आपदार् क अर्थ, प्रकार, प्रकृति, कारण एवं प्रभार्व
आपदार् क अर्थ है विपत्ति, मुसीबत यार् कठिनाइ। आपदार् को अंग्रेजी में डिजार्स्टर कहते हैं। डिजार्स्टर शब्द दो शब्दों से मिलकर बनार् है। डेस अर्थार्त बुरार् यार् अशुभ और ऐस्ट्रो क मतलब स्टार्र यार् नक्षत्र। पुरार्ने जमार्ने में किसी विपत्ति, मुसीबत और कष्ट क कारण बुरार् नक्षत्रों क प्रकोप मार्नार् जार्तार् थार्। वर्तमार्न में आपदार् क अर्थ उन प्रकृति और मार्नव जनित अप्रत्यार्शित यार् त्वरित घटनार्ओं से लियार् जार्तार् है जो मार्नव पर कहर बरसार्ती है। सार्थ ही जन्तु और पार्दप समुदार्य को अपार्र क्षति पहुंचार्ती है।

आपदार् की विशेषतार्एँ 

  1. आपदार् प्रकृति जन्य और मार्नव जनित आपदार् है।
  2. यह अप्रत्यार्शित और त्वरित गति से घटती है। 
  3. आपदार् से जार्नमार्ल को नुकसार्न पहुंचतार् है। लोगों को चोट पहुंचती है तथार् स्वार्स्थ्य पर बुरार् असर पड़तार् है। 
  4. इसके कारण सार्मार्जिक ढार्ंचार् ध्वस्त हो जार्तार् है। इमार्रतें क्षतिग्रस्त हो जार्ती हैं।
  5. इसके कारण परिवहन, संचार्र व्यवस्थार् तथार् अनिवाय सेवार्यें प्रभार्वित होती हैं। 
  6. इससे आम जनजीवन अस्त व्यस्त हो जार्तार् है और यह अचार्नक, अनजार्ने और व्यार्पक पैमार्ने पर आक्रमण करती है। 
  7. इससे पीड़ित समुदार्य के लोगों को भोजन, वस्त्र, आवार्स और चिकित्सार् और सार्मार्जिक देखभार्ल की आवश्यकतार् होती है।

प्रकोप और आपदार् में अन्तर – 

प्रकोप और आपदार् में निकट क सम्बन्ध है। प्रकोप में आपदार् की सम्भार्वनार् छिपी रहती है। जब किसी क्षेत्र में प्रकोप आतार् है तो वहार्ं मार्नव जीवन अस्त व्यस्त हो जार्तार् है तो उसे आपदार् कहेंगें। यदि किसी निर्जन तट पर चक्रवार्त आतार् है तो उसे प्रकोप कहेंगें क्योंकि उससे आम जनतार् प्रभार्वित नहीं होती है।

प्रकोप सार्मार्न्यतयार् उन प्रार्कृतिक एवं मार्नवीय प्रक्रमों से सम्बन्धित होते हैं जो चरम घटनार्एं उत्पन्न करते हैं जबकि आपदार् वे त्वरित और अचार्नक होने वार्ली घटनार्एं होती है जो मार्नव समार्ज और जैव समुदार्य को अधिक क्षति पहुंचार्ती हैं।

प्रकोप आपदार् से पूर्व की स्थिति है और इसमें आपदार् के आगमन क खतरार् मौजूद रहतार् है और इससे मनुष्य की आबार्दी के नष्ट होने क खतरार् बनार् रहतार् है। आपदार्ओं को सदार् मार्नव के सन्दर्भ में देखार् जार्तार् है। आपदार्ओं की गहनतार् तीव्रतार् एवं परिमार्ण क आंकलन धन जन की हार्नि के परिप्रेक्ष्य में कियार् जार्तार् है।

प्रकोप एक प्रार्कृतिक घटनार् है जबकि आपदार् इसक परिणार्म है। प्रकोप एक प्रार्कृतिक घटनार् है जिससे जार्न मार्ल दोनों क नुकसार्न होतार् है जबकि आपदार् इस संकट क अनुभव है।’’ (जार्न बिहरो-डिसार्स्टर 1980) आपदार् क कार्य मार्नवीय कार्य भी हो सकतार् है जैसे सड़क पर हुर्इ कोर्इ दुर्घटनार् और औद्योगिक विस्फोट अथवार् प्रार्कृतिक प्रकोप भी हो सकतार् है जैसे ज्वार्लार्मुखी, भूकम्प आदि। यदि भूकम्प .4.0 से कम परिमार्ण क आतार् है तो वह उस क्षेत्र के लोगों के लिए आपदार् नहीं होगी क्योंकि इसक प्रभार्व उस क्षेत्रों के लोगों पर नगण्य होगार् और यदि भूकम्प 7.0 से अधिक परिणार्म वार्ले आते हैं तो वह उस स्थार्न को तहस-नहस कर देते हैं। अप्रैल 2015 में नेपार्ल में आयार् भूकम्प जो भार्रतीय ओर यूरेशियन प्लेट के खिसकाव के कारण आयार् थार् प्रार्कृतिक आपदार् क उदार्हरण है।

आपदार् के प्रकार-

आपदार् जीव-जन्तु वनस्पति तथार् मार्नव के लिए हार्निकारक है। कुछ आपदार्एं प्रकृति की व्यवस्थार् में असन्तुलन उत्पé होने के कारण होती है जबकि कुछ मार्नव जनित क्रियार्ओं के कारण होते हैं।

1. भूगर्भीय आपदार्

  1. ज्वार्लार्मुखी
  2. भूकम्प
  3. भूस्खलन
  4. हिमस्खलन
  5. सिंक होल

2. जलीय आपदार्

  1. बार्ढ़
  2. लिम्निक उद्गार्र
  3. सुनार्मी
  4. बार्दल क फटनार्

3. मौसमी आपदार्

  1. बर्फार्नी तूफार्न
  2. चक्रवार्त
  3. सूखार्
  4. आकाशीय विद्युत आपदार्
  5. उपल वृष्टि
  6. गर्म लहर
  7. शीतलहर
  8. हरिकेन
  9. टार्रनेडो
  10. हिमार्वरण यार् हिमद्रवण
  11. समुद्र तल में परिवर्तन

4. प्रश्नोतर प्रकोप एवं आपदार्

  1. पृथ्वी एवं उल्काओं क टकरार्व
  2. उल्काओं में आपसी टक्कर

5. मार्नव कृत प्रकोप एवं आपदार्

  1. भौतिक आपदार्
  2. वार्यु और जल प्रदूषण
  3. मृदार् अपरदन
  4. भूस्खलन
  5. बार्ंध जनित भूकम्प
  6. क्षरण तथार् दार्वार्नल

6. रसार्यनिक आपदार्

  1. नार्भिकीय विस्फोट
  2. रेडियोधर्मी विकिरण
  3. जहरीले रसार्यनों क रिसार्व
  4. सार्गर में तेल वार्हक टेकर से पैट्रोलियम क रिसार्व

7. जैविक आपदार्

  1. जनसंख्यार् विस्फोट
  2. युद्ध/लड़ाइ/दुश्मन क आक्रमण 
  3. महार्मार्री
  4. कीट समूहन
  5. आतंकवार्द आपदार्

8. प्रौद्योगिकी आपदार्

  1. परिवहन दुर्घटनार्एं
  2. औद्योगिक दुर्घटनार्
  3. नार्भिकीय युद्ध

आपदार्ओं की प्रकृति

प्रार्रम्भ में मनुष्य पर पर्यार्वरण के सम्बन्धों क अध्ययन कियार् जार्तार् थार् जिसे निश्चयवार्द की संज्ञार् दी जार्ती है। वर्तमार्न में उद्योगों तथार् प्रौद्योगिकी के विकास के कारण पर्यार्वरण पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़ार् है जिसके कारण पर्यार्वरण पर मार्नवीय कार्यों के परिणार्मों पर अधिक जोर दियार् जार्ने लगार् है क्योंकि पर्यार्वरण में परिवर्तन क प्रभार्व मार्नव समार्ज पर पड़ने लगार् है और इसक प्रभार्व बार्ढ़, सूखार्, भूकम्प आदि प्रकोप व आपदार् के रूप में दिखाइ पड़ने लगार् है। इसक अध्ययन विभिन्न विषयों में अलग-अलग दृष्टिकोंण से कियार् जार्ने लगार् है। अभी तक छह दृष्टिकोंण सार्मने आए हैं।

  1. भौैगोलिक दृष्टिकोंण – इस दृष्टिकोंण के प्रमुख प्रर्वतक हार्रलैड वैरार्जे और गिलनर है। इसमें आपदार् क विस्तार्र, आने के कारणों तथार् समार्ज पर उसके प्रमुख प्रभार्वों तथार् उससे निपटने के लिए विभिé उपार्यों पर चर्चार् की गर्इ है। 
  2. समार्जशार्स्त्रीय दृष्टिकोंण – इसमें आपदार्ओं क समार्ज, मार्नव के रहन-सहन तथार् व्यवहार्र पर क्यार् प्रभार्व पड़तार् है क अध्ययन कियार् जार्तार् है। इसमें मनोविज्ञार्न आधार्रित प्रतिरक्षार् प्रतिक्रियार् पद्धति क आपदार् के सन्दर्भ में अध्ययन कियार् जार्तार् है। रस्सल आर डार्इनेस और एनरिको एल क्वैरेनटेलि इस दृष्टिकोंण के प्रमुख प्रवर्तक हैं। 
  3. शार्स्त्रीय दृष्टिकोंण – इसमें सभ्यतार्ओ के नष्ट होने में आपदार्ओं की भूमिकाओं पर चर्चार् की गर्इ है। इसमें आपदार्ओं क सार्मार्जिक आर्थिक विकास पर क्यार् प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है, इसक अध्ययन कियार् जार्तार् है। आपदार् के कारण प्रभार्वित समुदार्य अपनी आवश्यकतार्ओं की पूर्ति करने में असमर्थ रहतार् है। इसी कारण लोगों के प्रवजन यार् स्थार्नार्न्तरण की दशार् क जिक्र कियार् गयार् है।
  4. विकासार्त्मक दृष्टिकोंण – आपदार्ओं के प्रभार्व सबसे अधिक विकासशील देशों में होतार् है क्योंकि गरीबी के कारण प्रार्कृतिक प्रकोप की मार्र और भी घार्तक हो जार्ती है। इसी कारण इस दृष्टिकोंण में सहार्यतार् और रार्हत कार्य, शरणार्थ्र्ार्ी प्रबंध, स्वार्स्थ्य, देखरेख और भुखमरी जैसी समस्यार्ओं तथार् इससे निपटने के उपार्यों पर चर्चार् की गर्इ है। 
  5. आपदार् औषधि औैर महार्मार्री विज्ञार्न – आपदार् के दौरार्न सावजनिक स्वार्स्थ्य सेवार्एं बार्धित हो जार्ती है जिसके कारण पड़े पैमार्ने पर लोगों की मृत्यु तक हो जार्ती है। इसी कारण इसमें मृत्यु के प्रबंधन, क्षत विक्षत रोगियों क इलार्ज, संक्रार्मक और महार्मार्री आदि से ग्रसित रोगियों के उपचार्र पर बल दियार् जार्तार् है। 
  6. तकनीकी दृष्टिकोंण – इसमें आपदार् के विभिन्न पक्षो के अध्ययन के लिए विभिन्न विज्ञार्नों जैसे आपदार् विज्ञार्न, ज्वार्लार्मुखी विज्ञार्न, भूआकृति विज्ञार्न, भूगर्भशार्स्त्र तथार् भौतिकी क सहार्रार् लियार् जार्तार् है। प्रार्कृतिक और शार्रीरिक विज्ञार्न इस प्रकार के दृष्टिकोण पर महत्व देते हैं।

आपदार्ओं के कारण

प्रकृतिजन्य और मार्नव जनित अप्रत्यार्शित एवं दुष्प्रभार्व वार्ली चरम घटनार्ओं को आपदार् कहते हैं। ये आपदार्एं कभी त्वरित एवं कभी मन्द गति से घटित होती है। इन आपदार्ओं के घटने के कर्इ विवर्तनिक तथार् मार्नवजनित कारण है जिनक संक्षिप्त में यहार्ँ विवरण दियार् जार् रहार् है।

  1. पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी छोटे-बड़े भिé-भिé भार्गों में विभक्त है जिसे प्लेट की संज्ञार् दी गर्इ है। ये प्लेट गतिशील है। इनकी गति कभी एक-दूसरे के सार्मने, तथार् कभी एक दूसरे के विपरीत दिशार् में होती है। जब प्लेट विपरीत दिशार् में गति करती है तो पृथ्वी के अन्दर क तप्त तथार् तरल मौमार्, सतह पर आकर फैल जार्तार् है तथार् शार्न्त ज्वार्लार्मुखी क उद्गार्र होतार् है। जब ये प्लेट आमने-सार्मने टकरार्ती है तो भार्री प्लेट हल्के पदाथ से निर्मित प्लेट के नीचे चली जार्ती है तथार् अधिक गर्मी से पिघल जार्ती है। जिससे अधिक परिमार्ण वार्ले भूकम्प आते हैं तथार् विस्फोटक प्रकार वार्ले ज्वार्लार्मुखी क उद्गार्र होतार् है। 
  2. पृथ्वी के अन्वजति शक्तियों के कारण चट्टार्नों में क्षैतिज तथार् उध्र्वार्धर गतियार्ं होती हैं। इन्हीं गतिशीलतार् के कारण वलन एवं भ्रंशन की क्रियार् होती है। भं्रशन के कारण एक भार्ग ऊपर उठ जार्तार् है तथार् एक भार्ग नीचे धंस जार्तार् है। धरार्तलीय भार्ग में अगल-बगल तथार् ऊपर-नीचे खिसकाव होने से पृथ्वी पर कम्पन पैदार् होतार् है तथार् भूकम्प आतार् है। 
  3. धरार्तलीय भार्ग पर जब जल की अपार्र रार्शि क भण्डार्रण हो जार्तार् है तो उससे उत्पé अत्यधिक भार्र तथार् दबार्व के कारण जल भण्डार्र की तली के नीचे चट्टार्नों में हेर फेर होने लगतार् है और जब यह परिवर्तन शीलतार् से होतार् है तो भूकम्प क अनुभव कियार् जार्तार् है। 
  4. भूपटल के नीचे जब किसी कारण से जल पहुंच जार्तार् है तो वह अत्यधिक तार्प के कारण जलवार्ष्प में बदल जार्तार् है। ये गैसे ऊपर जार्ने क प्रयार्स करती है तथार् भूपटल पर नीचे से धक्के लगार्ती हैं। जिससे ऊपरी भार्ग क दबार्व कम हो जार्तार् है तथार् ये विस्फोट के सार्थ ठोस एवं गैसीय पदाथ निकलतार् है। जिससे ज्वार्लार्मुखी क उद्गार्र होतार् है तथार् भूकम्प क अनुभव कियार् जार्तार् है। 
  5. सार्गरीय तली में अचार्नक विवर्तनिक उथल-पुथल के कारण अपार्र सार्गरीय जलरार्शि क विस्थार्पन होतार् है तथार् सुनार्मी की उत्पत्ति होती है। सार्गरीय तली में उथल-पुथल कर्इ कारणों से होती है। जैसे सार्गरीय तली में ज्वार्लार्मुखी क उद्गार्र, प्लेटों के खिसकाव के कारण भूकम्प, सार्गरीय भूस्खलन, बड़े-बड़े हिमखण्डों की फिसलन आदि है। सुनार्मी लहरों की तटवर्ती क्षेत्रों में ऊचाइ अधिक हो जार्ती है जिसके कारण तबार्ही मचार्ती है।
  6. उष्ण कटिबन्धीय विक्षोभ, तूफार्न, हरिकेन यार् टार्इफून ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवार्तों के उनकी तीव्रतार् के आधार्र पर विभिé नार्म हैं। ये अधिक शक्तिशार्ली, खतरनार्क वार्युमण्डलीय तूफार्न होते हैं। ये चक्रवार्त गर्म सार्गरों में ग्रीष्म काल में उत्पé होते हैं। जबकि तार्पमार्न 270से0 से अधिक होतार् है। भूमध्यरेखार् के उत्तर तथार् दक्षिण में कोरियार्लिस बल की तथार् पृथ्वी की अक्षीय गति के कारण हवार्ओं की व्यवस्थार् चक्रीय हो जार्ती है। 
  7. बार्ढ़ प्रार्य: स्थलीय भार्ग के कर्इ दिनों तक जलमग्न रहने से आती है। जब वर्षार् क पार्नी नदी के किनार्रों से प्रवार्हित होकर समीपी भार्ग को जलमग्न कर दे तो बार्ढ़ की स्थिति आती है। तटीय क्षेत्र में बार्ढ़ वार्युमण्डलीय तूफार्नों तथार् उच्च ज्वार्र द्वार्रार् जनित महार्लहरों के कारण आती है। क्योंकि इससे कर्इ मीटर ऊंची लहरे तटीय भार्ग के निचले क्षेत्र में प्रविष्ट कर जार्ती है। नगरीय क्षेत्र में बार्ढ़ जल निकासी की उचित व्यवस्थार् न होने के कारण आती है। 
  8. जब वाषिक वर्षार् सार्मार्न्य वर्षार् से 75 प्रतिशत यार् उससे कम हो तो कृषि, पशुओं तथार् जनसंख्यार् की जल की पर्यार्प्त मार्त्रार् नहीं मिल पार्ती है। जल वर्षार् कम होने के कारण मृदार् में नमी की मार्त्रार् कम हो जार्ती है जिससे फसल की न्यून पैदार्वार्र होती है तथार् सतही और भूमिगत जलस्तर गिर जार्तार् है।

आपदार् के प्रभार्व

संयुक्त रार्ष्ट्र संघ (2015) की रिपोर्ट के अनुसार्र 2005 से 2014 के मध्य मौसम से सम्बन्धित आपदार्ओं में चक्रवार्त, बार्ढ़ और सूखार् में बढ़ोत्तरी हुर्इ है। रिपोर्ट के अनुसार्र प्रतिवर्ष औसत 335 आपदार्एं आती हैं। वर्ष 1955 से 2004 तक आपदार्ओं में निरन्तर वृद्धि हुर्इ है। भार्रत, इन्डोनेशियार् और फिलीपार्इन देशों क प्रतिशत सबसे अधिक आपदार् प्रभार्वित देशों में रहार्। इस रिपोर्ट के अनुसर 1994-2014 के मध्य से विभिन्न आपदार्ओं से 440 करोड़ लोग प्रभार्वित हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार्र पिछले बीस वर्षों में विकासशील और अविकसित देश प्रार्कृतिक आपदार् से अधिक प्रभार्वित रहे हैं। अविकसित देशों क प्रतिशत 33 प्रतिशत रहार् है। लेकिन आपदार् से 81 प्रतिशत लोगों की मृत्यु इन्हीं देशों में हुर्इ है।

आपदार्ओं की प्रकृति, अवधि, तीव्रतार् अलग-अलग होती है। इसी कारण इन आपदार्ओं के प्रभार्व तथार् इनके परिणार्म अलग होते हैं। आपदार् के प्रभार्वों क मूल्यार्ंकन विभिन्न आपदार्ओं की तीव्रतार् के आधार्र पर कियार् जार् सकतार् है।

  1. कुछ आपदार्एं अप्रत्यार्शित व त्वरित गति से आती है जैसे भूकम्प, ज्वार्लार्मुखी, चक्रवार्त तथार् भूस्खलन आदि। इसके कारण अपार्र धन-जन की हार्नि होती है। इसक प्रभार्व विस्तृत क्षेत्र पर पड़तार् है। भवनों एवं परिवहन तंत्रों क विनार्श हो जार्तार् है। बिजली एवं जल की आपूर्ति बार्धित हो जार्ती है। पार्लतू जार्नवरों क विनार्श हो जार्तार् है। ये आपदार्एं अधिक विनार्शार्त्मक प्रभार्व छोड़ती है। इसी कारण सार्मार्जिक और आर्थिक ढार्ंचे को अस्त-व्यस्त कर देती है। 
  2. कुछ आपदार्एं अत्यन्त मंद गति से आती है और इनक प्रभार्व दूरगार्मी पड़तार् है। वर्षार् की मार्त्रार् कम होने के कारण सूखे की स्थिति पैदार् हो सकती है। इसके कारण फसल विफलतार् तथार् न्यून पैदार्वार्र होती है। यदि सूखे की समयार्वधि लम्बी हो निर्वनीकरण, मरूस्थलीकरण तथार् मृदार् अपरदन की समस्यार् पैदार् हो सकती है। कृषि उत्पार्दन को झटक लगतार् है तथार् अन्न और जल के अभार्व में अकाल की स्थिति आ सकती है तथार् लोग भूखमरी, कुपोषण से ग्रस्त होकर अनेक बीमार्रियों की चपेट में आ सकते हैं। 
  3. कुछ आपदार्एं मार्नव जनित है। मार्नव की असार्वधार्नी, अज्ञार्नतार्, लार्परवार्ही, गलती यार् मार्नव निर्मित तंत्रों की विफलतार् के कारण होती है। जैसे दो रार्ष्ट्रों के बीच युद्ध, गृह युद्ध, पर्यार्वरणीय असंतुलन, जनसंख्यार् विस्फोट तथार् परमार्णु युद्ध तथार् औद्योगिक दुर्घटनार् आदि है। युद्ध तथार् गृह युद्ध के दौरार्न रार्ष्ट्रीय सम्पत्ति को अधिक क्षति पहुंचती है जिसके कारण संसार्धनों क अभार्व हो जार्तार् है तथार् वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। देश में नार्गरिक आंदोलन, युद्ध तथार् गृह युद्ध से हुआ विध्वंस प्रार्कृतिक प्रकोप के समार्न होतार् है। 
  4. आपदार् क त्वरित प्रभार्व जनसंख्यार् क स्थार्नार्न्तरण है। बार्ढ़ और भूकम्प के आने पर प्रभार्वित क्षेत्र के व्यक्ति अपनार् घर छोड़कर अन्यत्र पनार्ह लेते हैं। वहार्ं पर उनको स्वच्छ जल, खार्द्य आपूर्ति, शिक्षार् तथार् स्वार्स्थ्य सेवार्ओं से वंचित होनार् पड़तार् है। 
  5. आपदार्ओं क स्वार्स्थ्य पर प्रतिकूल प्रभार्व पड़तार् है। अत्यधिक बार्ढ़ के बार्द पार्नी जगह-जगह भर जार्तार् है। इसमें मच्छर और बैक्टीरियार् पनपते हैं। जिसके कारण मार्नव अधिक बीमार्रियों से ग्रसित हो जार्ते हैं। परमार्णु शक्ति संयंत्रों के रियेक्टरों के रेडिएशन क रिसार्व मार्नव सहित सभी जीवों के लिए घार्तक तथार् जार्नलेवार् होतार् है। इसक प्रभार्व विस्तृत क्षेत्र पर दीर्घ अवधि तक रहतार् है। नदियार्ं, झीले तथार् जलभण्डार्र रेडियो एक्टिव पदाथों से संदूषित हो जार्ते हैं। 
  6. प्रार्कृतिक आपदार् के बार्द अक्सर खार्द्य पदाथों की कमी हो जार्ती है। आपदार् से फसल विफलतार् तथार् न्यून पैदार्वार्र के कारण अनार्ज की कीमतें बढ़ जार्ती हैं और लोगों में आर्थिक विपéतार् के कारण क्रय शक्ति की कमी हो जार्ती है। जिससे लोग भुखमरी के शिकार हो जार्ते है। पर्यार्प्त भोजन न मिलने के कारण लोग कुपोषण के शिकार हो जार्ते है और बच्चों क विकास लम्बी अवधि तक रूक जार्तार् है। 
  7. आपदार् के बार्द लोग परिजनों की मृत्यु तथार् आर्थिक बदहार्ली के कारण ‘पोस्ट ट्रार्नमेटिक स्ट्रेस डिस्ऑडर’ नार्मक बीमार्री से ग्रसित हो जार्ते हैं। यह गम्भीर मनोवैज्ञार्निक बीमार्री है। इसमें व्यक्ति भय की स्थिति से गुजरतार् है। इस रोग क अगर उपचार्र नहीं कियार् गयार् तो व्यक्ति की मनोवैज्ञार्निक स्थिति हमेशार् के लिए खरार्ब हो जार्एगी। 
  8. आपदार् क सर्वार्धिक प्रभार्व समार्ज के गरीब तबके के लोगों पर पड़तार् है। इस दौरार्न उनकी जमार्पूंजी खत्म हो जार्ती है और वे अधिक निर्धन बन जार्ते हैं।

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