अस्तित्ववार्द क अर्थ, परिभार्षार्, मार्न्यतार्ए, महत्त्व एवं कमियार्

अस्तित्ववार्द बीसवीं सदी क दर्शन है हार्लार्ंकि यह संज्ञार्न में काफी
पहले आ गयार् थार्। अस्तित्ववार्द से हमार्रार् परिचय सार्हित्यिक आंदोलन के रूप
में होतार् है। अस्तित्ववार्द में सिद्धार्ंत व विचार्र की अपेक्षार् व्यक्ति के अस्तित्व को
महत्व दियार् गयार्। वह उन सभी मार्न्यतार्ओं, सिद्धार्ंतों व संस्थार्ओं क विरोध
करतार् है जो मार्नवीय गरिमार् व उसके अस्तित्व को गौण बनार्ते हैं। अस्तित्व,
मार्नवीय गरिमार्, कर्म, सत्य, दु:ख, वेदनार् व निरार्शार् इत्यार्दि को महत्त्व देने वार्लार्
यह दर्शन अपनार् महत्व रखतार् है।

अस्तित्ववार्द क अर्थ एवं परिभार्षार्


शब्दकोश में अस्तित्व क अर्थ मार्नार् गयार् है-
‘सत्तार् का
भार्व, विद्यमार्नतार् होनार्, मौजूदगी।’डॉ0 गणपति चंद्र गुप्त अस्तित्ववार्द को परिभार्षित करते हुए लिखते हैं-
‘‘जब उन्नीसवीं शतार्ब्दी में विभिन्न प्रकार के आविष्कारों एवं सिद्धार्ंतों के प्रचलन
के कारण मार्नव जीवन पर वैज्ञार्निकतार् एवं सार्मार्जिकतार् क प्रभार्व अधिक बढ़ने
लगार्, जिसके सम्मुख व्यक्ति की वैयक्तिकतार् एवं स्वतंत्रतार् उपेक्षित होने लगी,
तो उसकी प्रतिक्रियार् स्वरूप एक ऐसे वार्द क विकास हुआ, जो कि वैयक्तिक
स्वतंत्रतार् को सर्वार्धिक महत्त्व देतार् हुआ वैज्ञार्निकतार् एवं सार्मार्जिकतार् क तीव्र
विरोध करतार् है। यही वार्द दर्शन एवं कलार् के क्षेत्र में अस्तित्ववार्द के नार्म से
प्रसिद्ध है।’’

गुप्त जी ने अस्तित्ववार्द को वैयक्तिक स्वतंत्रतार् क प्रबल समर्थक और
व्यक्ति को गौण बनार्ने के कारण विज्ञार्न व सार्मार्जिकतार् क विरोधी मार्नार् है।
डॉ0 नगेन्द्र ने अस्तित्ववार्द को दाशनिक दृष्टिकोण क प्रतीक मार्नार् है
जो उन सभी परंपरार्गत, तर्क संगत मार्न्यतार्ओं, सिद्धार्ंतों व विचार्रों क विरोध
करतार् है जिससे मार्नव की सत्तार् व उसकी समस्यार् की उपेक्षार् हुई है।
अस्तित्ववार्द को परिभार्षित करते हुए वह लिखते हैं- ‘‘अस्तित्ववार्द दृष्टिकोण है,
वस्तुत: उन परंपरार्गत तर्क संगत, दाशनिक मतवार्दों के विरूद्ध एक विद्रोह है
जो विचार्रों अथवार् पदाथ-जगत की तर्कसंगत व्यार्ख्यार् करते हैं तथार् मार्नवीय
सत्तार् की समस्यार् की उपेक्षार् करते हैं। वह एक तर्कसंगत दाशनिक मतवार्द की
अपेक्षार् एक दाशनिक दृष्टिकोण क प्रतीक अधिक है।’’

सात्र ने अस्तित्ववार्द को मार्नववार्द मार्नार्। उनक मार्ननार् थार् कि मनुष्य
स्वयं क निर्मार्तार् है। वह जैसार् स्वयं को बनार्तार् है उसके अतिरिक्त वह कुछ नहीं
है। ‘अस्तित्ववार्द और मार्नववार्द’ में वह लिखते हैं- ‘‘सीधी बार्त यह है कि मनुष्य
है। वह अपने बार्रे में जैसार् सोचतार् है, वैसार् नहीं होतार्। बल्कि वैसार् होतार् है, जैसार्
वह संकल्प करतार् है, अपने होने के बार्द ही वह अपने बार्रे में सोचतार् है- वैसे ही
अपने अस्तित्व की ओर बढ़ने के बार्द ही वह अपने बार्रे में संकल्प करतार् है।
मनुष्य इसके अतिरिक्त कुछ भी नही है जैसार् खुद को बनार्तार् है कि वह स्वयं
क निर्मार्ण करतार् है। यही अस्तित्ववार्द क पहलार् सिद्धार्ंत है।’’


प्रभार् खेतार्न अस्तित्ववार्द को परिभार्षित करते हुए लिखती हैं-
‘‘अस्तित्व क अर्थ हुआ सतत प्रकट होते रहनार्, निरंतर आविर्भार्वित होते रहनार् और
अनुभूति के सार्थ उभरते रहनार्। इस अर्थ में केवल आदमी ही अस्तित्ववार्न होतार्
है और केवल आदमी को ही सतत अनुभूति होती रहती है कि वह अपने आप से
बार्हर आ रहार् है और अपनी परिस्थितियों क अतिक्रमण कर रहार् है। अत: इस
विचार्र के केंद्र में व्यक्ति स्वयं है।’’ प्रभार् खेतार्न अस्तित्व क अर्थ सतत प्रकट
होने के रूप में स्वीकारती हैं तथार् व्यक्ति की सत्तार् को ही अस्तित्ववार्न मार्नती
हैं।

अस्तित्ववार्द की पृष्ठभूमि

अस्तित्ववार्द के उदय में अनेक कारण व परिस्थितियार्ँ
जिम्मेदार्र थी। जिन्होंने मार्नव अस्तित्व व उसकी स्वतंत्रतार् की उपेक्षार् की थी।
अस्तित्ववार्द व्यक्ति के अस्तित्व व उसकी खोर्इ हुर्इ गरिमार् की खोज करने वार्लार्
दर्शन है।यूरोप क पूर्ववर्ती दर्शन, फ्रार्ंसीसी क्रार्ंति (1789-1799), रूसी क्रार्ंति
(1917), औद्योगिक क्रार्ंति (18-19वीं शतार्ब्दी), विज्ञार्न व तकनीक क बढ़तार्
वर्चस्व, दो-दो विश्वयुद्धों (1914-1918, 1939-1945) की विभीषिका, तार्नार्शार्ही,
पूँजीवार्द, सार्म्रार्ज्यवार्द, आदर्शवार्द, बौद्धिकतार् इत्यार्दि कारण के रूप में उपस्थित
रहे।

प्रार्चीन ग्रीक दर्शन में प्लेटो, अरस्तू व सुकरार्त क नार्म महत्वपूर्ण रहार्
है। प्लेटो ने सार्र को महत्वपूर्ण मार्नार् इसके सार्थ ही उन्होंने आदर्श रार्ज्य की
परिकल्पनार् कर रार्ज्य के महत्व को भी प्रतिपार्दित कियार्। जिसमें व्यक्ति की
उपेक्षार् हुई।

सुकरार्त क ‘स्वयं को जार्नो’ व्यक्ति की महत्तार् को अवश्य प्रतिपार्दित
करतार् है तथार् अस्तित्ववार्दियों के निकट जार्न पड़तार् है।
प्रार्चीन काल में मार्न्यतार् रही कि सर्वप्रथम वस्तु क रूप ईश्वर द्वार्रार्
परिकल्पित कियार् गयार् तत्पश्चार्त् वस्तु अस्तित्व में आई। मध्यकाल में सार्र को
व्यक्ति से अधिक महत्व दियार् गयार् जिसकी अनुपस्थिति में वस्तु को निरर्थक
मार्नार् गयार्। हार्लार्ंकि संत आगार्स्टार्इन व कांट इत्यार्दि क नार्म महत्वपूर्ण है जो
बौद्धिकतार् की उपेक्षार् करते हैं इनके विचार्र भी अस्तित्ववार्द के निकट दिखार्ई
पड़ते हैं।

हीगेल व्यक्ति को तो महत्व देतार् है मगर बौद्धिकतार् के प्रति विशेष आग्रह
अस्तित्ववार्दियों को उसक विरोध करने पर मजबूर करतार् है। देकार्त क प्रसिद्ध
वार्क्य ‘मैं सोचतार् हूँ इसलिए मैं हूँ’ व्यक्ति से पहले चिंतन को ही महत्वपूर्ण
मार्नतार् है। यद्यपि यहीं से अस्तित्ववार्द क आरंभ भी मार्नार् गयार् है मगर
अस्तित्ववार्दियों क मार्ननार् थार् कि अस्तित्व पहले है चिंतन, विचार्र यार् सिद्धार्ंत
बार्द में हैं इसलिए वह ‘मैं हूँ, इसलिए मैं सोचतार् हूँ’ के रूप में अपनी बार्त
कहनार् चार्हते हैं।

डाविन क ‘योग्यतम की उत्तर जीवितार्’ क सिद्धार्ंत मार्नव जीवन के
संघर्ष की बार्त करतार् है जो योग्य होगार् वही जीवित रह पार्एगार्, न्यूटन के
भौतिकी के सिद्धार्ंत आदि भी कारण के रूप में मौजूद रहे।
फ्रार्ंस में सार्मंतवार्द, रार्जतंत्र व दार्सतार् के विरोध में रार्ज्यक्रार्ंति हुई
जिससे समार्नतार्, बंधुत्व, स्वतंत्रतार् व लोकतंत्र की स्थार्पनार् हुई, रूसी क्रार्ंति में
भी रार्जशार्ही क अंत हुआ मजदूरों व किसार्नों की सत्तार् स्थार्पित हुर्इ। यूरोप
क पुनर्जार्गरण धामिक बंधनों व अंधविश्वार्सों से व्यक्ति को मुक्त करार्ने में
सफल हुआ।

तर्क, बुद्धि, जिज्ञार्सार् व विवेक को महत्व दियार् गयार्।
औद्योगिक क्रार्ंति से नए-नए उद्योगों की स्थार्पनार् हुई, पूंजीवार्दी
सार्म्रार्ज्यवार्द को बल मिलार्, उपनिवेश स्थार्पित हुए, विज्ञार्न व तकनीक का
विकास हुआ, नगरीकरण हुआ लोग गार्ँव से शहर की ओर पलार्यन करने लगे,
सार्मार्जिक विसंगतियों व अपरार्ध में बढ़ोत्तरी हुई। शोषण, अन्यार्य की स्थिति में
भीी बढ़ोत्तरी हुई। मार्क्र्सवार्द व मनोविश्लेषणवार्द जैसी विचार्रधार्रार्ओं क उदय
हुआ।

सर्वार्धिक भयार्वह स्थिति थी दो-दो विश्वयुद्धों की विभीषिका। इन युद्धों
में करोड़ो लोग मार्रे गए। सत्तार् के क्षुद्र स्वाथ हेतु मनुष्य क कीट-पतंगों की
भार्ँति मार्रार् जार्नार् बड़ार् त्रार्सदीपूर्ण थार्। मार्नव मूल्यों को अपार्र क्षति पहुँची। लोगों
में नैरार्श्य, दीनतार्, अवशतार्, पीड़ार् व कुंठार् घर कर गई। ईश्वर, धर्म व मार्नवतार्
से उसक विश्वार्स उठने लगार्।

विज्ञार्न व तकनीक के विकास ने भी मार्नवीय मूल्यों को विघटित कियार्।
एक ओर इन्होंने मार्नव जीवन को सुखी बनार्यार्, ब्रह्मार्ंड व प्रकृति के अनेक
रहस्यों से पर्दार् उठार्यार्, धर्म व ईश्वर को तर्क की कसौटी पर कसकर मनुष्य को
महत्व प्रदार्न कियार् तो दूसरी ओर मार्नवीय मूल्यों, पर्यार्वरण, प्रकृति को भी
सर्वार्धिक क्षति पहुंचार्ई तथार् नए-नए युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार्र की।
इन सभी परिस्थितियों, मार्न्यतार्ओं, सिद्धार्ंतों व दर्शन में मार्नव की घोर
उपेक्षार् हुई। अस्तित्ववार्द उन सभी धामिक, रार्जनीतिक, सार्मार्जिक, ऐतिहार्सिक,
वैज्ञार्निक, आध्यार्त्मिक व नियतिवार्दी सिद्धार्ंतों व मार्न्यतार्ओं क विरोध करतार् है
जो व्यक्ति को गौण बनार्ते हैं। अस्तित्ववार्द में सुख की भार्वनार् को निरर्थक
मार्नते हुए दु:ख को जीवन की उपलब्धि स्वीकार कियार् गयार्।

विज्ञार्न, परंपरार्,बौद्धिकतार्, इत्यार्दि क विरोध अस्तित्ववार्द में दिखाइ पड़तार् है। पहले रार्ज्य, धर्म
व ईश्वर को महत्व दियार् जार्तार् रहार् थार् मनुष्य को इनके संदर्भ में ही विश्लेषित
कियार् गयार्। रार्ज्य, सत्तार् व सार्मंतवार्द क बोलबार्लार् रहार्। मनुष्य दमित व
शोषित हुआ जिसक तीव्र विरोध अस्तित्ववार्द ने कियार्। अस्तित्ववार्दियों ने
संसार्र को निरर्थक व निष्प्रयोजन मार्नार्। उनके अनुसार्र मनुष्य अस्तित्व के
मार्ध्यम से अपनी अर्थवत्तार् को प्रार्प्त कर सकतार् है तथार् अपने जीवन के उद्देश्य
को निश्चित कर सकतार् है। यद्यपि अस्तित्ववार्द क प्रवर्तन जर्मनी में 19वीं सदी
में ही हो गयार् थार् मगर यूरोप में इसकी सशक्त उपस्थिति सन् 1940 व 1950
के दशक में दिखलार्ई पड़ती है।

अस्तित्ववार्द की मार्न्यतार् है कि सर्वप्रथम व्यक्ति क अस्तित्व है फिर
उसक सार्र है। अगर वस्तु ही नहीं होगी तो सार्र कैसे होगार्? व्यक्ति में ‘मैं’ की
स्थिति को आवश्यक मार्नार्। व्यक्ति की स्वतंत्रतार् को उन्होंने महत्वपूर्ण मार्नार्।
बार्ह्य परिस्थितियों, मार्न्यतार्ओं यार् वस्तुओं को उस पर थोपार् नहीं जार्नार् चार्हिए
उसे अपने जीवन क चुनार्व स्वयं करनार् है अपने विषय में निर्णय लेनार् होगार्।
उन्होंंने उस व्यक्ति को महत्वपूर्ण मार्नार् जो किसी के काम आतार् हो। साथक
कर्म द्वार्रार् ही वह अपने आप को अभिव्यक्त कर पार्येगार्।

कृष्णदत्त पार्लीवार्ल ने अस्तित्ववार्द के उदय की परिस्थितियों पर विचार्र
करते हुए इसे महार्युद्धों की विभीषक से उत्पन्न मार्नार् है- ‘‘अस्तित्ववार्द का
उदय और प्रसार्र क महत्वपूर्ण कारण दो विश्वयुद्धों की विभीषिक से उत्पन्न
आर्थिक-रार्जनीतिक, सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक विघटन, विदू्रपतार्, विसंगति
व्यक्तिबोध, अकेलार्पन तथार् मृत्युबोध की भार्वनार् में निहित है… महार्युद्ध के इन
दिनों में मार्नव ने त्रार्स और पूंजीवार्दी महत्वकांक्षार्ओं क जो पतनशील रूप देखार्
है- अस्तित्ववार्द इसी चीख एवं करार्ह से जन्मार् दर्शन है।’’

अस्तित्ववार्द को दो वर्गों में विभक्त कियार् गयार् है-

ईश्वरवार्दीअस्तित्ववार्द एवं अनीश्वरवार्दी अस्तित्ववार्द

पहले प्रकार के अस्तित्ववार्द में ईश्वर की सत्तार् को स्वीकार कियार् गयार् है तथार् अनीश्वरवार्दी में ईश्वर की
सत्तार् को नकारार् गयार् है फिर भी सभी अस्तित्ववार्दी व्यक्ति को ही महत्वपूर्ण
मार्नते हैं।अस्तित्ववार्द भार्रतीय सार्ंख्य दर्शन के निकट मार्नार् गयार् है। भार्रतीय
सार्ंख्य दर्शन प्रकृति और मार्नव चेतनार् को महत्त्वपूर्ण मार्नतार् है वह ईश्वर को
नहीं मार्नतार्, समस्त क्रियार्कलार्प मनुष्य को बंधन मुक्त करार्ने के लिए किए जार्ते
हैं। अस्तित्ववार्द की स्वतंत्रतार् की अवधार्रणार् इससे मेल खार्ती प्रतीत होती है।
चावार्क दर्शन प्रत्यक्ष दर्शन पर आधार्रित है जो प्रत्यक्ष वस्तुओं की सत्तार्
को स्वीकारतार् है। ईश्वर, परलोक, आत्मार् व पुनर्जन्म में विश्वार्स नहीं करतार्।
उसे मूलत: सुखवार्दी दर्शन मार्नार् गयार् है। चावार्क से अस्तित्ववार्द के र्इश्वर
संबंधी विचार्र मेल खार्ते हैं। अस्तित्ववार्द में दु:ख को महत्व दियार् गयार् है।

भार्रतीय दर्शन क ‘नेति नेति’ भी अस्तित्ववार्द में ‘नथिंगनैस’ के रूप में
दिखलार्ई पड़तार् है। गीतार् के कर्मवार्द के सिद्धार्ंत की महत्तार् भी अपने में
विशिष्ट है। अस्तित्ववार्द भी कर्म के महत्व को स्वीकार करतार् है। बौद्ध दर्शन में
दु:खवार्द व अस्तित्ववार्द में दु:ख, पीड़ार् व वेदनार् क महत्व निकट जार्न पड़ते
हैं। बौद्ध दर्शन में निर्वार्ण द्वार्रार् दु:ख से मुक्ति प्रार्प्त की जार् सकती है। अरविन्द
दर्शन में अरार्जकतार् से मुक्ति के लिए अतिमार्नस व अतिमार्नव दोनों की स्थिति
को स्वीकार कियार् गयार् है जो नीत्शे के अतिमार्नव के निकट दिखार्ई पड़तार् है।
भार्रतीय दर्शन में आशार्वार्दी स्वर मिलतार् है। यहार्ँ मृत्यु के परे भी मुक्ति
यार् मोक्ष की मार्न्यतार् मृत्यु को महत्त्वपूर्ण बनार् देती है जबकि अस्तित्ववार्द में ऐसी
कोर्इ आशार् नहीं दिखार्ई पड़ती।

भार्रतीय दर्शन जहार्ँ आशार्वार्दी है वही अस्तित्ववार्द क स्वर निरार्शार्वार्दी
मार्नार् गयार् है। भार्रतीय दर्शन में भक्ति, योग, अध्यार्त्म, ईश्वर, मोक्ष के मार्ध्यम से
सार्त्विक जीवन व मुक्ति की बार्त की गई है जो जीवन से परे भी मुक्ति के रूप
में आशार् क दर्शन है। वही अस्तित्ववार्द मुख्यत: वर्तमार्न के दु:ख, निरार्शार्
अवसार्द की बार्त करतार् है मृत्यु मार्नव जीवन की संभार्वनार्ओं क अंत है उसकी
सीमार् है।

अस्तित्ववार्द के विचार्रक

अस्तित्ववार्द क आरंभ जर्मनी से मार्नार् जार्तार् हैं। इस
दर्शन को विकसित करने में सॉरेन कीर्केगाद, ग्रेबियल माशल, नीत्शे, माटिन
हेडेगर, कार्ल जैस्पर्स, अल्बेयर कामू व ज्यार्ं पार्ल सात्र क नार्म प्रमुख हैं इनका
संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

सार्रेन कीर्केगाद- कीर्केगाद को अस्तित्ववार्द क प्रवर्तक मार्नार् जार्तार् है।
डेनमाक में 5 मई सन् 1813 ई. में इनक जन्म हुआ। इन्होंने ईश्वर की सत्तार्
को मार्नार् है मगर कीर्केगाद ने श्रद्धार् को मनुष्य की आंतरिक वस्तु स्वीकार
कियार्। उन्होंने निरार्शार् को भी महत्त्व दियार्। इनके दर्शन में आत्मनिष्ठार् भी
विद्यमार्न है। मनुष्य के अकेलेपन को सबसे पहले इन्होंने ही अनुभव कियार्।
नीत्शे- नीत्शे ने अपने प्रसिद्ध वार्क्य ‘र्इश्वर की मृत्यु हो गयी है’ के द्वार्रार् नवीन
जीवन मूल्यों की अपेक्षार् की है। इन्हें अतर्कवार्दी दाशनिक भी कहार् गयार् है।
उन्होंने अतिमार्नव की कल्पनार् की जो समार्ज में पार्शविक वृत्तियों क दमन कर
मार्नवतार् को पुनस्र्थार्पित करे यार् मनुष्य को सबल बनार्ए। नार्जियो ने उनको
गलत अर्थ में ग्रहण कियार्।

व्यक्ति के दु:ख, संतोष क चित्रण, मृत्यु क स्वार्गत, समार्जवार्द व हीगेल
की मार्न्यतार्ओं क विरोध भी नीत्शे ने कियार्।
माटिन हेडेगर- वह स्वयं को अस्तित्ववार्दी नहीं मार्नते। उन्होंने मनुष्य क ही
ऐतिहार्सिक अस्तित्व मार्नार्। संत्रार्स, मृत्यु संबंधी चर्चार् व शून्य को महत्व प्रदार्न
कियार्। मृत्यु को वह अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी मार्नते हैं। उन्होंने व्यक्ति के सार्थ
उसकी भार्षार् व जगत को भी महत्व दियार्।
उन्होंने अस्तित्व क अर्थ संभार्वनार् से लियार्। चुनार्व की स्वतंत्रतार् और
इस स्वतंत्रतार् की पहचार्न को अस्तित्व क सार्र तत्व मार्नार्। हेडेगर को ‘जीवन
विद्यार् क दाशनिक’ कहार् जार्तार् है।

कार्ल जैस्पर्स

कार्ल जैस्पर्स को आधुनिक अस्तित्ववार्द क प्रवर्तक मार्नार् गयार्।
सार्थ ही उन्हें ‘तर्क क दाशनिक’ भी मार्नार् जार्तार् है। उन्होंने व्यक्ति के आंतरिक
अस्तित्व को ही स्वतंत्र रूप में स्वीकार कियार् है। मनुष्य को बौद्धिक, भौतिक व
ऐतिहार्सिक बंधनों में बंधार् हुआ मार्नार् तथार् कर्म को महत्व दियार्।
ग्रैबियल मासल- इनक ईश्वर में विश्वार्स थार्। अस्तित्व व आधिपत्य के बीच
द्वंद्व दर्शन क मूल आधार्र रहार् इन्होंने आशार् को महत्व दियार्। चुनौती, निर्णय,
उत्तरदार्यित्व व मूल्यार्ंकन को मार्नव अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण मार्नार्।

अल्बेयर कामू

कामू ने स्वतंत्रतार्, भार्ईचार्रे व सौहाद को महत्त्व दियार्। उन्हें
विसंगति क दाशनिक मार्नार् गयार्। विसंगति से बचने के लिए विद्रोह जरूरी
मार्नार् है। कामू ने मार्क्र्सवार्द क समर्थन कियार्। वह मार्नवीय मूल्यों, नैतिक
मूल्यों, कर्म में विश्वार्स करते थे। इतिहार्स को सृजित करने की बार्त भी वह
स्वीकारते हैं। अलगार्व व तार्नार्शार्ही क उन्होंने विरोध कियार्। उन्हें 1957 में
नोबेल पुरस्कार मिलार्। प्रभार् खेतार्न ने उनके अस्तित्ववार्द को मार्नववार्द कहार् है।
मार्नवीय गरिमार् को वह श्रेष्ठ मार्नते थे। अहिंसार्, शार्ंति की बार्त भी कामू ने
उठार्ई है।

ज्यार्ं पार्ल सात्र

ज्यार्ं पार्ल सात्र क नार्म अस्तित्ववार्दियों में सर्वार्धिक महत्त्वपूर्ण
है। सात्र क जन्म पेरिस में 1905 ई. में हुआ थार्। सात्र अस्तित्व को सार्र से
पहले मार्नते हैं। स्वतंत्रतार्, कर्म को महत्तार् प्रदार्न की। उनक मार्ननार् थार् कि
व्यक्ति वही है जैसार् वह स्वयं को बनार्तार् है। मृत्यु को सभी संभार्वनार्ओं क अंत
मार्नार्। सात् रईश्वर को अस्वीकार करते हैं उनक मार्ननार् थार् कि ईश्वर के होने
न होने से कोई फर्क नहीं पड़तार्। कामू की तरह सात्र भी मार्क्र्सवार्द के समर्थक
थे। इसके सार्थ ही मनोविश्लेषण को भी महत्व दियार्। बैडफेथ क वह विरोध
करते हैं।

इसके अतिरिक्त निरार्शार्, अकेलेपन, त्रार्सदी, अलगार्व, बार्जार्रवार्द, संवेग,
चेतनार् व इगो को उन्होंने विश्लेषित कियार्।
सात्र ने नोबेल पुरस्कार लेने से अस्वीकार कर दियार् थार्। जनहित के
समर्थक इस लेखक ने नोबेल पुरस्कार को बुर्जुवार्वार्दी संस्थार् क ही रूप मार्नार्।
दॉस्तोवस्की- दॉस्तोवस्की में स्वतंत्रतार्, अकेलार्पन व व्यैक्तिकतार् देखने को
मिलती है। वह समार्जवार्द के समर्थक थे तथार् क्रार्ंति को ‘अरार्जकतार्’ के समार्न
मार्नार्।

फ्रेंज काफ्का

सन् 1883 र्इ0 में प्रार्ग में इनक जन्म हुआ। इनक सार्हित्य
महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रतार्, संघर्ष, अलगार्व व प्रेम क चित्रण इनके सार्हित्य में हुआ
है। ये अलगार्व क विरोध करते हैं।
इसके अलार्वार् हुर्सेल, बर्दिएफ आदि क भी अस्तित्ववार्दी चिंतकों में
महत्त्वपूर्ण स्थार्न है।

अस्तित्ववार्द की मार्न्यतार्एं

व्यक्ति के अस्तित्व को सर्वार्धिक महत्व देने वार्ले
दर्शन अस्तित्ववार्द की सभी मार्न्यतार्एं व्यक्ति के अस्तित्व, उसकी स्थिति व
गरिमार् को ही अर्थवत्तार् प्रदार्न करने वार्ली हैं। अस्तित्ववार्द की प्रमुख मार्न्यतार्एं
इस प्रकार हैं-

अस्तित्व क महत्व

अस्तित्ववार्दियों ने उन सभी ज्ञार्न-विज्ञार्न, दर्शन व
सिद्धार्ंतों क तीव्र विरोध कियार् जिन्होंने व्यक्ति के अस्तित्व को गौण मार्नकर
उपेक्षित कियार् थार्। अस्तित्ववार्द व्यक्ति के अस्तित्व को प्रमुख मार्नतार् है पहले
मनुष्य है उसक सार्र, चिंतन व सिद्धार्ंत सब बार्द में है।
व्यैक्तिक स्वतंत्रतार्- सभी अस्तित्ववार्दियों ने व्यक्ति की स्वतंत्रतार् को सर्वार्धिक
महत्वपूर्ण मार्नार्। उन्होंने मार्नार् कि बार्ºय परिस्थितियों और मार्न्यतार्ओं को व्यक्ति
पर थोपनार् नहीं चार्हिए वह वरण करने के लिए स्वतंत्र है सार्थ ही वरण किए
गए के प्रति उत्तरदार्यी भी, स्वतंत्रतार् तभी तक साथक है जब तक वह किसी
की स्वतंत्रतार् में अवरोधक न बने।


सात्र स्वतंत्रतार् को परिभार्षित करते हुए लिखते हैं
– ‘‘सार्र तत्व से पहले
अस्तित्व है। यह मार्नवीय स्वतंत्रतार् ही है, जो आदमी की आदमियत को संभव
करती है। अत: हम जिसे स्वतंत्रतार् कहते हैं, मार्नवीय वार्स्तविकतार् से अलग
नहीं।’’
स्वतंत्रतार् के सार्थ ही चुनार्व व निर्णय को भी महत्त्व दियार् गयार्। व्यक्ति
अपने जीवन में जो बननार् चार्हतार् है उसके लिए चुनार्व करे, निर्णय ले सार्थ ही
उसके उत्तरदार्यित्व को भी वहन करे तभी अपने अस्तित्व, गरिमार् व मार्नवतार् के
लिए कुछ कर पार्एगार्।

कर्म व सत्य को महत्त्व

अस्तित्ववार्द में कर्म व सत्य को भी महत्त्वपूर्ण मार्नार्।
कर्म के द्वार्रार् ही मनुष्य अपने स्वत्व को पार् सकतार् है। कर्मशील व्यक्ति को ही
अस्तित्ववार्दियों ने अस्तित्ववार्न मार्नार्। उनक मार्ननार् है कि परिवेशजन्य तनार्वों,
दबार्वों इत्यार्दि से कर्मशील रहकर ही मुक्ति संभव है। कर्म के सार्थ ही सत्य
को भी महत्व प्रदार्न कियार्।
निरार्शार्, कुंठार् व पीड़ार् बोध- इन्होंने निरार्शार् की स्थिति को भी स्वीकार कियार्
है। निरार्शार्, दु:ख, पीड़ार् की स्थिति में व्यक्ति अपने अस्तित्व की खोज कर
सकतार् है उसे साथक बनार् सकतार् है। अस्तित्ववार्दी बार्ºय की अपेक्षार् व्यक्ति के
आंतरिक पक्ष को महत्त्व देते हैं उसकी पीड़ार् कुंठार्, निरार्शार्, दु:ख की अभिव्यक्ति
अस्तित्ववार्द में हुर्इ है।

तनार्व, ऊब व व्यर्थतार्बोध-

अस्तित्ववार्द में तनार्व, ऊब व व्यर्थतार् बोध की
स्थिति भी स्वीकार की गर्इ है। औद्योगीकरण, मशीनीकरण ने इन स्थितियों को
उत्पन्न कियार् है। मनुष्य इनसे संघर्षरत है वह ‘सिफिसस’ की तरह निरर्थक श्रम
करतार् है जो व्यर्थतार् को बढ़ार्तार् है।
मृत्युबोध व शून्यतार्- अस्तित्ववार्दियों ने मृत्यु संबंधी विचार्र भी प्रस्तुत किए।
मृत्यु से शरीर क अंत होतार् है उसक अस्तित्व, उसकी स्वतंत्रतार् बची रहनी
चार्हिए। हेडेगर ने मृत्यु को अर्थपूर्ण जीवन की कुंजी कहार् है, नीत्शे मृत्यु का
स्वार्गत करते दिखाइ पड़ते हैं। वहीं सात्र मार्नव जीवन की संभार्वनार्ओं क अंत
मार्नते हुए भी इसे तथ्यपूर्ण मार्नते हैं।

शून्यतार् की स्थिति भी अस्तित्ववार्द में स्वीकार की गर्इ है। हेडेगर ने इसे
महत्वपूर्ण मार्नार्। सात्र ने ‘नथिंगनैस’ कहार् है। सार्थ ही इसे मार्नवीय अस्तित्व
क आधार्र भी मार्नार् है। चयन करने में यह सहार्यक होती है।
र्इश्वर संबंधी विचार्र- कुछ अस्तित्ववार्दी र्इश्वर की सत्तार् में विश्वार्स करते हैं
जैसे कीर्केगाद, मासल व जैस्पर्स इत्यार्दि। कुछ अस्तित्ववार्दी अनीश्वरवार्दी हैं।
सात्र क मार्ननार् है कि र्इश्वर के होने न होने से कोर्इ फर्क नहीं पड़तार् क्योंकि
अपने कार्य के प्रति मार्नव स्वयं जिम्मेदार्र है। नीत्शे क कहनार् ‘र्इश्वर की मृत्यु
हो गर्इ है’ नए मूल्यों की मार्ंग करतार् है।

दु:ख व संत्रार्स- दु:ख व पीड़ार् को अस्तित्ववार्दी जीवन की उपलब्धि मार्नते हैं।
दु:ख की घड़ी में ही मनुष्य स्वयं को खोज पार्एगार्। दु:ख, पीड़ार् व वेदनार् जितनी
अधिक होगी व्यक्ति की अनुभव की तीव्रतार् भी उतनी ही अधिक होगी।
समकालीन परिस्थितियार्ँ व्यक्ति के मन में भय को उत्पन्न करती हैं।
संत्रस्त व्यक्ति स्वयं को परिस्थितियों से घिरार् हुआ पार्तार् है। संत्रार्स की यह
भार्वनार् भी इनके यहार्ँ पाइ जार्ती है।

क्षण बोध-

अस्तित्ववार्द में क्षण को महत्व दियार् गयार् है। प्रत्येक क्षण अर्थपूर्ण है
जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व, स्वतंत्रतार् व अर्थवत्तार् को प्रार्प्त कर सकतार् है।
अजनबीपन, अलगार्व व एकाकीपन- विज्ञार्न व तकनीक क विकास,
औद्योगीकरण, नगरीकरण व मशीनीकरण ने मार्नव जीवन को यार्ंत्रिक बनार् दियार्
है। परिवेश व समार्ज से निर्वार्सित वह एक अजनबी की तरह जीवन यार्पन
करने को मजबूर है। परिवेश, समार्ज व संबंधों के इस अलगार्व ने उसको
एकाकी भी बनार् दियार् है। अस्तित्ववार्द इस पर भी प्रकाश डार्लतार् है।
विसंगति- कामू को विसंगति के दाशनिक के रूप में जार्नार् जार्तार् है। आधुनिक
जीवन विसंगति से जूझ रहार् है। विरोधार्भार्स जीवन को जटिल बनार्ते हैं।

अस्तित्ववार्द मार्नवीय अस्मितार् के लिए प्रयार्सरत रहतार् है। उसक उद्देश्य मार्नव
जीवन को अर्थवत्तार् प्रदार्न करनार् है। यार्ंत्रिकतार्, निरर्थकतार्, ऊब, अलगार्व,
अनिश्चिततार् व मृत्युबोध आदि परिस्थितियार्ं जीवन में विसंगति को पैदार् करती हैं।
बौद्धिकतार् एवं अति वैज्ञार्निकतार् क विरोध- चिंतन और विज्ञार्न दोनों में मनुष्य
की उपेक्षार् की स्थिति रही है। उसे वस्तु मार्न लिए जार्ने क अस्तित्ववार्द विरोध
करतार् है। इन बढ़ते वर्चस्व के सार्मने मनुष्य क अस्तित्व प्रार्य: गौण हो जार्तार् है
जिसे यह दर्शन स्वीकार नहीं करतार्।

अस्तित्ववार्दी दर्शन में केवल वे ही मार्न्यतार्एं यार् विचार्र स्वीकार्य हैं जो
मार्नव के अस्तित्व, अस्मितार् व गरिमार् की बार्त करते हैं। उसके अस्तित्व को
अर्थवत्तार् प्रदार्न कर साथक जीवन क दिशार् निर्देशन करने वार्ले हो। परंपरार्,
धर्म, ईश्वर, चिंतन, भार्ग्य, पूर्वजन्म इत्यार्दि पर उसे बहुत ज्यार्दार् विश्वार्स नहीं
क्योंकि यह सब मनुष्य की स्वतंत्रतार् में अवरोधक क कार्य करते हैं।
इस दर्शन के अनुसार्र मनुष्य ही सर्वार्धिक महत्वपूर्ण है वही मूल्यों और
अपने भार्ग्य क भी निर्मार्तार् है उसे जीवन में चुनार्व और निर्णय लेने चार्हिए।
साथक कर्म को जीवन क उद्देश्य बनार्ते हुए समस्त मार्नवतार् के हित में संलग्न
रहनार् चार्हिए। वह स्वयं के लिए ही नहीं वरन् समस्त मार्नव समुदार्य के लिए
निर्णय लेतार् है। कामू व सात्र मार्क्र्सवार्द क समर्थन भी इसीलिए करते हैं इसके
सार्थ ही मनोविश्लेषण को भी महत्व दियार् गयार् है।

अस्तित्ववार्द की कमियार्ँ

अस्तित्ववार्द को जहार्ँ एक ओर मार्नव मूल्यों को
प्रतिपार्दित करने के कारण मार्नववार्द की संज्ञार् दी गर्इ तो दूसरी ओर कुछ
आरोप भी अस्तित्ववार्द पर लगते रहे हैं।
अस्तित्ववार्द क स्वर निरार्शार्वार्दी मार्नार् गयार् जहार्ं दु:ख, पीड़ार्, संतार्प,
वेदनार् आदि जीवन की उपलब्धि हैं और संत्रार्स व विसंगति आदि मार्नव जीवन
क हिस्सार् जिससे मुक्त हो पार्नार् मुश्किल जार्न पड़तार् है। मृत्यु क भय जीवन
में निरार्शार् क संचार्र कर देतार् है।
इसके सार्थ ही ईश्वर की सत्तार्, बौद्धिकतार्, विज्ञार्न इत्यार्दि क नकार भी
मार्नव जीवन में विश्वार्स, विवेक व विकास की संभार्वनार्ओं को कम कर देतार् है।
स्वच्छंदतार्, भोगवार्द व अरार्जकतार् की स्थिति उत्पन्न हो जार्ती है।
रार्मविलार्स शर्मार् अस्तित्ववार्द में विसंगति की स्थिति मार्नते हैं।अस्तित्ववार्द में एक ओर तो आंतरिकतार् पर बल दियार् जार्तार् है तो वहीं दूसरी
ओर मूल्यों को महत्त्व दियार् गयार् है जिसक संबंध समार्ज से है।

इस विषय में
रार्मविलार्स शर्मार्
लिखते हैं- ‘‘अस्तित्ववार्द में एक तीव्र विसंगति है। वह केवल
आत्मगत सत्य को स्वीकार करतार् है, दूसरी ओर वह मूल्यों की बार्त करतार् है
जो स्वभार्वत: समार्जगत है। तर्कसंगत विचार्रक यार् तो मूल्यों को समार्जगत
मार्नकर मार्क्र्सवार्द की ओर बढ़ेगार् जैसार् सात्र ने कियार् यार् वह उन्हें पूर्ण स्वतंत्र
और निरपेक्ष रूप से आत्मगत मार्नकर मूल्य हीनतार् की ओर बढ़ेगार् जैसार् कि
ब्रिटेन, अमरीक और भार्रत के बहुत से परार्जयवार्दी ‘विद्रोही’ कर रहे हैं।’’
अस्तित्ववार्द को व्यक्तिवार्द, स्वाथवार्द, अहंकारवार्द, विद्रोह व उत्पार्ती
दर्शन के रूप में भी मार्नार् गयार् तथार् समस्त नकारार्त्मक क्रियार्कलार्पों व
आंदोलनों पर अस्तित्ववार्द क प्रभार्व मार्नार् गयार्। इसे निरार्शार् व असार्मार्जिकतार्
के संदर्भ में विश्लेषित कियार् गयार् जो समार्ज, ईश्वर, परंपरार्, विज्ञार्न व इतिहार्स
को नकारतार् है।


डॉ0 शिव प्रसार्द सिंह
ने अस्तित्ववार्द को महत्वपूर्ण मार्नते हुए इसे
प्रत्येक दर्शन क प्रस्थार्न बिंदु स्वीकार कियार् है- ‘‘अस्तित्ववार्द की सबसे बड़ी
देन यह है कि उसने आज के वार्तार्वरण में मनुष्य के अपने और समार्ज से हुए
अलगार्व को रेखार्ंकित कियार्। …..अस्तित्ववार्द इसी कारण प्रत्येक दर्शन का
प्रस्थार्न बिंदु बन जार्तार् है क्योंकि वह अस्तित्व दर्शन से संबंधित प्रश्नों को इस
ढंग से सार्मने रखतार् है कि पहले के समार्धार्न रद्दी और व्यर्थ लगने लगते हैं।’’9
इस प्रकार कमियों के बार्वजूद भी इसके महत्व को कम नहीं कियार् जार्
सकतार्। समकालीन परिस्थितियों के मध्य उपेक्षित व निस्संग मार्नवीय अस्तित्व
की खोज इसे उल्लेखनीय बनार्ती है।

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