस्वितार् से समार्ज की सेवार् कर सकते हैं।

    स्वयंसेवी संगठनों को रार्ज्य सरकारों द्वार्रार् सहार्यतार् 

    केन्द्रीय कल्यार्ण, स्वार्स्थ्य एवं परिवार्र कल्यार्ण, मार्नव संसार्धन विकास, ग्रार्मीण विकास, पर्यार्वरण एवं वन मंत्रार्लयों के अतिरिक्त रार्ज्य सरकारों के विभिन्न विभार्गविशेषतयार् समार्ज कल्यार्ण विभार्ग समार्ज के विभिन्न वगार्ंर् े हेतु कल्यार्ण प्रोग्रार्मों में संलग्न स्वयंसेवी संगठनों को सहार्यतार् अनदु ार्न प्रदार्न करते है। परन्तु समार्ज कल्यार्ण विभार्गों की कार्यदक्षतार् को सुधार्रने की आवश्यकतार् है तार्कि लार्भाथियों की बेहतर सेवार् हो सके। हरियार्णार् सरकार के समार्ज कल्यार्ण विभार्ग ने रार्ज्य में परित्यक्त महिलार्ओं एवं विधवार्ओं, वृद्धों एवं विकलार्ंग व्यक्तियों हेतु अनेक कल्यार्ण परियोजनार्ओं के क्रियार्न्वयन के लिए वर्श 1988-89 के लिए 141.17 करोड़ रू0 की रार्शि क प्रार्वधार्न कियार् थार्, परन्तु इसने फरवरी, 1989 तक बजट प्रार्वधार्न क केवल 46 प्रतिशत ही व्यय कियार्। हरियार्णार् विधार्न सभार् की अनुमार्न समिति ने समार्ज कल्यार्ण विभार्ग की सार्मार्न्य रूप से तथार् स्वयंसेवी संगठनों कीविशेष रूप से कार्यप्रणार्ली को परिश्कृत करने हेतु विभिन्न संस्तुतियार्ं एवं सुझार्व दिये हैं –

    1. निधियों के अपव्यय को रोकने के लिए, विभार्ग को विभिन्न स्कीमों पर रार्शि अनुपार्त में व्यय करनी चार्हिए तार्कि वर्श के अन्त में इसे लार्परवार्ही से व्यय न कियार् जार् सके। 
    2. विभार्ग को वित्त विभार्ग के सार्थ विचार्रार्धीन स्कीमों को स्वीकृत करार्ने हेतु तत्परतार् एवं ओजस्वितार् से मार्मले को अनसरित करनार् चार्हिए तार्कि धन समय पर प्रार्प्त हो सके एवं स्कीम के उद्देश्य को पूरार् कियार् जार् सके। 
    3. विभार्ग में अनेक पद 1987 से रिक्त पड़े हुए हैं, इन रिक्त पदों को तुरन्त भरार् जार्नार् चार्हिए तार्कि विभार्ग में कार्यकुशिलतार् क वर्द्धन हो सके अथवार् यदि इनकी आवश्यकतार् नहीं है अथवार् इनक शीघ्र नहीं भरार् जार् सकतार् तो इन्हें समार्प्त कर दियार् जार्ये।
    4. स्वयंसेवी संगठनों को सहार्यतार् अनुदार्न हेतु उपार्युक्त के मार्ध्यम से प्राथनार् पत्र देने की वर्तमार्न प्रक्रियार् में काफी समय की बर्बार्दी होती है, ऐसे प्राथनार्पत्र जिलार् कल्यार्ण अधिकारी के द्वार्रार् अपनी निरीक्षण रिपोर्ट सहित अग्रेशित किये जार्ने चार्हिए तार्कि विभार्ग से अनुदार्न समय पर मिल सके। 
    5. अनुदार्नों को समय पर दिये जार्ने के प्रष्न पर पुनर्विचार्र कियार् जार्ये एवं स्वयंसेवी संगठनों को कोर्इ कठिनाइ न हो, इस दृश्टि से स्पश्ट समय-सार्रिणी बनार् दी जार्ये। 
    6. सभी स्वयंसेवी संगठनों को सरकारी अनुदार्नों से क्रय आंशिक अथवार् पूर्ण रूप से सभी परिसम्पत्तियों क रिकार्ड रखनार् चार्हिए तथार् इनक प्रयोग केवल निर्दिश्ट उद्देश्यों के लिए ही, जिनके लिए अनुदार्न दियार् गयार् थार् कियार् जार्नार् चार्हिए। इन परिसम्पत्तियों को सरकार की पूर्ण सहमति के बिनार् विक्रय अथवार् अन्य किसी प्रकार से प्रयोग न कियार् जार्ये।
    7. स्वयंसेवी संगठनों को वित्तीय सहार्यतार् द्वार्रार् अछूते क्षेत्रों में कल्यार्ण सेवार्एं तथार् नयी कल्यार्ण सेवार्एं, जो अभी तक आरम्भ नहीं हुर्इ है क आरम्भ करने हेतु प्रोत्सार्हित कियार् जार्नार् चार्हिए। 

    स्वयंसेवी संगठनों को विदेशी सहार्यतार् 

    भार्रत में स्वयंसेवी संगठन विकासशील देषों में अपने प्रतिरूपों की भार्ंति अंतर्रार्श्ट्रीय स्वयंसेवी अभिकरणों (अशार्सकीय संगठनों) से भी सहार्यतार् प्रार्प्त करते हैं। कनार्डार् अंतर्रार्श्ट्रीय विकास अभिकरण ने देश की चार्र स्वयंसेवी एजेंसियों, यथार् – महिलार् विकास ऐक्षन, दिल्ली, सेवार्गिल्ड, मद्रार्स दीपार्लय शिक्षार् समार्ज, दिल्ली एवं नवयुवक एवं समार्ज विकास केन्द्र उड़ीसार्, को इन संस्थार्ओं को अंतर्रार्श्ट्रीय प्लार्न, जो दक्षिणी एशियार् में विष्व बार्ल विकास अभिकरण के मार्ध्यम से सषक्त बनार्ने हेतु लगभग एक करोड़ रूपयों क अनुदार्न दियार्। समार्ज कल्यार्ण के क्षेत्र में अधिक क्रियार्त्मक एवं प्िर सद्ध हैं : ‘केअर’; ऑक्सफोर्ड अकाल रार्हत समिति, विदेश सार्मुदार्यिक सहार्यतार्, डेविश अन्तर्रार्श्ट्रीय विकास अभिकरण एवं क्रिष्चियन बार्ल कोश। भार्रत को इनसे सबसे अधिक धन प्रार्प्त हुआ है। भार्रत में इन अभिकरणों के कार्यक्षेत्र में सम्मिलित हैं : संकटकालीन एवं विपत्ति रार्हत, स्वार्स्थ्य एवं शिक्षार्, सार्मुदार्यिक विकास, पूरक पोशार्हार्र, महिलार्, बार्ल, विकलार्ंग एवं अन्य पीड़ित वर्गों क कल्यार्ण, सार्मार्जिक सुरक्षार्, सार्मार्जिक एवं नैतिक स्वार्स्थ्य विज्ञार्न, पुनर्वार्स कार्य, दत्तक देखभार्ल एवं प्रयोजन आदि।

    अन्तर्रार्श्ट्रीय अभिकरण मार्नव पीड़ार् को दूर करने हेतु क्रिष्चियन चिन्तार् एवं दार्नशीलतार् से प्रेरित होते हैं। अन्तर्रार्श्ट्रीय रैडक्रार्स युद्ध में घार्यल सैनिकों की चिकित्सीय देखभार्ल एवं मार्नवी व्यवहार्र तथार् सेनार् में कार्य कर रहे व्यक्तियों को सुरक्षार् प्रदार्न करने के लिए 1861 में स्थार्पित सर्वप्रथम वृहद् अन्तर्रार्श्ट्रीय संगठन थार्। बार्द में, इसक कार्यक्षेत्र गंभीर बनार्ने के लिए तकनीकी मागदर्षन देकर, रार्श्ट्रीय जन सहयोग एवं बार्ल विकास संस्थार्न, रार्श्ट्रीय सार्मार्जिक सुरक्षण संस्थार्न, रार्श्ट्रीय “ौक्षिक अनुसंधार्न एवं प्रषिक्षण परिशद आदि में उनके कार्मिकों को प्रषिक्षण देकर, उनकी आवश्यकतार्ओं एवं समस्यार्ओं में अनुसंधार्न करार्कर, उनके द्वार्रार् संगठित समार्ज कल्यार्ण सेवार्ओं एवं संस्थार्नों को नियमित करके, सेवार्ओं के न्यूनतम मार्नकों को सुनिष्चित करके, कर्मचार्री वर्ग एवं लोगों के शोशण को रोक कर, वैतनिक एवं स्वैच्छिक कार्यकर्तार्ओं की सूची तैयार्र करके, कार्य रणनीतियों क विकास करने के लिए अनुभवों एवं विचार्रों के आदार्न-प्रदार्न हेतु मंच प्रदार्न कर।

    महिलार् एवं बार्ल विकास विभार्ग, कल्यार्ण मत्रार्लय, मार्नव संसार्धन विकास मंत्रार्लय के मार्ध्यम से सरकार स्वयंसेवी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिक को मार्न्यतार् देते हुए उनके प्रतिनिधियों को विभिन्न समितियों, कार्यसमूहों एवं अध्ययन दलों में स्थार्न देकर उनकी सेवार्ओं क कल्यार्णकारी रार्ज्य के आदर्ष को सार्कार बनार्ने हेतु लार्भ उठार्ती है एवं उन्हें विदेषों में आयोजित सम्मेलनों, गोश्ठियों आदि में भार्ग लेने के लिए भेजती है। वार्स्तविक रूप में, सरकार यह अनुभव करती है कि विकास एवं समार्ज कल्यार्ण के प्रत्येक क्षेत्र में स्वयंसेवी अभिकरणों की सहभार्गितार् अनिवाय है। कुछ समय पूर्व, इसने बच्चों के अन्तरार्देश अंगीकरण के मार्मलों की प्रार्यार्जित/छार्नबीन करने हेतु लगभग एक-सौ भार्रतीय एवं लगभग तीस विदेशी सार्मार्जिक/बार्ल कल्यार्ण अभिकरणों को मार्न्यतार् प्रदार्न की है।

    अभी हार्ल ही में, कल्यार्ण मंत्रार्लय ने स्वैच्छिक प्रयार्सों को बढ़ार्वार् देने की दृश्टि से ऐसे स्वयंसेवी संगठनों को संगठनार्त्मक सहार्यतार् देने की स्कीम आरम्भ की है जो प्रमुख रूप में कल्यार्ण गतिविधियों में संलग्न है एवं जिनक क्रियार्क्षेत्र इतनार् व्यार्पक है कि इसे समन्वय हेतु केन्द्रीय कार्यार्लय स्थार्पित करनार् आवश्यक है। ऐसी सहार्यतार् अधिकतम पन्द्रह वर्शों तक दी जार्ती है। सहार्यतार् की रार्शि मार्त्रार्, गुण के आधार्र पर निर्धार्रित की जार्ती है। केन्द्रीय कार्यार्लय को चलार्ने हेतु व्यार्वसार्यिक एवं अव्यार्वसार्यिक कार्मिकों के वेतन, भत्तों एवं अन्य आकस्मिक व्यय को इस रार्शि क निर्धार्रण करते समय ध्यार्न में रखार् जार्तार् है। प्रबन्धक संगठनों द्वार्रार् चलार्ये जार् रहे स्कूल्य ऑफ सोशल वर्क, जिन्हें विष्वविद्यार्लय अनुदार्न आयोग से सहार्यतार् प्रार्प्त नहीं होती, भी इस स्कीम के अन्तर्गत सहार्यतार् अनुदार्न के पार्त्र हैं।

    उपर्युक्त वर्णित उपार्य सरकार द्वार्रार् स्वयंसेवी संगठनों की भूमिक की प्रषंसार् एवं मार्न्यतार् क प्रमार्ण है। परन्तु इसे उनके ऊपर नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण भी करनार् होतार् है तार्कि स्वयंसेवी संगठनों को प्रदत्त वित्तीय सहार्यतार् को उसी उद्देश्य के लिए प्रयोग कियार् जार्ये जिसके लिए यह दी गयी है। इसक कोर्इ दुरूपयोग अथवार् गबन न हो, उनके द्वार्रार् उन नियमों विनियमों, अनुदेषों, दिशार् निर्देषों क पार्लन कियार् जार्ये जो पदार्धिकारियों के नियमित निर्वार्चन, योग्य स्टार्फ की नियुक्ति, सेवार्ओं के स्तर को बनार्ये रखने के लिए जार्री किये गये हैं। वह सहार्यतार् अनुदार्न के प्रयोग कर लिये जार्ने क प्रमार्ण-पत्र स्वीकृत लेखार् परीक्षकों से लेखार् परीक्षण के उपरार्ंत प्रस्तुत करें। सरकार ऐसे संगठनों के विरूद्ध जार्ंच आयोग कानून के अधीन जार्ंच भी आरम्भ कर सकती है जिनके विरूद्ध फंडों के दुरूपयोग अथवार् गबन एवं कुप्रबन्ध के आरोप हैं अथवार् ऐसी शिकायतों की छार्नबीन हेतु समितियों की नियुक्ति कर सकती है तथार् आरोप सिद्ध हो जार्ने पर उनके विरूद्ध उचित कार्यवार्ही कर सकती है।

    स्वयंसेवी संगठनों की भूमिक को मार्न्यतार् 

    भार्रत में कल्यार्णकारी सेवार्ओं के विकास में स्वयंसेवी प्रयार्सों की महत्वपूर्ण भूमिक रही है, जैसार् कि दक्षिण में विभिन्न बार्ंध परियोजनार्ओं के बार्रे में हुआ है। यदि स्वयंसेवी अभिकरण को निर्धनों के हितों की चिन्तार् है तो यह सरकार के विरूद्ध संघर्श में उलझ सकती है जिसे सरकारी अधिकारी स्पश्टतयार् अनुमोदित नहीं करेंगे। पुन: स्वयंसेवी अभिकरण से कम लार्गत वार्ले स्थार्नीय संसार्धनों पर आधार्रित तकनीकों में योगदार्न देने की अपेक्षार् की जार्ती है जो निर्धन कृशकों के लिए सर्वार्धिक उपयुक्त होती है, परन्तु स्थार्नीय अधिकारी हरित क्रार्न्ति प्रकार की प्रार्वधिकी में, जो कृशि रसार्यनों की उच्च मार्त्रार्ओं तथार् तदनुरूप बीजों पर आधार्रित है के प्रसार्र करने में संलग्न हैं। स्वयंसेवी अभिकरण रार्सार्यनिक कीटनार्शकों के प्रयोग को कम करने के लिए लोगों को कहते हैं, जबकि सरकार ऐसे बीजों क प्रचार्र करती है जो ऐसे रसार्यनों के प्रयोग की मार्ंग करते है। इस पक्र ार्र, सरकार तथार् स्वयंसेवी संगठन के मध्य संघर्श क्षेत्रों में वृद्धि होती जार्ती है।

    स्वयंसेवी अभिकरणों को संलग्न करने की रणनीति सरकार एवं अभिकरणों के मध्य स्वस्थ वार्तार्वरण एवं सद्भार्व की उपस्थिति की पूर्वकल्पनार् करती है। परन्तु दुर्भार्ग्यवश, वर्तमार्न सम्बन्ध सुखद नहीं है। प्रत्येक में दूसरे के प्रति शंक एवं अवस्थार् क अभार्व है। यद्यपि दोनों के मध्यविशेषतयार् उच्च स्तरों पर अधिकारियों एवं स्वयंसेवी संगठनों के प्रमुख प्रतिनिधियों के मध्य अच्छे संबंधों के एवं किये गये अच्छे कार्यों के कुछेक उदार्हरण देखे जार् सकते है तथार्पि प्रशार्सन के निचले स्तरों पर,विशेषतयार् गैर-संस्थार्त्मक एवं छोटे समूहों के प्रति ग्रार्मीण स्तर पर खुलार् विरोध है। जैसार् ऊपर वर्णित कियार् गयार् है, विकास प्रयार्सों को बेहतर बनार्ने के लिए सरकार एवं स्वयंसेवी संगठनों के मध्य सहयोग सुनिष्चित करने हेतु स्वतंत्र एवं स्पश्ट विचार्र-विमर्ष द्वार्रार् कुछेक महत्वपूर्ण विशयों के समार्धार्न किये जार्ने की आवश्यकतार् है।

    वस्तुत: इन समस्यार्ओं क जन्म सरकार एवं स्वयंसेवी अभिकरणों के मध्य संबंध, विकास कार्य में इन अभिकरणों की भूमिक तथार् सार्मुदार्यिक विकास एवं जनसहयोग पर किसी स्पश्ट नीति की अनुपस्थिति के कारण हुआ है। अत: सरकार को संघर्श क्षेत्रों को यदि समार्प्त नहीं हो सकते तो कम करने एवं दोनों के मध्य सरल सम्बन्धों को बनार्ये रखने के लिए सुस्पश्ट नीति की घोशणार् करनी होगी। दोनों सरकार एवं स्वयंसेवी अभिकरणों को अपनी उचित भूमिकाओं को स्पश्ट समझनार् होगो। संगठनों को यह मार्ननार् होगार् कि उनक कार्य रार्ज्य क पूरक है। वे दूसरार् रार्ज्य नहीं है, अधिक से अधिक वे सरकार के प्रयार्सों के पूरक हो सकते हैं, वे रार्ज्य द्वार्रार् आरम्भिक सार्मार्जिक पुनर्निर्मार्ण के प्रयार्सों क स्थार्न नहीं ले सकते। यह उनक सरकार के प्रति सकारार्त्मक दृश्टिकोण होनार् चार्हिए। इसी प्रकार, सरकार को भी स्वयंसेवी अभिकरणों की महत्वपूर्ण भूमिक की प्रषंसार् करनी चार्हिए तथार् स्वैच्छिक कार्य की प्रकृति एवं इसके दर्षन को समझनार् चार्हिए। दूसरार् यह सत्य है कि सरकारी सहार्यतार् अनुदार्नों पर स्वयंसेवी अभिकरणों की अतिनिर्भरतार् उनके कार्य एवं विचार्रधार्रार् की स्वतंत्रतार् जो स्वैच्छिक कार्य क मूल तत्व है, को कठिन बनार् देती है। परन्तु सरकार को इस सीमार् तक उनके ऊपर नियंत्रण नहीं करनार् चार्हिए कि रार्जनीतिक वैरभार्व अथवार् अधिकारियों के अहं से पे्िर रत जार्ँच आयोग स्थार्पित करके उन्हें अपमार्नित कियार् जार्ये। स्वयंसेवी अभिकरणों क उचित मागदर्षन करने तथार् उन्हें निर्दिश्ट कार्यों के निश्पार्दन में सहार्यतार् दिये जार्ने की आवश्यकतार् है। सरकार एवं स्वयंसेवी संगठन के मध्य सम्बन्ध सार्मार्जिक कल्यार्ण एवं विकास मे क्रमश: भूमिक अदार् करने के लिए सार्मार्न्य प्रयार्स में सहभार्गितार् क सम्बन्ध है। यहद इस सहभार्गितार् को ठीक प्रकार से कार्य करनार् है तो सरकार एवं स्वयंसेवी संगठन दोनों को परस्पर सम्मार्न करनार् चार्हिए। जैसार् पूर्व वर्णित कियार् गयार् है, ब्रिटेन में सरकार किसी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व विभिन्न प्रकार के स्वयंसेवी संगठनों, व्यार्वसार्यिक संगठनों एवं सेवार् संगठनों से परार्मर्ष करके प्रोग्रार्मों क निर्मार्ण करती है। परिणार्मत: जब निर्णय की घोशणार् संसद में की जार्ती है तो इससे सम्बन्धित हितों एवं संगठनों की निहित सहमति प्रार्प्त होती है। क्योंकि स्वयंसेवी संगठनों को नियोजन स्तर पर ही संलग्न कर लियार् जार्तार् है, अतएव उनके क्रियार्न्वयन में वे सहर्श सहयोग प्रदार्न करते हैं। ऐसे उद्देश्य की प्रार्प्ति हेतु प्रधार्नमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरार् गार्ँधी ने अक्टूबर, 1982 में सभी रार्ज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्वयंसेवी अभिकरणों के परार्मष्र्ार्ीय समूहों की स्थार्पनार् पर बल दियार् थार्, परन्तु दुर्भार्ग्यवश केवल कुछेक परार्मष्र्ार्ीय समूह ही स्थार्पित किये गये हैं। इस सुझार्व क पूर्णरूपेण परिपार्लन कियार् जार्नार् अति आवश्यक है। संक्षेप में सह-भार्गितार् सरकार एवं स्वयंसेवी संगठनों के मध्य संबन्धों क मूल है एवं दोनों सहभार्गियों के हित में इसक पार्लन कियार् जार्नार् चार्हिए। सरकार क्योंकि वरिश्ठ सहभार्गी है, अतएव इसे स्वयंसेवी संगठनों की तुलनार् में अधिक उदार्र एवं सहार्यक होनार् चार्हिए।

    स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका 

    समार्ज कल्यार्ण में सवयंसेवी संगठनों की भूमिक क दो मौलिक आधार्रों पर मूल्यार्ंकन कियार् जार् सकतार् है। सर्वप्रथम, रार्श्ट्रीय सरकार द्वार्रार् आरम्भित रार्श्ट्रीय योजनार् के नियोजन एवं क्रियार्न्वयन में लोगों की सहभार्गितार् सम्बन्धी पक्ष है। नियोजकों ने प्रजार्तंत्रीय योजनार् के बार्द लोगों की स्वैच्छिक सहमति प्रार्प्त करने के लिए ही नहीं, अपितु नियोजन एवं क्रियार्न्वयन प्रक्रियार् में उनकी सकारार्त्मक सहभार्गितार् प्रार्प्त करने के लिए भी बहुधार् अपनी उत्कृश्ट इच्छार् अभिव्यक्त की है। दूसरे शब्दों में, सरकारी तौर पर निर्मित एवं प्रशार्सित योजनार् में अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व प्रार्प्त लोगों अथवार् उनके संगठनों को सम्बद्ध करने क ही प्रष्न नहीं है, अपितु विकास की सम्पूर्ण प्रक्रियार् में संयुक्त सहभार्गितार् विकसित करनार् है। वस्तुत: यह सहभार्गितार् प्रजार्तंत्र की अवधार्रणार् को वार्स्तविकतार् में रूपार्न्तरित करने की ओर एक पत्र है।

    इस सार्मार्न्य उपार्गम के अतिरिक्त जो प्रजार्तंत्रीय योजनार् के अन्तर्गत किसी विकासीय परियोजनार् के बार्रे में उचित है, समार्ज कल्यार्ण के क्षेत्र में स्वयंसेवी संगठनों को महत्वपूर्ण भूमिक दिये जार्ने क एक अन्य औचित्य है। भार्रत में सार्मार्जिक कार्य के लम्बे इतिहार्स में स्वयंसेवी संगठनों ने सदार् महत्वपूर्ण भूमिक निभाइ है। चार्हे किसी विपदार्ग्रस्त व्यक्ति अथवार् अकाल अथवार् बार्ढ़ से उत्पन्न संकट क मार्मलार् थार्, स्वयंसेवी संगठन सेवार् प्रदार्न करने में आगे आतार् थार्। रार्ज्य की भूमिक तत्कालीन शार्सकों के दृश्टिकोण के अनुसार्र उदार्सीनतार् से लेकर आकस्मिक कभी-कभी परोपकारी रूचि तक बदलती रही है। शतार्ब्दियों तक रार्ज्य सहार्यतार् की अपेक्षार् सार्मुदार्यिक सहार्यतार् ही स्वयंसेवी संगठनों क प्रमुख आधार्र रही है। भार्रत में स्वतंत्रतार्-प्रार्प्ति के उपरार्न्त ही रार्ज्य के दृश्टिकोण में महत्वपूर्ण परिवर्तन आयार् है। संविधार्न में प्रगतिशील सार्मार्जिक नीति क निरूपण कियार् गयार् तथार् देष की योजनार्ओं में कल्यार्णकारी प्रोग्रार्मों की उचित स्थार्न दियार् गयार्।

    फंड-एकत्रीकरण – परिवर्तित सार्मार्जिक-आर्थिक दशार्ओं के कारण स्वयंसेवी संगठनों के लिए फंड इकट्ठार् करनार् कठिन हो गयार् है। रेणुक रार्य समिति 1959 ने विकास एवं भरण-पोशण अनुदार्नों सहित सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली की सिफार्रिष की थी। इसके बार्वजूद भी स्वयंसेवी संगठनों को स्वयं को चार्लू रखने हेतु बढ़ते हुए व्यय को पूरार् करने के लिए पर्यार्प्त धन इकट्ठार् करनार् होगार्। सहार्यतार् अनुदार्न प्रणार्ली स्वयंसेवी संगठनों के प्रयार्सों क केवल पूरक हो सकती है। यह भी आवश्यक है कि अपने स्वयंसेवी स्वरूप के संरक्षण हेतु उन्हें रार्ज्य सहार्यतार् पर अत्यधिक आश्रित नहीं होनार् चार्हिए। सार्मुदार्यिक सहार्यतार् की मार्त्रार् संगठन करने क विचार्र कुछ वर्शों से प्रचलित है। इस विचार्र क प्रमुख तत्व यह है कि कोश को नार्गरिकों की अधिक संख्यार् से अल्प-दार्न न कि दार्नवीरों की अल्प संख्यार् से विशार्ल दार्न द्वार्रार् इकट्ठार् कियार् जार्ये। इस लक्ष्य को सम्मुख रखते हुए समिति ने कहार् : ‘‘स्वयंसेवी संगठनों को फंड एकत्रित करने के अपने प्रोग्रार्मों को पुनर्रूप देनार् होगार्, तार्कि वे कुछेक दार्नवीरों की सहार्नुभूति की अपेक्षार् नार्गरिकों के विषार्ल बहुमत की स्वैच्छिक सहार्यतार् पर निर्भर हो।’’

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