इतिहार्स अतीत क अर्थ, परिभार्षार्, उपयोगितार्, महत्व, प्रकृति व क्षेत्र

इतिहार्स अतीत क अर्थ, परिभार्षार्, उपयोगितार्, महत्व, प्रकृति व क्षेत्र

By Bandey

अनुक्रम

इतिहार्स अतीत क्यार् है? इस प्रश्न के उत्तर अनेक रूपों में हमार्रे सार्मने आते हैं। विभिन्न विद्वार्नों के द्वार्रार् इसके अनेक उत्तर दिये गये हैं। इतिहार्स अतीत एक ऐसार् विषय है जिसे सीमार्ओं में नहीं बार्ँधार् जार् सकतार्। इतिहार्स अतीत हर विषय से सम्बन्धित है। प्रार्चीनकाल से आज तक इस पृथ्वी पर जो कुछ भी हुआ है वह इतिहार्स अतीत ही है। हर वस्तु क अपनार् इतिहार्स अतीत होतार् है। एक विद्वार्न क मार्ननार् है कि इतिहार्स अतीतकार के प्रयार्स क लक्ष्य अतीत तथार् वर्तमार्न के मध्य एक ऐसे सेतु क निर्मार्ण करनार् है जिसके मार्ध्यम से वह समसार्मयिक समार्ज को अतीत क अवलोकन करार्कर अतीत के उद्धरणों द्वार्रार् वर्तमार्न को प्रशिक्षित करे तथार् भविष्य क मागदर्शन कर सके।

जब स्मृति अथवार् अतीत को वैज्ञार्निक अध्ययन के सहार्रे क्रमबद्ध कियार् जार्तार् है तब इतिहार्स अतीत क जन्म होतार् है। परन्तु वर्तमार्न परिप्रेक्ष्य में इसके प्रति भी दृष्टिकोण बदलार् है। अब घटनार्ओं क मार्त्र क्रमबद्ध विवरण ही नहीं अपितु उनसे जुड़ी हुई परिस्थितियों क अध्ययन भी अब आवश्यक हो गयार् है। इस अध्ययन में भी नियमबद्धतार् होनी आवश्यक है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत वह है जो अतीत क अवलोकन करते हुए वर्तमार्न को शिक्षार् देतार् है तथार् भविष्य के लिये पथ प्रशस्त करतार् है।

आज इतिहार्स अतीत प्रत्येक वस्तु तथार् व्यक्ति से सम्बन्धित है। यह किसी व्यक्ति विशेष अथवार् समय विशेष तक ही सीमित नहीं है वरन् समार्ज एवं संस्कृति के प्रत्येक पहलू से जुड़ार् हुआ है। अत: हम कह सकते हैं कि अतीत के सत्य की खोज ही इतिहार्स अतीत है। कुछ विद्वार्नों क मार्ननार् है कि इतिहार्स अतीत अतीत की महत्त्वपूर्ण घटनार्ओं क अभिलेख है परन्तु यदि देखार् जार्ए तो इतिहार्स अतीत सम्पूर्ण अतीत क आलेख है। समार्ज क हर पहलू इतिहार्स अतीत क अंग है। इस धरती पर इतिहार्स अतीत क सम्बन्ध मार्नवीय अस्तित्व के शुरू होने से ही है। मनुष्य ने इस धरती पर कहार्ँ तथार् कब पैर रखार् वहीं से मनुष्य क इतिहार्स अतीत प्रार्रम्भ होतार् है। भौगोलिक परिस्थितियार्ँ भी मनुष्य की कार्यक्षमतार् तथार् इतिहार्स अतीत को प्रभार्वित करती हैं।

इतिहार्स अतीत की उत्पत्ति

इतिहार्स अतीत शब्द की उत्पत्ति संस्कृत व्यार्करण के विद्वार्नों के अनुसार्र इति + ह + आस, इन तीन शब्दों के रूप में स्वीकार की जार्ती है। जिसक अर्थ इस प्रकार से है-निश्चित रूप से ऐसार् ही हुआ थार्। इतिहार्स अतीत शब्द क प्रयोग हमें अनेक प्रार्चीन ग्रन्थों में भी मिलतार् है। इस शब्द क उल्लेख अथर्ववेद में भी मिलतार् है।

आचाय दुर्ग ने इस विषय में लिखार् है-इति हैवमार्सीदति यत् कथ्यते तत् इतिहार्स अतीत: (निरुक्त भार्ष्य वृत्ति रचनार्) अर्थार्त् यह निश्चत रूप से इस प्रकार ही हुआ थार्-यह जो कहार् जार्तार् है, वह इतिहार्स अतीत है। इसी प्रकार से छार्दोग्य उपनिषद में ‘ इतिहार्स अतीत: प×चमोवेद:’ (7-1-2) अर्थार्त् इतिहार्स अतीत को पार्ँचवार् वेद मार्नार् गयार् है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि प्रार्चीन भार्रतीय ग्रंथों, वेदों, पुरार्णों में भी इतिहार्स अतीत शब्द क प्रयोग हुआ है।

अंग्रेजी में इतिहार्स अतीत को (History) कहते हैं जोकि यूनार्नी संज्ञार् लोरोप्लार् (Loropla) से ग्रहण कियार् गयार् है। जिसक अर्थ होतार् है सीखनार्। कुछ अन्य विद्वार्नों के अनुसार्र इतिहार्स अतीत के लिये जर्मन शब्द ‘GESCHICHTE’ है और इसक अर्थ है ‘घटित होनार्’ परन्तु इस अर्थ में इतिहार्स अतीत को दोहरार्यार् नहीं जार् सकतार्।

History (हिस्ट्री) शब्द की उत्पत्ति यूनार्नी शब्द हिस्टोरियार् (Historia) से मार्नी जार्ती है। जिसक अर्थ होतार् है जार्ननार् अथवार् ज्ञार्त होनार्। यूनार्नी भार्षार् में इतिहार्स अतीतकार को हिस्तोर कहार् जार्तार् है। इस समय में इतिहार्स अतीतकार उसे कहते थे जो वार्द-विवार्द क निर्णय करतार् थार्, तथार् जिसे विषय की पूर्णतयार् जार्नकारी अथवार् अच्छी तरह समझ होती थी।

इतिहार्स अतीत की परिभार्षार्

यह तो स्पष्ट है कि अतीत क अध्ययन ही इतिहार्स अतीत है परन्तु यह अध्ययन वैज्ञार्निक होनार् चार्हिए। इस प्रकार से देखार् जार्ये तो अतीत क वैज्ञार्निक रूप से अध्ययन ही इतिहार्स अतीत कहलार्तार् है। रेनियर ने कहार् है कि इतिहार्स अतीत एक कहार्नी है। जी. एम. ट्रेवेलियन के अनुसार्र भी इतिहार्स अतीत एक कथार् है। हेमरी पेरिने ने इतिहार्स अतीत को समार्ज में रहने वार्ले मनुष्यों के कार्यों एवं उपलब्धियों की कहार्नी बतार्यार् है।

शार्ब्दिक अर्थ की दृष्टि से देखार् जार्ये तो (History) क अर्थ होतार् है-सत्य के अन्वेषण अथवार् खोज क क्रम और इतिहार्स अतीत क अर्थ होतार् है निश्चित रूप से ऐसार् ही हुआ थार् अथवार् ऐसार् ही होतार् आयार् है। अत: स्पष्ट है कि इतिहार्स अतीत निश्चित रूप से होने के सार्थ-सार्थ प्रार्मार्णिक भी है। हेरोडोट्स ने जो इतिहार्स अतीत लिखार् उसे कथार्त्मक इतिहार्स अतीत कहार् जार्तार् है। अगर हम शब्दकोष के आधार्र पर भी देखें तो इतिहार्स अतीत क अर्थ यही निकलतार् है। लेकिन यह मार्त्र सावजनिक घटनार्एं ही न हों बल्कि क्रमबद्ध होने के सार्थ-सार्थ कहीं भी अवरोधित न हो और इनके सार्थ प्रमार्ण होने आवश्यक हैं। थ्यूसीडार्इडस के द्वार्रार् जो इतिहार्स अतीत लिखार् गयार् उसे प्रबोधक इतिहार्स अतीत की संज्ञार् दी जार्ती है। उन्होंने अपने इतिहार्स अतीत लेखन में तथ्यों को अत्यधिक महत्त्व दियार्। इसके अलार्वार् अनेक विद्वार्नों ने इतिहार्स अतीत लेखन की वैज्ञार्निक पद्धति भी प्रस्तुत की और इस प्रकार की लेखन शैली को कालार्न्तर में अत्यधिक महत्त्व प्रार्प्त हुआ। अनेक विद्वार्नों ने इतिहार्स अतीत को अपने-अपने ढंग से देखार् है तथार् अपने ढंग से अर्थ दिये हैं। परन्तु इसके अर्थ के रूप में विद्वार्नों में मतैक्य नहीं रहार्। इस रूप में इतिहार्स अतीत को अतीत के अभिलेख (Records of Past) के रूप में मार्नार् गयार्। लेकिन इतिहार्स अतीत तिथियों अथवार् तार्रीखों क संग्रह मार्त्र नहीं है। कार्ल आर. पार्पर के अनुसार्र- इतिहार्स अतीत क कोई लक्ष्य नहीं होतार् इसलिये उसक कोई अर्थ नहीं है। कुछ विद्वार्नों ने इसक समर्थन तो कियार् है परन्तु अधिकांश लोगों ने इसको गलत मार्नार् है। कार्ल आर. पार्पर ने अपनार् यह सिद्धार्न्त कि इतिहार्स अतीत क अर्थ नहीं होतार् इससे समर्थित कियार् कि प्रकृति के समार्न इतिहार्स अतीत भी हमें नहीं बतार् सकतार् कि हमें क्यार् करनार् चार्हिये। परन्तु इसके विपरीत विल्हेल्म हिल्थे (1823-1911) ने जीवन को इतिहार्स अतीत के समार्न अर्थपूर्ण मार्नार्। उन्होंने कहार् कि सम्पूर्ण इतिहार्स अतीत मन की अभिव्यक्ति होतार् है क्योंकि इतिहार्स अतीत की रचनार् मस्तिष्क से होती है। इस तरह से गाडनर तथार् हीगेल ने भी इतिहार्स अतीत को अर्थपूर्ण बतार्यार् है। एरिख काल्हर के अनुसार्र-पार्पर द्वार्रार् दी गई अनेक आपत्तियों के बार्वजूद, मार्नव इतिहार्स अतीत में एक व्यवस्थार् क दर्शन होतार् है और जहार्ँ व्यवस्थार् होती है वहार्ँ अर्थ क अस्तित्त्व हो सकतार् है।

गाडनर क मार्ननार् है- इतिहार्स अतीतकार अतीत के तथ्यों पर उस काल की घटनार्ओं क एक परिकल्पनार्त्मक चित्र प्रस्तुत करतार् है जिसमें वर्णित घटनार्एं अर्थपूर्ण होती हैं-इसी को इतिहार्स अतीत क अर्थ कहते हैं।

कल्पनार् तो मार्त्र सार्धन है इससे अतीत को सार्कार कियार् जार् सकतार् है। अतीत की घटनार्एं अर्थपूर्ण होती हैं अत: इतिहार्स अतीत क भी अपनार् अर्थ होतार् है। विको ने ‘द न्यू सार्इंस’ (The New Science) नार्मक ऐतिहार्सिक ग्रन्थ की रचनार् की। उसक कहनार् थार् कि-फ् इतिहार्स अतीत क ज्ञार्न प्रकृति के ज्ञार्न से भिन्न है, प्रकृति ईश्वर की रचनार् है जबकि इतिहार्स अतीत की रचनार् मनुष्य करतार् है। इसलिए व्यक्ति प्रकृति की अपेक्षार् इतिहार्स अतीत को अधिक स्पष्ट रूप से जार्न सकतार् है। अन्य विद्वार्नों ने भी इतिहार्स अतीत को अर्थपूर्ण बतार्यार् है। वार्स्तविक स्थिति भी यही है कि जब विश्व में सभी चीजें अर्थपूर्ण हैं तब इतिहार्स अतीत अर्थहीन केसे हो सकतार् है। इतिहार्स अतीत तो ज्ञार्न क अजस्त्र स्रोत है। अन्य कई विषयों क उद्गम स्रोत ही इतिहार्स अतीत है तब इतिहार्स अतीत अर्थहीन केसे हो सकतार् है? इतिहार्स अतीत में हम अतीत की घटनार्ओं क अध्ययन तथार् विश्लेषण करते हैं। इतिहार्स अतीतकार इतिहार्स अतीत को अर्थ प्रदार्न करतार् है। अत: यह इतिहार्स अतीतकार क ही दार्यित्व होतार् है कि वह सकारार्त्मक रुख अपनार्कर सकारार्त्मक इतिहार्स अतीत की रचनार् कर, सकारार्त्मक अर्थ निकाले। इतिहार्स अतीतकार एक विशेष काल के तथ्यों को एकत्रित करके उस काल के इतिहार्स अतीत को अर्थ प्रदार्न करतार् है। यह ऐतिहार्सिक तथ्य बिखरे हुए होते हैं। अत: उन तथ्यों के सार्थ वह कार्य तथार् कारण इत्यार्दि सम्बन्धों की विवेचनार् एवं खोज करके अतीत के उस इतिहार्स अतीत को सार्कार करतार् है। इस प्रकार से अतीत की रचनार् इतिहार्स अतीत के रूप में इतिहार्स अतीतकार ही करतार् है।

इतिहार्स अतीत में बहुत सी घटनार्एं ऐसी होती हैं जो देखने में निरर्थक प्रतीत होती हैं परन्तु उनके पीछे कुछ अर्थ भी छिपे होते हैं, जोकि इतिहार्स अतीतकार के मार्ध्यम से ही सार्कार होते हैं तथार् जिन्हें इतिहार्स अतीतकार को अपने विवेक के द्वार्रार् ही खोजनार् पड़तार् है।

डेवी ने अपनी पुस्तक ‘“यूमन नेचर एण्ड कण्डक्ट’ (Human Nature and Conduct) में लिखार् है- अतीत पर निष्ठार् अतीत के लिये ही नहीं अपितु सुरक्षित एवं सुसम्पन्न वर्तमार्न के लिये इस उद्देश्य से की जार्ती है कि वह सुखद एवं सुन्दर भविष्य क निर्मार्ण करेगार्।

अत: हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत क सर्वप्रथम अर्थ यही है कि वह वर्तमार्न में अतीत से प्रेरणार् लेकर सुखद भविष्य क निर्मार्ण करे। ऐसे में इतिहार्स अतीतकार क दार्यित्व और बढ़ जार्तार् है कि वह अतीत क भली प्रकार से अध्ययन करने के पश्चार्त् इतिहार्स अतीत को एक साथक अर्थ प्रदार्न करे। जिससे लोग प्रेरणार् ग्रहण कर सके तथार् जो लोगों के लिये ज्ञार्न क स्रोत हो। यह सब इतिहार्स अतीतकार के ऊपर निर्भर करतार् है।

ओकशार्ट अपनी पुस्तक ‘एक्सपीरियेन्स एण्ड इट्स मोड्स’ (Experience and its Modes) में लिखते हैं कि- इतिहार्स अतीत, इतिहार्स अतीतकार क अनुभव होतार् है। इतिहार्स अतीतकार के अतिरिक्त अन्य कोई भी इसकी अनुभूति नहीं कर सकतार्। इतिहार्स अतीत लेखन क अभिप्रार्य इसक निर्मार्ण होतार् है। लेकिन इसके सार्थ ही इतिहार्स अतीतकार क कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो जार्तार् है, क्योंकि उसक कार्य मार्त्र घटनार्ओं क अध्ययन तथार् संकलन ही नहीं अपितु उचित अर्थ के सार्थ एक उपयुक्त निष्कर्ष तक पहुँचार्नार् भी होतार् है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत क अपनार् एक अर्थ होतार् है तथार् अतीत की प्रत्येक घटनार् के पीछे तथ्य तथार् उद्देश्य होते हैं। प्रत्यक्ष अथवार् अप्रत्यक्ष रूप से उसमें अर्थ निहित होते हैं। निष्कर्षत: वर्तमार्न में अतीत से प्रेरणार् लेकर भविष्य को सुखी बनार्नार् तथार् प्रेरणार् प्रार्प्त करनार् ही इतिहार्स अतीत क मुख्य अर्थ है।

अनेक विद्वार्नों ने इतिहार्स अतीत को जिन विभिन्न अर्थों में देखार् उसी के अनुरूप उन्हें परिभार्षित भी कियार् है। अत: इतिहार्स अतीत की कई अलग-अलग परिभार्षार्एँ निश्चित होने के पीछे भी यही मुख्य कारण है। इसीलिये चार्ल्र्स फर्थ ने लिखार् है कि- इतिहार्स अतीत को परिभार्षित करनार् सरल नहीं है। परिभार्षार् क मुख्य कार्य सम्बन्धित विषय के बार्रे में उनके तत्वों को स्पष्ट करनार् तथार् उसे सुबोध और सरल बनार्नार् होतार् है। इतिहार्स अतीत स्वयं में एक ऐसार् विषय है जिससे अन्य विषय भी जुड़े हुए हैं। अत: इसके लिये अनेक प्रकार की परिभार्षार्ओं की व्यार्ख्यार् की गई हैं। इतिहार्स अतीत को समार्ज क पूर्ण चित्रण कहार् गयार् है। यह तो निश्चित है कि इतिहार्स अतीत में देशकाल तथार् परिस्थितियों के सार्थ-सार्थ समार्ज के स्वरूप क भी चित्रण होतार् है। इतिहार्स अतीत क प्रार्रम्भ तभी से ही हो जार्तार् है जबसे इस पृथ्वी पर मनुष्य क जन्म हुआ है। गैरोन्सकी क कहनार् है- इतिहार्स अतीत मार्नव अतीत के उस बिन्दु के प्रार्रम्भ काल क अभिलेख है जबसे लिखित अभिलेख प्रार्प्त होतार् है। इतिहार्स अतीत मार्नव सभ्यतार् क अभिलेख है।

इतिहार्स अतीत की उपयोगितार्

इतिहार्स अतीत शब्द को मुख्यत: दो अर्थों से जोड़ार् जार्तार् है जिसमें प्रथम है विभिन्न घटनार्ओं क संकलन तथार् द्वितीय के अनुसार्र इतिहार्स अतीत स्वयं ही एक घटनार् है। क्योंकि घटनार् के अभार्व में इतिहार्स अतीत लेखन करनार् सम्भव ही नहीं है। अगर इतिहार्स अतीत स्वयं एक घटनार् है तो इसके बार्रे में अनेक प्रश्न उठते हैं यथार् क्यों, कब, कहार्ँ तथार् केसे? अत: यदि देखार् जार्ये तो हमें प्रत्येक घटनार् के सम्बन्ध में इतिहार्स अतीत से जार्नकारी प्रार्प्त होती है। चार्ल्र्स फर्थ (Charles Firth) ने लिखार् है कि-इतिहार्स अतीत मनुष्य के समार्ज में जीवन का, समार्ज में हुए परिवर्तनों का, समार्ज के कार्यों को निश्चित करने वार्ले विचार्रों क तथार् उन भौतिक दशार्ओं क जिन्होंने उसकी प्रगति में सहार्यतार् की, लेखार्-जोखार् है। डॉ. रार्धार्कृष्णन ने इतिहार्स अतीत को रार्ष्ट्र की स्मरण शक्ति कहार् है। यद्यपि इस कथन से भी समस्त इतिहार्स अतीतकार पूर्ण रूपेण सहमत नहीं है तथार्पि इसमें कुछ सत्यतार् हो सकती है क्योंकि अनेक रार्ष्ट्रों तथार् मार्नव जार्तियों को अपने विस्मृत गौरव तथार् अतीत की जार्नकारी इतिहार्स अतीत से होती है।

अनेक विद्वार्नों ने इतिहार्स अतीत को मार्त्र एक कहार्नी के रूप में स्वीकार कियार् है। जी.एम. ट्रेवेलियन के अनुसार्र- इतिहार्स अतीत अपने अपरिवर्तनीय रूप में एक कहार्नी है। हेनरी पिरेने के अनुसार्र- इतिहार्स अतीत समार्ज में रहने वार्ले मनुष्यों के कार्यों तथार् उपलब्धियों की कहार्नी है। इसी विचार्र को तुइ¯जग ने भी व्यक्त कियार् है कि- इतिहार्स अतीत अतीत की कथार्त्मक घटनार्ओं क उल्लेख है। रेनियर ने इतिहार्स अतीत को कहार्नी के रूप में परिभार्षित कियार् है। जिन्होंने लिखार् है कि- इतिहार्स अतीत सभ्य समार्ज की सन्निवार्सित मार्नवीय अनुभवों की कहार्नी है। इतिहार्स अतीत अतीत की कहार्नी मार्त्र है ऐसार् नहीं है। अपितु इतिहार्स अतीत सिर्फ कथार् नहीं बल्कि अतीत क जीवन्त चित्रण है। और अतीत के इस विवरण तथार् चित्रण में सिर्फ समार्ज के विशिष्ट लोग ही नहीं आते बल्कि सम्पूर्ण समार्ज आतार् है। वार्स्तव में किसी भी रार्ष्ट्र अथवार् स्थार्न क इतिहार्स अतीत तब पूरार् मार्नार् जार्तार् है जब वहार्ँ के सभी वर्ग इतिहार्स अतीत में समार्हित होते हों।

अगर हम इतिहार्स अतीत को मार्त्र एक कहार्नी मार्न लें तब उसमें इतिहार्स अतीत के मूल स्वरूप क लोप हो जार्तार् है क्योंकि इतिहार्स अतीत तथ्यों पर आधार्रित होतार् है और उन तथ्यों के आधार्र पर इतिहार्स अतीत को लिखनार् इतिहार्स अतीतकार के ऊपर निर्भर करतार् है कि वह उसे मार्त्र एक कहार्नी के रूप में प्रस्तुत करतार् है अथवार् वार्स्तविक अतीत के तथ्यों को भलीपूर्वक विश्लेषण करने के पश्चार्त् वर्तमार्न के समक्ष लार्तार् है। कहार्नी कल्पनार्ओं पर आधार्रित होती है। और इतिहार्स अतीत कल्पनार् पर नहीं तथ्यों पर आधार्रित होतार् है। प्रार्चीन समय में रार्जनीतिक इतिहार्स अतीत लेखन क प्रचलन अवश्य थार् क्योंकि रार्जनीति को इतिहार्स अतीत से सम्बद्ध कर दियार् जार्तार् थार्। परन्तु अब इतिहार्स अतीत जनसार्धार्रण के सार्मार्जिक तथार् सार्ँस्कृतिक पक्ष पर विशेष रोशनी डार्लतार् है। अत: ऐसे में इतिहार्स अतीत को मार्त्र एक कहार्नी के रूप में कदार्पि स्वीकार नहीं कियार् जार् सकतार् है। यद्यपि इस तथ्य से इंकार नहीं कियार् जार् सकतार् कि इतिहार्स अतीत की कुछ घटनार्ऐं ऐसी होती हैं जो स्वयं में रोचकतार् से परिपूर्ण होती हैं। वे एक कहार्नी की तरह लगती हैं परन्तु फिर भी हम इतिहार्स अतीत को मार्त्र एक कहार्नी नहीं मार्न सकते।

कलिंगवुड ने लिखार् है कि इतिहार्स अतीत अद्वितीय ज्ञार्न है और यह मनुष्य के सम्पूर्ण ज्ञार्न क स्रोत है। यह सत्य ही प्रतीत होतार् है क्योंकि इतिहार्स अतीत में ही मनुष्य जार्ति क सम्पूर्ण अतीत समार्यार् हुआ है। अत: चार्ल्र्स फर्थ ने भी कहार् है कि- इतिहार्स अतीत ज्ञार्न की एक शार्खार् ही नहीं, अपितु एक विशेष प्रकार क ज्ञार्न है जो मनुष्य के दैनिक जीवन में उपयोगी है। इतिहार्स अतीत से हमें यथेष्ट ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है। मनुष्य अपनी सभी समस्यार्ओं के लिये इतिहार्स अतीत की ओर उन्मुख होतार् है, क्योंकि इतिहार्स अतीत क मुख्य कार्य अतीत के उदार्हरणों के द्वार्रार् वर्तमार्न को भविष्य के लिये ज्ञार्न प्रार्प्त करार्नार् होतार् है। लार्ल बहार्दुर वर्मार् के अनुसार्र- अतीत के प्रति मनुष्य क नैसख्रगक लगार्व होतार् है, इतिहार्स अतीत इस लगार्व को इतिहार्स अतीत बोध में बदल देतार् है। संवेदनार् और भार्वनार् के यथाथ को बौद्धिक यथाथ-ज्ञार्न व विवेक में विकसित कर सकतार् है। अर्थार्त् उस लगार्व को प्रार्संगिक तथार् उपयोगी बनार् सकतार् है। क्रोचे ने भी इतिहार्स अतीत को मार्नव ज्ञार्न के सर्वश्रेष्ठ रूप के सार्थ-सार्थ एक प्रेरक शक्ति भी मार्नार् है। इतिहार्स अतीत से हमें पर्यार्प्त ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है। अतीत से व्यक्ति शिक्षार् लेतार् है तथार् अपने भविष्य क निर्मार्ण करतार् है। इतिहार्स अतीत में ऐसे अनेक उदार्हरण विद्यमार्न हैं जैसे अलार्उद्दीन खिलजी (खिलजी वंश) ने सिकन्दर की असफलतार् को देखकर अपनी विश्व विजय की महत्त्वार्कांक्षार् क परित्यार्ग कर दियार्। यह उचित ही है कि इतिहार्स अतीत अतीत के ज्ञार्न क संकलन है जो सभी के जीवन के विविध पहलुओं क ज्ञार्न प्रदार्न करतार् है। मगर एक तथ्य यह भी है कि मार्नव एवं समार्ज इतिहार्स अतीत से सीख कम ही लेतार् है। विश्व में होने वार्ले अनेक युद्ध इसके प्रमार्ण हैं। परन्तु सार्थ ही ऐसे उदार्हरण भी हैं जब इतिहार्स अतीत से सीख ली गई है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत ज्ञार्न क भंडार्र होने के सार्थ ही ज्ञार्न क प्रमुख स्रोत भी है। जिससे शिक्षार् लेकर मार्नव अपने सुखद भविष्य क निर्मार्ण कर सकतार् है।

इतिहार्स अतीत को सार्मार्जिक विज्ञार्न के रूप में भी मार्न्यतार् दी गयी है। यह कार्य सर्वप्रथम कार्ल माक्स ने कियार्। परन्तु विल्हेल्म डिल्थे प्रथम व्यक्ति थार् जिसने इतिहार्स अतीत को वार्स्तव में सार्मार्जिक विज्ञार्न क रूप देने की कोशिश की। डिल्थे क कहनार् थार् कि यदि मनुष्य के कार्य, व्यवहार्र तथार् कृतियों क अध्ययन कियार् जार्ये तो इतिहार्स अतीत ही ऐसार् मार्ध्यम है जिससे मनुष्य को समझार् जार् सकतार् है। इतिहार्स अतीत ही वह स्थार्न है जहार्ँ से सार्मार्जिक विज्ञार्न की उत्पत्ति होती है। अत: इतिहार्स अतीत में रार्जनीतिक, सार्मार्जिक तथार् आर्थिक विकास के वर्णन क समार्वेश होनार् चार्हिये। पिरेने ने लिखार् है- इतिहार्स अतीत अतीत में स्थित मार्नव समार्जों के विकास क व्यार्ख्यार्त्मक वर्णन है। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत सार्मार्जिक विज्ञार्न तो है ही सार्थ ही सार्मार्जिक विज्ञार्न के अन्तर्गत जितने भी विषय आते हैं उनमें सर्वप्रमुख है और अन्य सार्मार्जिक विज्ञार्न इसी में आत्मसार्त हैं।

इतिहार्स अतीत क महत्व

इतिहार्स अतीत एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण विषय है। इसक अध्ययन हमें वर्तमार्न में अतीत के महत्त्व को बतार्तार् है तथार् भविष्य के लिये हमें नई धरोहर देतार् है। मार्नव जार्ति आज जितनी प्रगति कर चुकी है, उसक आधार्र वह अतीत ही है जहार्ँ से उसे ज्ञार्न मिलार् है। मनुष्य के लिये इतिहार्स अतीत क ज्ञार्न बहुत उपयोगी है। शेख अली क मार्ननार् है कि-इतिहार्स अतीत की उपेक्षार् करने वार्ले रार्ष्ट्र क कोई भविष्य नहीं होतार्। दूसरी तरफ कुछ विद्वार्नों क यह भी कहनार् है कि इतिहार्स अतीत क अध्ययन उचित नहीं है। उनके अनुसार्र वर्तमार्न ही सब कुछ है तथार् अतीत के विषय में जार्नकारी प्रार्प्त करने में हमें समय नष्ट नहीं करनार् चार्हिये। हेनरी फोर्ड तथार् हीगल भी इसी मत क समर्थन करते हैं। किन्तु यह मत सर्वमार्न्य नहीं है। हमार्रार् वर्तमार्न अतीत से जुड़ार् हुआ है। वर्तमार्न में अतीत क अत्यधिक महत्त्व है। इस सृष्टि की उत्पत्ति केसे हुई, मार्नव समार्ज क प्रार्दुर्भार्व तथार् विकास केसे हुआ, इसकी जार्नकारी हमें इतिहार्स अतीत से ही मिल सकती है। मनुष्य तथार् विश्व में वर्तमार्न रूप की जो पृष्ठभूमि है वह अतीत में ही विद्यमार्न है। इन परिस्थितियों में हम अतीत को अनदेखार् केसे कर सकते हैं। इतिहार्स अतीत एक ऐसी कड़ी है जो वर्तमार्न को अतीत से सम्बद्ध करती है। जिस प्रकार से किसी भी चिकित्सक को रोग दूर करने के लिये रोग की पृष्ठभूमि की जार्नकारी आवश्यक होती है उसी प्रकार से किसी भी समार्ज व देश के विकास के लिये तथार् उनकी समस्यार्ओं के निदार्न के लिये हमें उसकी पृष्ठभूमि के लिये अतीत की ओर झार्ँकनार् ही पड़तार् है।

हम जार्नते हैं कि इतिहार्स अतीत क क्षेत्र अत्यन्त ही व्यार्पक है। यह समार्ज के हर वर्ग से सम्बन्धित है। व्यवसार्यिक रूप में भी इतिहार्स अतीत की उपयोगितार् कम नहीं है। फरार्तत्व विभार्ग, पर्यटन, अभिलेखार्गार्र, संस्कृति विभार्ग, ऐसे क्षेत्र हैं जहार्ँ इतिहार्स अतीत क ज्ञार्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अनिवाय भी है। शिक्षार् के क्षेत्र में भी इतिहार्स अतीत की अत्यन्त उपयोगितार् है। प्रशार्सनिक क्षेत्र में मार्नवीय तथार् सार्मार्जिक समस्यार्ओं को समझने तथार् हल करने में भी इतिहार्स अतीत एक धुरी क कार्य करतार् है। रार्उज ने लिखार् है कि समार्ज को उच्चतर शिक्षार् प्रदार्न करने के लिये इतिहार्स अतीत क ज्ञार्न अत्यार्वश्यक है। वार्स्तविकतार् भी यही है क्योंकि इतिहार्स अतीत से मनुष्य हर प्रकार की शिक्षार् प्रार्प्त करतार् है यह शिक्षार् अन्य विषयों में दुलर्भ है। इतिहार्स अतीत सभी विषयों में एकसूत्रतार् स्थार्पित करतार् है। यह उक्ति उचित ही प्रतीत होती है कि इतिहार्स अतीत मनुष्य को बुद्धिमार्न बनार्तार् है।

इतिहार्स अतीत के अध्ययन क प्रयोजन भी है। यह मनुष्य को न सिर्फ वर्तमार्न के लिये ज्ञार्न देतार् है अपितु भविष्य के निर्मार्ण में भी सहार्यतार् करतार् है। भविष्य के लिये यह दिशार्-निर्देश देतार् है। यह मार्नव के अनुभव क्षेत्र में वृद्धि करतार् है। यह न केवल मनुष्य को सत्य की खोज के लिये प्रेरित करतार् है अपितु अतीत के फनर्निमार्ण में भी सहार्यतार् प्रदार्न करतार् है। वर्तमार्न समय में इतिहार्स अतीत की उपयोगितार् मार्त्र नैतिक, सार्ंस्कृतिक तथार् सार्मार्जिक ही नहीं है अपितु सूचनार्परक भी है। इतिहार्स अतीत के अध्ययन के बार्रे मे कलिंगवुड ने लिखार् है कि- इतिहार्स अतीत क अध्ययन मार्नव जीवन के लिये उपयोगी है क्योंकि परिवर्तन की लय स्वयं को दोहरार्ती रहती है क्योंकि उसी प्रकार की घटनार्एं और समार्न परिणार्म अक्सर दृष्टिगोचर होते हैं। यह न केवल घटित होने वार्ली घटनार्ओं की ओर संकेत करतार् है अपितु उन संकटों से भी अवगत करार्तार् है जिनके आने की संभार्वनार् होती है। इतिहार्स अतीत क सम्बन्ध समार्ज के सभी वर्गों से है इतिहार्स अतीत स्वयं को समझने तथार् आंकलन करने क और भविष्य को संवार्रने क अनुभव देतार् है। यह हमें मार्नवीय समार्ज क ज्ञार्न प्रदार्न करतार् है। समार्ज की उत्पत्ति स्वरूप, विकास, विचार्रधार्रार्ओं के पार्रस्परिक संघर्ष तथार् प्रगति क विवरण हमें इतिहार्स अतीत से ही मिलतार् है। इतिहार्स अतीत हमें उन प्रार्कृतिक नियमों की जार्नकारी देतार् है जिन पर मार्नवीय व्यवहार्र आधार्रित हैं। इतिहार्स अतीत के प्रति मार्नव की हमेशार् से रुचि रही है।

इतिहार्स अतीत के अध्ययन क नैतिक महत्व भी है। अतीत से लेकर वर्तमार्न तक चार्हे जो भी स्थितियार्ँ अथवार् परिस्थितियार्ँ रही हों नैतिक मूल्यों एवं सिद्धार्न्तों के गुण तथार् विशेषतार्एँ प्रार्य: समार्न ही रहती हैं। अत: ऐसी स्थिति में इतिहार्स अतीत क नैतिक महत्व स्वयं ही सिद्ध हो जार्तार् है।

इतिहार्स अतीतकार इतिहार्स अतीत में शोध के द्वार्रार् अतीत को वर्तमार्न में चित्रित करतार् है। यह मार्नव मस्तिष्क की जिज्ञार्सार्ओं को शार्न्त करतार् है। नित्य नई खोजें तथार् अनुसंधार्न हमार्रे सार्मने नये तथ्य लार्ते रहते हैं। इतिहार्स अतीत की श्रंखलार् से अतीत, वर्तमार्न तथार् भविष्य सम्बद्ध रहते हैं।

कुछ विद्वार्नों ने इस दृष्टिकोण को नहीं मार्नार् है। यद्यपि उनके अनुसार्र इतिहार्स अतीत क महत्त्व है परन्तु एक सीमार् तक। उनक कहनार् है कि अतीत के अध्ययन क कोई सैद्धार्न्तिक महत्त्व नहीं है। इतिहार्स अतीतकार वर्तमार्न के महत्त्व को अनदेखार् कर देतार् है क्योंकि वह हमेशार् अतीत के अध्ययन में ही व्यस्त रहतार् है। ऐसे में इतिहार्स अतीत क अध्ययन वर्तमार्न के महत्त्व को कम करतार् है। आध्यार्त्मिक दृष्टिकोण से भी इतिहार्स अतीत निरर्थक है क्योंकि यह मार्त्र अतीत को ही दर्शार्तार् है। इतिहार्स अतीत क अध्ययन कभी-कभी पूर्वार्ग्रहों से भी प्रेरित होतार् है। ऐसी स्थिति में इतिहार्स अतीतकार सम्पूर्ण वर्णन अपनी इच्छार् के आधार्र पर ही करतार् है और ऐसी स्थिति में इतिहार्स अतीत क वार्स्तविक अर्थ ही समार्प्त हो जार्तार् है दूसरी ओर वर्णन तथार् व्यार्ख्यार् करने के लिये जो स्रोत प्रयोग किये जार्ते हैं उनमें भी विरोधार्भार्स होतार् है अत: ऐसी स्थिति में इतिहार्स अतीत क अध्ययन संदेहपूर्ण बन जार्तार् है।

परन्तु इन तर्कों के कारण इतिहार्स अतीत क महत्त्व समार्प्त नहीं हो जार्तार्। वर्तमार्न समय में नई तकनीक तथार् सार्धनों के कारण अतीत क वैज्ञार्निक तरीके से आंकलन कियार् जार् सकतार् है तथार् इन्हीं के आधार्र पर घटनार्ओं की व्यार्ख्यार् की जार् सकती है। अतीत में बिखरे हुए सार्क्ष्यों को समेटकर उन पर अनुसंधार्न करके ही इतिहार्स अतीतकार हमार्रे सार्मने रखतार् है। इतिहार्स अतीत क अध्ययन इस प्रकार से न केवल इतिहार्स अतीतकार वरन् सभी के लिये उपयोगी तथार् महत्त्वपूर्ण बन जार्तार् है। ए.जी. विझोरी ने लिखार् है कि- इतिहार्स अतीतकारों ने मार्नवतार् के जीवन की निरंतरतार् में महत्त्वपूर्ण भूमिक निभार्ई है। इतिहार्स अतीत के अध्ययन के लिये अनेक सशक्त कारण रहे हैं और रहेंगे। इस प्रकार से इतिहार्स अतीत क क्षेत्र अत्यन्त व्यार्पक है। समार्ज क कोई भी पहलू इससे अछूतार् नहीं रहार् है।

इतिहार्स अतीत की प्रकृति व क्षेत्र

इतिहार्स अतीत अतीत की घटनार्ओं की व्यार्ख्यार् करतार् है, अत: यह इतिहार्स अतीतकार क दार्यित्व होतार् है कि वह इतिहार्स अतीत की प्रकृति को ध्यार्न में रखे। प्रार्रम्भ में इतिहार्स अतीत लेखन के समय मार्त्र अतीत लेखन को ही महत्त्वपूर्ण समझार् जार्तार् थार् परन्तु समय के सार्थ-सार्थ इतिहार्स अतीत क अध्ययन करते समय वैज्ञार्निक पद्धति को प्रार्थमिकतार् दी जार्ने लगी। यह सर्वमार्न्य तथ्य है कि इतिहार्स अतीतकार क कार्य मार्त्र अतीत की घटनार्ओं क वर्णन नहीं अपितु उन्हें तथ्यों के आधार्र पर प्रस्तुत करनार् है। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि वह अपने व्यक्तिगत तर्कों तथार् तथ्यों को ऐतिहार्सिक तथ्यों से अलग रखे। इतिहार्स अतीतकार अपने इतिहार्स अतीत लेखन में सार्धार्रण वर्णन सार्मार्जिक-आर्थिक तथार् धामिक जीवन के बार्रे में अपने विचार्र रखतार् है और इसमें उसके स्वयं के विचार्र तथार् पूर्वार्ग्रह भी सम्मिलित दिखार्ई पड़ते हैं। पूर्वार्ग्रह से इतिहार्स अतीतकार हमेशार् ही प्रभार्वित होतार् है। क्योंकि उसे धामिक, आर्थिक तथार् सार्मार्जिक रूप में अतीत की घटनार्ओं क अध्ययन करनार् पड़तार् है। इतिहार्स अतीत लेखन के सार्थ यह आवश्यक हो जार्तार् है कि इसक पुनर्लेखन हो। नये तथ्यों के सार्थ जो अनुसंधार्नों तथार् खोजों के परिणार्म होते हैं उनक भी इतिहार्स अतीत लेखन में महत्त्वपूर्ण योगदार्न होतार् है। इसके अतिरिक्त नये सार्धनों क प्रयोग करके भी इतिहार्स अतीत लेखन के द्वार्रार् व्यार्ख्यार् की जार् सकती है। ऐसे अनेक तथ्य हैं जो इतिहार्स अतीत की प्रकृति को प्रभार्वित करते हैं।

कुछ विद्वार्नों क यह कहनार् है कि इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् है। दूसरी ओर कुछ अन्य क विचार्र है कि ऐसार् सत्य नहीं है। लेकिन सत्य इन दोनों तथ्यों के बीच में विद्यमार्न है। अगर हम प्रथम तथ्य को देखें कि इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् है तो इसक कारण पार्ते हैं कि विश्व में जो घटनार्यें होती हैं वे समार्न रूप से होती हैं परन्तु उनके पीछे कारण अथवार् घटित होने क ढंग अलग होतार् है। मनुष्य के सोचने क ढंग और कार्य करने क ढंग प्रार्य: एक सार् रहतार् है। उदार्हरण के लिये अगर हम देखें तो पार्येंगे कि इतिहार्स अतीत ऐसी कई घटनार्ओं से भरार् हुआ है जो युद्ध अशोक के समय में हुआ थार्, वही युद्ध प्रथम विश्वयुद्ध तथार् द्वितीय विश्वयुद्ध के रूप में सार्मने आयार्। युद्ध की भयार्वहतार् को तथार् विनार्श को देखते हुए प्रथम विश्वयुद्ध के बार्द लीग ऑफ नेशन्स (League of Nations) की स्थार्पनार् की गई और दूसरे विश्वयुद्ध के पश्चार्त् भी संयुक्त रार्ष्ट्र संघ (U.N.O.) को स्थार्पित कियार् गयार्। हिटलर, नेपोलियन, सिकन्दर तथार् जूलियस सीजर इत्यार्दि के कार्य मुख्यत: एक ही पथ पर आधार्रित थे। प्रसिद्धि के प्रति मोह तथार् महत्त्वार्कांक्षार् हर युग में विद्यमार्न रही है। दूसरी ओर जो इस कथन- इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् है के पक्ष में नहीं है। उनक कहनार् है कि बदलार्व प्रकृति क नियम है तब इतिहार्स अतीत स्वयं को केसे दोहरार् सकतार् है। अगर ऐसार् होतार् है तब विकास की सम्भार्वनार्एँ खत्म हो जार्ती हैं। उदार्हरणाथ हम इतिहार्स अतीत में कलार् को देखें तो हर युग में इसमें विभिन्नतार् है। इसके पीछे मनुष्य, समार्ज तथार् संस्कृति की विभिन्नतार् भी परिलक्षित होती हैं। यह एक विचार्र क विषय है कि इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् है अथवार् नहीं। परिवर्तन इतिहार्स अतीत में है जब इतिहार्स अतीत स्वयं को नहीं दोहरार्तार् है जैसे सभी स्थार्यी परिवर्तन धीरे-धीरे होते हैं और यह सत्य है कि अपरिवर्तनशीलतार् स्थार्यी नहीं है। अगर हम इस कथन के पक्ष में देखें तो पार्एंगे कि क्रार्न्तियार्ँ, सुधार्र, रार्जनीतिक, परिवर्तन हर युग में हुए हैं, लेकिन इनके घटित होने क ढंग अलग थार्। अत: हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् भी है और नहीं भी दोहरार्तार् है। कभी-कभी समार्न परिस्थितियों के कारण इतिहार्स अतीत में हुई घटनार्ओं की प्रवृत्ति क आभार्स करार्तार् है। इस बार्रे में टे्रवेलियन क कथन विचार्रणीय है कि-इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् है परन्तु कभी भी पूर्णतयार् नहीं दोहरार्तार् है।

इतिहार्स अतीत के बार्रे में दूसरार् विचार्र यह है कि-सम्पूर्ण इतिहार्स अतीत समसार्मयिक इतिहार्स अतीत होतार् है। इसकी व्यार्ख्यार् क्रोचे ने इस प्रकार से की है कि-प्रत्येक ऐतिहार्सिक तथ्य निर्णय के पीछे जो व्यार्वहार्रिक आवश्यकतार्यें होती हैं वे प्रत्येक इतिहार्स अतीत को समसार्मयिक इतिहार्स अतीत क चरित्र प्रदार्न करती हैं क्योंकि लिखी जार्ने वार्ली घटनार्यें वर्तमार्न स्थितियों से ही संदख्रभत होती हैं और उन्हीं में पहले की वे घटनार्यें प्रतिध्वनित होती हैं। इतिहार्स अतीत क लेखन वर्तमार्न में अतीत को आधुनिक अथवार् वर्तमार्न समस्यार्ओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करतार् है। इतिहार्स अतीतकार क मुख्य कार्य मार्त्र उन घटनार्ओं को लिखनार् ही नहीं बल्कि उनक पूर्ण रूप से निरपेक्ष होकर मूल्यार्ंकन करनार् होतार् है। कुछ ऐतिहार्सिक तथ्य एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं तथार् स्थार्ई रूप से एक दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। ओकशार्ट, गार्लार्ब्रेथ तथार् डेवी इत्यार्दि अनेक विद्वार्नों ने इस बार्त को स्वीकार कियार् है कि इतिहार्स अतीत समसार्मयिक होतार् है। वर्तमार्न समार्ज की उपार्देयतार् के लिये ही अतीत क अध्ययन कियार् जार्तार् है। कौटिल्य और कालिदार्स की रचनार्एं इसक उदार्हरण हैं। अशोक क युद्ध त्यार्ग आज भी मार्नव जार्ति को युद्ध से होने वार्ले संहार्र के बार्रे में सार्वधार्न करतार् है। ईसार् मसीह, महार्त्मार् बुद्ध, गार्ँधी जी इत्यार्दि के विचार्र आज भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं जितने उस समय में थे। लेकिन कुछ विद्वार्नों ने इतिहार्स अतीत के समसार्मयिक होने पर प्रश्न उठार्ए हैं कि यदि इतिहार्स अतीतकार इतिहार्स अतीत के तथ्यों को वर्तमार्न में उपार्देय बनार्ने पर जोर देतार् है तब यह मार्त्र उपयोगितार्वार्दी दृष्टिकोण बनकर ही रह जार्तार् है। अत: यह विशेष ध्यार्न रखनार् चार्हिये कि उपयोगितार्वार्द के कारण तथ्यों की मौलिकतार् नष्ट न हो। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत समसार्मयिक होतार् है। परन्तु उसे समसार्मयिक बनार्ने के प्रयार्स के लिये तथ्यों से खिलवार्ड़ नहीं करनार् चार्हिये।

कुछ अन्य इतिहार्स अतीतकारों की मार्न्यतार् है कि इतिहार्स अतीत की प्रकृति चक्रीय (Cyclic) अथवार् रैखिक (Linear) होती है। जिन इतिहार्स अतीतकारों क मार्ननार् है कि इतिहार्स अतीत की प्रकृति चक्रीय होती है उनक मार्ननार् है कि इतिहार्स अतीत एक वृत्त के आधार्र पर घटित होतार् रहतार् है। प्रत्येक घटनार् एक नियत स्थार्न से आरम्भ होकर चरम अवस्थार् पर पहुँचती है, तत्पश्चार्त् उसक पतन हो जार्तार् है। यह प्रक्रियार् क्रमश: होती रहती है और अनेक सभ्यतार्ओं क उत्थार्न तथार् पतन इसक उदार्हरण है। चार्हे वह सभ्यतार् किसी स्थार्न की हो, रोम की हो अथवार् चीन की यार् ग्रीक की सभी के लिये यह सिद्धार्न्त लार्गू होतार् है। हड़प्पार् की सभ्यतार् भी इसक अपवार्द नहीं है। कुछ विद्वार्नों क विचार्र है कि इतिहार्स अतीत की घटनार्एं रैखिक होती हैं। ये सभी घटनार्एं निरन्तर घटती रहती हैं। वर्तमार्न तथार् अतीत एक दूसरे में सम्बद्ध रहतार् है। घटनार्ओं की यह निरन्तरतार् तथार् अनवरततार् ही इतिहार्स अतीत की रैखिक प्रकृति क निर्मार्ण करती है। इसके अनुसार्र इतिहार्स अतीत की घटनार्एं अतीत से प्रार्रम्भ होकर वर्तमार्न से गुजरकर अज्ञार्त भविष्य की ओर जार्ती हैं। इन प्रार्कृतिक सिद्धार्न्तों के अतिरिक्त तूर्गो (Turgot) तथार् कोन्डोरे (Condorcet) ने विकास के विचार्र को मार्न्यतार् दी है। उनके अनुसार्र विकास क अर्थ अल्प वार्ंछित स्थिति से अधिक वार्ंछित स्थिति की ओर जार्नार् है। छोटी घटनार्एं बड़ी घटनार्ओं को जन्म देती हैं। कॉम्टे ने भी इस प्रकृति को स्वीकार कियार् है।

प्रसिद्ध विद्वार्न ई.एच.कार. के अनुसार्र इतिहार्स अतीत वर्तमार्न तथार् अतीत के मध्य अनन्त वातार् है। अतीत पूर्णत: ज्ञार्त नहीं होतार् है और इतिहार्स अतीतकार क कार्य उस अतीत के बार्रे में अनुसंधार्न तथार् खोज करके तथ्यों को हमार्रे सार्मने रखनार् होतार् है और वह इसमें अपने ज्ञार्न क प्रयोग करतार् है। ऐसार् करते समय इतिहार्स अतीत अतीत तथार् वर्तमार्न की घटनार्ओं क सर्वेक्षण करतार् है। इतिहार्स अतीतकार के समक्ष अतीत की घटनार्एं घटती नहीं हैं अत: उसे कल्पनार्शीलतार् क सहार्रार् भी लेनार् पड़तार् है। अतीत की घटनार्ओं क वर्तमार्न में अनार्वरण ही इतिहार्स अतीत क मुख्य ध्येय है। इन घटनार्ओं क वर्तमार्न में वर्णन करते समय अतीत की मुख्य भूमिक होती है। इस प्रकार इतिहार्स अतीत अतीत तथार् वर्तमार्न के बीच सम्बद्ध है। वर्तमार्न तथार् अतीत के मध्य एक महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध होतार् है जो इन दोनों को जोड़ने के लिये प्रयुक्त होतार् है। जब अतीत और वर्तमार्न दोनों को एक सार्थ देखने के लिए सार्धन के रूप में प्रयोग होतार् है तब इसे इतिहार्स अतीत की दृष्टि कहार् जार्तार् है। इसी आधार्र पर वर्तमार्न समार्ज को अतीत के उन तथ्यों से परिचित करार्यार् जार्तार् है जो वर्तमार्न के लिए रुचिकर तथार् उपयोगी हो। यह भी कहार् जार्तार् है कि अतीत तथार् वर्तमार्न को आपस में जोड़ने के लिये इतिहार्स अतीत क प्रयोग कियार् जार्तार् है। यह इतिहार्स अतीत की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यार्ख्यार् तथार् प्रकृति भी है।

इतिहार्स अतीत की प्रकृति की व्यार्ख्यार् इस रूप में भी की गई है कि सम्पूर्ण इतिहार्स अतीत विचार्रों क इतिहार्स अतीत है। इसको कालिंगवुड ने स्वीकार कियार् है और यह कहार् है कि- इतिहार्स अतीतकार प्रधार्न नहीं बल्कि विचार्र प्रधार्न होते हैं तथार् इतिहार्स अतीत प्रार्चीन विचार्रों क पुन: प्रदर्शन करतार् है। मार्नव के मूर्त कार्यों क स्रोत अथवार् आधार्र विचार्र ही होते हैं। मनुष्य पहले विचार्र करतार् है तत्पश्चार्त् उन्हीं विचार्रों को लिखित रूप देतार् है। परिस्थितियार्ँ तथार् वार्तार्वरण विचार्रों को प्रभार्वित करते हैं। जब हम शार्सकों क अध्ययन करते हैं तब यह बार्त उचित ही प्रतीत होती है। परन्तु इसके विपरीत अनेक विद्वार्नों ने इसे गलत मार्नार् है। प्रो. वार्ल्श के अनुसार्र भी इतिहार्स अतीत विचार्र प्रधार्न नहीं होतार्। दैवी विपत्तियार्ँ, बार्ढ़, भूकम्प इत्यार्दि विचार्रों के विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं। निष्कर्ष के रूप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत एक सीमार् तक ही विचार्रों क इतिहार्स अतीत कहार् जार् सकतार् है तथार् सम्पूर्ण इतिहार्स अतीत को विचार्रों क इतिहार्स अतीत कहनार् उचित प्रतीत नहीं होतार्। परिस्थितियार्ँ, देशकाल तथार् वार्तार्वरण इतिहार्स अतीतकार को प्रभार्वित करती हैं। अत: इतिहार्स अतीत मार्त्र विचार्रों क इतिहार्स अतीत ही नहीं है।

इतिहार्स अतीत समय के सार्थ हर युग में बदलतार् है और एक इतिहार्स अतीतकार के वर्णन दूसरे इतिहार्स अतीतकार से अलग होते हैं। काल के अनुसार्र इतिहार्स अतीत की प्रकृति भी बदल जार्ती है। काल अथवार् समय क इतिहार्स अतीत पर बहुत प्रभार्व पड़तार् है। इतिहार्स अतीतकार जो लिखतार् है-वह उसके तत्कालीन वार्तार्वरण से बहुत हद तक प्रभार्वित होतार् है। एक समकालीन इतिहार्स अतीतकार ऐतिहार्सिक घटनार्ओं क वर्णन अपने दृष्टिकोण से करतार् है और दूसरार् व्यक्ति उसक वर्णन अपने अनुसार्र करतार् है।

इतिहार्स अतीतकारों के मध्य मुख्य विवार्द क विषय है कि तथ्यों के महत्त्व क आकलन इतिहार्स अतीत में वार्ंछनीय है अथवार् नहीं। लॉर्ड एक्टन के अनुसार्र तथ्यों के महत्त्व क आकलन इतिहार्स अतीत में अनिवाय है। जबकि दूसरी ओर रेंकी (Ranke) तथार् बरी (Bury) के अनुसार्र यह सही नहीं है। उनक कहनार् है कि इतिहार्स अतीत में तथ्यों को उनकी मौलिक अवस्थार् में ही प्रस्तुत करनार् चार्हिये। परन्तु अगर ऐसार् कियार् गयार् तो इतिहार्स अतीत क कोई उद्देश्य नहीं रह जार्येगार्। इतिहार्स अतीत को अपने दृष्टिकोण से तथ्यों की व्यार्ख्यार् करनी चार्हिये। अन्यथार् इतिहार्स अतीत में नीरसतार् आ जार्येगी। सार्थ ही यह व्यार्ख्यार् इतनी भी नहीं होनी चार्हिए कि इतिहार्स अतीत अपने मूल रूप से ही वंचित हो जार्ये। इस प्रकार से इतिहार्स अतीत की प्रकृति क अध्ययन विभिन्न ढंगों से कियार् जार् सकतार् है। इतिहार्स अतीत स्वयं को दोहरार्तार् भी है और नहीं भी। एक ओर इतिहार्स अतीत समसार्मयिक है तो दूसरी ओर अतीत और वर्तमार्न के मध्य परस्पर संवार्द है। इतिहार्स अतीत में तथ्यों के महत्त्व क आकलन भी आवश्यक है जिसे अनदेखार् नहीं कियार् जार् सकतार्। ऐतिहार्सिक तथ्यों की अवधार्रणार् चक्रीय अथवार् रैखिक दोनों ही प्रकार की हो सकती है। इतिहार्स अतीत की प्रकृति के विषय में भले ही विद्वार्नों के मध्य विचार्रों में समार्नतार् न हो परन्तु इतिहार्स अतीत के महत्त्व पर सभी में सहमति है। इतिहार्स अतीत क अर्थ है तथार् उसक उद्देश्य भी है। यह इतिहार्स अतीतकार क कर्त्तव्य है कि वह इतिहार्स अतीत क वर्णन करते समय तर्वफसंगत दृष्टिकोण को महत्त्व दे।

विद्वार्नों क मार्ननार् है कि-समय के सार्थ इतिहार्स अतीत के क्षेत्र में भी विस्तार्र हुआ तथार् उसमें नवीन क्षेत्र जुड़ गये हैं। इतिहार्स अतीत क मुख्य कार्य घटित घटनार्ओं क वर्णन करनार्, उनके घटित होने के कारण बतार्नार् और उनक विश्लेषण करनार् है। उसक क्षेत्र भी निरंतर बढ़ रहार् है। इतिहार्स अतीत, अध्ययन विषय के रूप में काफी सीमार् तक एक नवीन क्षेत्र कहार् जार् सकतार् है। यह मुख्यत: अठार्रवीं तथार् बीसवीं शतार्ब्दी के मध्य एक अलग क्षेत्र के रूप में उभरार् तथार् विकसित हुआ। इतिहार्स अतीत एक प्रार्चीन विषय रहार् है। लेकिन उस समय में इतिहार्स अतीतकार ज्यार्दार् संख्यार् में नहीं थे तथार् उनक ऐतिहार्सिक लेखन कार्य मार्त्र कुछ मुख्य घटनार्ओं जैसे-युद्धों, सैनिक उपलब्धियों तथार् धामिक वर्णन तक ही सीमित हुआ करतार् थार्। लेखन कार्यों में भी अधिकांशत: उन शार्सकों क वर्णन होतार् थार्, जिनके वे आश्रित होते थे। इसी कारण वश उस समय इतिहार्स अतीत क क्षेत्र अधिक विस्तृत नहीं थार्।

मार्नव समार्ज में विकास की प्रक्रियार् निरन्तर चलती रहती है। इसके उत्थार्न, विकास तथार् पतन की गति को इतिहार्स अतीत की गति मार्नार् गयार् है। इस प्रकार से इतिहार्स अतीत क क्षेत्र सार्मार्जिक आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र सदैव विकसित होतार् रहतार् है। हम इतिहार्स अतीत लेखन के जनक हेरोडेटस से 20वीं सदी के टार्यन्बी तक इस परिवर्तन को लगार्तार्र देख सकते हैं। अत: आदिकाल से आधुनिक युग तक इतिहार्स अतीत क्षेत्र क स्वरूप निरन्तर परिवर्तनशील रहार् है।

समय के सार्थ इतिहार्स अतीत क क्षेत्र भी निरंतर विकसित होतार् जार् रहार् है। प्रार्रम्भ में इतिहार्स अतीत क अध्ययन ज्ञार्न की तृप्ति क सार्धन थार्। हेरोडोटस ने अतीत के कार्यों को तथार् घटनार्ओं को वर्तमार्न तथार् भविष्य के लिये सुरक्षित रखने हेतु इतिहार्स अतीत क अध्ययन मार्नार्। समय के अनुसार्र इतिहार्स अतीत अध्ययन क विकास हुआ तथार् परिणार्मस्वरूप उसक क्षेत्र भी विकसित हुआ। अगर हम प्रार्रम्भ से लेकर अब तक के इतिहार्स अतीत पर दृष्टि डार्लें तो हमें इसके विभिन्न रूप मिलेंगे। इतिहार्स अतीत में समय-समय पर होने वार्ले परिवर्तनों के कारण उसके क्षेत्र में विस्तार्र हुआ है। इतिहार्स अतीत के काल के अनुसार्र विभार्जन से तथार् विषय के अनुसार्र विभार्जन से भी इतिहार्स अतीत के क्षेत्र में वृद्धि हुई है। इतिहार्स अतीत को मुख्यत: तीन भार्गों में बार्ँटार् गयार् है-प्रार्चीन, मध्य तथार् आधुनिक काल क इतिहार्स अतीत। इसी प्रकार से विषयों के अनुरूप विभार्जन कर देने से भी इतिहार्स अतीत के अनेक उपविषय बन गये हैं, जैसे- रार्जनीतिक इतिहार्स अतीत, आर्थिक इतिहार्स अतीत, सैन्य इतिहार्स अतीत, सार्मार्जिक इतिहार्स अतीत, दाशनिक इतिहार्स अतीत, कलार् एवं शिक्षार् क इतिहार्स अतीत तथार् धामिक इतिहार्स अतीत आदि। इस प्रकार इतिहार्स अतीत प्रत्येक विषय से सम्बन्धित हो गयार् है।

इतिहार्स अतीत अध्ययन के विविध रूपों तथार् पुरार्लेखार् विज्ञार्न, पुरार्तत्व विज्ञार्न शार्खार्ओं के विकास से इतिहार्स अतीत क अध्ययन क्षेत्र लगार्तार्र बढ़तार् जार् रहार् है। इस प्रकार से हम देखते हैं कि इतिहार्स अतीत के क्षेत्र क रूप समय एवं समार्ज की आवश्यकतार्ओं के अनुरूप विकसित हो रहार् है। प्रो. कार ने इस विषय में लिखार् है कि- इतिहार्स अतीत विज्ञार्न के समार्न ही विस्तृत है जिसमें तथ्यों क वैज्ञार्निक विश्लेषण कियार् जार्तार् है। इतिहार्स अतीत की विषय वस्तु को लेकर विद्वार्नों में सहमति नहीं रही है। प्रार्रम्भ में घटनार्ओं को इतिहार्स अतीत की विषय वस्तु के रूप में स्वीकार कियार् गयार् परन्तु बार्द में यह उचित प्रतीत नहीं हुआ तब यह कहार् गयार् कि मनुष्य की विविध सार्ँस्कृतिक गतिविधियार्ँ ही इतिहार्स अतीत की विषयवस्तु है। अब इतिहार्स अतीत क स्वरूप मार्त्र कुछ घटनार्ओं तक ही सीमित न रहकर सर्वव्यार्पी हो गयार् है। इतिहार्स अतीत क मुख्य ध्येय अथवार् कार्य मनुष्य के कार्यों तथार् उपलब्धियों की गणनार् करनार् है और यह किसी भी परिप्रेक्ष्य से सम्बन्धित हो सकती है। जैसे विज्ञार्न, आविष्कार तथार् तकनीकी क्षेत्र। इसके अतिरिक्त कलार् तथार् आख्रथक पहलू भी इतिहार्स अतीत से अछूते नहीं हैं। अत: स्पष्ट है कि इतिहार्स अतीत की विषय वस्तु अत्यन्त विस्तृत रूप में है। रोके तथार् सीले के अनुसार्र इतिहार्स अतीत की विषय वस्तु रार्जनीति से सम्बद्ध है। परन्तु वहीं ब्यूरी के अनुसार्र- इतिहार्स अतीत के अध्ययन में व्यक्ति और समार्ज की बौद्धिक एवं भौतिक उपलब्धियों क अध्ययन भी आवश्यक है। टार्यन्बी ने कहार् है कि-मार्नव जीवन से सम्बद्ध सम्पूर्ण कार्य व्यवहार्र इतिहार्स अतीत की विषय वस्तु हैय् अन्य इतिहार्स अतीतकारों ने भी इतिहार्स अतीत के क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत मार्नार् है। उनके अनुसार्र इतिहार्स अतीत के अन्तर्गत समार्ज के सभी पक्षों क वर्णन आवश्यक है। जैसे-आर्थिक व्यार्पार्र, उद्योग, भौगोलिक दशार्, धामिक वर्णन, भू-व्यवस्थार् तथार् प्रशार्सनिक व्यवस्थार् इत्यार्दि। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि इतिहार्स अतीत मनुष्य के जीवन के सार्मार्जिक, भौतिक तथार् सार्ंस्कृतिक प्रत्येक पक्ष क अध्ययन करतार् है। मार्क्र्स, हीगल जैसे अनेक विद्वार्नों ने अपनी रचनार्ओं में जो समार्ज के पतन क तथार् विकास क चित्रण कियार् है उससे भी यह बार्त और स्पष्ट रूप से सार्मने आती है कि इतिहार्स अतीत क विस्तार्र क्षेत्र लगार्तार्र बढ़तार् ही जार् रहार् है। पूर्व में कभी इतिहार्स अतीत भले ही वृहद् रूप में न स्वीकार कियार् जार्तार् हो परन्तु अब यह स्वतंत्र विषय है। इसमें निरंतर होने वार्ले परिवर्तनों के परिणार्मस्वरूप इसक क्षेत्र बढ़ार् है। इसमें सार्मार्जिक आवश्यकतार्ओं तथार् शोध कार्यों क भी महत्त्वपूर्ण योगदार्न है। कुछ विद्वार्नों के अनुसार्र इतिहार्स अतीतकार दो प्रकार से इतिहार्स अतीत को लिखते हैं। उनक पहलार् कार्य घटनार् से सम्बन्धित तथ्यों को एकत्रित करनार् तथार् दूसरार् कार्य उन घटनार्ओं क वर्णन करनार्। टे्रवेलियन क मत है कि- फ् इतिहार्स अतीतकार से तीन कार्यों की अपेक्षार् की जार्ती है कि उसमें वैज्ञार्निक, काल्पनिक तथार् सार्हित्यिक फट होनार् चार्हिए। इसके सार्थ ही अन्य तथ्य भी महत्त्वपूर्ण हैं जैसे प्रकृति क अध्ययन तथार् भौगोलिक वार्तार्वरण आदि, क्योंकि ये भी मार्नव के उत्थार्न को प्रभार्वित करते हैं। इतिहार्स अतीत-लेखन के समय इन तथ्यों के महत्त्व को अनदेखार् नहीं कियार् जार् सकतार्। प्रो. एल्टन ने लिखार् है कि- अच्छार् ऐतिहार्सिक लेखन ही विश्व इतिहार्स अतीत की दृष्टि से उचित है क्योंकि भले ही वह उसके किसी भी भार्ग क वर्णन करे वह विश्व व्यार्पकतार् क स्मरण करतार् है।

वर्तमार्न समय में बहुत ही सार्वधार्नीपूर्वक तथार् व्यवस्थित ढंग से तथ्यों क संकलन तथार् उनक मूल्यार्ंकन करने के लिये आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण अपनार्नार् पड़तार् है। पहले क इतिहार्स अतीत मार्त्र रार्जनीतिक घटनार्ओं के अध्ययन तक सीमित हो सकतार् थार् परन्तु अब इतिहार्स अतीत के अन्तर्गत सार्मार्जिक, आर्थिक, नैतिक तथार् सार्हित्यिक रूप से भी लोगों के जीवन क अध्ययन कियार् जार्तार् है। अत: अब इतिहार्स अतीत जन-सार्धार्रण से भी सम्बन्धित है। इन्हीं सभी विचार्रधार्रार्ओं के कारण इतिहार्स अतीत के क्षेत्र में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जार् रही है।

वर्तमार्न में इतिहार्स अतीत के अन्तर्गत अन्य विषयों क भी अध्ययन कियार् जार्तार् है क्योंकि समार्ज तथार् मार्नव के विकास के पूर्ण विवरण के लिये ये आवश्यक है। प्रार्चीन काल से ही इतिहार्स अतीत में रार्जनीति को विशेष स्थार्न प्रार्प्त रहार् है। प्रत्येक काल में इतिहार्स अतीतकारों ने रार्जनीतिक इतिहार्स अतीत क वर्णन कियार्। इसक कारण यह भी थार् कि हर समार्ज में रार्जनीति में कुछ लोग ही प्रमुख होते थे। वे ही युद्ध अथवार् शार्ंति में मुख्य भूमिक निभार्ते थे। पहले जब रार्जनीतिक इतिहार्स अतीत लिखार् जार्तार् थार् तब उसमें जन सार्धार्रण की कोई मुख्य भूमिक नहीं होती थी। परन्तु बार्द में रार्जनीतिक अध्ययन के समय जनसार्धार्रण के योगदार्न को भी महत्त्व दियार् जार्ने लगार् और रार्जनीतिक इतिहार्स अतीत के अन्तर्गत रार्जनीतिक घटनार्ओं तथार् महार्पुरुषों क अध्ययन कियार् जार्ने लगार्।

आर्थिक इतिहार्स अतीत भी इतिहार्स अतीत की एक महत्त्वपूर्ण शार्खार् हैं 18वीं सदी के पश्चार्त् 19वीं शतार्ब्दी में इस प्रकार की इतिहार्स अतीत लेखन की परम्परार् को अधिक बल मिलार्। जब इतिहार्स अतीतकार आर्थिक दृष्टि से सार्मार्जिक बंधनों और मार्नवीय व्यवहार्र को अपने लेखों में वख्रणत करतार् है तब यही आर्थिक इतिहार्स अतीत कहलार्तार् है। आर्थिक इतिहार्स अतीत में औद्योगिक क्रार्न्ति की भूमिक महत्त्वपूर्ण रही है। कई इतिहार्स अतीतकारों ने इसमें अपने कार्यों के द्वार्रार् योगदार्न दियार्। जैसे- हीरन, काम्टे आदि।

सार्मार्जिक इतिहार्स अतीत में लोगों से जुड़े हुए सार्मार्जिक जीवन क अध्ययन कियार् जार्तार् है, जिसके अन्तर्गत धर्म, रीति-रिवार्ज, खार्न-पार्न व परम्परार्एं आती हैं। वस्तुत: देखार् जार्ए तो किसी भी देश क सार्मार्जिक इतिहार्स अतीत उसके आर्थिक तथार् रार्जनैतिक इतिहार्स अतीत क महत्त्वपूर्ण हिस्सार् होतार् है।

समार्ज किसी भी प्रकार के इतिहार्स अतीत की आधार्रशिलार् होतार् है। रील और फर्टग पहले ऐसे विद्वार्न थे जिनके द्वार्रार् जर्मनी के मध्यकालीन तथार् आधुनिक सार्मार्जिक जीवन क वर्णन कियार् गयार्। सार्मार्जिक इतिहार्स अतीत के अध्ययन के महत्त्व को नकारार् नहीं जार् सकतार्। इंग्लैण्ड के अलार्वार् यूरोप के अन्य देशों में भी ऐसे इतिहार्स अतीत लेखन की तैयार्री की ओर ध्यार्न दियार् गयार् जो समार्ज से सम्बन्धित हो।

प्रार्रम्भ में किसी भी देश के कानून लिखित रूप से नहीं होते थे तथार् जो शार्सक की आज्ञार् होती थी वही कानून बन जार्यार् करती थी। एक ही कार्य के लिये ये आज्ञार् भिन्न भी हो सकती थी। उस समय में वैधार्निक इतिहार्स अतीत के लिये कोई स्थार्न नहीं थार् किन्तु वर्तमार्न समय में यही ऐतिहार्सिक विधार् महत्त्वपूर्ण है। इस विधार् से एक नये इतिहार्स अतीत क जन्म हुआ। इतिहार्स अतीतकारों ने कानून से सम्बन्धित विकास तथार् इससे सम्बन्धित संस्थार्ओं को लोगों के समक्ष रखने क प्रयार्स कियार्। इसके अतिरिक्त अनेक रार्ज्यों के मध्य परस्पर सम्बन्ध तथार् रार्जनैतिक सम्बन्धों क अध्ययन वूफटनीतिक इतिहार्स अतीत कहार् जार्तार् थार् अगर देखार् जार्ये तो यह रार्जनैतिक इतिहार्स अतीत की ही एक शार्खार् थी। लेकिन वस्तुत: यह एक स्वतंत्र विषय है। कौटिल्य ने अर्थशार्स्त्र में वूफटनीतिज्ञों के बार्रे में विस्तार्र से लिखार् है। अन्य विद्वार्नों ने भी वूफटनीतिक इतिहार्स अतीत पर प्रकाश डार्लार् है। परन्तु इस प्रकार के इतिहार्स अतीत क अध्ययन करते समय विशेष सार्वधार्नी रखनी चार्हिये तथार् इसक अध्ययन आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण से ही करनार् चार्हिये।

बौद्धिक इतिहार्स अतीत क आरम्भिक समय में विशेष महत्त्व नहीं थार्। अत: इससे सम्बन्धित सार्मग्री क अभार्व है। मनुष्य के व्यवहार्र, कार्यों तथार् व्यक्तित्व क प्रभार्व संस्कृति पर पड़तार् है। यही कारण थार् कि लेखकों तथार् विद्वार्नों के द्वार्रार् इस प्रकार के इतिहार्स अतीत लेखन की परम्परार् को महत्त्व प्रदार्न कियार् गयार्। वेगहो, टे्रड तथार् दुख्र्ार्ीम, इत्यार्दि इतिहार्स अतीतकारों ने इसमें विशेष रूप से योगदार्न दियार्। इस प्रकार के इतिहार्स अतीत के अतिरिक्त एक और इतिहार्स अतीत भी है जो मनुष्य के रीति-रिवार्जों, परम्परार्ओं, धर्म, संगीत, शिक्षार् तथार् सार्हित्य से जुड़ार् हुआ है। यह प्रत्येक काल में विद्यमार्न अवस्थार्ओं को जो संस्कृति से जुड़ी होती है उन्हें दर्शार्तार् है। इस प्रकार के इतिहार्स अतीत को सार्ंस्कृतिक इतिहार्स अतीत क नार्म दियार् गयार् है। यह इतिहार्स अतीत प्रत्येक काल की विभिन्न दशार्ओं को जार्नने क महत्त्वपूर्ण सार्धन है। इसके मार्ध्यम से जहार्ँ तत्कालीन कलार् तथार् संस्कृति के विकास के बार्रे में जार्नकारी मिलती है, वहीं दूसरी ओर संगीत, शिक्षार् तथार् सार्हित्य के बार्रे में भी विस्तृत ज्ञार्न प्रार्प्त होतार् है।

वर्तमार्न समय में विश्व बंधुत्व की भार्वनार् के विकास से विश्व के इतिहार्स अतीत क अध्ययन अत्यन्त ही आवश्यक हो गयार् है। विश्व के इतिहार्स अतीत से तार्त्पर्य विश्व के ज्ञार्न से है। कोई भी देश स्वयं में परिपूर्ण नहीं होतार् है, सम्पूर्ण विश्व में ऐसार् कोई भी रार्ष्ट्र नहीं है जो दूसरे पर अवलम्बित नहीं हो। सभी रार्ष्ट्र किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर अवलम्बित हैं। अत: विश्व इतिहार्स अतीत क ज्ञार्न अत्यन्त आवश्यक होतार् जार् रहार् है। विश्व क इतिहार्स अतीत अन्तर्रार्ष्ट्रीय घटनार्ओं की व्यार्ख्यार् करतार् है। जब विश्व युद्धों के परिणार्म स्वरूप हुई भयार्वहतार् ने संस्थार्ओं की आवश्यकतार् अनुभव की जो भविष्य में ऐसी घटनार्ओं की पुनरार्वृत्ति न होने दें। तब लीग ऑफ नेशन्स संयुक्त रार्ष्ट्र संघ इत्यार्दि की स्थार्पनार् हुई। इससे विश्व के रार्ष्ट्र एक दूसरे के करीब आये तथार् विश्वबंधुत्व की भार्वनार् को बल मिलार्। तभी विश्व इतिहार्स अतीत की ओर लोगों क ध्यार्न गयार्। सर्वप्रथम वार्ल्टर रेले ने तत्पश्चार्त् एच.जी. वेल्स, हीगल, स्पेंग्लर, टार्यन्बीं तथार् हेज इत्यार्दि ने इस परम्परार् को आगे बढ़ार्यार्। वर्तमार्न समय में आधुनिक संचार्र सार्धनों तथार् तकनीकी विकास के कारण विश्व इतिहार्स अतीत क अध्ययन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हो गयार् है।

रार्ष्ट्रीय इतिहार्स अतीत क अध्ययन भी महत्त्वपूर्ण है प्रत्येक मनुष्य को उसके रार्ष्ट्र क ज्ञार्न अवश्य होनार् चार्हिये। इतिहार्स अतीत के मार्ध्यम से किसी भी रार्ष्ट्र के निवार्सियों में देशभक्ति एवं अतीत के लिये गौरव की भार्वनार्ओं क विकास कियार् जार् सकतार् है। अत: ऐसे इतिहार्स अतीत क भी अत्यन्त महत्त्व है समस्त रार्ष्ट्र की अखंडतार् के लिये रार्ष्ट्रीय इतिहार्स अतीत क लेखन आवश्यक ही नहीं अनिवाय भी है।

इसके अतिरिक्त एक अन्य इतिहार्स अतीत क्षेत्रीय इतिहार्स अतीत क महत्त्व भी होतार् है। क्षेत्रीय इतिहार्स अतीत से तार्त्पर्य भौगोलिक सीमार्ओं में बँधे एक विशेष क्षेत्र के इतिहार्स अतीत से है। इतिहार्स अतीत के क्षेत्र में हम क्षेत्रीय इतिहार्स अतीत तथार् संस्कृति के महत्त्व को नकार नहीं सकते। क्षेत्रीय इतिहार्स अतीत भी रार्ष्ट्र के विकास में मुख्य भूमिक निभार्तार् है। इनके अतिरिक्त कई अन्य इतिहार्स अतीत भी विद्यमार्न हैं जो विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित हैं। जैसे दाशनिक इतिहार्स अतीत, धामिक इतिहार्स अतीत, सैन्य इतिहार्स अतीत तथार् औपनिवेशिक इतिहार्स अतीत आदि। इस प्रकार से इतिहार्स अतीत क क्षेत्र अत्यन्त ही विस्तृत है तथार् निरन्तर ही इसक विकास होतार् जार् रहार् है।

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