आहार्र आयोजन क्यार् है ?
परिवार्र के सभी सदस्यों को संतुलित भोजन प्रदार्न करने के लिये गृहणी को कर्इ प्रकार के निर्णय लेने पड़ते हैं। जैसे- क्यार् पकायार् जार्ये, कितनी मार्त्रार् में पकायार् जार्ये, कब पकायार् जार्ये और कैसे परोसार् जार्ये आदि। भोजन बनार्ने से पूर्व इन सभी प्रश्नों पर विचार्र करके उचित निर्णय लेनार् व अपने निर्णय को क्रियार्न्वित करनार् ही आहार्र आयोजन कहलार्तार् है।

“भोजन निर्मार्ण से पूर्व परिवार्र के सभी सदस्यों को आवश्यकतार्नुसार्र पौष्टिक, रूचिकर एवं समयार्नुसार्र भोजन की योजनार् बनार्नार् ही आहार्र आयोजन कहलार्तार् है।”

आहार्र आयोजन के सिद्धार्ंत 

प्रत्येक गृहणी चार्हती है कि उसके द्वार्रार् पकायार् गयार् भोजन घर के सदस्यों की केवल भूख ही शार्ंत न करें अपितु उन्हें मार्नसिक संतुष्टि भी प्रदार्न करे। इसके लिये तार्लिक बनार्ते समय कुछ सिद्धार्ंतों क पार्लन करनार् आवश्यक है, जो कि निम्नलिखित है-

  1. पोषण सिद्धार्ंत के अनुसार्र- आहार्र आयोजन करते समय गृहणी को पोषण के सिद्धार्ंतों को ध्यार्न में रखते हुए आहार्र आयोजन करनार् चार्हिये अर्थार्त् आहार्र आयु के अनुसार्र, आवश्यकतार् के अनुसार्र तथार् आहार्र में प्रत्येक भोज्य समूह के खार्द्य पदाथों क उपयोग होनार् चार्हिये।
  2. परिवार्र के अनुकूल आहार्र- भिन्न-भिन्न दो परिवार्रों के सदस्यों की रूचियार्ँ तथार् आवश्यकतार् एक दूसरे से अलग-अलग होती है। अत: आहार्र, परिवार्र की आवश्यकतार्ओं के अनुकूल होनार् चार्हिये। जैसे उच्च रक्त चार्प वार्ले व्यक्ति के लिये बिनार् नमक की दार्ल निकाल कर बार्द में नमक डार्लनार्। भिन्न-भिन्न परिवार्रों में एक दिन में खार्ये जार्ने वार्ले आहार्र की संख्यार् भी भिन्न-भिन्न होती है। उसी के अनुसार्र पोषक तत्वों की पूर्ति होनी चार्हिये। जैसे कहीं दो बार्र नार्श्तार् और दो बार्र भोजन, जबकि कुछ परिवार्रों में केवल भोजन ही दो बार्र कियार् जार्तार् है। 
  3. आहार्र में नवीनतार् लार्नार्-एक प्रकार के भोजन से व्यक्ति क मन ऊब जार्तार् है। चार्हे वह कितनार् ही पौष्टिक आहार्र क्यों न हो। इसलिये गृहणी भिन्न-भिन्न तरीकों, भिन्न-भिन्न रंगों, सुगंध तथार् बनार्वट क प्रयोग करके भोजन में प्रतिदिन नवीनतार् लार्ने की कोशिश करनार् चार्हिये। 
  4. तृप्ति दार्यकतार्-वह आहार्र जिसे खार्ने से संतोष और तृप्ति क एहसार्स होतार् है। अर्थार्त् एक आहार्र लेने के बार्द दूसरे आहार्र के समय ही भूख लगे अर्थार्त् दो आहार्रों के अंतर को देखते हुए ही आहार्र क आयोजन करनार् चार्हिये। जैसे दोपहर के नार्श्ते और रार्त के भोजन में अधिक अंतर होने पर प्रोटीन युक्त और वसार् युक्त नार्श्तार् तृप्तिदार्यक होगार्। 
  5. समय शक्ति एवं धन की बचत- समयार्नुसार्र, विवेकपूर्ण निर्णय द्वार्रार् समय, शक्ति और धन सभी की बचत संभव है। उदार्हरण- छोलार् बनार्ने के लिये पूर्व से चने को भिगार् देने से और फिर पकाने से तीनों की बचत संभव है। 

आहार्र आयोजन को प्रभार्वित करने वार्ले तत्व 

आहार्र आयोजन के सिद्धार्तों से परिचित होने के बार्वजूद ग्रहणी परिवार्र के सभी सदस्यों के अनुसार्र भोजन क आयोजन नहीं कर पार्ती। क्योंकि आहार्र आयोजन को बहुत से कारक प्रभार्वित करते हैं-

  1. आर्थिक कारक-गृहणी भोज्य पदाथों क चुनार्व अपने आय के अनुसार्र ही कर सकती है। चार्हे कोर्इ भोज्य पदाथ उसके परिवार्र के सदस्य के लिये कितनार् ही आवश्यक क्यों न हो, किन्तु यदि वह उसकी आय सीमार् में नहीं है तो वह उसक उपयोग नहीं कर पार्ती। उदार्हरण- गरीब गृहणी जार्नते हुए भी बच्चों के लिये दूध और दार्लों क समार्वेश नहीं कर पार्ती। 
  2. परिवार्र क आकार व संरचनार्-यदि परिवार्र बड़ार् है यार् संयुक्त परिवार्र है तो गृहणी चार्हकर भी प्रत्येक सदस्य की आवश्यकतार्नुसार्र आहार्र क आयोजन नहीं कर पार्ती।
  3. मौसम- आहार्र आयोजन मौसम द्वार्रार् भी प्रभार्वित होतार् है। जैसे कुछ भोज्य पदाथ कुछ खार्स मौसम में ही उपलब्ध हो पार्ते हैं। जैसे गर्मी में हरी मटर यार् हरार् चनार् क उपलब्ध न होनार्। अच्छी गार्जर क न मिलनार्। अत: गृहणी को मौसमी भोज्य पदार्थोर्ं क उपयोग ही करनार् चार्हिये। सर्दी में खरबूज, तरबूज नहीं मिलते। 
  4. खार्द्य स्वीकृति- व्यक्ति की पसंद, नार्पसंद, धामिक व सार्मार्जिक रीति-रिवार्ज आदि कुछ ऐसे कारक हैं। जो कि व्यक्ति को भोजन के प्रति स्वीकृति व अस्वीकृति को प्रभार्वित करते हैं। जैसे परिवार्रों में लहसुन व प्यार्ज क उपयोग वर्जित है। लार्भदार्यक होने के बार्वजूद गृहणी इनक उपयोग आहार्र आयोजन में नहीं कर सकती। 
  5. भोजन संबंधी आदतें- भोजन संबंधी आदतें भी आहार्र आयोजन को प्रभार्वित करती हैं। जिसके कारण गृहणी सभी सदस्यों को उनकी आवश्यकतार्नुसार्र आहार्र प्रदार्न नहीं कर पार्ती। जैसे- बच्चों द्वार्रार् हरी सब्जियार्ँ, दूध और दार्ल आदि क पसंद न कियार् जार्नार्। 
  6. परिवार्र की जीवन-शैली- प्रत्येक परिवार्र की जीवन-शैली भिन्न-भिन्न होती है। अत: परिवार्र में खार्ये जार्ने वार्ले आहार्रों की संख्यार् भी भिन्न-भिन्न होती है। जिससे आहार्र आयोजन प्रभार्वित होतार् है। 
  7. सार्धनों की उपलब्धतार्-गृहणी के पार्स यदि समय, शक्ति बचत के सार्धन हो तो गृहणी कम समय में कर्इ तरह के व्यंजन तैयार्र करके आहार्र आयोजन में भिन्नतार् लार् सकती है अन्यथार् नहीं। 
  8. भोजन संबंधी अवधार्रणार्यें- कभी-कभी परिवार्रों में भोजन संबंधी गलत अवधार्रणार्यें होने से भी आहार्र आयोजन प्रभार्वित होतार् है। जैसे- सर्दी में संतरार्, अमरूद, सीतार्फल खार्ने से सर्दी क होनार्। 

आहार्र आयोजन क महत्व 

गृहणी के लिये आहार्र क आयोजन करनार् अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह इसके द्वार्रार् परिवार्र के लिये लक्ष्य प्रार्प्त कर सकती है-

  1. संतुलित भोजन की प्रार्प्ति-पूर्व में आयु, लिंग, व्यवसार्य के अनुसार्र आहार्र क आयोजन करने से सभी सदस्यों को संतुलित भोजन प्रार्प्त हो जार्तार् है।
  2. समय शक्ति और धन की बचत- समयार्नुसार्र पूर्व में आहार्र निर्मार्ण की योजनार् बनार् लेने से समय, शक्ति एवं धन की बचत हो जार्ती है। उदार्हरण- आलू और अरवी को एक सार्थ उबार्लनार्, रार्जमार् को 6 घंटे पहले भिगो देनार्।
  3. आहार्र में भिन्नतार्- आहार्र आयोजन के द्वार्रार् हम पहले से निश्चित करके भोजन में विभिन्नतार् क समार्वेश कर सकते हैं। जैसे- दोपहर में रार्जमार् की सब्जी बनार्यी हो तो रार्त में आलू गोभी की सब्जी बनार्यी जार् सकती है।
  4. खार्द्य बजट पर नियंत्रण-आहार्र क आयोजन करने से गृहणी बजट पर नियंत्रण रख सकती है। जैसे- हफ्ते में एक दिन पनीर रख सकते हैं। बार्की दिन सस्ती सब्जियों को उपयोग करनार्।
  5. आकर्षक एवं स्वार्दिष्ट आहार्र- आहार्र आयोजन आकर्षक एवं स्वार्दिष्ट भोजन की प्रार्प्ति होती है।
  6. बचे हुए खार्द्य पदाथों क सदुपयोग-आहार्र द्वार्रार् बचे हुए खार्द्य पदार्थोर्ं क सदुपयोग कियार् जार् सकतार् है। जैसे- रार्त की बची भार्जी यार् दार्ल क परार्ठे बनार्कर उपयोग करनार्।
  7. व्यक्तिगत रूचियों क ध्यार्न –आहार्र आयोजन से सदस्यों की व्यक्तिगत रूचि के खार्द्य पदार्थोर्ं को किसी न किसी आहार्र में शार्मिल कियार् जार् सकतार् है। 
  8. पूरार् दिन एक इकार्इ के रूप मे – आहार्र तार्लिक पूरे दिन को एक इकार्इ मार्नकर बनाइ जार्ती है। इसलिये यदि पौष्टिकतार् की दृष्टि से एक आहार्र पूर्ण नहीं है तो दूसरे आहार्र में उसकी कमियों को पूरार् कियार् जार्तार् है, जिससे पूरे दिन क आहार्र संतुलित हो जार्तार् है। 

परिवार्र के लिये आहार्र क आयोजन 

परिवार्र के लिये आहार्र आयोजन करने से पूर्व जीवन के विभिन्न सोपार्न की जार्नकारी होनार् आवश्यक है। जीवन के विभिन्न सोपार्न

  1. प्रथम सोपार्न – गर्भार्वस्थार्-इसके पश्चार्त् स्तनपार्न आती है। 
  2. द्वितीय सोपार्न – शैशवार्वस्थार् 
  3. तृतीय सोपार्न – बार्ल्यार्वस्थार्
  4. चतुर्थ सोपार्न – किशोरार्वस्थार् 
  5. पंचम सोपार्न – प्रौढ़ार्वस्थार् 
  6. सष्ठम सोपार्न – वृद्धार्वस्थार् 

1. गर्भार्वस्थार्- 

गर्भार्वस्थार् स्त्री के जीवन की वह अवस्थार् है। जब उसके शरीर में भ्रूण की वृद्धि और विकास होतार् है। यह अवस्थार् लगभग 9 मार्ह की होती है। इस 9 मार्ह के पूर्ण काल को तीन त्रिमार्सों में बार्ँटार् गयार् है।

  1. पहलार् त्रिमार्स- 0-3 मार्ह 
  2. दूसरार् त्रिमार्स- 3-6 मार्ह 
  3. तीसरार् त्रिमार्स- 6-9 मार्ह

इन तीनों त्रिमार्सों में वजन में लगार्तार्र वृद्धि होती है, पहले त्रिमार्स में भ्रूण काफी छोटार् होतार् है इसलिए इसकी आहार्र सम्बन्धी आवश्यकतार्एँ कम होती है, इसलिए इस अवधि में मार्ँ को अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकतार् नहीं होती। किन्तु दूसरे और तीसरे त्रिमार्स में भ्रूण की वृद्धि व विकास तीव्रगति से होतार् है। जिससे इस समय मार्ँ को अतिरिक्त पोषक तत्वों की आवश्यकतार् होती है।

गर्भार्वस्थार् में पोषण आवश्यकतार्एँ- 

गर्भार्वस्थार् में निम्नलिखित क्रियार्ओं के कारण पोषण आवश्यकतार्एँ बढ़ जार्ती है।

  1. गर्भ में भ्रूण के वृद्धि और विकास के लिये- भ्रूण अपनी वृद्धि और विकास के लिये सभी पोषक तत्वों को मार्ँ से ग्रहण करतार् है। अत: मार्ँ और भ्रूण दोनों की आवश्यकतार् की पूर्ति के लिए पोषक आवश्यकतार्एँ बढ़ जार्ती है। इस समय यदि मार्ँ क आहार्र अपर्यार्प्त होगार् तो वह मार्ँ व भू्रण दोनों के लिये उचित नहीं होगार्।
  2. गर्भार्शय, गर्भनार्ल, प्लेसेण्टार् आदि के विकास के लिये- गर्भार्शय क आकार इस समय बढ़ जार्तार् है। सार्थ-सार्थ दूध स्त्रार्व के लिए स्तनों क आकार भी बढ़ जार्तार् है, सार्थ ही सार्थ प्लेसेण्टार् तथार् गर्भनार्ल क भी विकास होतार् है। भार्र बढ़ने से भी उसकी पोषक आवश्यकतार्एँ भी बढ़ जार्ती है। 
  3. प्रसवकाल तथार् स्तनपार्न काल के लिये पौष्टिक आवश्यकतार्एँ-गर्भार्वस्थार् के समय जो पोषक तत्व संचित हो जार्ते हैं। वे ही प्रसवकाल तथार् स्तनपार्न काल में उपयोग में आते हैं। यदि ये पोषक तत्व अतिरिक्त मार्त्रार् में नहीं होंगे तो प्रसव के समय स्त्री को कठिनाइ होती है तथार् प्रसव के पश्चार्त् पर्यार्प्त मार्त्रार् में  दूध क स्त्रार्व नहीं हो पार्तार्। 

गर्भार्वस्थार् में पौष्टिक आवश्यकतार्एँ- 

इस अवस्थार् में लगभग सभी पोषक तत्वों की आवश्यकतार्एँ बढ़ जार्ती है- 

  1. ऊर्जार्- भ्रूण की वृद्धि के लिये, मार्ँ के शरीर में वसार् संचय के लिये तथार् उच्च चयार्पचय दर के लिये इस अवस्थार् में अधिक ऊर्जार् की आवश्यकतार् होती है। अत: सार्मन्य स्थिति से 300 कैलोरी ऊर्जार् अधिक देनी चार्हिये। 
  2. प्रोटीन-मार्ँ व भ्रूण के नये ऊतकों के निर्मार्ण के लिये प्रोटीन की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। अत: इस अवस्थार् में 15 ग्रार्म प्रोटीन प्रतिदिन अधिक देनार् आवश्यक है। 
  3. लौह तत्व- भ्रूण की रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन के निर्मार्ण के लिये और मार्ँ के रक्त में हीमोग्लार्बिन क स्तर सार्मार्न्य बनार्ये रखने के लिये, भू्रण के यकृत में लौह तत्व के संग्रहण के लिये एवं मार्ँ तथार् शिशु दोनों को रक्तहीनतार् से बचार्ने के लिये लौह तत्व की आवश्यकतार् होती है। इस समय 38 मि.ग्रार्. लौह तत्व प्रतिदिन देनार् आवश्यक है। 
  4. कैल्शियम एवं फॉस्फोरस-भ्रूण की अस्थियों एवं दार्ँतों के निर्मार्ण के लिये मार्ँ की अस्थियों को सार्मार्न्य अवस्थार् में बनार्ये रखने के लिये इस समय अधिक कैल्शियम की आवश्यकतार् होती है। इस अवस्थार् में कैल्शियम व फॉस्फोरस कम होने से मार्ँ को आस्टोमलेशियार् तथार् भू्रण में अस्थि विकृति की संभार्वनार् रहती है। अत: 1000 मि.ग्रार्. कैल्शिय प्रतिदिन देनार् आवश्यक होतार् है। 
  5. आयोडीन और जिंक-ये दोनों ही Trace Elements हैं, परन्तु गर्भार्वस्थार् के दौरार्न इनक विशेष महत्व है। इसकी कमी होने पर नवजार्त शिशु मार्नसिक रूप से अपंग यार् शार्रीरिक रूप से दुर्बल हो सकतार् है। 
  6. विटार्मीन ‘बी’- विटार्मीन बी समूह के विटार्मीन विशेष तौर पर थार्यमिन रार्इबोफ्लेविन एवं नयसिन की कमी होने पर जी मिचलार्नार्, उल्टी होनार्, मार्ँ को कब्ज होनार् आदि लक्षण देखे जार्ते हैं। फोलिक अम्ल की कमी से रक्तहीनतार् हो सकती है।
  7. विटार्मीन ‘डी’- कैल्शियम एवं फॉस्फोरस क शरीर में अवशोषण तभी सम्भव है जब कि स्त्री के आहार्र में विटार्मीन डी की मार्त्रार् पर्यार्प्त हो। इसलिये दूध व दूध से बने पदाथ तथार् हरी सब्जियार्ँ आहार्र में सम्मिलित होनार् आवश्यक है। 
  8. विटार्मिन ‘ए’-मार्तार् के दूध में विटार्मिन ए पर्यार्प्त मार्त्रार् में स्त्रार्वित होतार् है। इसलिये इस समय विटार्मिन ए की मार्ँग बढ़ जार्ती है। इसकी कमी होने पर बच्चे में नेत्र संबंधी विकार उत्पन्न हो सकते हैं। अत: विटार्मिन ए युक्त भोज्य पदाथ पर्यार्पत मार्त्रार् में देनार् चार्हिये। 
  9. विटार्मिन ‘बी’ समूह –इसकी आवश्यकतार् भी ऊर्जार् के अनुपार्त मे बढ़ जार्ती है। ये विटार्मिन पार्चन के लिये आवश्यक है। 
  10. विटार्मिन ‘सी’-स्तनपार्न काल में विटार्मिन सी की मार्त्रार् की आवश्यकतार् सार्मार्न्य से दुगुनी हो जार्ती है। यह 80 मि.ग्रार्. प्रतिदिन हो जार्ती है। इसके लिये विटार्मिन सी युक्त भोज्य पदाथ जैसे- ऑवलार्, अमरूद, संतरार् पर्यार्प्त मार्त्रार् में देनार् चार्हिये। 

गर्भार्वस्थार् के दौरार्न होने वार्ली समस्यार्एँ-

इस दौरार्न गर्भवती स्त्री को स्वार्स्थ्य सम्बन्धी निम्न समस्यार्ओं से गुजरनार् पड़तार् है- 

  1. जी मिचलार्नार् व वमन होनार्, 
  2. कुष्ठबद्धतार्, 
  3. रक्तहीनतार्, 
  4. सीने में जलन। 

गर्भार्वस्थार् के दौरार्न ध्यार्न रखने योग्य बार्तें- 

  1. गर्भार्वस्थार् के दौरार्न सुबह होने वार्ली परेशार्नियार्ँ जैसे- जी क मिचलार्नार्, उल्टी आदि को दूर करने के लिए गर्भवती स्त्री को खार्ली चार्य न देकर चार्य के सार्थ कार्बोज युक्त पदाथ जैसे बिस्किट आदि देनार् चार्हिए। 
  2. जलन तथार् भार्रीपन दूर करने के लिये वसार्युक्त तथार् मिर्च-मसार्ले युक्त भोज्य पदाथ नहीं देनार् चहिए। 
  3. कब्ज को रोकने के लिए रेशेदार्र पदाथ (Fiberous Food) देनार् चार्हिए तथार् तरल पदाथों क उपयोग करनार् चार्हिए। 

2. स्तनपार्न अवस्थार् 

यह समय गर्भार्वस्थार् के बार्द क समय है। सार्मार्न्यत: स्तनपार्न करार्ने वार्ली स्त्री एक दिन में औसतन 800 से 850 मि.ली. दूध क स्त्रार्व करती है। यह मार्त्रार् उसे दिये जार्ने वार्ले पोषक तत्वों पर निर्भर करती है। इसीलिये इस अवस्थार् में पोषक तत्वों की मार्ँग गर्भार्वस्थार् की अपेक्षार् अधिक हो जार्ती है। क्योंकि 6 मार्ह तक शिशु केवल मार्ँ के दूध पर ही निर्भर रहतार् है। 

धार्त्री मार्ँ के लिये पोषक आवश्यकतार्एँ- 

शुरू के 6 मार्ह में दूध की मार्त्रार् अधिक बनती है। धीरे-धीरे यह मार्त्रार् कम होने लगती है। इसीलिये शुरू के मार्ह में पोषक तत्वों की आवश्यकतार् अधिक होती है। इस अवस्थार् में निम्न पोषक तत्वों की आवश्यकतार् होती है- 

  1. ऊर्जार्- पहले 6 मार्ह में दुग्ध स्त्रार्व के लिये अतिरिक्त ऊर्जार् 550 और बार्द के 6 मार्ह में 400 किलो कैलोरी अतिरिक्त देनार् आवश्यक है। तभी शिशु के लिये दूध की मार्त्रार् पर्यार्प्त हो सकेगी। इसके लिये दूध, घी, गिरीदार्र फल देनार् चार्हिये। 
  2. प्रोटीन- शिशु को मिलने वार्ली प्रोटीन मार्ँ के दूध पर निर्भर करती है। इसलिये मार्तार् को इस समय 25 ग्रार्म प्रोटीन की अतिरिक्त आवश्यकतार् होती है। इसके लिये मार्ँ को उत्तम प्रोटीन वार्ले भोज्य पदाथ पर्यार्प्त मार्त्रार् में देनार् चार्हिये। जैसे- अंडार्, दूध, दार्लें, सोयार्बीन, सूखे मेवे आदि। 
  3. कैल्शियम एवं फॉस्फोरस- कैल्शियम की कमी होने पर दूध में कैल्शियम की कमी नहीं होती, परन्तु मार्ँ की अस्थियों और दार्ँतो क कैल्शियम दूध में स्त्रार्वित होने लगतार् है। जिससे मार्ँ की अस्थियार्ं और दार्ँत कमजोर हो जार्ते हैं। अत: दूध (आधार् किलार् प्रतिदिन), दूध से बने भोज्य पदाथ देने चार्हिये। 
  4. लौह तत्व- मार्तार् के आहार्र में अधिक आयरन देने पर शिशु को अतिरिक्त लोहार् नहीं मिलतार्, परन्तु आयरन की मार्त्रार् कम होने से मार्तार् को एनीमियार् हो सकतार् है। इसलिये पर्यार्प्त लौह तत्व देनार् चार्हिये। इसके लिये हरे पत्तेदार्र सब्जियार्ँ, अण्डार् गुड़ आदि देनार् चार्हिये। 
  5. विटार्मिन ‘ए’-मार्तार् के दूध में विटार्मिन ए पर्यार्प्त मार्त्रार् में स्त्रार्वित होतार् है। इसलिये इस समय विटार्मिन ए की मार्ँग बढ़ जार्ती है। इसकी कमी होने पर बच्चे में नेत्र संबंधी विकार उत्पन्न हो सकते हैं। अत: विटार्मिन ए युक्त भोज्य पदाथ पर्यार्पत मार्त्रार् में देनार् चार्हिये। 
  6. विटार्मिन ‘बी’ समूह – इसकी आवश्यकतार् भी ऊर्जार् के अनुपार्त मे बढ़ जार्ती है। ये विटार्मिन पार्चन के लिये आवश्यक है। 
  7. विटार्मिन ‘सी’- स्तनपार्न काल में विटार्मिन सी की मार्त्रार् की आवश्यकतार् सार्मार्न्य से दुगुनी हो जार्ती है। यह 80 मि.ग्रार्. प्रतिदिन हो जार्ती है। इसके लिये विटार्मिन सी युक्त भोज्य पदाथ जैसे- ऑवलार्, अमरूद, संतरार् पर्यार्प्त मार्त्रार् में देनार् चार्हिये। 

स्तनपार्न काल ध्यार्न रखने योग्य बार्तें- 

  1. इस समय स्त्री को सभी प्रकार के भोज्य पदार्थोर्ं क उपयोग कर सकते हैं, किन्तु यदि किसी खार्स भोज्य पदाथ को ग्रहण करने से शिशु को परेशार्नी होती है, तो उसे नहीं लेनार् चार्हिए। 
  2. नशीले पदार्थोर्ं क सेवन नहीं करनार् चार्हिए, क्योंकि यह दूध में स्त्रार्वित होकर शिशु के लिए नुकसार्नदार्यक हो सकतार् है। 
  3. दूध कि उत्पार्दन क्षमतार् बढ़ार्ने के लिए तरल पदाथ तथार् जल क अधिक उपयोग करनार् चार्हिए। 
  4. मार्ँ को संक्रार्मक बीमार्री जैसे तपेदिक होने पर स्तनपार्न नहीं करार्नार् चार्हिए। 
  5. जब मार्ँ दूध पिलार्नार् बंद कर दे तो आहार्र की मार्त्रार् कम देनार् चार्हिए अन्यथार् वजन बढ़ने की सम्भार्वनार् रहती है। 

3. शैशवार्वस्थार् 

जन्म से एक वर्ष तक क कार्यकाल शैशवार्वस्थार् कहलार्तार् है। यह अवस्थार् तीव वृद्धि और विकास की अवस्थार् है। यदि इस उम्र में शिशुओं को पर्यार्प्त पोषक तत्व न दिये जार्ये तो वे कुपोषण क शिकार हो जार्ते हैं। शिशुअुओंं की पोषण आवश्यकतार्एँ शिशुओं को निम्न पोषक तत्वों की आवश्यकतार्एँ अधिक होती है- 

  1. ऊर्जार्-इस अवस्थार् में वृद्धि दर तीव्र होती है। इस आयु में ऊर्जार् की आवश्यकतार् सबसे अधिक होती है। शिशु को एक कठोर परिश्रम करने वार्ले व्यस्क पुरूष की अपेक्षार् प्रति कि.ग्रार्. शार्रीरिक भार्र के अनुसार्र दुगुनी कैलोरी ऊर्जार् की आवश्यकतार् होती है। 
  2. प्रोटीन- शिशु के के शरीर के ऊतकों क विकास तीव्र गति से हार्ने के कारण प्रोटीन की आवश्यकतार् बहुत अधिक होती है। 
  3. खनिज लवण- हड्डियों क विकास तीव्र गति से हार्ने के कारण कैल्शियम की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लार्बिन के निर्मार्ण के लिये लौह तत्व की मार्त्रार् भी अधिक आवश्यक होती है। 
  4. विटार्मिन- आवश्यक ऊर्जार् के अनुसार्र ही रार्हबोफ्लेबिन तथार् नार्यसिन की मार्त्रार् बढ़ जार्ती है। शरीर में निर्मार्ण कार्य तथार् रोग प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के लिये विटार्मिन ‘ए’ एवं ‘सी’ पर्यार्प्त मार्त्रार् में देनार् आवश्यकत होतार् है। 
  5. जल- 6 मार्ह तक शिशु को अलग से जल देने की आवश्यकतार् नहीं होती है। यह आवश्यकतार् मार्ँ के दूध से ही पूरी हो जार्ती है। इसके पश्चार्त् जल को उबार्लकर ठंडार् करके देनार् चार्हिये। 

शिशुओं  के लिए आहार्र आयोजन- 

शिशुओं को दियार् जार्ने वार्लार् प्रथम आहार्र मार्ँ क दूध है। जो कि बार्लक के लिये अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि –

  1. कोलोस्ट्रम की प्रार्प्ति-शिशु को जन्म देने के पश्चार्त् मार्ँ के स्तनों में तीन दिन तक सार्फ पीले रंग द्रव निकलतार् है। जिसे नवदुग्ध यार् कोलस्ट्रम कहते हैं। यह बार्लक को रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रदार्न करतार् है। 
  2. वृद्धि एवं विकास में  सहार्यक- मार्ँ के दूध में पार्यी जार्ने वार्ली लेक्टार्एल्ब्यूमिन तथार् ग्लोब्यूलिन में प्रोटीन पार्यी जार्ती है, जो कि आसार्नी से पच कर वृद्धि एवं विकास में सहार्यक होती है। 
  3. स्वच्छ दूध की प्रार्प्ति-इसे शिशु सीधे स्तनों से प्रार्प्त करतार् है। इसलिये यह स्वच्छ रहतार् है। 
  4. उचित तार्पमार्न-मार्ँ के दूध क उचित तार्पमार्न रहतार् है, न वह शिशुओं के लिये ठंडार् रहतार् है और न ही गर्म। 
  5. निसंक्रार्मक- इस दूध से संक्रमण की संभार्वनार् नहीं रहती, क्योंकि व सीधे मार्ँ से प्रार्प्त करतार् है। 
  6. भार्वनार्त्मक संबंध-मार्ँ क दूध बच्चे और मार्ँ में स्नेह संबंध विकसित करने में सहार्यक होतार् है। 
  7. समय शक्ति और धन की बचत-चूंकि बार्लक सीधे मार्ँ के स्तनों से दूध को प्रार्प्त कर लेतार् है, जिससे समय शक्ति और धन तीनों की बचत हो जार्ती है।
  8. पार्चक- मार्ँ की दूध में लेक्टोस नार्मक शर्करार् पार्यी जार्ती है, जो कि आसार्नी से पच जार्ती है एवं मार्ँ क दूध पतलार् होने के कारण भी आसार्नी से पच जार्तार् है। 
  9. विटार्मिन सी की प्रार्प्ति- मार्ँ के दूध में गर्म होने की क्रियार् न होने के कारण जो भी विटार्मिन सी उपस्थित होतार् है। नष्ट नहीं हो पार्तार्।
  10. विटार्मिन ‘ए’ की प्रार्प्ति- शुरू के कोलेस्ट्रम में विटार्मिन ए की मार्त्रार् अधिक पार्यी जार्ती है।
  11. परिवार्र नियोजन में सहार्यक- डॉक्टर की रार्य है कि, जब तक मार्ँ स्तनपार्न करार्ती रहती है। शीघ्र गर्भधार्रण की सम्भार्वनार् नहीं रहती।

मार्ँसपेशियों के संकुचन में सहार्यक-

स्तनपार्न करार्ने से गर्भार्शय की मार्ँसपेशियार्ँ जल्दी संकुचित होती है, जिससे वह जल्दी पूर्ववत आकार में पहुँच जार्तार् है। नोट – मार्ँ के दूध की अनपु स्थिति मे शुष्क दूध देनार् उत्तम होतार् है क्योंिक इसकी संरचनार् मार्ँ के दूध के समार्न होती है। शिशु इसे आसार्नी से पचार् सकतार् है।

पूरक आहार्र – 

6 मार्ह के पश्चार्त् बार्लक के लिये मार्ँ क दूध पर्यार्प्त नहीं रहतार्। अत: मार्ँ के दूध के सार्थ ही सार्थ दियार् जार्ने वार्लार् अन्य आहार्र पूरक आहार्र कहलार्तार् है और पूरक आहार्र देने की क्रियार् स्तन्यमोचन (Weaning) कहलार्ती है।उदार्हरण – गार्य क दूध, भसै  क दूध, फल, उबली सब्जियार्ँ व सबे फल आदि। बच्चों को दिये जार्ने वार्ले पूरक आहार्र को तीन वगोर्ं में वर्गीकृत कियार् जार् सकतार् है- 

  1. तरल पूरक आहार्र – वह आहार्र जो पूर्णत: ठोस होतार् है। जैसे- फलों क रस, दार्ल क पार्नी, नार्रियल पार्नी, दूध आदि। 
  2. अर्द्धतरल आहार्र –वह आहार्र जो पूर्णत: ठोस होतार् है और नहीं पूर्णत: तरल, अर्द्धतरल आहार्र कहलार्तार् है जैसे- खिचड़ी, दलियार्, कस्टर्ड, मसले फल, उबली सब्जियार्ँ, खीर आदि। 
  3. ठोस आहार्र – ठोस अवस्थार् में प्रार्प्त आहार्र ठोस आहार्र कहलार्तार् है। एक वर्ष की अवस्थार् में देनार् शुरू कर दियार् जार्तार् है। जैसे- रोटी, चार्वल, बिस्किट, ब्रेड आदि। 

4. बार्ल्यार्वस्थार् 

2 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की अवस्थार् बार्ल्यार्वस्थार् कहलार्ती है। 2-5 वर्ष की अवस्थार् प्रार्रंभिक बार्ल्यार्वस्थार् तथार् 6 से 12 वर्ष की अवस्थार् उत्तर बार्ल्यार्वस्थार् कहलार्ती है। 6-12 वर्ष के बच्चों के लिये स्कूलगार्मी शब्द क प्रयोग कियार् गयार् है। स्कूलगार्मी बच्चों के लिये पोषण आवश्यकतार्एँ इस अवस्थार् में निम्नलिखित पोषक तत्व आवश्यक होते हैं- ;पद्ध ऊर्जार्- इस अवस्थार् में वृद्धि दर तेज होने से अधिक ऊर्जार् की आवश्यकतार् होती है। सार्थ ही सार्थ इस उम्र में बच्चों की शार्रीरिक क्रियार्शीलतार् बढ़ने से ऊर्जार् की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। इस अवस्थार् में लड़कों के मॉसपेशीय ऊतक अधिक सक्रिय होने से ऊर्जार् की आवश्यकतार् लड़कियों की अपेक्षार् अधिक होती है। 

  1. प्रोटीन- यह निरंतर वृद्धि की अवस्थार् होने के कारण प्रोटीन की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। 
  2. लोहार्-शार्रीरिक वृद्धि के सार्थ ही सार्थ रक्त कोशिकाओं की संख्यार् भी बढ़ने लगती है, जिससे अधिक लौह तत्व की आवश्यकतार् होती है। 
  3. कैल्शियम-स्कूलगार्मी बच्चों की अस्थियों की मजबूती के लिये तथार् स्थार्यी दार्ँतो के लिये अधिक कैल्शियम की आवश्यकतार् होती है। इसलिये भरपूर कैल्शियम मिलनार् आवश्यक है।
  4. सोडियम एवं पोटेशियम- अधिक क्रियार्ऐं करने से पसीनार् अधिक आतार् है। जिससे सोडियम और पोटेशियम जैसे पोषक तत्वों की कमी हो जार्ती है। अत: तरल पदाथ देने चार्हिये। 
  5. विटार्मिन-इस समय थार्यसिन, नार्यसिन-रार्इबोफ्लेविन, विटार्मिन सी, फोलिक एसिड तथार् विटार्मिन ए की दैनिक मार्त्रार् बढ़ जार्ती है। 

5. किशोरार्वस्थार् 

13 से 18 वर्ष की अवस्थार् किशोरार्वस्थार् कहलार्ती है। इस अवस्थार् में शार्रीरिक मार्नसिक तथार् भार्वनार्त्मक परिवर्तन होते हैं। इसलिये पोषक तत्वों की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। इसलिए भार्रतीय अनुसंधार्न परिषद द्वार्रार् किशोर-बार्लिकाओं के लिये निम्नलिखित पोषक तत्व आवश्यक है- 

  1. ऊर्जार्- किशोर बार्लक शार्रीरिक एवं मार्नसिक दोनों दृष्टि से अधिक क्रियार्शील होतार् है तथार् शार्रीरिक वृद्धि भी होती है और चयार्पचय की गति भी तीव्र होती है। जिसके कारण अधिक ऊर्जार् आवश्यक होती है
  2. प्रोटीन- शार्रीरिक वृद्धि दर के अनुसार्र लड़कों में प्रोटीन की आवश्यकतार् लड़कियों की अपेक्षार् अधिक होती है। अत: इस अवस्थार् में उत्तम कोटि के प्रोटीन देनार् चार्हिए। 
  3. लौहार्-रक्त की मार्त्रार् में वृद्धि होने के कारण लौह तत्व की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। लड़कियों में मार्सिक धर्म प्रतिमार्ह होने के कारण अधिक मार्त्रार् में लौह तत्व आवश्यक होतार् है। 
  4. कैल्शियम- शरीर की आन्तरिक क्रियार्ओं के लिये, अस्थियों में विकास, दार्ँतो की मजबूती के लिए कैल्शियम की अधिक मार्त्रार् आवश्यक होती है। ब्ं के सार्थ-सार्थ फॉस्फोरस की आवश्यकतार् स्वत: ही पूरी हो जार्ती है। 
  5. आयोडीन- शार्रीरिक और मार्नसिक विकास के लिये किशोरों को आयोडीन की मार्त्रार् पर्यार्प्त मिलनार् आवश्यक है। इसकी कमी होने पर गलगंड नार्मक रोग हो सकतार् है। 
  6. विटार्मिन- किशोरार्वस्थार् में कैलोरी की मार्ँग बढ़ने के सार्थ-सार्थ विटार्मिन ‘बी’ समूह के विटार्मिन की आवश्यकतार् बढ़ जार्ती है। 

6. वृद्धार्वस्थार् 

यह जीवन के सोपार्न की अन्तिम अवस्थार् है। इस अवस्थार् में शार्रीरिक तथार् मार्नसिक क्रियार्शीलतार् कम हो जार्ती है। उसकी मार्ँसपेशियार्ँ कमजोर हो जार्ती है। अत: पोषक तत्वों की उतनी आवश्यकतार् नहीं होती। इस अवस्थार् में निम्नलिखित पोषक तत्व की आवश्यकतार् होती है- 

  1. ऊर्जार्- इस अवस्थार् में बी.एम.आर. कम होने के कारण तथार् क्रियार्शीलतार् कम होने से ऊर्जार् की आवश्यकतार् कम हो जार्ती है। इस ऊर्जार् की पूर्ति कार्बोज युक्त भोज्य पदार्थोर्ं द्वार्रार् की जार्नी चार्हिए। इस समय 30: ऊर्जार् कम कर देनी चार्हिए।
  2. प्रोटीन- यह अवस्थार् विश्रार्म की अवस्थार् होती है। अत: न तो शार्रीरिक वृद्धि ही होती है और रहीं टूट-फूट की मरम्मत होती है। अत: 1 ग्रार्म से कम प्रोटीन प्रति भार्र के लिये पर्यार्प्त रहती है। किन्तु सुपार्च्य प्रोटीन क प्रयोग करनार् चार्हिए। 
  3. कैल्शियम- इसकी आवश्यकतार् वयस्कों के समार्न ही होती है। कमी होने पर अस्थियार्ँ कोमल और भंगुर होने लगती है। इसकी पूर्ति के लिये दूध सर्वोत्तम सार्धन है। 
  4. लौहार्- रक्तहीनतार् से बचने के लिये आयरन भी व्यस्कों के समार्न ही देनार् चार्हिए। 
  5. विटार्मिन-इस समय पार्चन शक्ति कमजोर हो जार्ती है। जिससे विटार्मिन ‘बी’ समूह के विटार्मिन पर्यार्प्त मार्त्रार् में होनार् आवश्यक है। रोग प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ार्ने के लिये विटार्मिन ‘सी’ की मार्त्रार् भी आवश्यक होती है।

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