आकाश तत्व क्यार् है ?

संसार्र में पंच महार् भूतो में आकाश तत्व प्रधार्न होतार् है। यह सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व हैै। जिस प्रकार परमार्त्मार् असीम एंव निरार्कार है उसी प्रकार आकाश तत्व क असीम एवं निरार्कार है। आकाश तत्व क उसी प्रकार नार्श नही हो सकतार् जिस प्रकार र्इश्वर को कभी नश्ट नहीं कियार् जार् सकतार्। भार्रतीय मार्न्यतार्ओं के अनुसार्र आकाश में परमार्त्मार् क देवी, देवतार्ओं क वार्स मार्नार् जार्तार् है इसलिये आकाश तत्व के द्वार्रार् उसे धार्रण करके उसके द्वार्रार् चिकित्सार् द्वार्रार् मनुष्य भी उत्तम स्वार्स्थ्य एवं दीर्घ जीवन प्रार्प्त कर पार्तार् है।

जिस प्रकार हर ठोस वस्तु में एक अदृश्य शक्ति छीपी होती है और अदृश्य यार् निरार्कार वस्तु को देखने पर हमें कोर्इ ठोस वस्तु के दर्शन नहीं होते है। ठीक उसी प्रकार निरार्कार आकाश तत्व में भी होतार् है। निरार्कार से निरार्कार वस्तु की ही प्रार्प्ति होती है। आकाश निरार्कार है और इससे निरार्कार शक्ति की ही प्रार्प्ति होती है। यह शक्ति परम कल्यार्ण कारी होती है।

मार्नव शरीर एक अद्भूत यंत्र है, जिसकी संरचनार् एवं कार्य विचित्र है। मार्नव शरीर को हम एक ब्रहमार्ण्ड रूपी छोटी संरचनार् क रूप कह सकते है।

वार्स्तविकतार् तो यह है कि यदि परमार्त्मार् ने आकाश तत्व की उत्पत्ति नहीं की होती हो तो आज हमार्रार् भी अस्तित्व नहीं होतार्। हम श्वार्स भी नहीं ले पार्ते। आन्तरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नतार् की अनुभूति आकाश तत्व से ही सम्भव होती है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वार्यु ये चार्रों तत्व आकाश तत्व क आधार्र लेकर ही कार्य करते है। वे सभी आकाश तत्व पर ही निर्भर रहते है।

आकाश तत्व क अर्थ

आकाश क अर्थ ‘खार्ली जगह’ होतार् है इसे अवकाश देने वार्लार् भी कहते है। जहार्ँ खार्ली स्थार्न होतार् है। वहार्ँ वार्यु होती है। ठीक इसी प्रकार में ही मनुष्य अपनार् जीवन यार्पन करतार् है। आकाश के बिनार् मार्नव यार् अन्य प्रार्णियों की कल्पनार् नहीं की जार् सकती। आकाश में ही प्रार्णी गति करते है। ठोस में गति करने के लिये अवकाश नहीं रहतार् है। जिस प्रकार पार्नी में मछली रहती है उसी प्रकार सभी जीव आकाश में अपनार् जीवन यार्पन करते है।

हम चार्रो ओर से आकाश तत्व द्वार्रार् ही घिरे रहते है। हमार्रे शरीर के भीतर शरीर के बार्हर आकाश ही है। हमार्रे शरीर के भीतर, रक्त गति करतार् है, असंक्ष्य कोश काये कार्य करती है, वार्यु गति करतार् है। इन सबको अपनार् कार्य सम्पन्न करने एवं अपने अस्तित्व के लिये आकाश तत्व की ही आवश्यकतार् होती है। इसके अभार्व में इनके कार्य एंव स्थिति सम्भव नहीं होती है।

आकाश तत्व एक मूल तत्व मार्नार् गयार् है। अत: वार्स्तु विषय मे इसे ब्रहम तत्व (मध्य स्थार्न) कहार् जार्तार् है। इस तत्व की पूर्ति करने के लिये पुरार्ने जमार्ने में मकान के मध्य में खुलार् आंगन रखार् जार्तार् थार्, तार्कि अन्य सभी दिशार्ओं में इस तत्व की आपूर्ति हो सके। आकाश तत्व से अभिप्रार्य यह है कि गृह निर्मार्ण में खुलार्पन रहनार् चार्हिये। मकान में कमरों की ऊचार्ंर्इ और आंगन के आधार्र पर छत क निर्मार्ण होनार् चार्हिये। अधिक व कम ऊंचाइ के कारण आकाश तत्व प्रभार्वित होतार् है। कर्इ मकानों में दूषित वार्यु (भूत-पे्रत) क प्रवेश एवं आवेश देखार् गयार् है। इसक मूल कारण वार्यु तत्व और आकाश तत्व क सही निर्धार्रण नहीं होनार् ही पार्यार् गयार् है। मार्नसिक रोगों क पनपनार् भी आकाश तत्व के दोष क ही नतीजार् पार्यार् जार्तार् है।

मार्नव शरीर की संरचनार् बहुत ही विचित्र है। जिस प्रकार शरीर के भीतर आकाश तत्व यार्नि खार्ली स्थार्न होतार् है उसी आधार्र पर अब वैज्ञार्निक भी ठोस पदाथ में आकाश तत्व की स्थिति को बतार्ते है क्योंकि उनमें भी इलेक्ट्रोन तथार् प्रोटोन परस्पर गतिशील रहते है। जब स्थूल सृष्टि की रचनार् होती है तब यह सबसे पहले शक्ति से उत्पन्न होतार् है और महार्प्रलय के समय ही जब समस्त सृष्टि क अंत होतार् है तब यह शक्ति में ही विलीन हो जार्तार् है। आकाश तत्व क सूक्ष्म विषय ‘‘शब्द’’ है यार्नि ‘‘शब्द’’ के मार्ध्यम से ही आकाश तथार् आकाश तत्व प्रधार्न वस्तुओं की जार्नकारी प्रार्प्त होती है। इस संसार्र में सभी प्रकार के सूचनार् प्रसार्रण तंत्रो क मुख्य आधार्र यही आकाश तत्व होतार् है।

आकाश तत्व की परिभार्षार्

महार्त्मार् गार्ँधी जी ने आकाश तत्व को ‘आरोग्य सम्रार्ट’ की संज्ञार् दी है और बतार्यार् है कि र्इश्वर क भेद जार्नने के समार्न ही आकाश क भेद जार्ननार् है। ऐसे महार्न तत्व क जितनार् ही अभयार्स और उपयोग कियार् जार्येगार् उतनार् ही अधिक आरोग्य प्रार्प्त होगार्। गार्ँधी जी के अनुसार्र ‘बिनार् घर बार्र अथवार् वस्त्रो के इस अनन्त के सार्थ सम्बन्ध जुड जार्ये तो हमार्रार् शरीर, बुद्धि और आत्मार् पूर्ण रीति से आरोग्य भोगें। इस आदर्श को जार्ननार्, समझनार् और आदर करनार् आवश्यक है। वे कहते है कि घर-बार्र, सार्ज समार्न और वस्त्र आदि के उपयोग में हमें काफी अवकाश (आकाश) रखनार् चार्हिये। जो आकाश (अवकाश ) के सार्थ सम्बन्ध जोड़तार् है, उसके पार्स कुछ नहीं होतार् और सब कुछ होतार् है।  बडे़-बडे़ विद्वार्न दाशनिको ने भी अपने अनुभव से आकाश तत्व को परिभार्शित कियार् है जिसक वर्णन इस प्रकार से है-

जैनो के अनुसार्र –आकाश वह है जो धर्म, अधर्म, जीव और पुदगल जैसे अस्तिकाय द्रव्यों को स्थार्न देतार् है आकाश अदृश्य है। आकाश क ज्ञार्न अनुमार्न से प्रार्प्त होतार् है। विस्तार्र युक्त द्रव्यों के रहने के लिये स्थार्न चार्हिये। आकाश ही विस्तार्र युक्त द्रव्यो को स्थार्न देतार् है। आकाश दो प्रकार क होतार् है।

  1. लोकाकाश – इसमें जीव, पुदगल, धर्म और अधर्म निवार्स करते है। 
  2. अलोकाकाश – यह जगत के बार्हर होतार् है।

आकाश तत्व क महत्व

आकाश को शार्स्त्रों में पितार् भी मार्नार् गयार् है और यदि आकाश को पितार् मार्नार् गयार् है आकाश हमार्रार् पार्लन करतार् है, हमार्री रक्षार् करतार् है। आकाश हमार्रार् पार्लन करतार् है वार्रिश मे धरती पर पार्नी बरसार् कर और फिर उस बार्रिश से उगी फसलों से खार्ने लार्यक बनार्ने के लिए मौसम क परिवर्तन लार्कर आकाश हमार्री रक्षार् करतार् है, सूर्य की उन सभी बुरी किरणों से जो हमें नुकसार्न पहुंचार्ती है और हम तक सिर्फ उन्हीं किरणों को जार्ने देतार् है जो हमार्रे लिए लार्भदार्यक है।

आकाश ये सब ठीक उसी तरह करतार् है जिस तरह एक पितार् अपने बच्चों के लिए सार्री तकलीफे उठार्तार् है और उनक पार्लन करतार् है जब तक बच्चे बडे न हो जार्ये। भार्रतीय संस्कृति की प्रार्रम्भ मार्न्यतार् रही है कि आत्मार् के बिनार् शरीर मिट्टी क खिलौनार् है और आत्मार् अजय और अमर है किन्तु आज हम इस अजेय आत्मार् रूपी आकाश पर विजय पार्ने के लिये आकाश को ही घार्यल करते जार् रहे हैं।

मनुष्य के सोने क स्थार्न आकाश के नीचे ही होनार् चार्हिये। ओस, सर्दी, बरसार्त आदि में बचार्व के लिये ओढने के अतिरिक्त हर समय अगणित तार्रों से जुड़ार् हुआ आकाश ही हमार्रे चार्रो ओर हमार्री आवश्यकतार् होनार् चार्हिये।

आकाश हमार्रे भीतर-बार्हर, ऊपर-नीचे चार्रों ओर है। त्वचार् के एक छेद के बीच जहार्ं है वहीं आकाश है। इस आकाश की खार्ली जगह को हमें भरने की कोशिश नहीं करनी चार्हिये। यदि दैनिक दिनचर्यार् में हम बिनार् ठूसे भोजन करें तो पेट में रिक्त स्थार्न बचार् रहेगार् जो कि आकाश तत्व ही है। और सार्थ ही यह एक अच्छे स्वार्स्थ्य के लिये भी उत्तम रहतार् है। उत्तम स्वार्स्थ्य की प्रार्प्ति एवं रोग की निवृत्ति के लिये आकाश तत्व एक सार्धन के रूप में कार्य करतार् है। आकाश तत्व की प्रार्प्ति विभिन्न सार्धनो द्वार्रार् की जार् सकती है। जैसे – उपवार्स , ब्रहमचर्य, संयम, सदार्चार्र, मार्नसिक अनुशार्सन, मार्नसिक संतुलन, विश्रार्म यार् शिथिलीकरण, प्रसन्नतार्, मनोरंजन एवं गहरी निद्रार्।

उपरोक्त सार्धन आकाश तत्व के महत्व को और बढ़ार् देते है। इनके व्यवहार्र द्वार्रार् व्यक्ति के जीवन में शार्रीरिक मार्नसिक अध्यार्त्मिक उन्नति के सार्थ-सार्थ भार्वनार्त्मक, क्रियार्त्मक विकास भी सम्भव है सार्थ ही सार्मार्जिकतार् के निरवार्ह में भी यह सभी सार्धन अनुकूल प्रभार्व डार्लते है। आइये अब आपको आकाश तत्व प्रार्प्ति कें सार्धनो के बार्रे में जार्नकारी देते है। जिससे आप आकाश तत्व के महत्व को और विस्तार्र से जार्न पार्येगें।

उपवार्स- उपवार्स क अर्थ भोजन की कमी से है। जिसमें व्यक्ति अपनी रार्जखार्ने की आदत में कमी करतार् है। सार्मार्न्यत: व्यक्ति की बार्र-बार्र खार्ने की आदत के कारण उसक पेट हमेशार् भरार् रहतार् है। जिससे पार्चन संस्थार्न को विश्रार्म नहीं मिलतार् है। अपवार्स काल में व्यक्ति के पार्चन संस्थार्न को विश्रार्म मिलतार् है। यह एक शार्रीरिक एवं मार्नसिक शुद्धि क सार्धन भी है। इस प्रकार उपवार्स द्वार्रार् आकाार् तत्व को प्रार्प्त करने से व्यक्ति के लिये उपवार्स क महत्व और ज्यार्दार् बढ़ जार्तार् है। शार्रीरिक शुद्धि शार्रीरिक रोगो से मुक्त करती है तथार् मार्नसिक शुद्धि मन के विकारो को दूर कर दृढ़ मार्नार्सिक शक्ति प्रदार्न करती है। जिससे व्यक्ति एक सुखमय जीवन व्यतीत करतार् है।

उपवार्स शरीर के अंदर संचित विजार्तीय द्रव , हार्निकारक विष तत्व और मृत कोशिकाओं, जो शरीर को अशुद्ध करके शरीर में रोग व विकृतियार्ँ उत्पन्न करते है ,को शरीर से निश्कासित करके शरीर को स्वच्छ ,निरोगी , सु–ढ़ व सशक्त बनार्ने क सार्धन है। उपवार्स शरीर के आंतरिक शोधन व सवार्च्छिकरण की उत्तम विधि है।

उपवार्स शरीर के अंदर संचित विजार्तीय द्रव , हार्निकारक विष तत्व और मृत कोशिकाओं, जो शरीर को अशुद्ध करके शरीर में रोग व विकृतियार्ँ उत्पन्न करते है ,को शरीर से निश्कासित करके शरीर को स्वच्छ ,निरोगी , सु–ढ़ व सशक्त बनार्ने क सार्धन है। उपवार्स शरीर के आंतरिक शोधन व सवार्च्छिकरण की उत्तम विधि है।

उपवार्स क आरंभ भोजन छोड़ने से होतार् है । उपवार्स के समय चूँकि शरीर को भोजन के पचने के कार्य से अवकाश मिल जार्तार् है अत: उपवार्स काल में , आंतों की सफाइ क कार्य तेजी के सार्थ नियमबद्धतार् से होने लगतार् है जिससे जीवनी शक्ति रोगों को शरीर से बार्हर निकलने के कार्य को सुचार्रू रुप से व सुगमतार् पूर्वक करने लगती है । रोग अवस्थार् में लियार् गयार् भोजन विष बन जार्तार् है जो प्रार्णघार्तक हो सकतार् है।

उपवार्स शरीर के अंदर संचित विजार्तीय द्रव , हार्निकारक विष तत्व और मृत कोशिकाओं, जो शरीर को अशुद्ध करके शरीर में रोग व विकृतियार्ँ उत्पन्न करते है ,को शरीर से निश्कासित करके शरीर को स्वच्छ ,निरोगी , सु–ढ़ व सशक्त बनार्ने क सार्धन है। उपवार्स शरीर के आंतरिक शोधन व सवार्च्छिकरण की उत्तम विधि है । उपवार्स क आरंभ भोजन छोड़ने से होतार् है । उपवार्स के समय चूँकि शरीर को भोजन के पचने के कार्य से अवकाश मिल जार्तार् है अत: उपवार्स काल में , आंतों की सफाइ क कार्य तेजी के सार्थ नियमबद्धतार् से होने लगतार् है जिससे जीवनी शक्ति रोगों को शरीर से बार्हर निकलने के कार्य को सुचार्रू रुप से व सुगमतार् पूर्वक करने लगती है । रोग अवस्थार् में लियार् गयार् भोजन विष बन जार्तार् है जो प्रार्णघार्तक हो सकतार् है।

ब्रहमचर्य एंव संयम-ब्रहमचर्य अर्थार्त ब्रहम क आचार्रण करनार्, ब्रहमचर्य को थोड़ार् संसार्रिक स्तर में सोचें तो इन्द्रिय संयम ही ब्रहमचर्य है। कामवार्सनार्ओं पर नियन्त्रण करते हुए व्यिक्त् ब्रहमचर्य व्रत क पार्लन करतार् है।

ब्रहमचर्य दो प्रकार क होतार् है।

  1. उपकुवाण – जो व्यक्ति थोड़ार् शार्स्त्र ज्ञार्न करके गुरू की आज्ञार् से गृहस्थार्श्रम में प्रवेश करतार् है उसे उपकुर्वार्ण ब्रहमचार्री कहते है। 
  2. नैश्टिक – जो व्यक्ति जीवन भर ब्रहमचर्य व्रत स्वीकार कर लेतार् है उसे नैश्टिक ब्रहमचार्री कहते है।

ब्रहमचय व्रत के पार्लन में स्त्री क संग, अश्लील एंव कामार्द्दीपक बार्तो, स्त्री के रूप की चर्चार्, मैथुन सम्बन्धि कल्पनार् आदि व्यवहार्र क त्यार्ग करनार् आवश्यक होतार् है। इनके द्वार्रार् व्यक्ति की शक्ति क संचार्र होतार् है तथार् वह अन्नत जीवन जीतार् है।

जिस प्रकार दूध में मक्खन, तिल में तेल उपस्थित रहतार् है ठीक उसी प्रकार व्यिक्त् में रज एंव वीर्य उपस्थित रहतार् हैै। जो तेज, शौर्य, कान्ति, मेधार् एवं बल की उत्पत्ति करते है। ब्रहमचर्य व्रत के पार्लन से इनमें वृद्धि होती है। सत्संग, स्वार्ध्यार्य, उचित दिनचर्यार्, पथ्य भोजन, आदि के द्वार्रार् वीर्य पार्त से बचार् जार् सकतार् है।

संयम-ब्रहमचर्य के पार्लन में संयम क विषेश महत्व है। मन, विचार्र, इन्द्रिय आदि संयम द्वार्रार् व्यक्ति अपने जीवन को उन्नत बनार् सकतार् है। मन के संयम द्वार्रार् मनुष्य की उत्पत्ति चार्हे जैसे भी हुर्इ हो ,परन्तु यदि किसी मनुष्य से यह कहार् जार्ये कि तुम्हार्रे पार्स मन नही है तो वह स्वीकार नही कर सकतार् । मनुष्य शब्द क अर्थ ही है मन वार्लार् । जहार्ँ पशुतार् से ऊपर उठने के लिए मननशीलतार् क होनार् जरुरी है ,वहीँ परमार्त्मार् तक पहुँचने के लिए मन क न होनार् यार्नि उमनी भार्व दशार् क होनार् आवश्यक है ।

मन के बार्रे में गीतार्(6-33,34) में अर्जुन भगवन कृष्ण से पूछते है कि हे कृष्ण यह मन बड़ार् चंचल ,प्रमथन स्वार्भार्व वार्लार् ,बड़ार् मजबूत ,बलवार्न है। इसलिए इसको वश में करनार् वार्यु को रोकने की भार्ंति अत्यंत दुश्कर है ।

तब भगवार्न कृष्ण गीतार् (6-35) में कहते है कि हे महार्बार्हो, निस्संदेह मन चंचल और कठिनतार् से वश में होने वार्लार् होतार् है , परन्तु इसे अभ्यार्स और वैरार्ग्य से वश में कियार् जार् सकतार् है । मन ही मनुष्य के बन्धन एवं मोक्ष क कारण होतार् है। आज व्यक्ति मन क दार्स हो गयार् है। उस व्यक्ति क पूरार् जीवन मन के अनुसार्र चलने में ही निकल जार्तार् है वह मन की चंचलतार् के कारण दार्स्य की तरह कायर्क् करतार् रहतार् है। अत्यार्धिक चंचल इन्द्रिय होने के कारण मन व्यक्ति के विचार्रो को अपने से हटार्ने ही नही देतार् अपने में ही उलझार्कर रखतार् है। इस पर नियन्त्रण करके व्यक्ति अपने कल्यार्ण के लिये प्रयार्स करतार् है। वार्णी एवं कर्म संयम स्वत: सिद्ध ेहो जार्तार् है।एंकान्तवार्स, र्इश्वरोपार्सनार् आदि द्वार्रार् मन क संयम सम्भव है।

वार्णी क संयम –वार्णी में संयम होनार् व्यक्ति के लिये अत्यार्वश्यक होतार् है। तार्नार् मार्रनार्, गार्ली देनार्, चिढ़ार्नार्, घृणार् करार् भार्व प्रदर्शित करनार्, बुरी निगार्ह से देखकर मजार्क करनार् आदि असंयमित वार्णी को ही दर्शार्ते है। वचन को संयमित करने के लिये ‘मौन’ एक मार्त्र उपार्यार् है। मौन में बहुत शक्ति होती है। मौन को शार्न्ति के नार्म से भी जार्नार् जार् सकतार् है। वेद-पुरार्णो में भी मौन को शार्न्ति कहार् गयार् है। अपनी वार्णी को संयमित करने के लिये इसक पार्लन आवश्यक होतार् है। इससे व्यक्ति के सार्मार्जिक व्यवहार्र एंव व्यक्तित्व में गहरार् प्रभार्व पड़तार् है। 

कर्म क संयम-सही एवं गलत के भेद को समझकर उसके अनुसार्र कर्म करनार् कर्म क संयम कहलार्तार् है। एक कर्म योगी के रार्स्ते में चार्हे जितनी भी बार्ंधार्ऐं क्यों न आये। वह अपने कर्म माग से विचलित नहीं होतार् है। निश्काम कार्य करने से ही कर्म क संयम है। कर्म में आसक्ति नहीं होनी चार्हिये। अन्यतार् व्यक्ति बन्धन में बंध जार्तार् है। कार्य क संयम और कर्म बन्धन दोनो अलग-अलग चीजे है।

सकाम क्रम ही भव बंधन क कारण है। जब तक मनुष्य शार्रीरिक सुख क स्तर बढ़ार्ने के उद्देश्य से कर्म करतार् रहतार् है तब तक वह विभीन प्रकार के शरिरो में देहार्न्तरण करते हुए भवबंधन को बनार्ये रखतार् है।भले ही मनुष्य क मन सकाम कर्मो में व्यस्त रहे और अज्ञार्न द्वार्रार् प्रभार्वित हो, किन्तु उसे भगवन कि भक्ति के प्रति प्रेम उत्पन करनार् चार्हिए द्य केवल तभी वह भवबंधन से छुटने क अवसर प्रार्प्त कर सकतार् है।

जो भक्ति भार्व से संयम में रहते हुए कर्म करतार् है, जो विषुद्ध आत्मार् है और अपने मन तथार् इन्द्रियों को वश मर्इ रखतार् है, वह सभी को प्रिय होतार् है और सभी उसे प्रिये होते है द्य ऐसार् व्यक्ति कर्म करतार् हुआ भी कभी भी कर्म बंधन में नहीं बंधतार्।

जीव के शरीर के भीतर वस् करने वार्लार् भगवन ब्रह्मार्ंड समस्त जीवो के नियंतार् है हम कह सकते है कि शरीर रुपी नगर क स्वार्मी देह धार्री जीव आत्मार् न तोह कर्म क सृजन करतार् है, न लोगो को कर्म करने के लिए प्रेरित करतार् है, और न ही कर्म फल कि रचन करतार् है द्य यह सब तोह प्रकृति के गुणों द्वार्रार् हे कियार् जार्तार् है।

आकाश तत्व की महत्तार् में संयम एक महत्वपूर्ण सार्धन के रूप में कार्य करतार् है। मन, कम, वचन को संयमित करके व्यक्ति अपनी जीवन में श्रेष्ठ अवस्थार् को प्रार्प्त करने में सक्षम होतार् है। व्यक्तिगत एवं सार्मार्जिक दोनों जीवन में संयम एक प्रभार्वकारी सहार्यक सिद्ध होतार् है।

सदार्चार्र- सत्पुरूषो के आचरण को सदार्चार्र कहते है जिसमें शरीर और मन दोनो परिश्रम होते है। सद्विचार्र क बीजार्रोपण मार्नसिक शुचितार् के क्षेत्र में होतार् है और वह क्षेत्र तैयार्र करतार् है सदार्चार्र। सदार्चार्र की भार्षार् मौन होने के बार्वजूद सदार्चार्री सार्रे विश्व को अपने सार्थ करने की हिम्मत रखतार् है। सदार्चार्र से वियार्क्तित्व निर्मार्ण भी होतार् है। जीवन को साथक एवं समर्थ बनार्ने वार्ली क्षमतार् को अर्जित करने क दूसरार् नार्म सदार्चार्र ही है ।सदार्चर से ही वियक्ति संयमशील ,अनुशार्सित और सुव्यवस्थित क्रियार्कलार्प अपनार् सकतार् है ।सदार्चार्र व्यक्तित्व को पवित्र ,प्रमार्णिक प्रखर बनार्ने कि प्रक्रियार् है । सदार्चार्र अन्तरंग जीवन में सुसंस्कारितार् की सुगंध फैलार्ती है और बहिरंग जीवन में सभ्यतार् रूपी शार्लीन व्यवहार्र में निखरती है।

मार्नसिक अनुशार्सन एवं सन्तुलन –मनुष्य क मन एक प्रबल शक्तिशार्ली यन्त्र होतार् है। व्यक्ति क मन जैसार् सोचतार् है व्यक्ति वैसार् होतार् चलार् जार्तार् है। व्यक्ति मन में जैसे विचार्र बार्र-बार्र लार्तार् है वैसार् ही मार्हौल वह अपने चार्रो ओर तैयार्र करतार् है। मन एक गुप्त शक्ति केन्द्र है। जिसक नियन्त्रण मस्तिष्क द्वार्रार् होतार् है। मनुष्य की उन्नति, अवनति, सुख-दुख, मंगल- अमंगल सबक कारण मन ही है। मनोभार्व व्यक्ति को रोग्रसित करने एंव रोगयुक्त रहने क कारण होते है। क्रोध, धृणार्, र्इश्र्यार्, भय आदि के प्रभार्व से शरीर में नकारार्त्मक प्रभार्व पड़तार् है शरीर रोगग्रस्त हो जार्तार् है। यदि व्यक्ति उत्तम स्वार्स्थ्य क चिन्तन करतार् है सकारार्त्मक भार्वो को मन में रखतार् है तो व्यक्ति क मन उसके शरीर में सकारार्त्मक प्रभार्व डार्लतार् है। आकाश चिकित्सार् के अन्तर्गत मार्नसिक अनुशार्सन को रोग निवार्रण क एक प्रवल सार्धन मार्नार् है, जिसके द्वार्रार् सभी रोग नष्ट किये जार् सकत है।

विश्रार्म – शरीर की थकावट दूर होनार्, मस्तिष्क की शार्ंति यार् शरीर और मन को कुछ समय के लिये विरार्म देनार् ही विश्रार्म कहलार्तार् है। विश्रार्म क अर्थ केवल शरीर के विश्रार्म तक सीमित नहीं है। शरीर और मन दोनो को विश्रार्म ही वार्स्तव में पूर्ण विश्रार्म कहलार्तार् है। कार्य की थकावट को दूर करने को विश्रार्म कहते है परन्तु बिनार् थकावट के कियार् गयार् विश्रार्म शरीर और मन में निश्क्रियतार् को बढ़ार्तार् है इसे आलस्य कहते है। विश्रार्म स्फूर्ति प्रदार्न करतार् है। विश्रार्म के समय मनुष्य के मस्तिश्क और शरीर के सार्रे अवयव इन्द्रियार्ँ शिथिल हो जार्ती है विश्रार्म के बार्द शरीर एंव मस्तिश्क में पुन: बल और तार्जगी क अनुभव होने लगतार् है। परिश्रम में खोर्इ हुर्इ शक्ति को दोबार्रार् प्रार्प्त करने के लिये विश्रार्म अति आवश्यक होतार् है।

नींद भी विश्रार्म क ही समार्नाथक शब्द है मार्नव क जीवन दिनोदिन कठिन होतार् जार् रहार् है आधुनिकतार् के इस दौर में हर व्यक्ति एक दूसरे के आगे निकलने के लिए प्रयार्सरत है। जिसके कारण उसकी जीवन शैली में अनेको उलझनें उत्पन हुर्इ है। इन उलझनों को दूर करने के लिए विश्रार्म एक कारगर उपार्य के रूप में कार्य करतार् है ।

जब हमार्रे शरीर की नस, नार्डियार्ँ, मार्ँसपेशियार्ँ शार्रीरिक श्रम यार् मार्नसिक श्रम के कारण थकावट महसूस करती है तब विश्रार्म की अति आवशयकतार् होती है और हमरार् शरीर मन की भार्षार् को अच्छी तरह समझतार् है । जब पूरार् मन सोने की इच्छार् पर लगतार् है तब हम सो जार्ते है ।

हमार्रे शरीर में उपस्थित अन्तार्श्रवी ग्रंथियों में से एक ग्रंथि है पेनिअल ग्रंथि जो कि एक मेलार्टोमिन नार्मक हार्रमोंस क स्रार्व करती है जो कि नींद आने में सहार्यक होतार् है। यदि व्यक्ति को नींद नहीं आती है तोह इससे हम समझ सकते है कि शरीर में मेलार्टोमिन कि कमी है।आकाश तत्व प्रार्प्त करने क एक सार्धन विश्रार्म है जो कि रोग निवार्रण के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण सार्धन है। संसार्र में जितने भी रोग है उनक कारण किसी न किसी प्रकार की थकावट ही है। शरीर क लचीलार्पन ही उत्तम स्वार्स्थ्य है और कड़ार्पन विजार्तीय पदाथ यार् थकावअ क सूचक है। योगमुद्रार्, शवार्सन आदि अभ्यार्स योग में पूर्ण विश्रार्म प्रार्प्त करने के लिये ही बतार्ये गये है।

उपरोक्त वर्णन से हमें आकाश तत्व क सार्धन एवं आकाश तत्व के महत्व के बार्रे में पूर्ण जार्नकारी प्रार्प्त होती है। आकाश तत्व चिकित्सार् में व्यक्ति के शार्रीरिक, मार्नसिक, वैचार्रिक आदि पक्षो को प्रीार्वित करके शार्रीरिक, मार्नसिक और मनोकायिक सभी रोगो क निवार्रण सम्भव होतार् है, सार्थ ही व्यक्ति सार्मार्जिक एंव व्यक्तिगत स्तर में भी उन्नति करतार् है ।

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