ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार्, विशेषतार्एँ, गुण व दोष

ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार्, विशेषतार्एँ, गुण व दोष

By Bandey

अनुक्रम

प्रार्चीनकालीन इतिहार्स लेखन (ग्रीको-रोमन, चीनी तथार् भार्रतीय) की तुलनार् में मध्यकालीन इतिहार्स लेखन की प्रमुख विशेषतार् यह थी कि इसमें दैवीय विधार्न को महत्व दियार् गयार् जिसमें कि व्यक्ति की भूमिक नार्म मार्त्र की थी। मध्यकालीन, विशेषकर ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् में धर्म को सर्वोपरि स्थार्न दियार् गयार् और विधर्मियों पर ईसार्इयत की विजय ने ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् के लिए प्रेरित कियार्। र्इ्रसार्ई इतिहार्सकारों ने यहूदी धामिक ग्रंथों को मूल स्रोतों के रूप में स्वीकार कियार्। ईसार्ई धर्म के व्यार्पक प्रचार्र-प्रसार्र और रोमन सार्म्रार्ज्य में सम्रार्ट कॉन्सटैन्टार्इन प्रथम के काल के पश्चार्त उसकी प्रतिश्ठार् में अपार्र वृद्धि के परिणार्मस्वरूप ईसार्ई धर्म-विज्ञार्न एवं बार्इबिल में निहित सिद्धार्न्तों को समार्विश्ट करके एक विशिष्ट ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् क विकास हुआ। मध्यकाल में ईसार्ई सन्यार्सियों एवं पुरोहित वर्ग की इतिहार्स-लेखन में अत्यधिक अभिरुचि थी। उन्होंने यीशू मसीह, चर्च और उसके संरक्षकों तथार् स्थार्नीय शार्सकों के रार्जवंशीय इतिहार्स के विषय में प्रचुर मार्त्रार् में लिखार्। प्रार्रम्भिक मध्यकाल में ऐतिहार्सिक रचनार्ओं क स्वरूप आख्यार्नों अथवार् इतिवृत्तों के रूप में होतार् थार् जिनमें कि सार्ल दर सार्ल की घटनार्ओं क सिलसिलेवार्र वर्णन होतार् थार्। केवल तिथिक्रमार्नुसार्र घटनार्ओं के वृतार्न्त की इस शैली के लेखन में विशिष्ट घटनार्ओं और उनके कारणों के विश्लेषण की सम्भार्वनार् नहीं रह पार्ती थी। मध्यकालीन ईसार्ई इतिहार्स लेखन वार्स्तव में हेलेनिस्टिक व रोमन इतिहार्स लेखन परम्परार् की ही अगली कड़ी है। ईसार्ई इतिहार्कारों ने जिस काल को अपने लेखन क विषय बनार्यार्, उस काल के परिवेश, परिस्थिति एवं अवस्थिति क सार्मार्न्यत: उनके लेखन पर प्रभार्व पड़ार् है।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन


ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार्

प्रार्रम्भिक ईसार्ई इतिहार्स

लेखन मध्यकालीन इतिहार्स लेखन परम्परार् में पश्चिमी इतिहार्स लेखन क विशिष्ट स्थार्न है। पश्चिमी इतिहार्स लेखन क प्रमुख केन्द्र बिन्दु ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् है। जहार्ं ग्रीको-रोमन इतिहार्स लेखन परम्परार् में बुद्धि एवं विवेक क स्थार्न थार्, वहीं ईसार्ई इतिहार्स लेखन परम्परार् में धर्म को सर्वार्धिक महत्वपूर्ण स्थार्न दियार् गयार् थार्। ईसार्ई इतिहार्सकारों ने विधर्मी इतिहार्स लेखन को शैतार्न की कृति कहकर उसकी भत्र्सनार् की थी किन्तु पूर्वकालीन इतिहार्स लेखन, विशेषकर ग्रीको-रोमन इतिहार्स लेखन व इतिहार्स-दर्शन ने प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रूप से उनके लेखन को प्रभार्वित कियार् थार्। ईसार्ई इतिहार्स लेखन में ‘ओल्ड टैस्टार्मैन्ट’ को ऐतिहार्सिक स्रोत के रूप में प्रमुख स्थार्न दियार् गयार्। प्रार्रम्भिक काल में ईसार्ई मतार्नुयार्यी यीशू मसीह के शिश्यों और धर्म प्रचार्रकों द्वार्रार् उनके उपदेशों एवं उनके कृत्यों के वृतार्न्त पर निर्भर करते थे परन्तु धीरे-धीरे जब यीशू मसीह के समकालीन काल के गार्ल में समार्ते चले गए तो इस श्रुत परम्परार् क स्थार्न लिखित दस्तार्वेज़ों ने ले लियार्। प्रथम तथार् द्वितीय शतार्ब्दी में लिखित ‘गॉस्पल ऑफ़ माक’, ‘गॉस्पल ऑफ़ मैथ्यू’, ‘गॉस्पल ऑफ़ ल्यूक’ तथार् द्वितीय शतार्ब्दी में लिखित ‘गॉस्पल ऑफ़ जॉन’ में यीशू मसीह के उपदेशों को ईश्वरीय वचन के रूप में प्रस्तुत कियार् गयार् है। ‘गॉस्पल ऑफ़ माक’ (रचनार्काल 65-70 ईसवी) सम्भवत: प्रथम यहूदी-रोमन युद्ध के पश्चार्त लिखी गई थी। ‘गॉस्पल ऑफ़ मैथ्यूज़ (रचनार्काल 80-85 ईसवी) क लक्ष्य यहूदियों के समक्ष यह बार्त रखने क थार् कि यीशू मसीह ही हमार्रार् मुक्तिदार्तार् मसीहार् है और वह मोज़ेज़ से भी महार्न है। ‘दि गॉस्पल ऑफ़ ल्यूक’ (रचनार्काल 85-90 ईसवी) और ‘ल्यूक एक्ट्स’ को सभी गॉस्पल्स में सार्हित्यिक दृष्टि से सबसे उत्कृश्ट और कलार्त्मक मार्नार् जार्तार् है। अन्त में ‘गॉस्पल ऑफ़ जॉन’ (रचनार्काल दूसरी शतार्ब्दी) क उल्लेख आवश्यक है जिसमें यीशू मसीह को दिव्यवार्णी क सन्देश वार्हक बतार्यार् गयार् है। इसमें यीशू मसीह स्वयं अपने जीवन के विषय में और अपने दिव्य अभियार्न के विषय में विस्तार्र से बोलते हैं। इसमें लॅज़ैरस के पुनरुत्थार्न जैसे चमत्कारों क भी उल्लेख है। ‘जॉन ऑफ़ गॉस्पल’ में यह दर्शार्यार् गयार् है कि यीशू मसीह और उनके उपदेशों में आस्थार् रखने वार्लों की ही मुक्ति सम्भव है।

जोसेफ़स

जोसेफ़स की रचनार्ओं में यहूदी शार्सन काल के मैकाबीस, होस्मैनियन रार्ज्यवंश तथार् हीरोद महार्न के उत्थार्न तथार् प्रार्रम्भिक ईसार्ई काल की जार्नकारी उपलब्ध है।

टैसिटस

टैसिटस के इतिवृत्त को हम पहलार् ज्ञार्त धर्म-निरपेक्ष इतिवृत्त कह सकते हैं। टैसिटस ने नीरो द्वार्रार् ईसार्इयों के उत्पीड़न क सजीव चित्रण कियार् है।

सेक्सटस जूलियस एफ्ऱीकैनस (180-250 ईसवी)

सेक्सटस जूलियस एफ्ऱीकैनस की 5 खण्डों की पुस्तक ‘क्रोनोग्रार्फ़ियार्’ को हम तिथि-क्रमार्नुसार्र वृतार्न्त की पहली रचनार् कह सकते हैं। एफ्ऱीकैनस क यह विश्वार्स है कि यीशू मसीह के 500 वर्श बार्द ही संसार्र क विनार्श हो जार्एगार्। एफ्ऱीकैनस ने मूल स्रोतों के स्थार्न पर मेनेथो, बिरोसस, अपोलोडोरस, जोसेफ़स तथार् जस्टस की रचनार्ओं को आधार्र बनार्कर अपने ग्रंथ की रचनार् की है। इस दृष्टि से हम एफ्ऱीकैनस की रचनार् को मौलिक रचनार् की श्रेणी में नहीं रख सकते।

यूज़िबियस (260-340 ईसवी)

यूज़िबियस

ग्रीको-रोमन परम्परार् में बुद्धि व विवेक क सर्वोपरि स्थार्न थार् किन्तु ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् में धर्म को सर्वोपरि स्थार्न दियार् गयार् थार्। सिज़ेरियार् के निवार्सी यूज़िबियस द्वार्रार् सन् 324 के आसपार्स रचित प्रथम कलीसियार्यी इतिहार्स में लिखित स्रोतों क प्रचुर मार्त्रार् में उपयोग कियार् गयार्। प्रथम शतार्ब्दी से लेकर यूज़िबियस ने अपने समय तक ईसार्ई धर्म के विकास क तिथि-क्रमार्नुसार्र सिलसिलेवार्र इतिहार्स लिखार् है। यूज़िबियस की रचनार्ओं में ‘हिस्टोरियार् एक्लेसियार्स्टिका’, ‘डिमॉन्सट्रेशन ऑफ़ दि गॉस्पल’, ‘प्रिपरेशन इवैन्जेलिका’, ‘डिस्क्रिपेन्सीज़ बिटवीन दि गॉस्पल्स’ तथार् ‘स्टडीज़ ऑफ़ दि बार्इबिकल टेक्स्ट’ प्रमुख हैं। यूज़िबियस अपने गं्रथों में प्लैटो तथार् फ़िलो के ग्रंथों क उपयोग करतार् है। वह ओक ऑफ़ मानरे की धामिक परम्परार्ओं क उल्लेख करतार् है तथार् ओल्ड व न्यू टैस्टार्मेनट की समीक्षार् करतार् है। रोमन सम्रार्टों, विशेषकर कॉन्सटैन्टार्इन प्रथम के शार्सन काल, यहूदियों और ईसार्इयों के मध्य सम्बन्ध और ईसार्ई शहीदों के विषय में उसने विस्तार्र से लिखार् है। यूज़िबियस सार्मार्जिक एवं धामिक पहलुओं पर भी प्रकाश डार्लतार् है। ईसार्ई धर्म-विज्ञार्न में यह मार्नार् जार्तार् है कि समय एक रेखार् के रूप में ईश्वरीय योजनार् के अनुसार्र आगे बढ़तार् है। चूंकि ईश्वरीय योजनार् में सभी समार्हित होते हैं इसलिए ईसार्ई इतिहार्स लेखन क दृष्टिकोण सावभौमिक होतार् है। सिज़ेरियार् के निवार्सी यूज़िबियस के चौथी शतार्ब्दी में रचित चर्च सम्बन्धी इतिहार्स में प्रथम शतार्ब्दी से लेकर उसके अपने समय तक ईसार्ई धर्म के विकास क तिथि-क्रमार्नुसार्र सिलसिलेवार्र इतिहार्स वर्णित है। यूज़िबियस के ग्रंथ ‘कोनिक ग्रीक’ भार्षार् में लिखे गए हं ै और अब इनके लैटिन, सीरियिक तथार् आर्मीनियन संस्करण भी उपलब्ध हैं। यूज़िबियस के ग्रंथों को हम ईसार्ई दृष्टिकोण से लिखे गए पहले सम्पूर्ण इतिहार्स-ग्रंथ कह सकते हैं। यूज़िबियस ने अपने ग्रंथों की रचनार् में अनेक धामिक दस्तार्वेज़ों, शहीदों के कृत्यों, पत्रों, पूर्व में लिखे गए ईसार्ई ग्रंथों के सार्र-संक्षेपों, बिशपों की सूचियों आदि क उपयोग कियार् है और उसने अपने ग्रंथों में ऐसे मूल स्रोत-ग्रंथों क उल्लेख कर उनके विस्तृत उद्धरण भी दिए हैं जो कि अब अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं। यूज़िबियस पर प्रार्य: यह आरोप लगार्यार् जार्तार् है कि वह जार्नबूझ कर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करतार् है और व्यक्तियों व तथ्यों मूल्यार्ंकन के समय वह निश्पक्ष तथार् तटस्थ नहीं रहतार् है।

सन्त एम्ब्रोज़ (340-497 ईसवी)

सन्त एम्ब्रोज़ ने सन्त अगस्तार्इन के विचार्रों और उनके लेखन पर विशेष प्रभार्व डार्लार् थार्। उनकी रचनार्ओं में ‘फ़ेथ टु ग्रैशियन ऑगस्टस’, ‘दि होली घोस्ट’ तथार् ‘दि मिस्ट्रीज़’ प्रमुख हैं।

सन्त अगस्तार्इन (354-430 ईसवी)

मध्ययुगीन ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् के प्रमुख प्रतिनिधि संत अगस्तार्इन थे। उन्होंने ऐतिहार्सिक लेखन में दैवीय घटनार्ओं को प्रमुखतार् दी थी। सन्त अगस्तार्इन इतिहार्सकार, धर्म-विज्ञार्नी, दाशनिक, शिक्षक एवं कवि थे। ‘सिटी ऑफ़ गॉड’ उनकी प्रमुख रचनार् है। सन्त अगस्तार्इन ने ईश्वर की आज्ञार् क पार्लन मनुष्य क परम कर्तव्य मार्नार् है। उनके अनुसार्र ईश्वर की आज्ञार् क पार्लन करने वार्ले देवतार् व मनुष्य देव नगर में निवार्स करते हैं जब कि उसके विरोधी पार्प नगर में रहने के लिए अभिशप्त हैं। अपने इस विचार्र की पुश्टि के लिए सन्त अगस्तार्इन रोम के उत्थार्न और पतन क दृश्टार्न्त देते हैं। उनके अनुसार्र रोम क उत्थार्न ईश्वरीय अनुकम्पार् के कारण हुआ परन्तु कालार्न्तर में जब रोम-वार्सियों ने अपने जीवन और विचार्रों में पार्प, अन्यार्य व अनैतिकतार् को स्थार्न दियार् तो उन्हें ईश्वरीय कोप क भार्जन होनार् पड़ार् जिसके फलस्वरूप रोम क पतन हुआ। इससे यह निश्कर्श निकलतार् है कि ईश्वर को भुलार् देने वार्लों अथवार् उसकी आज्ञार् क पार्लन न करने वार्लों को ईश्वर द्वार्रार् दण्डित कियार् जार्तार् है। सन्त अगस्तार्इन की दृष्टि में रार्ज्य की उत्पत्ति में कुछ भी दैविक नहीं है। ये मार्नव-निर्मित संस्थार् है अत: इसमें दोषों क होनार् स्वार्भार्विक है। जब इसमें अच्छार्इयों क आधिक्य होतार् है तो इसक उत्थार्न होतार् है और जब इसमें बुरार्इयार्ं घर कर जार्ती हैं तो इसक पतन होतार् है। छोटे से छोटे रार्ज्यों से लेकर बड़े से बड़े सार्म्रार्ज्यों तथार् सभी संस्कृतियों के उत्थार्न और पतन के सार्थ यही दैविक-नियम लार्गू होतार् है। ईश्वर कृत रचनार्ओं में सब कुछ निर्दोश एवं परिपूर्ण होतार् है जब कि मार्नव-निर्मित रचनार्ओं में मौलिकतार् क अभार्व व अपूर्णतार् होती है। कोई भी शार्सन-व्यवस्थार् निर्दोश व परिपूर्ण नहीं नहीं हो सकती परन्तु चर्च की रचनार् ईश्वर ने की है इसलिए वह दोषरहित व परिपूर्ण हो सकतार् है। ‘सिटी ऑफ़ गॉड’ एक धामिक सार्म्रार्ज्य है। मार्नव-निर्मित सार्म्रार्ज्य की स्थार्पनार् बिनार् रक्तपार्त के नहीं हो सकती जब कि ‘‘सिटी ऑफ़ गॉड’ अपनार् आधिपत्य बिनार् रक्तपार्त के स्थार्पित करतार् है। मार्नव-निर्मित रार्ज्यों को अपने क्षण-भंगुर कानूनों के अनुपार्लन के लिए सैन्य दल की आवश्यकतार् होती है जब कि ईश्वर निर्मित रार्ज्य में शार्श्वत दैविक नियमों के अनुपार्लन हेतु किसी वार्ह्य बल की आवश्यकतार् नहीं होती है।

सन्त अगस्तार्इन क इतिहार्स लेखन मुख्य रूप से धर्मनिर्पेक्ष एवं धर्मतन्त्रार्त्मक शक्तियों के मध्य संघर्ष की गार्थार् है जिसमें कि उन्होंने धर्मतन्त्रार्त्मक पक्ष क समर्थन कियार् है। सन्त अगस्तार्इन के अनुसार्र ईश्वरीय आदेश क पार्लन करने वार्ले को स्वर्गलोक में वार्स करने क अधिकार मिलतार् है जब कि उसकी आज्ञार्ओं क उल्लंघन करने वार्ले को नर्क में रहने के लिए अभिशप्त होनार् पड़तार् है। सन्त अगस्तार्इन रोमन सार्म्रार्ज्य के इतिहार्स क उल्लेख करते हुए यह बतलार्ते हैं कि उसक उत्थार्न प्रभु की कृपार् के कारण हुआ किन्तु उसक पतन कालार्न्तर में पार्प, अन्यार्य व अनैकितार् के कारण अर्थार्त् ईश्वरीय आदेश की अवज्ञार् के कारण हुआ। दृश्टार्न्त देते हुए सन्त अगस्तार्इन के इतिहार्स लेखन की सबसे बड़ी कमी यह है कि वह घटनार्ओं को तोड़-मरोड़कर उनक प्रस्तुतीकरण इस प्रकार करते हैं कि उनक अपनार् मन्तव्य सिद्ध हो जार्ए। इन कमियों के बार्वजूद उनके ग्रंथ ‘सिटी ऑ़फ़ गॉड’ को प्लैटो के ग्रंथ ‘रिपब्लिक’, सर टॉमस रो के ग्रंथ ‘उटोपियार्’ तथार् बैकन के ग्रंथ ‘अटलार्न्टिस’ के समकक्ष रखार् जार्तार् है।

सन्त अगस्तार्इन के परवर्ती ईसार्ई इतिहार्सकार

पॉलस ओरोसियस (380-420 ईसवी)

सन्त अगस्तार्इन के शिष्य और इतिहार्स लेखन में उनके अनुयार्यी पॉलस ओरोसियस की मार्न्यतार् है कि विभिन्न समुदार्यों के भार्ग्य ईश्वर द्वार्रार् ही निर्धार्रित होतार् है। ओरोसियस की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण पुस्तक – ‘सेवेन बुक्स ऑ़फ़ हिस्ट्री अगेन्स्ट दि पैगन्स’ की रचनार् सन् 411-418 के मध्य हुई थी। इस ग्रंथ में मार्नव की सृश्टि से लेकर गॉलों द्वार्रार् रोम के विनार्श तक क इतिहार्स है। ओरोसियस के लेखन पर सन्त अगस्तार्इन के अतिरिक्त हेरोडोटस लिवी तथार् पोलीबियस की रचनार्ओं स्पष्ट प्रभार्व पड़ार् है। ओरोसियस के ऐतिहार्सिक ग्रंथ में अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों तथार् देशों क उल्लेख ही नहीं कियार् गयार् है। इस अपूर्णतार् के अतिरिक्त ओरोसियस के इतिहार्स गं्रथ क सबसे बड़ार् दोष यह है कि वह जार्नबूझ कर यह प्रदर्शित करतार् है कि ईसार्ई धर्मार्वलम्बियों की तुलनार् में अन्य धमोर्ं के अनुयार्यियों को युद्ध, महार्मार्री, अकाल, भू-कम्प, बार्ढ़, बिजली गिरनार्, तूफ़ार्न, आपरार्धिक घटनार्ओं आदि क अधिक सार्मनार् करनार् पडार् है।

सन्त जेरोम (347-420 ईसवी)

सन्त जेरोम ने सन् 391 में पूर्व काल के 135 लेखकों के जीवन वृतार्न्त वार्ली पुस्तक ‘दि विरिस इल्यस्ट्रिबस सिवे दि स्क्रिप्टोरिबस एक्लेसियार्स्टिक्स’ की रचनार् की थी। उसकी अन्य रचनार्ओं में ‘लार्इफ़ ऑफ़ पॉल’, ‘दि फ़स्र्ट हेरमिट’ तथार् ‘वल्गेट’ प्रमुख हैं।

माक औरेलियस कैसीडोर (480-570 ईसवी)

इटली के निवार्सी माक औरेलियस कैसीडोर की रचनार्ओं ‘वेरार्य’, ‘हिस्ट्री ऑफ़ गोथ’ तथार् ‘हिस्टोरियार् ट्रिपाटियार्’ में ऑस्ट्रोगोथ काल के रार्जनीतिक एवं सार्ंस्कृतिक जीवन की झार्ंकी मिलती है।

वेनरेबिल बेडे (672-735 ईसवी)

वेनरेबिल बेडे ने ‘एक्लेसियार्स्टिकल हिस्ट्री ऑफ़ इंग्लिश पीपुल’ में जूलियस सीज़र के काल से लेकर सन् 735 तक इंग्लैण्ड के धामिक एवं रार्जनीतिक इतिहार्स क वर्णन कियार् है।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन की विशेषतार्एँ

इतिहार्स में ईश्वरीय इच्छार् की महत्तार्ए

ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् में घटनार्एं उस रूप में नहीं देखी गई, जिस रूप में वो घटित हुई बल्कि उन घटनार्ओं को एक दैवीय आवरण पहनार् कर उन्हें ईश्वरीय इच्छार् के रूप में प्रस्तुत कियार् गयार्। ईसार्ई धर्मार्वलम्बी इतिहार्स चिन्तकों की दृष्टि में ब्रह्मार्ण्ड में होने वार्ली हर घटनार् के पीछे ईश्वर की इच्छार् होती है। इसमें घटनार् के अच्छे यार् उसके बुरे होने क कोई भी अन्तर नहीं पड़तार् है। ऐतिहार्सिक घटनार्ओं पर नियन्त्रण रख पार्ने की शक्ति मनुष्य में नहीं है। मनुष्य तो भगवार्न के हार्थ में एक खिलौने की तरह है परन्तु उनसे खेलते समय ईश्वर उनमें से किसी पर भी अपनार् विशेष अनुरार्ग अथवार् कोप प्रदर्शित नहीं करतार् है। ईसार्ई इतिहार्स की परम्परार् में इतिहार्स को एक नार्टक मार्नार् गयार् है। ईसार्ई धर्मार्वलम्बी इतिहार्स चिन्तक इतिहार्स की चक्रीय प्रकृति में विश्वार्स नहीं रखते हैं। उनक यह विश्वार्स है कि संसार्र में घटित सभी घटनार्ओं की दिशार् ईश्वर द्वार्रार् ही निर्धार्रित की जार्ती है। ईश्वर को सभी घटनार्ओं की परिणति क पहले से ही ज्ञार्न होतार् है। ईश्वर ऐतिहार्सिक शक्तियों क दिशार्-निर्देशन करतार् है अत: ऐतिहार्सिक शक्तियार्ं सावभौमिक हैं। ईसार्ई धर्मार्वलम्बी इतिहार्स चिन्तकों के अनुसार्र केवल उन रार्ष्ट्रों क उत्थार्न होतार् है जो दैविक नियमों क पार्लन करते हैं और जो रार्ष्ट्र उनक पार्लन नहीं करते उनक पतन अवश्यम्भार्वी होतार् है।

ऐतिहार्सिक बलों की दैविक प्रकृति

ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् में प्रकृति क भौतिक विकास महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें इतिहार्स को मनुष्य और ईश्वर के बीच सम्बन्धों क एक प्रवार्ह मार्नार् गयार् है। ईसार्ई इतिहार्स लेखन की परम्परार् में इतिहार्स को एक नार्टक मार्नार् गयार् है। इस नार्टक के प्रथम अंक में आदम क स्वर्ग से पतन, पार्प क प्रार्रम्भ तथार् ईश्वर से विच्छेद है। इस नार्टक के दूसरे अंक में यीशू मसीह क जन्म, उनके उपदेश, उनक सूली पर चढ़यार् जार्नार् तथार् उनक पुनरुत्थार्न है। इसके तीसरे अंक में चर्च की स्थार्पनार् तथार् ईसार्ई धर्म क प्रचार्र है। इस नार्टक के चतुर्थ एवं अन्तिम भार्ग में यीशू मसीह क पुनरार्गमन व ईसार्ई रार्ज्य की स्थार्पनार् क वर्णन है।

ईसार्ई इतिहार्स चिन्तक ऐतिहार्सिक बलों की दैविक प्रकृति में आस्थार् रखते हैं। जो बल मनुष्य की समझ से परे होते हैं उन्हें दैविक कहार् जार्तार् है और उनक संचार्लन पूरी तरह ईश्वर द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् है। इन दैविक बलों क प्रयोग स्थार्नीय अथवार् क्षेत्रीय स्तर पर नहीं अपितु सावभौमिक रूप से कियार् जार्तार् है।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन में तिथिक्रम तथार् काल-विभार्जन

ईसार्ई इतिहार्स चिन्तकों ने विविध तिथिपरक घटनार्ओं के लिए ईसार् के जन्म क प्रतिमार्न प्रस्तुत कियार्। उन्होंने केवल ईसार्ई तिथिक्रम को ही अपने समस्त ऐतिहार्सिक वृतार्न्तों के लिए पर्यार्प्त एवं परिपूर्ण मार्नार् है। घटनार्ओं क काल-निर्धार्ण करने के लिए उनक मार्पदण्ड केवल ‘यीशू मसीह के जन्म से पूर्व’ और ‘उनके जन्म के पश्चार्त’ क ही है। उनके लिए सभी ऐतिहार्सिक घटनार्ओं और सावभौमिक इतिहार्स क केन्द्र बिन्दु यीशू मसीह ही होते हैं। ईसार्ई धर्म-विज्ञार्न में यह मार्नार् जार्तार् है कि समय एक रेखार् के रूप में ईश्वरीय योजनार् के अनुसार्र आगे बढ़तार् है। चूंकि ईश्वरीय योजनार् में सभी समार्हित होते हैं इसलिए ईसार्ई इतिहार्स लेखन क दृष्टिकोण सावभौमिक होतार् है।

ईसार्ई इतिहार्सकारों ने समय क मुख्य रूप से दो कालों में विभार्जन कियार् है – एक अंधकार क युग और दूसरार् प्रकाश क युग। यीशू मसीह से पहले क काल अन्धकार क युग और उनके जीवनकाल व उनके बार्द क काल (दोनों को मिलार्कर) प्रकाश क युग मार्नार् जार्तार् है। अन्धकार व प्रकाश युगों को विभिन्न उप-कालों में विभार्जित कियार् गयार् है और फिर उनका, उनकी विशिष्टतार्ओं के अनुरूप वर्णन कियार् गयार् है।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन के आधार्र-स्रोत के रूप में बार्इबिल की महत्तार्

ईसार्ई धर्म में बार्इबिल की केन्द्र-बिन्दु के रूप में महत्तार्, ईसार्ई इतिहार्कारों के लेखन में भी प्रतिबिम्बित होती है। शार्स्त्रीय युग के इतिहार्सकारों के विपरीत ईसार्ई इतिहार्कारों ने अपने लेखन में मौखिक स्रोतों की तुलनार् में लिखित स्रोतों को अधिक वरीयतार् प्रदार्न की। ईसार्ई इतिहार्सकारों ने धामिक दृष्टि से महत्वपूर्ण किन्तु रार्जनीतिक दृष्टि से महत्वहीन व्यक्तियों को अपने लेखन में स्थार्न दियार्। ईसार्ई इतिहार्सकारों ने धर्म और समार्ज के विकास को अपने लेखन में सर्वार्धिक महत्व दियार्।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन के गुण व दोष

ईसार्ई इतिहार्स लेखन के दोष

  1. इतिहार्स को एक दैविक योजनार् के रूप में देखने की हठवार्दी प्रवृत्ति- ईसार्ई इतिहार्सकार इतिहार्स में मनुष्य की स्वतन्त्र भूमिक को सर्वथार् नकारते हैं। उनकी दृष्टि में नियति को अपने पौरुश से बदलने क दु:सार्हस करने वार्लार् हर व्यक्ति असफल होतार् है और पतन व विनार्श के माग पर अग्रसर होतार् है।
  2. आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण क अभार्व- ईसार्ई इतिहार्स लेखन में आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण क नितार्न्त अभार्व है। वार्स्तव में परम्परार् और तथ्यों की वैधतार्, विश्वसनीयतार् एवं तर्कसंगततार् क आकलन करने में उनकी कोई अभिरुचि नहीं है और न ही मूल स्रोत सार्मग्री क पर्यार्प्त उपयोग करने की उनमें क्षमतार् है। इन कारणों से उनकी रचनार्ओं में प्रार्मार्णिकतार् क अभार्व है।
  3. इतिहार्स लेखन की आदर्श तकनीक की उपेक्षार्- तथ्यों की प्रार्मार्णिकतार् की जार्ंच और अपने दृष्टिकोण को यथार्सम्भव तटस्थ बनार्ए रखने के स्थार्न पर ईसार्ई इतिहार्स लेखन में दुरार्ग्रहतार् एवं पूर्व निश्चित अवधार्रणार् क दोष दिखार्ई देतार् है। ईसार्ई इतिहार्स लेखन क मुख्य लक्ष्य चर्च की अन्य धामिक संस्थार्ओं की तुलनार् में निर्विवार्द श्रेश्ठतार् तथार् यीशू मसीह के उपदेशों की कालजयी उपयोगितार् स़िद्ध करनार् है। ईसार्ई इतिहार्स लेखन अन्य धर्मार्वलम्बियों के अवश्यम्भार्वी पतन पर निरन्तर ज़ोर देतार् है।
  4. सार्मार्जिक एवं आर्थिक कारकोंं की उपेक्षार्- ऐतिहार्सिक घटनार्ओं में सार्मार्जिक एवं आर्थिक कारकों की नितार्न्त उपेक्षार् ईसार्ई इतिहार्स लेखन की एक बड़ी कमज़ोरी है। हर घटनार् के पीछे ईश्वरीय इच्छार् क हार्थ होने क विश्वार्स, उन्हें इतिहार्स निर्मार्ण में सार्मार्जिक एवं आर्थिक घटकों की महत्तार् स्वीकार करने से रोकतार् है।
  5. ऐतिहार्सिक स्रोतों के वर्गीकरण की दोषपूर्ण प्रणार्ली- ईसार्ई इतिहार्स लेखन की ऐतिहार्सिक स्रोतों के वर्गीकरण की प्रणार्ली दोषपूर्ण है क्योंकि इसमें नयी स्रोत सार्मग्री एकत्र करने क कोई प्रयार्स नहीं कियार् जार्तार् है और पहले से उपलब्ध इतिवृत्त, सुव्यस्थित इतिहार्स एवं जीवनी को स्रोत सार्मग्री के रूप में प्रयुक्त करते समय उनमें किसी प्रकार कोई अन्तर नहीं कियार् जार्तार् है।

ईसार्ई इतिहार्स लेखन के गुण

  1. प्रार्चीन दस्तार्वेज़ों एवं अभिलेखों क संरक्षण- ईसार्ई इतिहार्सकारों ने प्रार्चीन दस्तार्वेज़ों एवं अभिलेखों क संरक्षण करने में महत्वपूर्ण योगदार्न दियार्। परवर्ती काल के इतिहार्सकारों को मध्यकाल से सम्बन्धित अपने ऐतिहार्सिक ग्रंथों की रचनार् में इससे बहुत सहार्यतार् मिली। वार्स्तव में मध्यकालीन इतिहार्स को जार्नने के लिए ईसार्ई इतिहार्स लेखन क अध्ययन नितार्न्त आवश्यक है।
  2. ऐतिहार्सिक क्रमबद्धतार्- ईसार्ई इतिहार्सकारों ने तिथि-क्रमार्नुसार्र घटनार्ओं क वर्णन करने की एक नयी परम्परार् क विकास कियार्।
  3. धामिक, रार्जनीतिक एवं सार्मार्जिक इतिहार्स को महत्व- ईसार्ई इतिहार्सकारों ने धामिक, रार्जनीतिक एवं सार्मार्जिक विकास पर उपयोगी सार्मग्री उपलब्ध करार्ने में सफलतार् प्रार्प्त की है।
  4. इतिहार्स लेखन की मुस्लिम परम्परार् पर ईसार्ई इतिहार्स लेखन क प्रभार्व- इतिहार्स लेखन की मुस्लिम परम्परार् पर ईसार्ई इतिहार्स लेखन क स्पष्ट प्रभार्व देखार् जार् सकतार् है। ईसार्ई अवधार्रणार् के अनुरूप ही इतिहार्स लेखन की इस्लार्मी अवधार्रणार् में भी गॉड अर्थार्त् अल्लार्ह को ही सृश्टि क नियंतार् मार्नार् गयार् है। मुस्लिम इतिहार्स लेखन में भी ईसार्ई इतिहार्स लेखन की भार्ंति तिथि-क्रमार्नुसार्र घटनार्ओं क वर्णन कियार् गयार् है।

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