आधुनिक आर्य भार्षार् एवं उनक वर्गीकरण

आधुनिक आर्य भार्षार् एवं उनक वर्गीकरण

By Bandey

आधुनिक आर्य भार्षार् आधुनिक भार्रतीय आर्यभार्षार्ओं की प्रमुख विशेषतार्एँ हैं-

1. आधुनिक भार्रतीय आर्यभार्षार्ओं में प्रमुखत: वही ध्वनियार्ँ हैं जो प्रार्कृत, अपभ्रंश आदि में थीं। किन्तु कुछ विशेषतार्एँ भी हैं-(क) पंजार्बी आदि में उदार्सीन स्वर ‘अ’ भी प्रयुक्त होने लगार् है। अवधी आदि में जपित यार् अघोष स्वरों क प्रयोग होतार् है। गुजरार्ती में मंर्मर स्वर क विकास हो गयार् है। प्रार्कृत-अपभ्रंश में केवल मूल स्वर थे, किन्तु अवहट्ट में ऐ, औ विकसित हो गए थे। कई आधुनिक भार्षार्ओं में इनक प्रयोग होतार् है, यद्यपि कुछ बोलियों में केवल मूल स्वरों क प्रयोग हो रहार् है, संयुक्त स्वरों क नहीं। (ख) ‘ऋ’ क प्रयोग तत्सम शब्दों में लिखने में चल रहार् है, किन्तु बोलने में यह स्वर न रहकर ‘र’ के सार्थ इ यार् उ स्वर क योग रह गयार् है। उत्तरी भार्रत में इसक उच्चार्रण ‘रि’ है और गुजरार्ती आदि में ‘रु’। (ग) व्यंजनों में जहार्ँ तक उष्मों क प्रश्न है, लिखने में तो प्रयोग स, ष, श तीनों क हो रहार् है, किन्तु उच्चार्रण में स, श दो ही हैं। ‘ष’ भी ‘श’ रूप में उच्चरित होतार् है। चवर्ग के उच्चार्रण में आधुनिक काल में एकरूपतार् नहीं है। हिन्दी में वे ध्वनियार्ँ स्पर्श-संघष्री हैं, किन्तु मरार्ठी में इनक एक उच्चार्रण त्स (च) द्ज (ज) जैसार् भी है। सच पूछार् जार्य तो मरार्ठी में दो चवर्ग हो गये हैं। संयुक्त व्यंजन ‘ज्ञ’ के शुद्ध उच्चार्रण (ज् ञ) क लोप हो चुक है, उसके स्थार्न पर ज्यँ, ग्यँ और द्यँ, द्नँ आदि कई उच्चार्रण चल रहे हैं। (घ) विदेशी भार्षार्ओं के प्रभार्व-स्परूप आधुनिक भार्षार्ओं में कई नवीन ध्वनियार्ँ आ गई हैं, जैसे क, ख़्, ग़्, ज़्, फ, ऑ, आदि। इन ध्वनियों क लोकभार्षार्ओं में तो क, ख, ग, ज, फ, आ के रूप में उच्चार्रण हो रहार् है। किन्तु पढ़े-लिखे लोग इन्हें प्रार्य: मूल रूप में बोलने क प्रयार्स करते हैं। संगम (Juncture) तथार् अनपुनार्सिकतार् प्रार्य: सभी में स्वनिमिक है।

2. जिन शब्दों के उपध (Penultimate) स्वर यार् अन्तिम को छोड़कर किसी और पर बलार्त्मक स्वरार्घार्त थार्, (क) उनके अन्तिम दीर्घ स्वर प्रार्य: ह्रस्व हो गए है। तथार् (ख) अंतिक ‘अ’ स्वर कुछ अपवार्दों (संयुक्त व्यंजनार्दि) को छोड़कर प्रार्य: लुप्त हो गयार् है (रार्म्, अब् आदि)।

3. प्रार्कृत आदि में जहार्ँ समीकरण के कारण व्यंजनद्वित्त यार् दीर्घ व्यंजन (कर्म-कम्म) हो गए थे, आधुनिक काल में ‘द्वित्व’ में केवल एक रह गयार् और पूर्ववर्ती स्वर में क्षतिपूरक दीर्घतार् आ गई (कम्म-काम, अठ्ठ-आठ)। पंजार्बी, सिन्धी अपवार्द है, उनमें प्रार्य: प्रार्कृत से मिलते-जुलते रूप ही चलते हैं (अठ्ठ, कम्म)।

4. बलार्त्मक स्वरार्घार्त ह। वार्क्य के स्तर पर संगीतार्त्मक भी है।

5. अपभ्रंश के प्रसंग में कहार् जार् चुक है कि संस्कृत, पार्लि आदि की तुलनार् में रूप कम हो गए थे। आधुनिक भार्षार्ओं में अपभ्रंश की तुलनार् में भी रूप कम हो गए है, इस प्रकार भार्षार् सरल हो गई है। संस्कृत आदि में कारक के तीनों वचनों में लगभग 24 रूप बनते थे। प्रार्कृत में लगभग 12 हो गए थे, अपभं्रश में 6 और आधुनिक भार्षार्ओं में केवल दोन, तीन यार् चार्र रूप हैं। क्रियार् के रूपों में भी पर्यार्प्त कमी हो गई है। क्रियाथ यार् काल आदि तो सभी, बल्कि संस्कृत आदि से व्यक्त कर किए जार्ते हैं किन्तु सबके रूप अलग नहीं हैं। सहार्यक शब्दों से काम चल जार्तार् है। मूल रूप थोडे़ हैं।

6. रचनार् की दृष्टि से संस्कृत, पार्लि, प्रार्कृत आदि की भार्षार् योगार्त्मक थी। अयोगार्त्मकतार् अपभं्रशों से आरम्भ हुई और अब, आधुनिक भार्षार्एँ (नार्म और धतु दोनों दृष्टियों से) पूर्णत: अयोगार्त्मक यार् वियोगार्त्मक हो गई हैं। कुछ रूप योगार्त्मक हैं भी तो उअवार्द-स्वरूप। नार्म रूपों के लिए परसर्गों क प्रयोग होतार् है और धतु-रूपों के लिए कृदंत और सहार्यक क्रियार् के आधार्र पर संयुक्त क्रियार् का।

7. संस्कृत में वचन 3 थे। मध्यकालीन आर्यभार्षार्ओं में ही द्विवचन समार्प्त हो गयार् थार् और आधुनिक काल में भी केवल दो वचन हैं। अब प्रवृति एकवचन की है। लगतार् है कि आगे चलकर रूप केवल एकवचन के रह जार्यँगे और दो, तीन यार् अधिक क भार्व सहार्यक शब्दों से प्रकट कियार् जार्एगार्। उदार्हरणाथ, हिन्दी में ‘मैं’ के प्रयोग की प्रवृत्ति कम हो रही है। उसके स्थार्न पर ‘हम’ चल रहार् है, जिसके बहुवचन क कोई अलग रूप नहीं होतार्, केवल ‘लोग’ यार् ‘सब’ जोड़कर काम चलार् लेते हैं।

8. संस्कृत में लिंग 3 थे। मध्ययुगीन भार्षार्ओं में भी स्थित यही थी। आधुनिककाल में सिन्धी, पंजार्बी, रार्जस्थार्नी तथार् हिन्दी में 2 लिंग हैं (पुलिग, स्त्रीलिंग) सम्भवत: तिब्बत-बर्मी मुंडार् आदि भार्षार्ओं के प्रभार्व के कारण बंगार्ली, उड़ियार्, असमी में लिंगभेद कम-सार् है। बिहार्री, नेपार्ली में भी समार्प्त होतार्-सार् दिखार्ई दे रहार् है। तीन लिंग केवल गुंजरार्ती, मरार्ठी और (कुछ) सिंहली में हैं।

9. आधुनिक भार्षार्ओं में प्रार्चीन तथार् मध्ययुगीन से शब्द-भण्डार्र की दृष्टि से सबसे बड़ी विशेषतार् यह है कि पश्तो, तुर्की, अरबी, फार्रसी, पुर्तगार्ली तथार् अंग्रेजी आदि से लगभग 8-9 हजार्र नये विदेशी शब्द आ गए हैं। इनके पूर्व भार्षार्ओं क प्रमुख शब्द-भण्डार्र तत्सम, तद्भव और देशज क ही थार्। मध्ययुगीन भार्षार्ओं की तुलनार् में आज तत्सम शब्दों क प्रयोग अधिक हो रहार् है और तद्भव क अपेक्षार्कृत कम। इधर पार्रिभार्षिक शब्दार्वली की कमी दूर करने के लिए नए शब्द बनार्ए और अपनार्ए जार् रहे हैं। अनुकरणार्त्मक एवं प्रतिध्वन्यार्त्मक शब्द बहुत प्रयुक्त होने लगे हैं।

आधुनिक भार्रतीय आर्यभार्षार् में सिन्धी, गुजरार्ती, लहँदार्, पंजार्बी, मरार्ठी, उड़ियार्, बंगार्ली, असमियार्, हिन्दी (पश्चिमी हिन्दी, पूर्वी हिन्दी) प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त कश्मीरी भी भार्रत की एक महत्त्वपूर्ण भार्षार् है, किन्तु मूलत: वह भार्रत-ईरार्नी की दरद शार्खार् में आती है। उर्दू, वस्तुत: भार्षार्वैज्ञार्निक स्तर पर हिन्दी की ही अरबी-फार्रसी से प्रभार्वित एक शैली है। रार्जस्थार्नी, पहार्ड़ी तथार् बिहार्री को लोगों ने अलग रखार् है, किन्तु ये हिन्दी प्रदेश में आती हैं, वस्तुत: अब भार्षार् के आकृतिमूलक यार् पार्रिवार्रिक वर्गीकरण से सार्ंस्कृतिक वर्गीकरण को कम महत्त्वपूर्ण नहीं मार्नार् जार्तार् और इस दृष्टि से ये सभी-रार्जस्थार्नी, पहार्ड़ी, बिहार्री-हिन्दी के सार्ंस्कृतिक वर्ग में आती हैं।

भार्रत के बार्हर बोली जार्ने वार्ली आधुनिक आर्यभार्षार् में नेपार्ली, सिंहली तथार् जिप्सी भी उल्लेख्य हैं।

नेपार्ली-यह ‘पहार्ड़ी’ क पूर्वी रूप है। पहार्ड़ी बोलियों के प्रदेश के पूर्वी भार्ग की भार्षार् होने के कारण इसे ‘पूर्वी पहार्ड़ी’ भी कहते हैं। ‘नेपार्ली’ को नैपार्ल में नैपार्ली कहते हैं। नेपार्ल में बोले जार्ने के कारण ही इसक नार्म ‘नेपार्ली’ है। ‘नेपार्ल’ शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई मत हैं। कुछ लोग नेपार्ल क सम्बन्ध ‘ने’ नार्मक Íषि से जोड़ते हैं। बौद्ध मत के अनुसार्र ‘नेपार्ल’, ‘ने’ + ‘पार्ल’ दो शब्दों से बनार् है। ‘ने’ क अर्थ है ‘स्वयंभू’ और ‘पार्ल’ क अर्थ है ‘पार्लन करने वार्लार्’। अर्थार्त् ‘नेपार्ल’ क अर्थ है ‘जिसक पार्लक स्वयंभू हो।’ अधिक प्रार्मार्णिक मत यह है कि ‘नेपार्ल’ क सम्बन्ध ‘नेपार्ल’ से है। नेपार्ल के कुछ भार्गों में ‘नेपार्ल’ (अब इसे ‘नेवार्र’ कहते हैं) जार्ति के लोग रहते हैं, कदार्चित् उन्हीं के आधार्र पर देश को पहले ‘नेपार्र’ कहार् गयार्। मार्गघी प्रार्कृत की सार्मार्न्य प्रवृत्ति के अनुसार्र ‘र’ क ‘ल’ हो जार्ने से ‘नेपार्र’ शब्द बार्द में ‘नेपार्ल’ हो गयार्। हिन्दी प्रदेश की सार्मार्न्य जनतार् ‘नेपार्ल’ को ‘नैपार्ल’ कहती है। ‘नेपार्ली’ क एक अन्य नार्म ‘गोरखार्ली’ भी है। यहार्ँ के शार्सक, नेपार्ल के शार्सक बनने के पूर्व, ‘गोरखार्’ नार्मक नगर, (काठमार्ंडू से 70 मील दूर) में रहते थे, अत: उन्हें ‘गोरखे’ तथार् उसी कारण नैपार्ल के लोगों को भी ‘गोरखे’ कहते हैं। इसी आधार्र पर ‘नेपार्ली’ भार्षार् क एक नार्म ‘गोरखार्ली’ यार् ‘गुरखार्ली’ है। भार्षार् के अर्थ में ‘गोरखार्ली’ क प्रयोग ‘नेपार्ली’ से फरार्नार् है। शार्सकीय स्तर पर ‘गोरखार्ली’ भार्षार् के लिए ‘नेपार्ली’ नार्म क प्रयोग 1932 के बार्द हुआ है। पर्वतीय प्रदेश की भार्षार् होने के कारण इसे पर्वतियार् यार् पर्बतियार् भी कहते हैं। इसक एक अन्य नार्म ‘खसकुरार्’ भी है। ‘खसकुरार्’ क अर्थ है ‘खसों की भार्षार्’ यहार्ँ ‘खस’ लोग भी काफी हैं।

‘नेपार्ल’ शब्द क प्रार्चीन प्रयोग कौटिल्य के अर्थशार्स्त्र में मिलतार् है, किन्तु भार्षार् के अर्थ में ‘नेपार्ली’ क प्रयोग अत्यार्धुनिक है। ‘नेपार्ली’ नार्म से लगतार् है कि यह पूरे नेपार्ल की भार्षार् है, किन्तु वस्तुत: बार्त ऐसी नहीं है। यहार्ँ के आर्य शार्सक तथार् अन्य आर्य लोग ही इसक प्रयोग करते हैं। नेपार्ल के आदिवार्सियों की भार्षार् ‘नेवार्री’ है जो चीनी परिवार्र की तिब्बती-बर्मी शार्खार् की एक बोली है। नेपार्ल के शार्सकों की भार्षार् होने के कारण ही नेपार्ली पूरे नेपार्ल की रार्ष्ट्रभार्षार् है। ‘नेपार्ली’ अन्य पर्वतीय भार्षार्ओं की तरह ग्रियर्सन के अनुसार्र ‘आवन्त्य’ अपभ्रंश से निकली है तथार् डॉ. सपार्ुनीतिकुमार्र चटर्जी के अनुसार्र यह ‘खस अपभ्रंश’ से निकली है। ऐतिहार्सिक और भौगोलिक कारणों से इस पर रार्जस्थार्नी, मैथिली, दरद, खस तथार् तिब्बती-बर्मी की ‘नेवार्री’ आदि भार्षार्ओं क प्रभार्व पड़ार् है। प्रमुखत: रूप की दृष्टि से यह ‘रार्जस्थार्नी’ तथार् शब्द-समूह एवं मुहार्वरों आदि की दृष्टि से ‘नेवार्री’ से बहुत अधिक प्रभार्वित है। इधर काफी दिनों से हिन्दी क भी नेपार्ल में पर्यार्प्त प्रचार्र रहार् है और यहार्ँ हिन्दी के समार्चार्र-पत्र आदि भी निकलते रहे हैं। 19वीं सदीं तक यहार्ँ, हिन्दी की बोली अवधी तथार् भोजपुरी आदि में कवितार्एँ भी होती रही हैं। इस प्रकार हिन्दी से नेपार्ली क पर्यार्प्त सम्बन्ध रहार् है। जिसक परिणार्म यह हुआ है कि नेपार्ली भार्षार् में बहुत से हिंदी शब्द चले गए हैं। प्रमुखत: वर्तमार्न नेपार्ली में तो हिन्दी शब्दों की संख्यार् बहुत ही अधिक है। नेपार्ली भार्षार् क प्रार्चीनतम नमूनार् 1543 ई. के एक तार्म्रपार्त्र में मिलतार् है। इसके प्रार्चीनतम प्रसिद्ध सार्हित्यकार प्रमनिधि पंत कहे जार्ते हैं, किन्तु उनकी कोई भी रचनार् उपलब्ध नहीं है। नेपार्ली के फरार्ने कवियों में भार्नुदत्त (रचनार्-काल 19वीं सदी क मध्य) सर्वश्रेष्ठ हैं। इनकी रार्मार्यण बहुत सपुनदर रचनार् है। वर्तमार्न काल में नेपार्ली गद्य-पद्य की सभी विधओं में प्रगति कर रही है। पहार्ड़ी प्रदेश की भार्षार्ओं में बोलियों-उपबोलियों क प्रार्य: बार्हुल्य हो जार्तार् है। यह बार्त नेपार्ली में भी है। पूरे नेपार्ल में इसके अनेक तिब्बती-बर्मी तथार् कुमार्यूँनी आदि से प्रभार्वित स्थार्नीय रूप प्रचलित हैं। इनमें उल्लेख्य केवल चार्र हैं पार्ल्पार्, दही, कुसवार्र तथार् देनवार्र। पार्ल्पार् नेपार्ल क कुमार्यूँनी से प्रभार्वित वह रूप हैं जो काठमार्ंडू के पश्चिम ‘पार्ल्पार्’ नगर के आसपार्स बोलार् जार्तार् है। दही नेपार्ली क एक विकृत रूप है जो नेपार्ल की तरार्ई में ‘दही’ नार्मक जार्ति के लोगों में व्यवहृत होतार् है। इसे दढी यार् दढ़ी भी कहते हैं। नेपार्ल की तरार्ई में देनवार्र नार्मक जार्ति के लोगों में भी नेपार्ली क एक विकृत रूप प्रयुक्त होतार् है जिसे देनदार्र यार् दोनवार्र कहते हैं। इसी प्रकार नेपार्ल की तरार्ई में ही नेपार्ली क ‘कुसवार्र’ जार्ति में प्रयुक्त एक विकृत रूप कुसवार्र यार् कसवार्र कहलार्तार् है। ‘कुसवार्र’ क व्यार्करण चीनी परिवार्र की स्थार्नीय तिब्बती-बर्मी बोलियों से प्रभार्वित है। नेपार्ली लिखने के लिए नार्गरी लिपि क प्रयोग होतार् है। नेपार्ली बोलने वार्ले पर्यार्प्त लोग भार्रत में भी रहते हैं। 1921 की जनगणनार् के अनुसार्र नेपार्ली बोलने वार्लों की संख्यार् भार्रत में डेढ़ लार्ख से कुछ ही कम थी।

सिंहली-इसक क्षेत्र लंक के दक्षिणी भार्ग में है। लगभग 5वीं सदी ई. पू. में विजय नार्मक रार्जार् के सार्थ कुछ भार्रतीय लंक में जार्कर बस गए। इन्हीं लोगों के सार्थ यहार्ँ से यह भार्षार् भी अपने मूल रूप में गई। विजय रार्जार् तथार् उसके सार्थी कहार्ँ के थे, इस सम्बन्ध में विवार्द है। ये लोग जहार्ँ के रहने वार्ले होंगे, वहीं की भार्षार् से सिंहली क सम्बन्ध होगार्। कुछ लोगों ने इन्हें पश्चिमी बंगार्ल क मार्नार् है जिनके अनुसार्र सिंहली क सम्बन्ध उस समय बंगार्ल में प्रयुक्त भार्षार् से होगार्, किन्तु कुछ लोगों ने सौरार्ष्ट्र, लार्ट यार् गुजरार्त में उनक स्थार्न मार्नार् है। अधिक सम्भार्वनार् सौरार्ष्ट्र की ही है। इस प्रकार सिंहली क सम्बन्ध सौरार्ष्ट्र की पार्लि यार् पूर्व भार्षार् से है। बार्द में बौद्ध धर्म के कारण मगध् से भी लंक क सम्बन्ध हो गयार् और इस पर पार्लि तथार् संस्कृत क भी कुछ प्रभार्व पड़ार्। सिंहली प्रार्कृत भार्रतीय प्रार्कृतों की तरह लंक की प्रार्कृत है। इसक अधिकांश सार्हित्य नष्ट हो चुक है, केवल कुछ अभिलेख ही शेष हैं। सिंहली में प्रार्प्त सार्हित्य 10वीं सदी के आसपार्स क है। सिंहली भार्षार् क प्रार्चीन रूप ‘एळु’ शब्द सिंहल क ही एक विकसित रूप एळु (सिंहल > सीहळु > हिअळु > हेळु > एळु) है। एळु एक प्रकार से अपभ्रंश है, अर्थार्त् सिंहली प्रार्कृत और वर्तमार्न सिंहली के बीच की भार्षार् है। एळू पर मरार्ठी क कुछ प्रभार्व भी पड़ार् है। मार्लद्वीप तथार् आसपार्स के द्वीपों की भार्षार् भी सिंहली क ही एक रूप है। इसे महल (Mahl) कहते हैं। यह 10वीं सदी को सिंहली से विकसित हुई है। अपने पूरे इतिहार्स में भार्रतीय आर्यभार्षार्एँ एक-दूसरे से पर्यार्प्त प्रभार्वित होती रही है, किंतु सिंहली क विकास प्रार्य: स्वतन्त्र रूप से हुआ है। हार्ँ, द्रविड़ परिवार्र क कुछ प्रभार्व उस पर अवश्य है।

जिप्सी-घुमंतू लोगों द्वार्रार् प्रयुक्त एक भार्षार्, जिसे हबूड़ी, रोमनी, बंजार्रार् तथार् बंजार्री आदि भी कहते हैं। जिप्सी भार्षार्एँ मूलत: भार्रोपीय परिवार्र की हैं। 5वीं सदी ई.पू. में बंजार्रार् यार् जिप्सी भार्षियों के पूर्वज जहार्ँ-तहार्ँ इधर-उधर फैल गए। इस प्रकार इनकी भार्षार् मूलत: 5वीं सदी ई. पू. की प्रार्कृत भार्षार् से संबद्ध है। इस पर कुछ प्रभार्व दरद भार्षार्ओं क भी है। जिप्सी की भार्रत में प्रमुख भार्षार्एँ बेल्दार्री, भार्म्टी, डोम, गार्रोड़ी, गुलगुलियार्, कंजरी (इसकी एक बोली ‘कुचबंधी’ है), कोल्हार्री, लार्ड़ी, मचरियार्, मलार्र, चूहरार् यार् चूहड़ार्, मनवार्लार् यार् ल्हार्री, नदी, ओड्की पेंढार्री, कशार्ई, सार्ंसी तथार् सिकलगार्री आदि है। भार्रत में जिप्सी भार्षार्ओं के बोलने वार्लों की संख्यार् 1924 की जनगणनार् के अनुसार्र 15,000 से अधिक थी। ग्रियर्सन ने अपने भार्षार्-सर्वेक्षण में इनकी संख्यार् 1 लार्ख से उपर दी है। ये लोग ईरार्न, तुर्की होते 12वीं सदी में मध्य यूरोप पहुँच चुके थे। अब पूरे यूरोप, मध्य एशियार्, कुछ अर्कीकी भार्ग तथार् अमेरिक तक य पहुँच गए हैं। इस समय जिप्सी भार्षार्एँ आर्मेनियार्, तुर्की सीरियार्, ईरार्न, रूस, इटली, र्कांस, बेल्ज आदि अनेक देशों में बोली जार्ती हैं। अकेले रूस में इनकी संख्यार् एक लार्ख से उपर है। अपने वर्तमार्न रूप में ये भार्षार्एँ स्थार्नीय भार्षार्ओं से काफी प्रभार्वित हो गई हैं। संस्कृत मूल के शब्दों में इनमें घ, ध्, भ के स्थार्न पर प्रार्य: ख, थ, फ मिलतार् है। टवर्गीय ध्वनियार्ँ कई स्थार्नों पर पूर्णत: समार्प्त हो गई हैं तथार् ज़्, ज़् ख़्, मध्य स्वर इ आदि कई नई ध्वनियार्ँ विकसित हो गई हैं। प्रार्रंभ में इनको ‘इजिप्ट’ से आयार् समझार् गयार् थार्। ‘इजिप्शियन’ शब्द ही विकसित होकर ‘जिप्सी’ बन गयार् है। प्रार्रंभ में लोग समझते थे कि जिप्सी भार्षार्ओं क संबंध मूलत: पिश्मोत्तरी प्रार्कृत से है। किंतु डॉ. टर्नर ने अंतिम रूप से ध्वनि एवं रूपों के आधार्र पर (The position of Romani in Indo-Aryan, Edunburg. 1927) यह सिद्ध कर दियार् कि इनक संबध मध्यदेशीय भार्षार् से है। वहार्ँ से ये पश्चिमोत्तरी क्षेत्र में गए और वहार्ँ से प्रभार्वित होते भार्रत के बार्हर गए। इनकी भार्षार्ओं में विभिन्न भार्षार्ओं के शब्दों आदि के आधार्र पर इनके जार्ने के पथ क भी न्यूनार्धिक रूप से निर्धार्रण कर दियार् गयार् है।

आधुनिक आर्य भार्षार् क वर्गीकरण

विश्व के समस्त भार्षार्-कुलों में भार्रतीय भार्षकुल क और इसमें भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं क विशेष महत्त्व है। प्रार्चीन भार्रतीय आर्य भार्षार् से मध्ययुगीन भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं क उद्भव हुआ है और उससे आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् क विकास हुआ है। वर्तमार्न समय की आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् क विकास रेखार्ंकन योग्य है। इसकी विभिन्न शार्खार्ओं में भरपूर सार्हित्य रचनार् हो रही है। इस तथ्य को ध्यार्न में रखकर इस परिवार्र की विभिन्न भार्षार्ओं क वर्गीकरण कियार् गयार् है। यहार्ँ कुछ प्रमुख भार्षार् वैज्ञार्निकों क वर्गीकरण प्रस्तुत है-

हानले द्वार्रार् प्रस्तुत आधुनिक आर्य भार्षार् क वर्गीकरण

भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के वर्गीकरण के संबंध में प्रथम नार्म हानले क आतार् है। उन्होंने आर्य के विषय में एक सैद्धार्ंतिक तथ्य सार्मने रखार् है कि आर्य बार्हर से भार्रत में दो बार्र आए हैं। इनके भार्रत में प्रथम आगमन क माग ¯सध्ु पार्र कर पंजार्ब से रहार् है। दूसरी बार्र इनक आगमन कश्मीर की ओर से हुआ है। दूसरी बार्र आर्यों के आगमन पर पूर्वकाल में आए देश के कोने-कोने में फैल गए। दूसरी बार्र आए आर्य देश के मध्य भार्ग में बस गए। इस प्रकार हानले ने आर्यों के बहिरंग तथार् अंतरंग वर्गों के आधार्र पर ही उनकी भार्षार्ओं को भी वर्गीकृत कियार् है। इस आधार्र पर हानले ने अंतरंग और बहिरंग दो वर्ग बनार्ए।

हानले ने “Comparative Grammar of the Gaudian Languages” में एक भिन्न वर्गीकरण भी प्रस्तुत कियार् है। इसमें उन्होंने विभिन्न दिशार्ओं के आधार्र पर भार्षार्-सीमार् बनार्ने क प्रयत्न कियार् है। ये भार्षार्-वर्ग हैं-

  1. पूर्वी गौडियन : पूर्वी हिंदी (बिहार्री सहित), बंगलार्, उड़ीसार्, असमी।
  2. पश्चिमी गौडियन : पश्चिमी हिंदी (रार्जस्थार्नी सहित), गुजरार्ती, ¯सधी, पंजार्बी।
  3. उत्तरी गौडियन : पहार्ड़ी (गढ़वार्ली नेपार्ली आदि)
  4. दक्षिणी गौडियन : मरार्ठी।

इस प्रकार हानले द्वार्रार् प्रस्तुत कियार् गयार् आधुनिक भार्रतीय भार्षार् क आदि वर्गीकरण भले ही विस्तृत और पूर्ण वैज्ञार्निक नहीं सिद्ध हो सक है, किंतु इसक अपनार् विशेष महत्त्व है इस वर्गीकरण की प्रमुख विशेषतार् यह है कि परवर्ती वर्गीकरण अल्पार्धिक रूप से इस पर आधरित हैं।

ग्रियर्सन द्वार्रार् प्रस्तुत आधुनिक आर्य भार्षार् क वर्गीकरण

जाज इब्रार्ही ग्रियर्सन ने आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् क समुचित सर्वेक्षण करके उनकी विशेषतार्ओं के आधार्र पर वर्गीकरण करने क प्रयत्न कियार् है। उनके द्वार्रार् प्रस्तुत किए गए दो वर्गीकरण इस प्रकार हैं-

प्रथम वर्गीकरण : ग्रियर्सन ने हानले के बार्ह्य और आंतरिक सिद्धार्ंत-वर्गीकरण को आंशिक आधार्र बनार्कर आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् क वर्गीकरण कियार् है। उन्होंने इस वर्गीकरण में समस्त भार्षार्ओं को मुख्यत: तीन वर्गों में विभक्त कियार् है। उनके वर्गीकरण को संक्षिप्त रूप में इस प्रकार रेखार्ंकित कर सकते हैं-

आधुनिक आर्य भार्षार्एँ क ग्रियर्सन द्वार्रार् प्रस्तुत वर्गीकरण

आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् : ग्रियर्सन द्वार्रार् प्रस्तुत प्रथम वर्गीकरण

1. बार्हरी उपशार्खार् :

  1. पूर्वी वर्ग : उड़ियार्, बंगलार्, असमी, बिहार्री।
  2. पश्चिमोत्तर वर्ग : लहंदार्, ¯सधी
  3. दक्षिणी वर्ग : मरार्ठी।

2. मध्यवर्ती उपशार्खार् : मध्यवर्ती वर्ग : पूर्वी हिंदी।

3. भीतरी उपशार्खार् :

  1. केद्रीय वर्ग : पश्चिमी हिंदी, पंजार्बी, गुजरार्ती, रार्जस्थार्नी।
  2. पहार्ड़ी वर्ग : नेपार्ली (पूर्वी पहार्ड़ी), मध्य पहार्ड़ी, पश्चिमी पहार्ड़ी।

ग्रियर्सन के मतार्नुसार्र विभिन्न उपशार्खार्ओं में विभक्त भार्षार्ओं की ध्वनियों, शब्दों तथार् उनके व्यार्करणिक रूपों में पर्यार्प्त भिन्नतार् है। उन्हीं आधार्रों पर उन्होंने विभिन्न भार्षार्ओं को उपशार्खार्ओं में विभक्त कियार् है। डॉ. सपार्ुनीतिकुमार्र चटर्जी और डॉ. भोलार्नार्थ तिवार्री ने इस वर्गीकरण की विभिन्न दृष्टियों से समीक्षार् की है। इस वर्गीकरण के आधार्र पर विशेषतार्ओं पर आलोचनार्त्मक दृष्टिकोण से इस प्रकार विचार्र कियार् जार् सकतार् है।

(क) ध्वन्यार्त्मक विशेषतार्एँ

ग्रियर्सन ने बार्हरी उपशार्खार् की कुछ ऐसी ध्वन्यार्त्मक विशेषतार्एँ रेखार्ंकित की हैं, जो भीतरी उपशार्खार् में नहीं हैं यथार्-

  1. उनके अनुसार्र बार्हरी उपशार्खार् की भार्षार्ओं में इ, उ तथार् ए स्वरार्ंत शब्दों की उक्त ध्वनियों क लोप नहीं होतार् है, किंतु अंत: वर्ग की भार्षार्ओं में इन ध्वनियों क लोप हो जार्तार् है। यदि भीतरी उपशार्खार् की भार्षार्ओं को ऐसी शब्दार्ंत ध्वनियों के विषय में देखें, तो पार्एँगे कि उनक लोप वहार्ँ भी नहीं होतार्ऋ यथार्-पति, पशु, मिले आदि।
  2. इस शार्खार् में इ ध्वनि ए और उ ध्वनि में परिवख्रतत हो जार्ती हैं। ऐसार् ध्वनि-परिवर्तन बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में ही नहीं भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी मिलतार् हैं यथार्-इ > ए : मिलनार् > मेल, मेलार्, तिल > तिल। उ > ओ : सुखार्नार् > सोखनार्, मुग्ध > मोह, तुही > तोही।
  3. उक्त शार्खार् की भार्षार्ओं की ‘इ’ तथार् ‘उ’ ध्वनि आपस में एक-दूसरे के प्रयोग स्थार्न पर प्रयुक्त होती है। भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी यदार्-कदार् ऐसे प्रयोग मिल जार्ते हैं यथार्-इ-उ : बुंद > बदु।
  4. ग्रियर्सन के अनुसार्र ‘ड़’ और ‘ल’ के स्थार्न पर ‘र’ क प्रयोग होतार् है। ऐसी ध्वन्यार्त्मक विशेषतार्एँ भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी यदार्कदार् मिल जार्ती हैं यथार्-ड > र : किवार्ड़ > किवार्र, पड़ गए > पर गए सड़क > सरक, चिड़ियार् > चिरियार्। ल > र : बल > बर, बिजली > बिजुरी, तले > तरे। यह प्रवृत्ति अवधी तथार् ब्रज में पर्यार्प्त रूप से मिलने के सार्थ खड़ी-बोली में भी अल्पार्ार्धिक रूप मे मिल जार्ती है।
  5. उनकी मार्न्यतार् है कि बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में द तथार् ड ध्वनियार्ँ आपस में एक-दूसरे के स्थार्न पर प्रयुक्त होती हैं। ऐसी प्रवृत्ति तो भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी मिलती है यथार्- द > ड : दंशन > डसनार्, दंड > डंड यार् डंडार्, ड्यार्ढ़ी > देहली।
  6. बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में ‘म्ब’ से ‘म’ ध्वनि क विकास मार्नार् गयार् है, सार्थ ही यह भी संकेत कियार् गयार् है कि भीतरी शार्खार् में ‘म्ब’ क ‘ब’ रूप होतार् है दोनों उपशार्खार्ओं के शब्दों की ध्वनियों के अध्ययन से यह तथ्य सार्मने आतार् है कि इसके विपरीत प्रवृत्ति भी मिलती है। पश्चिमी तथार् पूर्वी हिंदी में निम्ब से नीम, निबोलीऋ जम्बुक से जार्मपार्ुन शब्द रूप हो जार्ते हैं तो बंगलार् में निम्बुक से लेंबू रूप हो जार्तार् है।
  7. उनके अनुसार्र बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में ‘स’ ध्वनि श, ख यार् ह के रूप में मिलती है। यदि बार्हरी शार्खार् की पूर्वी वर्ग की बंगलार् तथार् दक्षिणी वर्ग की मरार्ठी भार्षार्ओं में देखें तो यह ध्वनि ‘श’ के रूप में प्रयुक्त होती है। बंगलार् की पूर्वी बोली तथार् असमी में यह निर्बल ध्वनि ‘ख’ के रूप में प्रयुक्त होती है। पश्चिमोत्तर वर्ग की लहँदार् तथार् ¯सधी भार्षार्ओं में यही ध्वनि ‘ह’ के रूप में मिलती है। ग्रियर्सन द्वार्रार् संकेत की गई उपशार्खार् की यह प्रवृत्ति भीतरी उपशार्खार् में भी मिलती है यथार्-द्वार्दश > बार्रह, केसरी झ केहरी, पंच-सप्तति > पचहत्तर, कोस > कोह।
  8. ग्रियर्सन के अनुसार्र बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं की महार्प्रार्ण ध्वनियार्ँ अल्पप्रार्ण हो जार्ती है। यदि भीतरी शार्खार्ओं की भार्षार्ओं के विषय में चिंतन करें, तो यह परिवर्तन इसमें भी मिलतार् है यथार्-भगिनी > बहन यार् बहिन, ईठार् (प्रार्कृत) (इष्टक) > र्इंट।
  9. उनके अनुसार्र संयुक्त व्यंजन के मध्य स्थिति अर्ध-व्यंजन क लोप हो जार्तार् है। क्षतिपूरक दीघ्र्ार्ीकरण नियमार्नुसार्र पूर्व वर्ग क रूप दीर्घ हो जार्तार् है। भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी ऐसे ध्वनि-परिवर्तन मिल जार्ते हैं यथार्-कर्म झ काम, सप्त झ सार्त, हस्त झ हार्थ, चर्म झ चार्म आदि।
  10. इसमें अंतस्थ ‘र’ क लोप हो जार्तार् है। वह प्रवृत्ति भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी मिलती है यथार्-और > और > औ, पर > पै।
  11. इसमें ही ‘ए’ क ‘ऐ’ और ‘औ’ होने की बार्त कही गई है, भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं के उच्चार्रण में यदार्-कदार् ऐस परिवर्तन मिल जार्ते हैं यदार्-कदार् ऐसे परिवर्तन मिल जार्ते हैं यथार्-सेमैस्टर > सैमेस्टर।
  12. बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में द और ध् के ज और > होने की बार्त कही गई है। ये परिवर्तन भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में भी मिल जार्ते हैं।

(ख) व्यार्करणिक विशेषतार्एँ

  1. ग्रियर्सन ने ‘ई’ प्रत्यय के प्रयोग के आधार्र पर बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं को अलग कियार् है, किंतु भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में ऐसी प्रवृत्ति संज्ञार्, क्रियार्, विशेषण आदि शब्दों के स्त्रीलिंग बनार्ने में मिलती है यथार्- संज्ञार् : लड़क > लड़की, मार्मार् > मार्मी, दार्दार् > दार्दी। विशेषण : अच्छार् > अच्छी, गंदार् > गंदी, पीलार् > पीली क्रियार् : जार्तार् > जार्ती, रोतार् > रोती, गार्तार् है > गार्ती है।
  2. उन्होंने बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं के विशेषण शब्दों में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग संरचनार् में ‘लार्’ तथार् ‘ली’ प्रयोग की बार्त कही है, जो भीतरी भार्षार्ओं में भी मिलती है यथार्- पुल्लिंग विशेषण : गठीलार्, रँगीलार्, खर्चीली, कटीली।
  3. ग्रियर्सन के अनुसार्र संस्कृत संयोगार्त्मक भार्षार् थी। उसके पश्चार्त की भार्षार्एँ क्रमश: वियोगार्त्मक होती गई हैं। बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में आगे के विकास की बार्त कही गई है, अर्थार्त् उसमें पुन: संयोगार्त्मक रूप विकसित हो गए हैं। ‘रार्म की कितार्ब’ क बंगलार् रूपार्ंतरण ‘रार्मेर बोई’ होतार् है। भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं के कारक के संयोगार्त्मक प्रयोग में भी ये रूप देखे जार् सकते हैं यथार्-अपने काम से मतलब है। तुमसे भी कहूँ। उनकी बार्त है।
  4. क्रियार् शब्दों तथार् धतु रूपों में समार्नतार् की बार्त कही गई है। यह तथ्य न तो बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में पूर्णत: मिलतार् है और न ही भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं में। दोनों ही शार्खार्ओं की भार्षार्ओं में मिलने वार्ली ऐसे प्रवृत्ति को भेदक आधार्र रूप में स्वीकार नहीं कियार् जार् सकतार् है।
  5. भूतकालिक क्रियार् क रूप कर्त्तार् के अनुरूप प्रयुक्त होतार् है। यह बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं के अतिरिक्त पूर्वी हिंदी में भी मिलती है, यथार्- हम इमिली खार्येन-(मैंने इमली खार्ई) हम आम खार्येन-(मैंने आम खार्यार्) बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं में यह प्रवृत्ति केवल अकर्मक क्रियार् के संदर्भ में ही मिलती है।
  6. ग्रियर्सन के अनुसार्र भूतकालिक क्रियार् के सार्थ आने वार्लार् सर्वनार्म क्रियार् के सार्थ अंतभ्र्ार्ूत होतार् है। बार्हरी शार्खार् की सभी भार्षार्ओं में यह प्रक्रियार् नहीं मिलती है। इस प्रकार यह भी स्पष्ट भेदक आधार्र नहीं है।
  7. बार्हरी शार्खार् की भार्षार्ओं के सभी वर्गों के शब्दों को सप्रत्यय मार्नार् है। यदि भीतरी शार्खार् की भार्षार्ओं के शब्दों पर विचार्र करें तो ऐसी ही प्रकृति इसमें भी मिलती है यथार्-मैं (मैंन), तै (तूने), बार्लहि (बार्लक को)।

(ग) शब्दगत विशेषतार्एँ

ग्रियर्सन के अनुसार्र बार्हरी शार्खार् की सभी भार्षार्ओं के शब्दों में पर्यार्प्त समार्नतार् है। यदि तुलनार्त्मक दृष्टिकोण से भीतरी तथार् बार्हरी शार्खार्ओं की विभिन्न भार्षार्ओं क अध्ययन करें, तो पार्एँगे कि बंगलार्-लहँदार् यार् बंगलार्-मरार्ठी की अपेक्षार् कहीं अधिक समतार् बंगलार् तथार् हिंदी में मिलती है। तो वार्स्तव में हिंदी क एक रूप है। इस प्रकार बार्हरी तथार् भीतरी शार्खार्ओं की भार्षार्ओं के विभिन्न शब्द वर्गों और उनकी रचनार् में पर्यार्प्त समार्नतार् होने से वर्गीकरण क यह आध् ार्र भी वैज्ञार्निक नहीं सिद्ध होतार् है।

(घ) वंशार्नुगत विशेषतार्एँ

आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् के बार्हरी तथार् भीतरी उपशार्खार् आधरित वर्गीकरण को फष्ट आधार्र देने के लिए आर्य परिवार्र को दो उपवर्गों में विभक्त कियार् गयार् है। मंतव्य के अनुसार्र बार्हरी क्षेत्र के आर्य एक जार्ति के थे और भीतरी क्षेत्र के आर्य दूसरी जार्ति के थे। इस प्रकार भिन्न जार्ति के होने के कारण उनकी भार्षार् भी भिन्न बतार्ई गई है। इस विचार्र के अनुसार्र बंगार्ल, ¯सध् तथार् महार्रार्ष्ट्र क्षेत्र के आर्य एक जार्ति के और उत्तर-प्रदेश, गुजरार्त तथार् रार्जस्थार्न आदि क्षेत्रों के आर्य दूसरी जार्ति के थे, किंतु ऐतिहार्सिक दृष्टिकोण में यह मंतव्य गलत सिद्ध होतार् है। अधिकांश इतिहार्सवेत्तार्ओं के अनुसार्र आर्य एक ही परिवार्र के थे।

द्वितीय वर्गीकरण : ग्रियर्सन ने बार्द में पश्चिमी-हिंदी को विशेष महत्त्व देते हुए एक नए ढंग क वर्गीकरण प्रस्तुत कियार् है। इसमें पश्चिमी हिंदी को केद्र में रखार् गयार् है। इस वर्गीकरण में विभिन्न भार्षार्ओं की समार्न विशेषतार्ओं पर विशेष ध्यार्न दियार् जार्तार् है। उनके इस वर्गीकरण को इस प्रकार रेखार्ंकित कर सकते हैं:

  1. मध्य देशीय भार्षार्-पश्चिमी हिंदी
  2. अंतर्वर्ती भार्षार्एँ-पंजार्बी, रार्जस्थार्नी, गुजरार्ती, पहार्ड़ी (पश्चिमी हिंदी से अधिक समतार् रखने वार्ली भार्षार्एँ)
  3. बार्हरी भार्षार्एँ-1. पश्चिमोत्तरी भार्षार्एँ-लहँदार्, ¯सधी 2. दक्षिणी भार्षार्-मरार्ठी 3. पूर्वी भार्षार्एँ-बिहार्री, उड़ियार्, बंगलार्, असमी।

डॉ. ग्रियर्सन के द्वार्रार् किए गए दोनों ही वर्गीकरण पूर्ण वैज्ञार्निक कोटि में नहीं आते हैं, क्योंकि प्रथम वर्गीकरण की दोनों उपशार्खार्ओं की ध्वन्यार्त्मक, व्यार्करणिक तथार् शब्दगत विशेषतार्ओं में स्पष्ट भेदक रेखार् खींचनार् संभव नहीं है। आर्यों को बार्हरी तथार् भीतरी दो जार्तियों में विभक्त करनार् इतिहार्स के तथ्यों के विपरीत है। इनके द्वार्रार् प्रस्तुत द्वितीय वर्गीकरण अधिक उपयोगी तथार् अपेक्षार्कृत अधिक वैज्ञार्निक है। आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के अब तक हुए वर्गीकरणों में ग्रियर्सन क वर्गीकरण निश्चय ही महत्वपूर्ण है। इस वर्गीकरण के मार्ध्यम से आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार् की विभिन्न भार्षार्यी विशेषतार्ओं के अध्ययन क अवसर मिल जार्तार् है।

डॉ. सपुनीतिकुमार्र चटर्जी द्वार्रार् प्रस्तुत वर्गीकरण

डॉ. चटर्जी ने ओरिजन एण्ड डेवलपमेंट ऑफ बेंगार्ली लैंग्वेज में डॉ. ग्रियर्सन द्वार्रार् किए गए आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के बार्हरी और भीतरी वर्गीकरण के ध्वन्यार्त्मक, व्यार्करणिक तथार् शब्दगत आधार्रों की आलोचनार् की है। इस प्रकार उदार्हरण फष्ट आलोचनार् करने से जहार्ँ ग्रियर्सन के वर्गीकरण की वैज्ञार्निकतार् तथार् उसकी सीमार् स्पष्ट होती है, वहीं नए वर्गीकरण क आधार्र बनतार् है। इसी पुस्तक में उन्होंने आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं की आपसी समीपतार् तथार् पार्रस्परिक विशेषतार्ओं को महत्त्व देते हुए उनको वर्गीकृत कियार् है। इस वर्गीकरण में उन्होंने वैदिक काल से वर्तमार्न समय तक मध्यक्षेत्र की भार्षार् की महत्तार्-संकेत करते हुए उसी भार्षार् को वर्गीकरण क आधार्र बनार्यार् है। वर्तमार्न समय में पश्चिमी हिंदी उसी महत्त्वपूर्ण भूमिक के रूप में सार्मने आती है। इस प्रकार सर्वप्रथम मध्यप्रदेश भार्षार् वर्ग बनार्कर उसमें पश्चिमी हिंदी रखी गई। पश्चिमी हिंदी के पश्चिमी क्षेत्र की भार्षार्ओं-गुजरार्ती तथार् रार्जस्थार्नी को आपसी समतार् के कारण ये एक सार्थ पश्चिमी भार्षार्-वर्ग में रखी गई हैं। समतार् की दृष्टि से ¯सधी तथार् लहँदार् के सार्थ ही पंजार्बी भार्षार् भी एक वर्ग में रखी गई हैं। इस वर्गीकरण में भी मरार्ठी एक अलग दक्षिणी वर्ग में रखी गई है। पूर्वी वर्ग में आने वार्ली बिहार्री, बंगलार्, असमी तथार् उड़ियार् के सार्थ ही पूर्वी हिंदी भी रखी गई है यथार्-

  1. (क) उत्तरी (उदीच्य) वर्ग- 1. ¯सधी, 2. लहँदार्। 3. पंजार्बी।
  2. (ख) पश्चिमी (प्रतीच्य) वर्ग- 4. गुजरार्ती। 5. रार्जस्थार्नी।
  3. (ग) मध्य (मध्यदेशीय) वर्ग- 6. पश्चिमी हिंदी।
  4. (घ) पूर्वी (प्रार्च्य) वर्ग- 7. पूर्वी हिंदी। 8. बिहार्री। 9. बंगलार्। 10. असमी। 11. उड़ियार्।
  5. (घ) दक्षिणी (दक्षिणार्त्य) वर्ग- 12. मरार्ठी।

इस वर्गीकरण की कुछ विशेषतार्एँ इस प्रकार हैं:

  1. डॉ. ग्रियर्सन डॉ. धीरेंद्र वर्मार् आदि ने भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के वर्गीकरण में ‘पहार्ड़ी’ भार्षार् को महत्व देते हुए मार्ध्य शार्खार् के उपवर्ग तथार् उत्तरी भार्षार् के रूप में स्थार्न दियार् है। डॉ. चटर्जी के वर्गीकरण में ‘पहार्ड़ी’ क नार्म न आने से उनके द्वार्रार् उस भार्षार् को महत्त्व न देने की बार्त स्पष्ट होती है। उन्होंने पहार्ड़ी को दरद तथार् रार्जस्थार्नी भार्षार् को सम्मिलित रूप मार्नार् है।
  2. आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के वर्गीकरण के संदर्भ में ग्रियर्सन तथार् कुछ अन्य भार्षार् वैज्ञार्निकों ने भीली तथार् खार्नदेशी को स्वतंत्र भार्षार् के रूप में स्वीकार कर एक वर्ग में स्थार्न दिए हैं। डॉ. चटर्जी इन दोनों ही भार्षार्ओं को स्वतंत्र रूप में स्वीकार नहीं कियार् है। इस कारण इन्हें वर्गीकरण में स्थार्न नहीं मिल सक है।
  3. यह वर्गीकरण विभिन्न भार्षार्ओं की विशेषतार्ओं की समार्नतार् के आधार्र पर कियार् गयार् है, इसलिए सुविधजनक है। इस वर्गीकरण के विषय में डॉ. सरयूप्रसार्द अग्रवार्ल ने भार्षार्विज्ञार्न और हिंदी (द्वितीय संस्करण) के पृष्ठ 138 पर अपनार् विचार्र इस प्रकार व्यक्त कियार् है-फ्यह अंधनुकरण नहीं वरन् विशेषतार्ओं की दृष्टि से समीचीन वर्गीकरण हैं। डॉ अग्रवार्ल ने इस वर्गीकरण की सरलतार् को स्पष्ट करते हुए आगे कहार् है-सुविधार् की दृष्टि से श्रेयस्कर है। आधुनिक भार्रतीय आर्य भार्षार्ओं के वर्गीकरण में डॉ. चटर्जी के वर्गीकरण क अपनार् महत्त्व है।

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