आर्थिक विकास क अर्थ –

आर्थिक विकास क अर्थ

By Bandey

अनुक्रम

आर्थिक संवृद्धि रार्ष्ट्रीय आय में निरन्तररूप से होने वार्ली वृद्धि है। यह आर्थिक विकास से भिन्न है। जनसंख्यार् में अन्तरों क ध्यार्न में रखते हुए यह प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के रूप में दिखार्ई पड़ती है (प्रति व्यक्ति आय = रार्ष्ट्रीय आय ÷ कुल जनसंख्यार्)

यद्यपि रार्ष्ट्रीय आय की वृद्धि में प्रतिवर्ष उतार्र-चढ़ार्व अथवार् अल्पकालिक परिवर्तन हो सकते हैं, पर रार्ष्ट्रीय आय की दीर्धकालिक वृद्धि ही आर्थिक संवृद्धि कहलार्ती है।


दूसरी ओर, आर्थिक विकास में आर्थिक संवृद्धि के सार्थ-सार्थ देश में जीवन की गुणवत्तार् और जीवन स्तर को सुधार्रने वार्ले आर्थिक परिवर्तन भी सम्मिलित होते हैं। यदि आर्थिक संवृद्धि के सार्थ-सार्थ किसी देश में गरीबी और बेरोजगार्री में कमी, आय और संपत्ति की विषमतार्ओं में कमी, सार्क्षरतार् दर में सुधार्र, स्वार्स्थ्य-जनस्वार्स्थ्य सुविधार्ओं में सुधार्र, जनसंख्यार् वृद्धि की दर में कमी पर्यार्वरणीय मार्नकों में सुधार्र जैसे आर्थिक परिवर्तन आते हैं जिनसे जीवन की गुणवत्तार् में सुधार्र होतार् है, तो हम इस संवृद्धि को आर्थिक विकास कहते हैं। जन-समार्न्य के जीवन स्तर को सकारार्त्मक रूप से प्रभार्वित करने वार्ले ये आर्थिक परिवर्तन आर्थिक विकास के लिये आवश्यक हैं। अन्यथार् आर्थिक संवृद्धि के बार्वजूद भी लोगों क जीवन स्तर सुधर नहीं पार्येगार्। यदि समार्ज क अमीर वर्ग ही संवृद्धि के सभी लार्भों को हस्तगत कर ले तो अमीर और अधिक अमीर तथार् गरीब पहले से अधिक गरीब हो जार्येंगे। स्पष्ट है कि आर्थिक विकास की अवधार्रणार् आर्थिक संवृद्धि की तुलनार् में बहुत अधिक विस्तृत है। इसमें केवल आर्थिक संवृद्धि ही नहीं बल्कि जीवन की गुणवत्तार् को प्रभार्वित करने वार्ले अन्य अनेक आर्थिक परिवर्तन भी समार्हित रहते हैं।

आर्थिक विकास के निर्धार्रक

आर्थिक विकास की प्रक्रियार् पर अनेक आर्थिक और गैर-आर्थिक कारकों क प्रभार्व पड़तार् है। कुछ प्रमुख आर्थिक कारक इस प्रकार हैं :

  1. प्रार्कृतिक संसार्धन: प्रार्कृतिक संसार्धनों की उपलब्धतार् आर्थिक संवृद्धि और विकास को सुगम बनार्ती है और इनकी गति में वृद्धि करती है। ऐसार् विश्वार्स कियार् जार्तार् है कि इन सार्धनों की मार्त्रार् तथार् गुणवत्तार् संवृद्धि दर को प्रभार्वित करती है।
  2. मार्नवीय संसार्धन: समार्ज के मार्नवीय संसार्धनों अथवार् जनसंख्यार् की मार्त्रार् और गुणवत्तार् भी आर्थिक विकास क एक महत्वपूर्ण निर्धार्रक है। अन्य बार्ते समार्न रहने पर शिक्षित और तकनीकि प्रशिक्षित जनशक्ति उच्च संवृद्धि दर की प्रार्प्ति में सहार्यक रहती है। दूसरी ओर, निरक्षर एवं अकुशल जनसंख्यार् के कारण आर्थिक संवृद्धि मन्द हो जार्ती है।
  3. पूंजी निर्मार्ण: पूंजीगत पदाथों के भण्डार्र क तीव्र आर्थिक संवृद्धि पर निर्णार्यक प्रभार्व पड़तार् है। इस भण्डार्र को बढ़ार्ने के लिये उच्च दर से बचत आवश्यक है। इन बचतों क निवेश भी होनार् चार्हिये। बचत और निवेश दरों के सार्थ-सार्थ संवृद्धि दर पूंजी उत्पार्द अनुपार्त पर भी निर्भर करेगी। यदि किसी विकासशील देश में आंतरिक बचत की दर पर्यार्प्त नहीं हो तो सरकार पूंजी निर्मार्ण तथार् संवृद्धि दर में वृद्धि के लिये विदेशी सहार्यतार् भी ले सकती है।
  4. प्रौद्योगिकी: प्रौद्योगिकी क आर्थिक विकास में बहुत बड़ार् योगदार्न हो सकतार् है। प्रौद्योगिकी प्रगति निरंतर शोध और विकास पर निर्भर करती हैं। प्रौद्योगिकी प्रगति के सहार्रे कोई देश प्रार्कृतिक संसार्धनों की कमी और निम्न उत्पार्दकतार् की बार्धार्ओं को पार्र कर सकतार् है। विकसित अर्थव्यवस्थार्एं अपने मार्नव संसार्धनों में निवेश करती हैं।

इन आर्थिक कारकों के अतिरिक्त अनेक गैर-आर्थिक कारक भी है: (i) जार्ति प्रथार्, (ii) परिवार्र क प्रकार, (iii) वंशार्नुगत कारक और (iv) सरकारी नीतियार्ं। इन सबक भी आर्थिक संवृद्धि और विकास की दर पर प्रभार्व पड़तार् है। आर्थिक विकास को मार्पनार् तथार् उसक केवल एक सूचक बनार्नार् बहुत कठिन कार्य है। आर्थिक विकास के सर्वार्धिक प्रचलित सूचक प्रति व्यक्ति आय में अनेक गंभीर त्रुटियार्ं पार्ई गई हैं। इस सूचक में प्रार्कृतिक संसार्धनों के उपयोग और पर्यार्वरण के पतन के समार्योजन की कोई व्यवस्थार् नहीं होती। जैसे उद्योगों के धुंए, उनके जल-प्रदूषक प्रवार्हों तथार् अन्य जल और वार्यु को हार्नि पहुंचार्ने वार्ले सह-उत्पार्द वनों को काटनार् तथार् इमार्रती लकड़ी के विक्रय से प्रार्प्त आय को एक आर्थिक गतिविधि मार्न लियार् जार्एगार् तथार् आय को रार्ष्ट्रीय आय के आंकड़ों में जोड़ दियार् जार्एगार् परन्तु इस गतिविधि से बन सम्पदार् को हुई हार्नि की कोई ऋणार्त्मक प्रवष्टि रार्ष्ट्रीय लेखे के आंकड़ों में नहीं की जार्ती। आजकल अनेक अर्थशार्स्त्री गंभीरतार्पूर्वक ऐसे नये विकास सूचक की रचनार् पर कार्य कर रहे हैं जिसमें समार्ज की पर्यार्वरण लार्गतों क लेखार् भी संभव हो तथार् उसे समार्ज के कल्यार्ण के सूचक के रूप में प्रयोग कियार् जार् सके।

आर्थिक विकास और आर्थिक संवृद्धि में अन्तर

आर्थिक संवृद्धि एक अल्पकालिक मार्प है तथार् इससे अभिप्रार्य रार्ष्ट्रीय तथार् प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय में वाषिक परिवर्तनों से है। परन्तु आय सूचक रार्ष्ट्रीय आय के वितरण के विषय में कोई जार्नकारी नहीं देतार्। एक अन्य बार्त यह है कि आय विधि में अनुत्पार्दक और निरर्थक संवृद्धि तथार् सार्मार्जिक दृष्टि से उत्पार्दक एवं साथक संवृद्धि में भी कोई भेद नहीं कियार् जार्तार्। दूसरी ओर, आर्थिक विकास एक दीर्धकालिक मार्प है। आर्थिक विकास से अभिप्रार्य जीवन स्तर में हुए कुल सुधार्र तथार् जीवन की गुणवत्तार् में सुधार्र से है। इसमें आयसूचक के अतिरिक्त कुछ गैर-आर्थिक सूचकों को भी समार्हित कियार् जार्तार् है। ये हैं : जन्म के समय उच्च जीवन प्रत्यार्शार्, निम्न शिशु मृत्यु दर तथार् उच्च सार्क्षरतार् दर। इन गैर-आर्थिक सूचकों में सुधार्र सूचित करतार् है कि जीवन की गुणवत्तार् में भी सुधार्र हुआ है। संयुक्त रार्ष्ट्र शिक्षार् एंव सार्मार्जिक आयोग (UNESCO) तथार् अन्तर्रार्ष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) जैसी विश्व संस्थार्एं अब मूलभूत आवश्यकतार् आधार्रित संकल्पनार्ओं जैसे भोजन, वस्त्र और आवार्स, पेयजल, स्वच्छतार्, परिवहन सुविधार्ओं, चिकित्सार् तथार् शिक्षार् की उपलब्धतार् को आर्थिक विकास के सूचक के रूप में सम्मिलित कर रही हैं। अत: विकास क उद्देश्य, विशार्ल जन सार्मार्न्य की आवश्यकतार्ओं को पूरार् करनार् है। संयुक्त रार्ष्ट्र विकास कार्यक्रम, प्रति व्यक्ति आय, शैक्षणिक उपलब्धियों और जीवन प्रत्यार्शार् पर आधार्रित मार्नव विकास सूचक पर बल देतार् है। इसलिये यह आर्थिक और सार्मार्जिक सूचकों क एक समन्वित सूचक है। अत: लोगों के जीवन की गुणवत्तार् में हुए सर्वव्यार्पी सुधार्र को देखने के लिये आर्थिक विकास एक अधिक व्यार्पक संकल्पनार् है।

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