आंग्ल-बर्मार् सम्बन्ध

बर्मार् में कंपनी की प्रार्रंभिक गतिविधियार्ँ

भार्रत के पूर्व में बर्मार् देश है जिसे म्यार्न्मार्र भी कहार् जार्तार् है। भार्रतीय सार्म्रार्ज्य की रक्षार् के लिए स्वार्भार्विक थार् कि कांग्रेस पूर्वी सीमार् की भी रक्षार् करे। मुगल सम्रार्टों ने आसार्म के कुछ भार्गों को जीतकर अपने सार्म्रार्ज्य में शार्मिल कियार् थार्। बंगार्ल पर अधिकार करने के बार्द कंपनी ने बर्मार् के सार्थ संबंधों पर ध्यार्न दियार्।

बर्मार् क रार्जार् चीन के सम्रार्ट के समार्न स्वयं को विश्व विजेतार् समझतार् थार्। दूसरी ओर अंग्रेजों को भी भार्रत में आशार्तीत सफलतार्एँ प्रार्प्त हुर्इ थीं। ऐसे वार्तार्वरण में अंग्रेजों तथार् बर्मार् के मध्य युद्ध हो जार्नार् स्वार्भार्विक थार्। सर जार्न शार्रे तक अंग्रेजों को नीति रही थी कि वे अरार्कान में आकर छिपने वार्ले लुटेरों को बर्मी सैनिकों को देते थे लेकिन वेलेजली ने कड़ार् रूख अख्तियार्र कियार् और लुटेरों के समर्पण करने से मनार् कर दियार्। 1816 में बर्मी रार्जार् ने आसार्म पर अधिकार कर लियार्। आसार्म के रार्जार् चन्द्रकातं को अंग्रेजों ने अपने रार्ज्य में शरण दी और आसार्म में छार्पे मार्रने में भी उसकी सहार्यतार् की। चिटगार्ँव से भी लुटेरों के छार्पे बढ़ गय।े इन कारणों से बर्मार् क रार्जार् अंग्रेजों से नार्रार्ज हो गयार्। नेपार्ल युद्ध में अंग्रेजों को जिन असफलतार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ार्, उनसे बर्मी लोगों क सार्हस बढ़ार् और वे समझने लगे कि अंग्रेजों को परार्जित करनार् आसार्न कार्य है। इसलिए जब लाड हेस्ंिटग्ज पिण्डार्रियों के विरूद्ध कार्यवार्ही में लगार् हुआ थार् तब आवार् के रार्जार् ने लाड हेस्ंिटग्ज के पार्स एक पत्र भेजकर मार्ँग की कि चिटगार्ँव, ढार्का, मुर्शिदार्बार्द और कासिमबार्जार्र उसके सुपुर्द कर दिये जार्यें। उसक दार्वार् थार् कि ये सभी क्षेत्र अरार्कान के रार्जार् को कर देते थे, अत: अब उसकी अधीनतार् में हैं। हेस्ंिटग्ज ने इस पत्र क उत्तर नहीं दियार् बल्कि यह कहकर लौटार् दियार् कि पत्र जार्ली थार् लेकिन अंग्रेजों को स्पष्ट हो गयार् थार् कि अपने रार्ज्य की पूर्वी सीमार् की सुरक्षार् करने के लिए उन्हें आवार् सरकार को परार्जित करनार् आवश्यक थार्। अत: दोनों के मध्य युद्ध अवश्यसंभार्वी हो गयार्।

प्रथम आंग्ल-बर्मार् युद्ध (1824-1826 र्इ.)

युद्ध के कारण

युद्ध क वार्स्तविक कारण अंग्रेजों और सार्म्रार्ज्यवार्दी तथार् व्यार्पार्रिक आकांक्षार्एँ थीं। इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी थे –

  1. बंगार्ल और अरार्कान की सीमार्यें निर्धार्रित नहीं थी। बर्मियों द्वार्रार् जीते हुए प्रदेश से लुटेरे भार्ग कर अंग्रेजी क्षेत्र में शरण लेते थे। बर्मी सरकार उनके समर्पण की मार्ँग करती थी लेकिन अंग्रेजों ने इसे स्वीकार नहीं कियार्। 
  2. इस समय कंपनी के सिपार्हियों से कभी-कभी बर्मी सैनिकों की मुठभेड़ हो जार्ती थी, इसमें उन्हें सफलतार् प्रार्प्त होती थी। इससे आवार् नरेश को विश्वार्स हो गयार् कि वह अंग्रेजों को परार्जित कर सकतार् थार्।
  3. अंग्रेजों ने 1795 से 1811 र्इ. तक कर्इ रार्जदूत बर्मी सरकार से संबंध स्थार्पित करने के लिए भेजे। किन्तु बर्मार् द्वार्रार् इन रार्जदूतों के सार्थ अच्छार् व्यवहार्र नहीं कियार् गयार्। 
  4. मणिपुर (1813 र्इ.) पर अधिकार करकने बार्द बर्मी सेनार्ओं ने आसार्म (1816 र्इ.) को भी जीत लियार्। अंग्रेजों ने आसार्म के रार्जार् को शरण दी। अंग्रेजों की सहार्यतार् से आसार्म और अरार्कान पर छार्पेमार्र हमले होते थे। 
  5. 1818 र्इ. आवार् नरेश ने लाड हेस्टिंग्स को पत्र भेजकर चटगार्ँव, मुर्शिबार्द, ढार्क और कासिमबार्जार्र को समर्पित कर देने की मार्ँग की। इस समय हेि स्ंटग्स पिण्डार्रियों क दमन करने में व्यस्त थार्। अत: उसने पत्र को जार्ली मार्नकर लौटार् दियार्। 
  6. युद्ध क तार्त्कालिक कारण चटगार्ँ के निकट शार्हपुरी द्वीप क विवार्द थार्। 1823 र्इ. में बर्मियों ने इस द्वीप पर अधिकार कर लियार्। गवर्नर जनरल एमहस्र्ट ने आवार् नरेश से मार्ँग की कि वह द्वीप को लौटार् दे। उसके मनार् करने पर एमहस्र्ट ने युद्ध की घोषणार् कर दी। शार्हपुरी द्वीप के अतिरिक्त कछार्र क विवार्द भी थार्। एमहस्र्ट कछार्र पर बर्मियों की सत्तार् स्वीकर करने को तैयार्र नहीं थार् क्योंकि बर्मार् से बंगार्ल क सरल माग कछार्र होकर थार्। इस समय कछार्र क रार्जार् गोविन्दचन्द्र थार् जो बर्मार् के रार्ज्य क करद रार्जार् थार्। उसे बर्मियों ने सहार्यतार् देकर रार्जार् बनार्यार् थार्। एमहस्र्ट ने कछार्र पर बर्मियों की सत्तार् को स्वीकार कर दियार्। 
  7. युद्ध क वार्स्तविक कारण ब्रिटिश सार्म्रार्ज्यवार्द थार्। भार्रत में अंग्रेजों की सर्वोच्च सत्तार् स्थार्पित हो चुकी थी। अब वे बंगार्ल के पूर्व में विस्तार्र चार्हते थे। उनकी दृष्टि अरार्कान, कछार्र और आसार्म पर थी। इसके अलार्वार् वे बर्मार् में बिनार् किसी बार्धार् के व्यार्पार्र चार्हते थे। बर्मार् ठीक लकड़ी और लार्ख की मार्ँग इंग्लैण्ड और यूरोप में बढ़ रही थी।

युद्ध की घटनार्एँ

बर्मार् की सेनार्ओं को सर्वोत्तम सुरक्षार् प्रकृति ने प्रदार्न की थी। घने जंगल, पहार्ड़ और अनेक नदियार्ँ होने के कारण अंग्रेजों को अनेक समस्यार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़ार्। उनक देश जंगल और दलदल क एक विस्तृत फैलार्व थार्। बर्मी सैनिक अंग्रेजी सेनार् की तरह प्रशिक्षित सैनिक नहीं थे किंतु अपने देश की जटिल प्रार्कृतिक अवस्थार् में लड़ने में अत्यंत कुशल थे।

आक्रमण की पहल बर्मी सेनार्पति महार्बंदूलार् ने की। उसने बंगार्ल की पूर्वी सीमार् पर आक्रमण कर दियार् और चिटगार्ँव के पार्स रार्मू नार्मक स्थार्न पर अधिकार कर लियार्।

अंग्रेजों की योजनार् यह थी कि समुद्र माग से आक्रमण करके रंगून पर कब्जार् कर लियार् जार्ये और वहार्ँ से दरार्वती नदी के माग से जहार्ज आवार् पहुँच जार्ये। इसके लिए सर आर्चोबार्ल्ड केम्पबेल के सेनार्पतित्व में सेनार् भेजी गयी। इसमें ग्यार्रह हजार्र सैनिक थे जिनमें अधिकांश मद्रार्स के सिपार्ही थे। इस सेनार् के सार्थ जहार्ज भी भेजे गये थे। इस सेनार् ने जल माग से रंगून पहुँचकर बंदरगार्ह व नगर पर अधिकार कर लियार्।

अंग्रेजों ने दूसरी सेनार् उत्तर-पूर्व के स्थल माग से भेजी। इस सेनार् क उद्देश्य रक्षार्त्मक युद्ध के द्वार्रार् उन प्रदेशों को जीतनार् थार् जिन पर हार्ल में बर्मियों ने अधिकार कर लियार् थार् अर्थार्त् आसार्म, कछार्र और मणिपरु । ब्रिटिश सैनिकों ने आसार्म से बर्मियों को खदेड़ दियार् लेकिन सहार्बन्दूलार् ने चिटगार्ँव की सीमार् रार्मू पर एक ब्रिटिश सैन्य दल को मार्र भगार्यार्। अंग्रेजों को आशार् थी कि इस क्षेत्र के मोन लार्गे बर्मियों के विरूद्ध विद्रार्हे कर देगें जिससे उन्हें आगे बढ़ने में सहार्यतार् मिलेगी लेकिन बर्मियों ने मोन लोगों को यहार्ँ से हटार् दियार्। फलस्वरूप अंग्रेजों को खार्द्य पदाथों की कमी क सार्मनार् करनार् पड़ार् और उनके सैनिकों को बहुत कष्ट उठार्नार् पड़ार्। वर्षार् के कारण अस्वार्स्थ्यकर जलवार्यु से भी सैनिकों को कष्ट हुआ। वर्षार् समार्प्त होने के बार्द महार्बन्दूलार् बर्मी सेनार् के सार्थ पुन: आयार्। वह फिर परार्जित हुआ और भार्गकर दोनार्ब्यू पहुँचार्। 15 दिसम्बर, 1825 र्इ. को यहार्ँ युद्ध हुआ जिसमें वह मार्रार् गयार्। इसके बार्द केम्पबेल ने प्रोम पर अधिकार कर लियार्। इस स्थार्न से वह रार्जधार्नी आवार् की ओर बढ़ार्। बर्मियों में युद्ध करने की शक्ति नहीं रह गयी थीं। अत: यार्न्दबू नार्मक स्थार्न पर संधि हो गयी। इसकी शर्तें केम्पबले ने लिखवार्यी थीं।

यार्न्दबू की संधि

24 फरवरी, 1826 र्इ. को यह संधि हुर्इ। इसकी शर्तें इस प्रकार थीं –

  1. बर्मार् के शार्सक ने अरार्कान और टिनार्सिरम के प्रार्ंत अंग्रेजों को दे दिये। 
  2. बर्मार् की सरकार ने आसार्म, कछार्र, जेन्तियार् में हस्तक्षपे न करने क वचन दियार् और मणिपरु की स्वतंत्रतार् स्वीकार कर ली। 
  3. बर्मार् के शार्सक ने अपने दरबार्र में अंगे्रजों को एक करार्डे  रूपयार् देनार् स्वीकार कियार्। 
  4. बर्मार् के शार्सक ने अपने दरबार्र में अंग्रेज रेजीडेण्ट रखनार् स्वीकार कियार्। 
  5. बर्मार् के शार्सक ने अंग्रेजों से व्यार्पार्रिक संधि करने तथार् व्यार्पार्रिक सुविधार्एँ देनार् स्वीकार कियार्। एक बर्मार् दूत को कलकत्तार् आने की अनुमति मिली।

1826 र्इ. में बर्मार् के सार्थ अंग्रेजों ने एक व्यार्पार्रिक बोदौपार्यार् संधि की जिसमें अंगे्रजों की सभी मार्ँगें स्वीकार कर ली गयीं। बर्मी रार्जार् विक्षिप्त हो गयार्। 1837 र्इ. में गद्दी से उतार्र दियार् गयार् और उसके भाइ थार्रार्वार्दी को गद्दी पर बिठार्यार् गयार्। वार्स्तव में, बर्मार् की सरकार अंग्रेजों से किसी प्रकार क संबंध नहीं रखनार् चार्हती थी। अत: उसने अपनार् दूत कलकत्तार् नहीं भजे ार्। 1837 र्इ. में जब थार्रार्वार्दी गद्दी पर बैठार्, तब उसने यार्न्छबू की संधि को अस्वीकार कर दियार्। बर्मी परम्परार् के अनुसार्र नये रार्जार् को पहले की गयी संधियों को स्वीकार यार् अस्वीकार करने करने क अधिकार होतार् थार्।

समीक्षार्

आंग्ल-बर्मार् युद्ध की कटु आलोचनार् की गयी है। कहार् गयार् है कि एमहस्र्ट ने युद्ध की ठीक व्यवस्थार् नहीं की और अंग्रेजों को जन-धन की बड़ी बर्बार्दी उठार्नी पड़ी है। अकुशलतार् के सार्थ एमहस्र्ट की यह भी आलोचनार् भी की गयी है कि उसने स्थिति क दृढ़तार् से सार्मनार् नहीं कियार् लेकिन उसकी नीति सफल रही और अंग्रेजों क बर्मार् के समुद्रतीय प्रदेश, व्यार्पार्र के अधिकार, आसार्म, कछार्र, मणिपुर के प्रदेश प्रार्प्त हुए।

यार्न्दबू की संधि से बर्मी-अंग्रेज शत्रुतार् क अंत नहीं हुआ। बर्मार् के नये रार्जार् ने संधि को मार्नने से इंकार कर दियार्। दूसरी ओर, अंग्रेजों को केवल तार्त्कालिक लार्भ प्रार्प्त हुए थे लेकिन वे बर्मार् पर प्रभार्वपूर्ण नियंत्रण चार्हते थे। अत: द्वितीय आंग्ल-बर्मार् युद्ध अवश्यम्भार्वी थार्।

द्वितीय आंग्ल-बर्मार् युद्ध (1852)

द्वितीय आंग्ल-बर्मार् युद्ध लाड डलहौजी के शार्सनकाल में हुआ। लाड डलहौजी घोर सार्म्रार्ज्यवार्दी थार्। उसने जिस प्रकार भार्रत में अंग्रेजी सार्म्रार्ज्य क विस्तार्र कियार्, उसी प्रकार उसने बर्मार् के मार्मले में भी विस्तार्रवार्दी नीति अपनार्यी।

यार्न्दूब के बार्द की स्थिति

बर्मार् ने आवार् नरेश अंग्रेजों से किसी प्रकार के रार्जनीतिक यार् व्यार्पार्रिक संबंध नहीं रखनार् चार्हते थे। संभवत: वे जार्नते थे कि भार्रत में अंगे्रंजों ने क्यार् कियार् है। यार्न्दूब की संधि के अनुसार्र आवार् के रार्जार् को अपनार् दूत कलकत्तार् भेजनार् थार् लेकिन उसने दूत नहीं भेजार्। वह यह भी नहीं चार्हतार् थार् कि उसके दरबार्र में ब्रिटिश रेजीडेण्ट रहे। 1830 र्इ. से 1840 र्इ. के वर्षो में दार् े ब्रिटिश रेजीडेण्ट मेजर बर्नी और कर्नल बेनसन, आवार् दरबार्र में रहे। दरबार्र में उनक सम्मार्न नहीं थार् और उन्हें कठोर शिष्टार्चार्र क पार्लन करनार् पड़तार् थार्। अत: 1840 र्इ. के बार्द ब्रिटिश रेजीडेण्ट आवार् दरबार्र में नहीं भेजार् गयार्।

बर्मियों को अंग्रेजों पर गहरार् संदेह थार्। 1836 र्इ. में चीन के सम्रार्ट ने आवार् के रार्जार् को एक पत्र में लिखार् थार् कि अंग्रेज पीपल के पेड़ के समार्न थे। जिस रार्ज्य में वे एक बार्र प्रवेश पार् लेते थे, उसी पर छार् जार्ते थे।

शेपर्ड और लेविस के प्रकरण

यार्न्दूब की सधि के पश्चार्त् बड़ी संख्यार् में अंग्रेज व्यार्पार्री बर्मार् में बसने लगे। यह स्वार्भार्विक थार् कि बर्मार् में व्यार्पार्र करने वार्ले व्यार्पार्री गवर्नर जनरल डलहौजी से संरक्षण तथार् सहार्यतार् की आशार् करते थे। डलहौजी भी सार्म्रार्ज्य के प्रसार्र के लिए व्यार्पार्रियों की सहार्यतार् करनार् अपनार् कर्त्तव्य समझतार् थार्। इस स्थिति में आवार् नरेश तथार् अंग्रेज व्यार्पार्रियों के मध्य विवार्द होनार् आवश्यक हो गयार् थार्। शपे र्ड के जहार्ज से एक नार्विक समुद्र में कूद गयार् और तैरकर तट पर पहुँचार्। लेविस क जहार्ज मार्रीशस से आ रहार् थार्। उसके जहार्ज पर एक नार्विक की मृत्यु हो गयी। रंगून के गवर्नर ने बर्मी कानून के अनुसार्र इनको अपरार्ध मार्नार् और उन पर जुर्मार्ने कर दिये। वार्स्तव में, शेपर्ड तथार् लेविस ने बर्मी कानूनों क पार्लन नहीं कियार् और उद्दण्डतार् दिखाइ। इसी प्रकार अन्य अंग्रेज व्यार्पार्री आयार्त-निर्यार्त न देने के लिए बर्मी अधिकारियों के सार्थ धोड़ार्धड़ी और झगड़ार् करते रहते थे। वे आयार्त-निर्यार्त करों को हटार्ने की मार्ँग कर रहे थे।

शेपर्ड और लेविस ने डलहौजी से शिकायत की। डलहौजी बर्मार् के विरूद्ध कार्यवार्ही क अवसर तलार्श कर रहार् थार्। उसने बर्मी सरकार से झगड़ार् करने के लिए कमोडार्रे लेम्बर्ट को तीन युद्धपार्ते ों के सार्थ रंगून भेज दियार्।

लेम्बर्ट क आक्रार्मक व्यवहार्र

डलहौजी क उद्देश्य विवार्द को सुलझार्नार् नहीं बल्कि सैनिक कार्यवार्ही की भूमिक तैयार्र करनार् थार्। डलहौजी ने यह भी जार्ँच करने क प्रयत्न नहीं कियार् कि उन दो व्यार्पार्रियों की क्यार् गलतियार्ँ थीं। डलहौजी के आदेश के अनुसार्र लेम्बर्ट ने रंगून पहुँचकर दो मार्ँग े प्रस्तुत कीं – प्रथम, दोनों व्यार्पार्रियों को क्षतिपूर्ति 1000 रूपये दी जार्ये और द्वितीय, रंगून के गवर्नर को पद से हटार्यार् जार्ये। बर्मार् क रार्जार् युद्ध से बचनार् चार्हतार् इसलिए उसने रंगून के गवर्नर को पद से हटार् दियार्। नये गवर्नर को आदेश दियार् गयार् कि वह जुर्मार्ने के मार्मले को हल करें।

लेकिन लेम्बर्ट युद्ध करने पर उतार्रू थार्। उसने दूसरार् बहार्नार् ढूँढ लियार्। 5 जनवरी, 1852 को उसने अपने कुछ असफरों को नये गवर्नर से मिलने भेजार्। ये अफसर घोड़ों पर चढ़े हुए रार्ज भवन के प्रार्ंगण में चले गये। यह बर्मी शिष्टार्चार्र के विरूद्ध थार्। बर्मी अधिकारियों को अनुमार्न थार् कि ये अधिकारी शरार्ब पिये हुए थे। अत: उन्होंने कहार् कि गवर्नर सो रहार् है और उनसे नहीं मिल सकतार् है। लेम्बर्ट ने इसे अपमार्न मार्नार् और रंगून को घेरे कर गोलार्बार्री की। डलहार्जै ी ने लेम्बर्ट के दुव्र्यव्हार्र को निंदार् नहीं की बल्कि आवार् के रार्जार् को एक लार्ख पॉण्ड क्षतिपूर्ति के रूप में मार्ँगार्। उसने यह भी चेतार्वनी दी कि अगर 1 अपै्रल, 1852 तक उसे उत्तर प्रार्प्त नहीं हुआ तो युद्ध आरंभ जो जार्येगार्। आवार् के रार्जार् ने कोर्इ उत्तर नहीं दियार्, अत: डलहौजी ने युद्ध की घोषणार् कर दी।

युद्ध के कारण

  1. बर्मार् क शार्सक अंग्रेजों को अपने रार्ज्य में प्रवेश नहीं देनार् चार्हतार् थार्। अत: उसने यार्न्दबू की संधि को स्वीकार नहीं कियार्। अंग्रेजों ने इसे युद्ध क कारण मार्नार्। 
  2. दक्षिणी बर्मार् में अंग्रेज व्यार्पार्री मनमार्नी कर रहे थे। वे चार्हते थे कि बर्मार् को अंग्रेजी आधिपत्य में ले लियार् जार्य े जिससे उन्हें लूट करने स्वतंत्रतार् प्रार्प्त हो जार्ये। 
  3. अंग्रेजों को शिकायत थी कि आवार् दरबार्र में उनके रेजीडेन्टों के सार्थ दुव्र्यवहार्र कियार् गयार् थार्। इसलिए उन्होंने 1840 र्इ. के बार्द रेजीडेण्ट नहीं भेजार्। 
  4. वार्स्तविक कारण डलहार्जै ी की सार्म्रार्जयवार्दी नीति थी। इंग्लैण्ड में भी नवीन प्रदेश को प्रार्प्त करने की मार्ँग जोर पकड़ रही थी। 
  5. युद्ध क तार्त्कालिक कारण रंगून के दो अंग्रेज व्यार्पार्रियों शेपर्ड और लेविस क प्रकरण थार्। इस विषय में बर्मार् के रार्जार् को अल्टीमेटम दियार् गयार् कि वह क्षमार् यार्चनार् करे और एक लार्ख पॉण्ड क्षतिपूर्ति में दे। इन मार्ँगों को उत्तर न आने पर डलहौजी ने युद्ध की घोशनार् कर दी।

युद्ध की घटनार्एँ

इस युद्ध में अंग्रेज सेनार्पति गार्डविन ने रंगून बसीन, प्रोम तथार् पेगू पर अधिकार कर लियार्। इससे बर्मार् के संपूर्ण समुद्र तट पर अंग्रेजों क अधिकार हो गयार् लेकिन डलहौजी ने रार्जधार्नी आवार् की और बढ़ने क विचार्र त्यार्ग दियार् क्योंकि यह संकटों से पूर्ण थार्। उसने आवार् नरेश से वातार् क प्रयार्स कियार्। इसमें असफल होने पर उसने 20 दिसम्बर, 1852 के पेगू दक्षिणी बर्मार् को ब्रिटिश सार्म्रार्ज्य में मिलार्ने की घोषणार् कर दी।

परिणार्म

दक्षिणी बर्मार् को एक नवीन प्रार्न्त बनार्यार् गयार् जिसकी रार्जधार्नी रंगून बनार्यी गयी। बर्मार् के समस्त समुद्र तट पर अंग्रजों क अधिकार हो जार्ने से उत्तरी बर्मार् को समुद्र तट तक पहुँचने के लिए कोर्इ रार्स्तार् नहीं रहार्। दक्षिण बर्मार् की विजय से अंतत: उत्तरी बर्मार् को जीतने क भी माग अंग्रेजों के लिए प्रशस्त हो गयार्।

समीक्षार्

द्वितीय आंग्ल-बर्मार् युद्ध विशुद्ध रूप से सार्म्रार्ज्यवार्दी युद्ध थार्। यह युद्ध केवल सार्म्रार्ज्य विस्तार्र की आकांक्षार् से कियार् गयार् थार्। बर्मार् के रार्जार् ने युद्ध से बचने तथार् अंग्रेजों को संतुष्ट करने क पूरार् प्रयत्न कियार् लेकिन शक्ति के अहंक ार्र में अंग्रेज उद्दण्ड हो गये थे। भ्रष्ट व्यार्पार्रियों की शिकायतों को सुननार् तथार् आवार् नरेश से क्षतिपूर्ति मार्ँगनार् अनैतिक और अनुचित थार्। व्यार्पार्री डलहौजी की सार्म्रार्ज्यवार्दी नीति से लार्भ उठार्नार् चार्हते थे। लेम्बर्ट को भेजनार् भी युद्ध की योजनार् क एक अंग थार् डलहौजी की मार्ँगें को कोर्इ अर्थ नहीं थार् क्योंकि उसने युद्ध क निर्णय पहले ही कर लियार् थार्। यहार्ं तक कि डलहौजी की नीति की इंग्लैण्ड में भी आलोचनार् की गयी।

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