ईश्वर क्यार् है ?

शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से र्इश्वर शब्द र्इश धार्तु में वरच् प्रत्यय लगार्कर बनार् है जिसक अर्थ है ऐश्वर्य युक्त, समर्थ, शक्तिशार्ली, स्वार्मी, प्रभु, मार्लिक, रार्जार्, शार्सक आदि। हिन्दी संस्कृत कोश के अनुसार्र र्इश्वर शब्द क प्रयोग परमेश्वर, जगदीश्वर, परमार्त्मन, परमेश, स्वार्मी, शिव आदि अनेक रूपों में कियार् गयार् है।

ऋग्वेद में र्इश धार्तु क प्रयोग अनेक रूपों में मिलतार् है जैसे-

      ‘मार् नो दु:शंस र्इशत’’। (ऋग्वेद 9.23.9) 
      ‘‘ र्इशे ह्यग्नि:अमृतस्य’’। (ऋग्वेद 7.4.6) 
      ‘‘ र्इशे यो विश्वस्यार्देववीते:’’। (ऋग्वेद 10.6.3) 

ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में र्इश्वर विश्वरूप है-

     सहस्रशीर्षार् पुरुष: सहस्रार्क्ष: सहस्रार्पार्त्। 
     स भूमि: विश्वतो वृत्वार्Sत्पतिष्ठत् दशार्ड़गुलम। (ऋग्वेद 10.90) 

र्इश्वर एक-नार्म अनेक- 

र्इश्वर एक है किन्तु उसके नार्म अनेक हैं। ऋग्वेद में वर्णित अनेक देव शक्तियार्ँ एक ही र्इश्वर के पर्यार्य है।

      इन्द्रं मित्रं वरूणमग्निमार्हुरथो दिव्य: स सुंपर्णो गरुत्मार्न्। 
      एकं सद्विप्रार् वहुधार् वदन्त्यार्ग्निं यमं मार्तरिश्वार्नमार्हु:।। 

कठोपनिषद के ऋषि ने परमेश्वर को ब्रहम के रूप में अणु से भी अणु (यार्नी सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म) और महार्न से भी महार्न बतार्यार्, जिसे प्रार्प्त करके मनुष्य को अमृतत्व की प्रार्प्ति हो जार्ती है।

      अणोरणीयन्महतो महीयार्नार्त्मार्स्य जन्तोर्निहितो गुहार्यार्म्।  
      तमक्रतु: पश्यति वीतशोको धार्तुप्रसार्दार्न्म-हिमार्नमार्त्मार्न:।। (कठो0 1.2.20) 

इसलिए महर्षि पतंजलि ने मोक्ष प्रार्प्ति के सार्धनों में र्इश्वर प्रणिधार्न क वर्णन कियार् है।

      र्इश्वर प्रणिधार्नार्द्वार्। (पार्तंजल योग सूत्र, समार्धिपार्द 1.23)

र्इश्वर क्यार् है? इस सम्बन्ध में भार्ष्यकार व्यार्स क कथन है कि जो भोगों से रहित है वही र्इश्वर है-

       ‘‘यो ह्यनेन भोगेनार् परार्मृष्ट: स पुरुष विशेष र्इश्वर:’’।। 

इसी प्रकार क उल्लेख भोजवृत्ति में भी प्रार्प्त होतार् है।

     ‘‘वार्सनार्ख्यार्: संस्कारार्स्तैरपरार्मृष्टस्त्रि“वपि। 
       कालेषु न संस्पृष्ट: पुरुष विशेष:।।’’ 

अर्थार्त्- वार्सनार् रूपी संस्कार से रहित तीनों कालो में भी जिसक सम्बन्ध नहीं होतार् वह पुरुष विशेष र्इश्वर है। योग भार्ष्यकार महर्षि व्यार्स र्इश्वर को असीम ऐश्वर्य युक्त मार्नते है उनक कहनार् है कि जिसमें एश्वर्य है वही र्इश्वर है। 

     ‘तस्मार्द्यत्र काष्ठार्प्रार्प्तिरैश्वर्यस्य स र्इश्वर इति। 

वृत्रिकार भोज ने भी इच्छार्मार्त्र से सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति और प्रलय करने में समर्थ शक्ति को र्इश्वर कहार् है-

     ‘र्इश्वर र्इशनशील इच्छार्मार्त्रेण सकलजगदुद्धरणक्षम:’’ 

श्रीमद् भगवद्गीतार् के अनुसार्र र्इश्वर इस सम्पूर्ण विश्व क स्वार्मी है। वह ही सृष्टि कर्तार्, पार्लन कर्तार्, और संहार्र कर्तार् है। र्इश्वर इस जगत क पितार्, मार्तार्, धार्तार्, पितार्मह, गति, भर्तार्, प्रभु, सार्क्षी, निवार्स, शरण तथार् सुहत् है। वही इसक उत्पत्ति स्थार्न, प्रलय स्थार्न, निधार्न तथार् अविनार्शी बीज है- 

     पितार्Sहमस्य जगतो मार्तार् धार्तार् पितार्मह:। 
     गतिर्भर्तार् प्रभु: सार्क्षी निवार्स: शंरण सुहृत्। 
     प्रभव: प्रलय: स्थार्नं निधार्नं बीजमव्ययम्।। (गीतार् 9/17,18) 

र्इश्वर जड़ पदाथों (क्षर) तथार् चेतन जीवों (अक्षर) से भिन्न है। वह इन दोनों से परे और उत्तम है। अत: वह परमार्त्मार् और पुरुषोत्तम है-

      द्वार्विमे पुरुषौ लोके क्षरश्चार्क्षर एव च। 
      क्षर: सर्वार्णि भूतार्नि कूटस्थोSक्षर उच्यते।। 
      यस्मार्त् क्षरमतीतोSहमक्षरार्दपि चोत्तम:। 
      अतोSस्मि लोकेवेदे च प्रथित: पुरुषोत्तम:।। (गीतार् 15/16,18)

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