एकाकी व्यार्पार्र क्यार् है ?
एकाकी व्यार्पार्री स्वयं ही व्यवसार्य क प्रबंधक और कर्मचार्री होतार् हैं। वह स्वयं ही आवष्यक पूंजी लगार्तार् हैं। लार्भ-हार्नि क अधिकारी होतार् हैं तथार् व्यार्पार्र के समस्त उत्तरदार्यित्वों को पूरार् करतार् है। इन्ही विषेषतार्ओं के कारण उसे एकाकी व्यार्पार्री, व्यक्तिगत सार्हसी, व्यक्तिगत व्यवस्थार्पक, एकल स्वार्मी तथार् एकाकी स्वार्मित्व आदि भी कहार् जार्तार् हैं। डॉ. जार्नए ए. शुबिन के अनुसार्र:-‘एकाकी व्यार्पार्र के अंतर्गत एक ही व्यक्ति समस्त व्यार्पार्र क संगठन करतार् हैं उसक स्वार्मी होतार् हैं तथार् अपने नार्म से व्यार्पार्र क संचार्लन करतार् हैं।’

एकाकी व्यार्पार्र के प्रमुख लक्षण यार् विशेषतार्एं

  1. एकल स्वार्मित्व- एकाकी व्यार्पार्र में व्यार्पार्र क स्वार्मी एक ही व्यक्ति होतार् हैं जो व्यार्पार्र के समस्त कार्यो के लिये स्वयं उत्तरदार्यी होतार् हैं।
  2. निर्णय लेने में स्वतंत्र- एकाकी व्यार्पार्री अपने व्यार्पार्र के संबंध में स्वंय निर्णय लेतार् हैं। उसे निर्णय लेने के लिये किसी सहयोगी यार् सार्झेदार्र पर निर्भर नहीं रहनार् पड़तार्।
  3. असीमित उत्तरदार्यित्व- एकाकी व्यार्पार्र में स्वार्मी केवल एक ही व्यक्ति होतार् हैं। अत: व्यार्पार्र को होने वार्ली हार्नि की क्षतिपूर्ति करने क दार्यित्व उसी पर होतार् हैं। यदि किसी कारणवश व्यार्पार्र में लगाइ गइ पूंजी से अधिक हार्नि होती हैं तो उस अतिरिक्त हार्नि की पूिर्त उसे अपनी निजी सपंत्ति से करनी पड़ती है।पैकमने के अनुसार्र-’काननू एकाकी व्यार्पार्री के व्यार्पार्र अथवार् घर में कोर्इ अंतर नहीं मार्नतार्। एकाकी व्यार्पार्र में होने वार्ली हार्नि के अंतिम पैसे चुकाने तक वह उत्तरदार्यी होतार् हैं।
  4. सीमित व्यार्पार्र क्षेत्र- प्रत्येक व्यक्ति की प्रबंध पूंजी कार्य करने की क्षमतार् सीमित होती हैं। अत: सार्झेदार्री व कंपनी के व्यवसार्य क्षेत्र की तुलनार् में एकाकी व्यार्पार्र क क्षेत्र सीमित रहतार् हैं।
  5. ऐच्छिक प्रार्रंभ व समार्पन- एकाकी व्यार्पार्र क प्रार्ंरभ एंव अंत करनार् दोनो ही सरल हैं। एकाकी व्यार्पार्री जब चार्हे तब व्यार्पार्र आरंभ एवं समार्पन कर सकतार् हैं। इसके लिये उसे किसी के सहयोग यार् सहमति की आवष्यकतार् नहीं हैं।
  6. लोभों पर एकाधिकार- एकाकी व्यार्पार्री क लार्भों पर एकाधिकार होतार् हैं, इसी प्रकार हार्नि की स्थिति मे वह अकेलार् उत्तरदार्यी होतार् हैं।
  7. व्यवसार्य चुुनने की स्वतंत्रतार्- एकाकी व्यार्पार्री अपनी इच्छार् से व्यवसार्य चुनने एंव उसे परिवर्तित करने के लिये स्वतंत्र होतार् हैं। इसके लिये वह किसी के परार्मर्श को मार्नने के लिये बार्ध्य नहीं होतार् हैं।

    एकाकी व्यार्पार्र क महत्व

    1. व्यक्ति एकाकी व्यार्पार्र करके स्वतंत्र जीवन व्यतीत कर सकतार् हैं। 
    2. यह रोजगार्र के अवसरों में वृद्धि करतार् हैं। नौकरी प्रार्प्त न होने पर व्यक्ति आसार्नी से इसके मार्ध्यम से अपनी जीविक कमार् सकतार् हैं। 
    3. एकाकी व्यार्पार्र में धन क छोटी-छोटी इकार्इयों में विकेद्रीकरण हो जार्तार् हैं। जिससे गरीबी व अमीरी क खाइ बढ़ने नहीं पार्ती। 
    4. एकाकी व्यार्पार्र मे अधिक प्रतिस्पर्द्धार् पार्यी जार्ती हैं, जिसके कारण ग्रार्हकों कों कम कीमत पर अच्छी वस्तुयें मिलने लगती हैं। 
    5. एकाकी व्यार्पार्र व्यक्तिगत हित होने के कारण एकाकी व्यार्पार्री सार्ार्धनों को कुशलतार्पूर्वक उपयोग करतार् हैं। 
    6. एकाकी व्यार्पार्र छोटे व्यार्पार्र क सूत्रधार्र होतार् है। आगे चलकर यह बड़ें व्यार्पार्र क रूप ले लेतार् हैं।

      एकाकी व्यार्पार्र के लार्भ एवं गुण

      अनेक गुणों के कारण एकाकी व्यार्पार्र प्रार्चीन काल से आजतक चलार् आ रहार् हैं। विश्व के सभी देशो में अनेक व्यार्पार्री इस प्रणार्ली से अपनार् व्यवसार्य संचार्लित कर रहे हैं। एकाकी व्यार्पार्र के प्रमुख लार्भ है-

      1. व्यार्वसार्य आरभं करने में सुविधार्- एकाकी व्यार्पार्र प्रार्रंभ करनार् बड़ार् सरल है। इस व्यार्पार्र को प्रार्रंभ करते समय लार्इसेंस यार् पंजीयन की आवष्यकतार् नहीं होती हैं, व्यक्ति अपनी सुविधार्नुसार्र व्यार्पार्र प्रार्रंभ तथार् समार्पन कर सकतार् हैं। 
      2. त्वरिक निर्णय- व्यार्पार्र क स्वार्मी स्वयं होने के कारण एकाकी व्यार्पार्री व्यवसार्य से संबंधित सभी बार्तों क निर्णय स्वयं तथार् शीघ्रतार् से ले लेतार् हैं। स्वार्वलंबी तथार् आत्मनिर्भरतार् की प्रवृत्ति एकाकी व्यार्पार्री को विवेकशील तथार् विचार्रवार्न बनार्ती हैं। 
      3. मितव्ययितार्- असीमित उत्तर दार्यित्व व लार्भ हार्नि के लिये स्वयं उत्तरदार्यी होने के कारण एकाकी व्यार्पार्री अनार्वश्यक खर्च को कम करते हुये धन के दुरूपयोग को रोकतार् हैं। इससे लार्भ में वृद्धि होती हैं और हार्नि कम हो जार्ती हैं। 
      4. गोपनीयतार्- एकाकी व्यार्पार्र में गोपनीयतार् पार्यी जार्ती हैं। एकाकी व्यार्पार्र में एक व्यक्ति ही व्यवसार्य क संचार्लक होतार् हैं तथार् उसे व्यार्पार्र की समस्त बार्ते पतार् होती हैं। इसके अलार्वार् एकाकी व्यार्पार्री को अपने खार्ते भी प्रकाशित नहीं करने पड़ते, अत: खार्ते संबंधी भेद भी गोपनीय रहते हैं। 
      5. सपूंर्ण लार्भ पर एकाधिकार- ‘एकाकी व्यार्पार्र में संपूर्ण लार्भ पर एकाकी व्यार्पार्री क एकाधिकार होतार् हैं। अत: एकाकी व्यार्पार्री अधिक परिश्रम, लगन, चतुराइ, विवेक तथार् धैर्य से काम करतार् हैं। तार्कि उसे अधिक से अधिक लार्भ हो सके। 
      6. व्यक्तिगत संपर्क – एकाकी व्यार्पार्र क एक अन्य लार्भ यह हैं कि एकाकी व्यार्पार्री ग्रार्हकों के व्यक्तिगत संपर्क में रहतार् हैं जिसके कारण ग्रार्हकों से उसके निजी संबंध स्थार्पित हो जार्ते हैं। इससे उसके व्यार्पार्र में वृद्धि होती हैं। इस प्रकार के संबंध क व्यार्पार्र पर उत्कृष्ट प्रभार्व पड़तार् हैं। 
      7. ऋण प्रार्प्त करने में सुविधार्-एकाकी व्यार्पार्री के असीमित दार्यित्व तथार् ऋणदार्तार् व व्यार्पार्री में व्यक्तिगत संपर्क होने के कारण ऋण प्रार्प्त करने मे विशेष सुविधार् होती हैं। ऋणदार्तार् एकाकी व्यार्पार्र की सार्ख व संपत्ति से अच्छी तरह परिचित रहतार् हैं, अत: एकाकी व्यार्पार्र को उचित समय पर पर्यार्प्त मार्त्रार् में सही ब्यार्ज दर से ऋण पार््रप्त हो जार्तार् है।
      8. पैतृक गुण व ख्यार्ति क लार्भ- एकाकी व्यार्पार्र में पितार् के सार्थ पुत्र भी कार्य करतार् हैं। अत: ग्रार्हक से बार्तचीत करने, मोलभार्व करने, नार्पने, तोलने, हिसार्ब लिखने से संबंधित गुण पुत्र को बचपन से प्रार्प्त हो जार्ते हैं। सार्थ ही व्यार्पार्री को अपने पितार् की प्रसिद्धि क लार्भ भी व्यार्पार्र में मिलतार् हैं।

        एकाकी व्यार्पार्र की हार्नि यार् दोष

        1. सीमित प्रबधंकीय योग्यतार्- प्रत्येक मार्नव में ज्ञार्न, अनुभव व प्रबधंकीय कुशलतार् सीमित होती हैं अत: व्यक्ति जब व्यार्पार्र के समस्त कार्य देखतार् हैं तो उसने कही न कहीं त्रुटियार् रह जार्ती हैं। एकाकी व्यार्पार्री के पार्स जितनी योग्यतार् होती हैं उतनार् ही वह व्यार्पार्र क विकास कर पार्तार् हैं। 
        2. सीमित  पूजी-एकाकी व्यार्पार्री की पूंजी सीमित होती हैं। अत: वह अपने व्यवसार्य क सीमित मार्त्रार् में ही विकास कर पार्तार् हैं। 
        3. सीमित सार्ख- एकाकी व्यार्पार्री की ख्यार्ति एवं निजी सार्ख सीमित होती हैं। अत: उसे उधार्र भी कम मिलतार् है। कम पूंजी व सीमित सार्ख के कारण एकाकी व्यार्पार्र क आकार छोटार् होतार् हैं। कर्इ बार्र जब व्यार्पार्री को अधिक सार्ख की आवश्यकतार् होती हैं तो आवश्यकतार्नुसार्र सार्ख न मिलने पर व्यवसार्य को हार्नि होती हैं। 
        4. असीमित उत्तरदार्यित्व- एकाकी व्यार्पार्र क दार्यित्व असीमित होतार् हैं। एकाकी व्यार्पार्री ही व्यार्पार्र की संपूर्ण हार्नि को चुकाने को उत्तरदार्यी होतार् हैं, इस कारण उसकी संपत्ति सुरक्षित नहीं रह पार्ती। दुर्भार्ग्य से यदि व्यार्पार्र में हार्नि हो जार्ये तो व्यार्पार्री को अपनी निजी संपत्ति से हार्नि क भुगतार्न करनार् पड़तार् हैं। इससे उसक आर्थिक जीवन समार्प्त हो जार्तार् हैं। यह एकाकी व्यार्पार्र क सबसे बड़ार् दोश हैं। 
        5. अनुपस्थिति से क्षति- एकाकी व्यार्पार्री अपने व्यार्पार्र क प्रबंध एंव संचार्लन स्वंय करतार् हैं। यदि वह बीमार्र हो जार्तार् हैं यार् अन्य कारणों से वह व्यार्पार्र से अनुपस्थित रहतार् हैं तो उसे व्यार्पार्र बंद करनार् पड़तार् हैं। इससे व्यार्पार्री को न केवल हार्नि होती है बल्कि ग्रार्हकों के अन्य स्थार्नों पर चले जार्ने की भी आशंक बनी रहती हैं। 
        6. अस्थार्यी अस्तित्व- एकाकी व्यार्पार्र क अस्तित्व अस्थार्यी प्रकृति क होतार् है। एकाकी व्यार्पार्र क जीवन एकाकी व्यार्पार्री के जीवन से जुड़ार् होतार् हैं, व्यार्पार्री की मृत्यु होने पर उसक व्यार्पार्र ही समार्प्त हो जार्तार् हैं।

          एकाकी व्यार्पार्र क भविष्य

          एकाकी व्यार्पार्र निम्न दशार्ओं में उपयुक्त रहतार् हैं-

          1. जब व्यार्पार्र क क्षेत्र छोटार् होतार् हैं। 
          2. जब सीमित यार् कम पूंजी की आवश्यकतार् होती हैं। 
          3. जब उत्तरदार्यित्व असीमित हो पर जोखिम कम हो।

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