असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न की ऐतिहार्सिक पृष्ठभूमि

महार्न् चिकित्सक हिपोक्रेट्स के बार्द ग्रीक तथार् रोमन चिकित्सक मनोरोगों के अध्ययन में उनके द्वार्रार् बतार्ये गये पथ क अनुकरण करते रहे। इस संबंध में मिस्र में काफी प्रगति हुयी एवं वहार्ँ के अनेक गिरजार्घरों एवं मंदिरों को आरोग्यशार्लार्ओं में परिवर्तित कर दियार् गयार् और वहार्ँ के शार्ंत एवं स्वस्थ वार्तार्वरण में मनोरोगियों को रखने की विशेष रूप से व्यवस्थार् की गर्इ। इन आरोग्यशार्लार्ओं की विशेष बार्त यह थी कि इनमें मनोरोगियों को विभिन्न प्रकार की सर्जनार्त्मक एवं मनोरंजन करने वार्ली गतिविधियों जैसे नृत्य करनार्, गार्नार्-बजार्नार्, बगीचे में घूमनार् इत्यार्दि में शार्मिल कियार् जार्तार् थार्। इस समय मनोरोगों के उपचार्र में कुछ अन्य नयी तकनीकों को भी शार्मिल कियार् गयार्। जैसे व्यार्यार्म, जल चिकित्सार्, अल्पभोजन तथार् कुछ विशिष्ट रोगों में शरीर से रक्त बहार् देनार्, यार्ंत्रिक दबार्व इत्यार्दि।

मनोरोगों एवं असार्मार्न्य व्यवहार्र के अध्ययन में अनेक रोमन चिकित्सकों जैसे- एस्कलेपियड्स, सिसेरो, ऐरेटियस, गेलेन इत्यार्दि के द्वार्रार् भी महत्वपूर्ण योगदार्न दयार् गयार्। एस्कलेपियड्स सबसे पहले चिकित्सक थे, जिन्होंने तीव्र (Acute) एवं चिरकालिक (Chronic) मनोरोगों के बीच तथार् भ्रम (illusion) विभ्रम (Hallucination) एवं व्यार्मोह (Delusion) के बीच अन्तर स्पष्ट कियार्। इसी प्रकार सिसेरो ने सर्वप्रथम यह बतार्यार् कि मार्नसिक रोगों की उत्पत्ति में सार्वेमिक कारकों की भूमिक सर्वार्धिक होती है। लगभग एक शतार्ब्दी के उपरार्न्त ऐरेत्यिस द्वार्रार् सबसे पहले यह विचार्र प्रतिपार्दित कियार् गयार् कि अवसार्द एवं उन्मार्द एक ही रोग की दो अलग-अलग मनोवैज्ञार्निक अभिव्यक्ति है। ऐरेटियस क विचार्र थार् कि जो लोग सुस्त तथार् गंभी स्वभार्व के होते हैं उनमें विषार्दग्रस्त होने की संभार्वनार् अधिक होती है एवं जो व्यक्ति अधिक चिड़चिड़े एवं आक्रोशी प्रकृति के होते हैं, वे प्रार्य: उन्मार्दग्रस्त हो बतो हैं। प्रसिद्ध चिकित्सक गेलेन जो मूलत: ग्रीक थे तथार् बार्द में जार्कर रोग में बस गये थे उन्होंने मनोरोगों के कारणों को निम्न दो वर्गों में विभक्त कियार्-

  1. शार्रीरिक कारण एवं
  2. मार्नसिक कारण

मस्तिष्क में चोट लगनार्, अत्यधिक मद्यमार्न, आघार्त, भय, मार्सिक धर्म में गड़बड़ी, आर्थिक अभार्व, प्रेम में असफल होनार् इत्यार्दि कारकों को मनोरोगों क कारण मार्नार् गयार्। ग्रीस तथार् रोम की सभ्यतार् क सूर्य अस्त होने के बार्द अर्थार्त जब गेलेन की मृत्यु हो गयी (200 ।ण्क्ण्) तत्पश्चार्त इन देशों में मनोरोगों के कारण एवं उपचार्र के संबंध यहार्ँ के दाशनिकों द्वार्रार् प्रतिपार्दित विचार्र एवं विधियार्ँ भी अपनार् प्रभार्व खोने लगी और पुन: जीववार्दी चिन्तन जोर पकड़ने लगार् अर्थार्त फिर से उस समय के लोग एवं चिकित्सक भी मनोरोगों क कारण दैवीय प्रकोप एवं दुष्ट आत्मार् क शरीर में प्रवेश करनार् मार्नने लगे। इसलिये असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में इसे अन्धकार युग (Dark age) मार्नार् जार्तार् है, जिसक समय 500 ।ण्क्ण् तक मार्नार् गयार् है। 500 ।ण्क्ण् से 1500 ।ण्क्ण् तक के समय को ‘‘मध्ययुग’’ (Middle age) मार्नार् गयार् है।

(3) मध्ययुग में पैशार्चिकी

जैसार् कि पहले ही स्पष्ट कियार् जार् चुक है कि असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में 200 A.D. से 500 A.D. तक के समय को अन्धकार युग एवं 500 A.D. से 1500 A.D. तक के काल को मध्ययुग मार्नार् गयार् है। इन दोनों कालों में मार्नसिक रोगों के प्रति प्रार्य: एक जैसार् दृष्टिकोण ही थार्। ग्रीक एवं रोमन सभ्यतार् के सूर्यार्स्त एवं इसाइयत के सूर्योदय से अंधकारयुग क आरंभ मार्नार् जार्तार् है। इस युग में एक बार्र फिर मनोरोगों क मूल कारण बुरी आत्मार् के प्रवेश यार् दैवीय प्रकोप को मार्नार् जार्ने लगार्। इसाइयत के बढ़ते प्रचार्र ने इस मार्न्यतार् को और दृढ़ कियार्। मध्ययुग के प्रार्रंभ में भी मार्नसिक रोगों की उतपत्ति एवं उपचार्र के प्रति यही दृष्टिकोण बनार् रहार्।

मध्ययुग के उत्तराद्ध में असार्मार्न्य व्यवहार्र में सार्मूहिक पार्गलपन की एक नयी प्रवृत्ति की शुरूआत हुयी और धीरे-धीरे यूरोप के काफी बड़े हिस्से में यह रोग एक महार्मार्री के रूप में फैल गयार्। इस सार्मूहिक पार्गलपन की बीमार्री में जैसे ही हिस्टीरियार् क लक्षण किसी एक व्यक्ति में दिखार्यी देतार् तो दूसरे लोग ीार्ी इससे प्रभार्वित होने लगते और असार्मार्न्य व्यवहार्र दिखार्ने लगते जैसे रोगनार्, उछलनार्, कूदनार्, एक दूसरे के कपड़े फार्ड़ देनार् आदि। इटली में इस प्रकार के सार्मूहिक नार्च-गार्ने के उन्मार्द को नृत्योन्मार्द कहार् गयार्। नृत्योन्मार्द को समार्न ही एक दूसरार् तरह क उन्मार्द वृकोन्मार्द भी फैलार्। इसमें मनोरोगी को ऐसार् लगतार् थार् कि वह एक भेड़ियार् के रूप में बदल गयार् है। इसलिये उसकी गतिविधियार्ँ भी भेड़ियें के समार्न ही हो जार्ती थी। 14वीं-15वीं सदी में सार्मूहिक पार्गलपन की यह प्रवृत्ति अपनी चरम सीमार् पर थी। मध्ययुग में मनोरोगों क उपचार्र मूलत: पार्दरियों द्वार्रार् ही कियार् जार्तार् थार्। इस युग के प्रार्रंभ में तो मनोरोगों के उपचार्र हेतु कुछ मार्नवीय तरीके अपनार्ये गये लेकिन बार्द में फिर से अपदू्रतनिरार्सन एवं ट्रीफार्इनेशन जैसी अवैज्ञार्निक एवं अमार्नवीय विधियों को अपनार्यार् गयार्।

15वीं सदी के उत्तराद्ध में लोगों में यह विचार्र काफी सुदृढ़ हो गयार् कि बुरी आत्मार् क आधिपत्य दो तरह क होतार् है। एक आधिपत्य ऐसार् होतार् है। जिसमें व्यक्ति के स्वयं के पार्पकर्म के फलस्वरूप कोर्इ बुरी आत्मार् व्यक्ति की इच्छार् के विरूद्ध उसमें प्रवेश कर जार्ती हैं और उसमें मनोरोगों को जन्म देती है। दूसरे प्रकार क आधिपत्य ऐसार् होतार् हे। जिसमें व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छार् से बुरी आत्मार् से मित्रतार् कर लेतार् है और असार्मार्न्य व्यवहार्र करने लगतार् है। इस दूसरे प्रकार के आधिपत्य में व्यक्ति उस बुरी आत्मार् की अलौकिक शक्तियों को प्रार्प्त करके विभिन्न प्रकार के सार्मार्जिक उपद्रव जैसे-आँधी-तूफार्न, बार्ढ़ महार्मार्री, अकाल आदि लार्कर लोगों को अनेक तरीकों से परेशार्न करतार् है। इस प्रकार के मनोरोगियों को डार्यन यार् जार्दूगर मार्नार् जार्ने लगार्। 15वीं सदी के अन्त तक इन दोनों प्रकार के मनोरोगियों में अन्तर खत्म हो गयार् तथार् सभी मार्नसिक रोगियों को अब जार्दूगर यार् डार्यन ही मार्नार् जार्ने लगार् और इनक उपचार्र भी अत्यन्त अमार्नवीय ढंग से कियार् जार्तार् थार्। इनके उपचार्र के लिये कठोर शार्रीरिक दण्ड जैसे कोड़ार् लगार्नार्, अंगों को जलार्नार् आदि दियार् जार्तार् थार्। उस युग के पार्दरियों ने इस प्रकार के जार्दू-टोनार् से लोगों को बचार्ने हेतु एक नियमार्वली भी बनार्यी, जिसे ”The withes hammer” कहार् गयार्। इसमें जार्दू-टोनार् के प्रभार्वों को दूर करने एवं डार्इन को न्यार्यिक दंड देने के तरीकों क उल्लेख थार्। इस प्रकार स्पष्ट है कि मध्ययुग में मनोरोगों के अध्ययन के संबंध में किसी प्रकार की कोर्इ प्रगति नहीं हुयी। न तो मनोरोगों के कारणों के संबंध में और न ही इनके उपचार्र के संबंध में किसी ताकिक एवं वैज्ञार्निक विचार्रधार्रार् क प्रतिपार्दन कियार् गयार्।

(4) मार्नवीय दृष्टिकोण क उद्भव-

16वीं सदी के प्रार्रंभ में ही मनोरोगों के संबंध में मध्ययुग के र्इश्वरपरक एवं अंधविश्वार्युक्त विचार्रधार्रार् के विरूद्ध आवार्ज उठने लगी और इस संबंध में एक नवीन मार्नवीय दृष्टिकोण क उद्भव हुआ, जिसमें यह मार्नार् गयार् कि शार्रीरिक रोग के समार्न ही मनोरोग भी होते है, इनक कारण कोर्इ दैवीय प्रकोप नहीं होतार् है। अत: मार्नसिक रोगियों क उपचार्र भी मार्नवीय ढंग से ही होनार् चार्हिये। इस सन्दर्भ में जिन विद्वार्नों एवं चिकित्सकों ने महत्वपूर्ण योगदार्न दियार्, उनक विवेचन निम्नार्नुसार्र है-

  1. ‘‘पार्रार्सेल्सस’’ एक अत्यन्त प्रख्यार्त चिकित्सक हुये, जिन्होंने असार्मार्न्यतार् के प्रति मार्नवीय दृष्टिकोण क परिचय दियार् इनक विचार्र थार् कि ‘‘नृत्योन्मार्द’’ रूपी सार्मूहिक पार्गलपन की प्रवृत्ति दैवीय प्रकोप यार् शरीर पर बुरी आत्मार् क आधिपत्य होने के कारण उत्पन्न नहीं होती वरन अन्य शार्रीरिक रोगों के समार्न यह भी एक रोग है, जिसके इलार्ज के मार्नवीय ढंग पर वैज्ञार्निक तरीके से विचार्र करनार् चार्हिये। पार्रार्सेल्सस ने मनोरोगों के मनोवैज्ञार्निक कारणों पर प्रकाश डार्लार् तथार् मार्नसिक रोगों के उपचार्र हेतु ‘‘शार्रीरिक चुम्बकीय’’ विधि को अपनार्ने पर बल दियार्। आगे चलकर यही विधि सम्मोहन विधि के नार्म से लोकप्रिय हुयी।
  2. यद्यपि पार्रार्सेल्सस ने मनोरोगों के कारण के संबंध में दुष्ट आत्मार् संबंधी विचार्रों क खण्डन कियार्, किन्तु इन्होंने मनोरोगों की उत्पत्ति में नक्षत्रों के प्रभार्व को स्वीकार कियार् है। इनक कहनार् थार् कि व्यक्ति के मार्नसिक स्वार्स्थ्य पर चन्द्रमार् क प्रभार्व पड़तार् है। महार्न जर्मन चिकित्सक जोहार्न वेयर ने असार्मार्न्य व्यवहार्र एवं मनोरोगों के संबंध में अपने विचार्रों क प्रतिपार्दन अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘The Deception of Demons’’ में कियार् है, जिसमें उन्होंने बतार्यार् कि मनोरोगी किसी बुरी आत्मार् के आधिपत्य से ग्रसित नहीं होते और न ही वे जार्दू-टोनार् करने की कलार् में निपुण होते हैं, वरन् कुछ शार्रीरिक एवं मार्नसिक कारणों से उनमें असार्मार्न्य व्यवहार्र विकसित हो जार्तार् है। अत: ऐसे लोगों के सार्थ सहार्नुभूतिपूर्ण व्यवहार्र करनार् चार्हिये और उनक इलार्ज मार्नवीय ढंग से करनार् चार्हिये। उस समय के बुद्धिजीवी वर्ग ने तो जोहार्न वेयर के मत क समर्थन कियार्, किन्तु कुछ लोग ऐसे भी थे जो उनके विचार्रों से सहमत नहीं थे और उन्होंने वेयर के विचार्रों क मजार्क उड़ार्यार्। चर्च द्वार्रार् भी वेयर की पुस्तक तथार् विचार्रधार्रार् पर प्रतिबंध लगार् दियार् गयार् और यह प्रतिबंध बीसवीं सदी के आरंभ तक लगार् रहार्। इसक परिणार्म यह हुआ कि वेयर के विचार्र बहुत अधिक प्रभार्वशार्ली सिद्ध नहीं हो पार्ये।
  3. रेजिनार्ल्ड स्र्काट ने भी असार्मार्न्यतार् के संबंध में मार्नवीय दृष्टिकोण के विषय में अपनार् महत्त्वपूर्ण योगदार्न दियार्। उस समय के अन्य चिकित्सकों के समार्न इन्होंने भी मनोरोगों की उत्पत्ति एवं उपचार्र के संबंध में पैशार्चिकी क घोर विरोध कियार् और इनके विरूद्ध तर्कसम्मत वैज्ञार्निक विचार्रों क प्रतिपार्दन कियार्, जिनक वर्णन उन्होंने सन् 1584 में प्रकाशित अपनी प्रसिद्ध कृति ‘‘क्पेबवअमतल व िूपजबीबतंजि’’ में कियार् है, लेकिन इंग्लैण्ड के रार्जार् जेम्स प्रथम ने इस पुस्तक पर न केवल प्रतिबंध लगार्यार् बल्कि उसकी प्रतियों में आग लगार् दी गर्इ, किन्तु उस समय तक मार्नवीय दृष्टिकोण अत्यन्त बल पकड़ चुक थार् क्योंकि चर्च के पार्दरी भी दुरार्त्मार् संबंधी दृष्टिकोण क पूरे जोर-शोर से खण्डन करने लगे थे। इन सन्दर्भ में सते-बिनसेंट डी पार्ल क योगदार्न उल्लेखनीय है, जिन्होंने घोर विरोध के बीच तथार् अपने जीवन को संकट में डार्ल कर इस बार्त की घोषणार् की कि शार्रीरिक रोग के समार्न मार्नसिक बीमार्री भी एक प्रकार क रोग है, कोर्इ दैवीय प्रकोप नहीं। अत: मनोरोगियों के जीवन के कल्यार्ण के लिये र्इसाइयों को मार्नवीय दृष्टिकोण अपनार् कर मार्नवतार् क परिचय देनार् चार्हिये। इस प्रकार जैसे-जैसे मार्नवीय दृष्टिकोण क विचार्र जोर पकड़तार् गयार् वैसे-वैसे लोगों के मन से दुरार्त्मार् संबंधी अंधविश्वार्स धीरे-धीरे दूर होने लगार् और उनके मन में यह विचार्र पनपने लगार् कि मनोरोगियों क उपचार्र भी किसी मार्नसिक अस्पतार्ल यार् मार्नसिक स्वार्स्थ्य केन्द्रों में होनार् चार्हिये न कि किसी सुनसार्न जगह पर। इसके परिणार्मस्वरूप सोलहवीं सदी के मध्य से ही अनेक चर्च एवं मंदिरों को आरोग्यशार्लार्ओं में बदल दियार् गयार्, किन्तु इस संबंध में भी दुर्भार्ग्य की बार्त यह रही कि इन आरोग्यशार्लार्ओं क निर्मार्ण तो रोगियों क मार्नवीय ढंग से इलार्ज करने के लिये कियार् गयार् थार्, किन्तु वार्स्तविकतार् कुछ और ही थी। यहार्ँ पर भी उनके सार्थ जार्नवरों से भी खरार्ब अत्यन्त अमार्नवीय व्यवहार्र कियार् जार्तार् थार्।
  4. मनोरोगियों के प्रति सही अर्थों में मार्नवीय दृष्टिकोण क उद्भव प्रसिद्ध फ्रे्रच चिकित्सक फिल्पिपिनेल (1745-1826) के सक्रिय प्रयार्सों के परिणार्मस्वरूप हुआ। फिलिप पिनेल को आधुनिक मनोरोगविज्ञार्न (Modern Psychiatry) क जनक मार्नार् जार्तार् है। सन् 1792 में फ्रार्ंस की क्रार्न्ति क प्रथम चरण समार्प्त होने पर पिनेल के पेरिस के मार्नसिक अस्पतार्ल लार्विस्टरे के प्रभार्री पद पर नियुक्त कियार् गयार्। पद ग्रहण करते ही पिनेल ने जो सबसे पहलार् और सर्वार्धिक महत्त्वपूर्ण कार्य कियार्, वह थार् वहार्ँ के मनोरोगियों को लोहे की जंजीरों से आजार्द करवार्नार् और उन्हें हवार् एवं प्रकाशयुक्त कमरों में रखनार्। अस्पतार्ल के अधिकारियों द्वार्रार् पिनेल के इन कार्यों क अत्यन्त मजार्क उड़ार्यार् गयार् किन्तु मार्नवीय ढंग से उपचार्र करने पर मनोरोगियों के व्यवहार्र में काफी सकारार्त्मक परिवर्तन होने लगे और उन्होंने उपचार्र में सहयोग करनार् भी आरंभ कर दियार्। इसके बार्द पिनेल को सार्लपेट्रिर अस्पतार्ल क प्रभार्री बनार्यार् गयार्। वहार्ँ पर भी उन्होंने मार्नसिक रोगियों क मार्नवीय ढंग से उपचार्र करनार् प्रार्रंभ कियार्, जिसके परिणार्म अत्यन्त सकारार्त्मक थे। पिनेल के बार्द उनके शिष्य जीनएस्क्यूटरोल द्वार्रार् उनके कार्य को आगे बढ़ार्यार् गयार् और लगभग 10 ऐसे मार्नसिक अस्पतार्लों की स्थार्पनार् की गर्इ, जहार्ँ मनोरोगियों क मार्नवीय तरीके के उपचार्र कियार् जार्तार् थार्।

इस प्रकार फ्रार्ंस विश्व क ऐसार् प्रथम देश बनार् जहार्ँ मनोरोगियों क इलार्ज मार्नवीय ढंग से कियार् जार्ने लगार्। इसक प्रभार्व विश्व के दूसरे देशों पर भी बड़ार् और उन्होंने भी मनोरोगों के मार्नवीय उपचार्र की दिशार् में महत्त्वपूर्ण कदम उठार्ये। जिस समय फ्रार्ंस में पिनेल अपने क्रार्ंतिकारी कार्य को अंजार्म दे रहे थे, उसी दौरार्न इंग्लैण्ड में विलियम टर्क ने चाक रिट्रीट नार्मक मार्नसिक अस्पतार्ल खोलार्, जिसमें मार्नसिक रोगों के मार्नवीय उपचार्र पर बल दियार् गयार्।

इस प्रकार हम देखते है कि असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में पूर्व वैज्ञार्निक काल, जो प्रार्चीन समय में लेकर सन् 1800 तक क मार्नार् गयार् है, मनोरोगों के संबंध में अत्यन्त उतार्र-चढ़ार्व क समय रहार् है। इस युग में असार्मार्न्यतार् को लेकर समय-समय पर अनेक विचार्रधार्रार्ओं क प्रतिपार्दन हुआ। सबसे प्रार्रंभ में जीववार्दी चिन्तन क बोलबार्लार् रहार्, जिसमें दुष्टार्त्मार् यार् दैवीय प्रकोप को ही मनोरोगों की उत्पत्ति क मूल कारण मार्नार् गयार्। इसके बार्द ग्रीक चिकित्सक हिपोक्रेट्स के प्रकृतिवार्द क उद्भव हुआ, जिसके अनुसार्र असार्मार्न्यतार् को शार्रीरिक रोग के समार्न ही एक मार्नसिक रोग मार्नार् गयार् और इसकी उत्पत्ति में शार्रीरिक एवं पचविरणी कारकों की भूमिक को स्वीकार कियार् गयार्। इसके उपरार्न्त 1500 ।ण्क्ण् तक अर्थार्त् मध्ययुग में मनोरोगों के संबंध में दुरार्त्मार् संबंधी दृष्टिकोण ही प्रचलित रहार्, किन्तु बार्द के समय में अर्थार्त् सन् 1800 तक इस सन्दर्भ में अनेक क्रार्ंतिकारी परिवर्तन हुये और मनोरोगियों के प्रति मार्नवीय दृष्टिकोण क उद्भव हुआ, जिसमें नेतृत्व फ्रेंच चिकित्सक फिलिपपिनेल ने कियार्।

असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न क आधुनिक उद्भव

(Moderna cenging of Abnormal psychology) (सन् 1801- सन् 1950) असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में इस काल क अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थार्न है। इस युग में मनोरोगों के कारणों एवं उपचार्र के संबंध में अनेक महत्त्वपूर्ण विचार्रों क प्रतिपार्दन कियार् गयार् और उनके प्रयोग भी किये गये।

फ्रेंच चिकित्सक फिलिप पिनेल तथार् इंग्लैण्ड में टर्क ने जिन मार्नवीय उपचार्र विधियों क प्रयोग कियार्, उनके परिणार्मों ने मनोरोगों के संबंध में पूरे विश्व में एक क्रार्ंति सी लार् दी। अमेरिक में बेंजार्मिन रश के कार्यों के मार्ध्यम से इसके प्रभार्वों क पतार् चलतार् है। रश ने सन् 1783 में पेनसिलवार्नियार् अस्पतार्ल में कार्य करनार् प्रार्रंभ कियार् तथार् सन् 1796 में मनोरोगों के उपचार्र हेतु एक अलग वाड बनवार्यार्। इस वाड में मनोरोगियों के मनोरंजन के लिये विभिन्न प्रकार के सार्धन थे जिससे कि उनके सृजनार्त्मक क्षमतार्ओं को विकसित कियार् जार् सके। इसके बार्द अपने कार्य को और आगे बढ़ार्ते हुये उन्होंने स्त्री एवं पुरूष रोगियों के लिये अलग-अलग वाड बनवार्ये उनके सार्थ अधिकाधिक मार्नवीय व्यवहार्र अपनार्ने पर बल दियार् गयार्। सन् 1812 में मनोरोग विज्ञार्न पर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुयी, जिसमें मनोरोगों के उपचार्र के लिये रक्तमोचन विधि (Blood leting method) एवं विभिन्न प्रकार के शोधक अपनार्ने पर जोर दियार् जो किसी भी प्रकार से मार्नवीय नहीं थार्। 19वीं सदी के प्रार्रंभ में अमेरिक में मनोरोगों के संबंध में एक विशेष आन्दोलन की शुरूआत हुयी, जिसक नेतृत्व एक महिलार् स्थूल शिक्षिक डोरार्थियार्डिक्स द्वार्रार् कियार् गयार्। यह आन्दोलन मार्नसिक स्वार्स्थ्य विज्ञार्न आन्दोलन के नार्म से लोकप्रिय हुआ। इस आन्दोलन क प्रमुख लक्ष्य थार्-’’मनोरोगियों के सार्थ हर संभव मार्नवीय व्यवहार्र करनार्।’’ यूरोप में तो 18वीं सदी के कुछ अन्तिम वर्षों में ही इस प्रकार के मार्नवीय दृष्टिकोण क उद्भव हो गयार् थार्, किन्तु अमेरिक में इसक प्रार्दुर्भार्व 19वीं सदी के प्रार्रंभ में हुआ। इस आन्दोलन के परिणार्म स्वरूप मनोरोगी जंजीरों से मुक्त हो गये और उन्हें हवार् एवं रोशनी से युक्त कक्षों में रखार् गयार्। इसके सार्थ-सार्थ उन्हें खेती एवं बढ़र्इगिरी इत्यार्दि के कार्यों में भी लगार्यार् गयार्, जिससे कि उनक शरीर एवं मन कुछ सर्जनार्त्मक कार्यों में व्यस्त रहे। डिक्स के सर्जनार्त्मक कार्योंम में व्यस्त रहे। डिक्स के इस आन्दोलन क प्रभार्व केवल अमेरिक में ही नहीं वरन स्कॉटलैण्ड एवं कनार्डार् आदि देशों में भी पड़ार् और वहार्ँ के मार्नसिक अस्पतार्लों की स्थिति में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुये। डिक्स ने अपने जीवनकाल में लगभग 32 मार्नसिक अस्पतार्ल खुलवार्ये। मार्नसिक रोगियों के कल्यार्ण हेतु अत्यन्त सरार्हनीय एवं प्रेरणार्स्पद कार्य करने वार्ली इस महिलार् सुधार्रक को अमेरिकी सरकार द्वार्रार् सन् 1901 में ‘‘पूरे इतिहार्स में मार्नवतार् क सबसे उप्तम उदार्हरण’’ बतार्यार् गयार्।

अमेरिक के सार्थ-सार्थ दूसरे देशों में भी जैसे कि जर्मनी, फ्रार्ंस, आस्ट्रियार् आदि में भी असमार्न्य मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम उठार्ये गये। फ्रार्ंस में ऐसे कार्यों क श्रेय सर्वप्रथम एनटोन मेसमर को जार्तार् है। उन्होंने पशु चुम्बकत्व पर महत्वपूर्ण कार्य कियार्। मेसमर इलार्ज के लिये रोगियों में बेहोशी के समार्न मार्नसिक स्थिति उत्पन्न कर दे देते थे। इस विधि को मेस्मरिज्म के नार्म से जार्नार् गयार्। बार्द में यही विधि सम्मोहन (Hypnosis) के नार्म से प्रसिद्ध हुयी। बार्द में नैन्सी शहर के चिकित्सकों जैसे लिबार्ल्ट एवं उनके शिष्य बर्नहिम ने मार्नसिक रोगों के उपचार्र में सम्मोहन विधि क अत्यन्त सफलतार्पूर्वक प्रयोग कियार्, जिसके कारण यह विधि उस समय मनोरोगों के उपचार्र की सर्वार्धिक महत्वपूर्ण एवं प्रभार्वशार्ली विधि बन गयी। इसके बार्द प्रसिद्ध तंत्रिकाविज्ञार्नी शाकों ने पेरिस में हिस्टीरियार् के उपचार्र में सम्मोहन विधि क सफलतार्पूर्व प्रयोग कियार्। यदि असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में शाकों क सर्वार्धिक महत्वपूर्ण योगदार्न देखार् जार्ये तो वह पेरिस के एक अत्यन्त लोकप्रिय शिक्षक के रूप में है, जिनक कार्य मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में कुछ छार्त्रों को प्रशिक्षित करनार् थार्। आगे चलकर ये छार्त्र मनोविज्ञार्न के क्षेत्र में अत्यन्त लोकप्रिय हुये। शाकों के विद्याथियों में से दो छार्त्र ऐसे है, जिनके कार्यों के लिये इतिहार्स उनक आभार्री है। इनमें से एक है- सिगमण्ड क्रार्यड (सन् 1856 – सन् 1939)। ये सन् 1885 में वियार्नार् से शाकों से शिक्षार्ग्रहण करने आये थे तथार् दूसरे हैं, पार्इरे जेनेट जो पेरिस के ही रहने वार्ले थे। शाकों ने अपनी मृत्यु के 3 सार्ल पूर्व जेनेट को अस्पतार्ल क निदेशक नियुक्त कियार्। जेनेट ने सफलतार्पूर्वक अपने गुरू शाकों के कार्यों को आगे बढ़ार्यार्। मनोरोगों के क्षेत्र में जेनेट क सर्वार्धिक महत्वपूर्ण योगदार्न है-मनोस्नार्युविकृति (Psychoneurosis) में मनोविच्छेद (Dissociation) के महत्त्व को अलग से बतार्नार्।

फ्रार्ंस के सार्थ-सार्थ जर्मनी में भी इस दिशार् में अनेक महत्वपूर्ण कार्य हुये, जिनमें विलिहेल्म ग्रिसिंगर (1817-1868) और ऐमिल क्रेपलिन के कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इन दोनों चिकित्सकों ने मनोरोगों क एक दैहिक आधार्र (Somatic basis) मार्नार् और इस विचार्री क प्रतिपार्दन कियार् कि जिस प्रकार शरीर के किसी अंग में कोर्इ विकार आने पर शार्रीरिक रोग उत्पन्न हो जार्ते हैं, ठीक उसी प्रकार मनोरोगों के उत्पन्न होने क कारण भी अंगविशेष में विकृति ही है। इसे ‘‘असार्मार्न्यतार् क अवयवी दृष्टिकोण’’ (arganic viewpoint of abnormality) कहार् गयार्। सन् 1845 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में ग्रिंसिगर ने अत्यन्तदृढ़तार्पूर्वक इस मत क प्रतिपार्दन कियार् कि मनोरोगों क कारण दैहिक होतार् है। ग्रिसिंगर की तुलनार् में ऐमिल क्रेपलिन क योगदार्न ज्यार्दार् महत्वपूर्ण है, क्योंकि भिन्न-भिन्न लक्षणों के आधार्र पर इन्होंने मनोरोगों को अनेक श्रेणियों में बार्ँटार् और उनकी उत्पत्ति के अलग-अलग कारण भी बतार्ये। सर्वप्रथम क्रेपलिन ने ही उन्मार्द-विषार्द मनोविकृति नार्मक मार्नसिक रोग क नार्मकरण कियार् और आज भी यह रोग इसी नार्म से जार्नार् जार्तार् है। उन्होंने जो दूसरार् महत्वपूर्ण मनोरोग बतार्यार्, उसक नार्म थार् डिमेंशियार् प्रार्क्रोवस इसक नार्म बदलकर वर्तमार्न समय में मनोविदार्लितार् यार् सिजोफ्रेनियार् कर दियार् गयार् है। क्रेपलिन ने मनोरोगों क कारण शार्रीरिक यार् दैहिक मार्नते हुये इसे निम्न दो वर्गों में विभक्त कियार्-

  1. अन्तर्गत कारक (Endogenous factors)
  2. एवं बहिर्गत कारक (Exogenous factors)

1. अन्तर्गत कारक- इन कारकों क संबंध वंशार्नुक्रम से मार्नार् गयार्।
2. बहिर्गत कारक- इन कारकों क संबंध मस्तिष्कीय आघार्त से थार्, जिसके अनेक कारण हो सकते थे। जैसे-शार्रीरिक रोग, विष अथवार् दुर्घटनार् इत्यार्दि। 19वीं सदी के उत्तराद्ध में आस्ट्रियार् में प्रसिद्ध तंत्रिक विज्ञार्नी एवं मनोरोग विज्ञार्नी सिगमण्ड फ्रार्यड द्वार्रार् मनोरोगों के सन्दर्भ में उल्लेखनीय कार्य कियार् गयार्। इनक महत्वपूर्ण योगदार्न यह है कि सर्वप्रथम इन्होंने ही मनोरोगों की उत्पत्ति में जैविक कारकों की तुलनार् में मनोवैज्ञार्निक कारकों को अधिक महत्वपूर्ण बतार्यार्। मनोरोग विज्ञार्न के क्षेत्र में फ्रार्यड के योगदार्न में अचेतन, स्वप्न विश्लेषण, मुक्त सार्हचर्य विधि, मनोरचनार्यें तथार् मनोलैंगिक सिद्धार्न्त विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। फ्रार्यड ने जोसेफ ब्रियुअर से मनोस्नार्युविकृति के रोगियों पर सम्मोहन विधि क सफलतार्पूर्वक प्रयोग करनार् सीखार्। इस विधि के प्रयोग के दौरार्न उन्होंने देखार् कि सम्मोहित स्थिति में रोगी बिनार् किसी संकोच एवं भय के अपने अचेतन में दमित विचार्रों, इच्छार्ओं, भार्वनार्ओं, संघर्षों, आदि को अभिव्यक्त करतार् है, जिनक संबंध स्प्ष्ट रूप से उस व्यक्ति के रोग से होतार् है। फ्रार्यड तथार् ब्रियुअर ने इसे विरेचन विधि (Catthartic method) क नार्म दियार्। इसके बार्द सन् 1885 में फ्रार्यड, प्रसिद्ध फ्रेंच चिकित्सक शाकों से शिक्षार् प्रार्प्त करने पेरिस गये। वहार्ँ उन्होंने सम्मोहन विधि से मनोस्नार्युविकृति के रोगियों में चमत्कारी परिवर्तन देखे। वे इससे अत्यन्त प्रभार्वित हुये, किन्तु वियार्नार् वार्पस आने के बार्द उन्होंने सम्मोहन विधि द्वार्रार् उपचार्र करनार् बन्द कर दियार् क्योंकि उनक मत थार् कि इस विधि द्वार्रार् रोग क केवल अस्थार्यी उपचार्र होतार् है, रोग पूरी तरह दूर नहीं होतार् है। असार्मार्न्य व्यवहार्र के संबंध में जो एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार्र फ्रार्यड द्वार्रार् दियार् गयार् वह यह थार् कि उनके मतार्नुसार्र अधिकतर मनोरोगों क कारण अचेतन में दमित इच्छार्यें, विचार्र, भार्वनार्यें आदि हैं अर्थार्त मनोरोगों क मूल कारण अचेतन (Unconscious) है। जो विचार्र, भार्वनार्यें यार् इच्छार्यें दु:खद, अनैतिक, असार्मार्जिक यार् अमार्नवीय होती हैं, उनको व्यक्ति अपने चेतन मन से हटार्कर अचेतन में दबार् देतार् है।

फ्रार्यड ने इसे दमन (Repression) कहार् है। इस प्रकार से इच्छार्यें एवं विचार्र नष्ट नहीं होते वरन् दमित हो जार्ते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति के व्यवहार्र को नियंत्रित करते हैं। इस लिये किसी भी व्यक्ति के व्यवहार्र क ठीक प्रकार से अध्ययन करने के लिये उसके अचेतन में दमित संवेगों, विचार्रों को चेतन स्तर पर लार्नार् अत्यन्त आवश्यक है। इस हेतु इन्होंने दो विधियों क प्रतिपार्दन कियार्-

  1. मुक्त सार्हयर्च विधि (Free association method)
  2. स्वप्न-विश्लेषण विधि (Deream Analysis method)

अपनी इन विधियों क प्रयोग करके फ्रार्यड ने सन 1900 में अपनी सर्वार्धिक लोकप्रिय पुस्तक ‘‘The interpretation of dream’’ क प्रकाशन कियार्। मनोरोगों के उपचार्र हेतु फ्रार्यड ने जिस विधि क प्रयोग कियार् उसे ‘‘मनोविश्लेषण विधि’’ (Psychoanalytic Method) कहार् जार्तार् है। इस विधि में मनोरोगी के अचेतन में दमित इच्छार्ओं, विचार्रों, भार्वों आदि को मुक्तसार्हचर्य विधि एवं स्वप्न-विश्लेषण के मार्ध्यम से बार्हर निकालार् जार्तार् हे एवं उसके आधार्र पर रोग क निदार्न करके उपचार्र कियार् जार्तार् है। मनोविश्लेषण विधि के उत्सार्हजनक परिणार्म आने से यह विधि पूरे विश्व में फैलार् गयी और इनसे इस विधि को सीखने हेतु विश्व के अनेक देशों से लोगों इनके पार्स आने लगे। फ्रार्यड के शिष्यों में कार्य युंग एवं एल्फ्रेडएडलर क नार्म विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एडलर वियार्नार् के ही थे। फ्रार्यड के कुछ विचार्रों से असहमत होने के कारण बार्द में युग एवं एडलर ने उनसे अपनार् संबंध तोड़कर नयी अवधार्रणार्ओं को जन्म दियार्। युग क मनोविज्ञार्न विश्लेषणार्त्मक मनोविज्ञार्न (Analytic psychology) तथार् एडलर क मनोविज्ञार्न ‘‘वैयक्तिकमनोविज्ञार्न’’ (Individual psychology) के नार्म से जार्नार् जार्तार् है।

फ्रार्यड जब 80 सार्ल के थे तो वे अत्यन्त गंभीर रूप से बीमार्र हो गये तथार् उन्हें हिटलर के जर्मन सैनिकों ने पकड़ लियार् क्योंकि हिटलर ने वियार्नार् पर आक्रमण कर दियार् थार्। अपने कुछ शिष्यों एवं दोस्तों की सहार्यतार् से उन्हें सैनिकों के कब्जे से छुड़ार् लियार् गयार् तथार् इसके बार्द वे लंदन चले गये और वहार्ँ 83 वर्ष की आयु में अर्थार्त सन् 1939 में कैंसर के कारण उनक निधन हो गयार्। असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न के इतिहार्स में एडॉल्फमेयर क योगदार्न भी अविस्मरणीय है, जो स्विट्जरलैण्ड के थे किन्तु सन् 1892 में अमेरिक आकर वहीं पर बस गये तथार् यहार्ँ पर इन्होंने मनोरोगों के क्षेत्र में अत्यन्त उल्लेखनीय कार्य किये। असार्मार्न्यतार् के सन्दर्भ में मेयर द्वार्रार् प्रतिपार्दित विचार्रधार्रार् को ‘‘मनोजैविक दृष्टिकोण’’ के नार्म से जार्नार् जार्तार् है। मेयर क मत थार् कि मनोरोगों क कारण केवल दैहिक ही नहीं वरन मार्नसिक भी होतार् है। इसलिये उपचार्र भी दोनों आधार्रों पर कियार् जनार् चार्हिये। इस प्रकार यह कहार् जार् सकतार् है कि मनोरोगों के संबंध में मेयर ने एक मिश्रित विचार्रधार्रार् को जन्म दियार्, जो ज्यार्दार् उपयुक्त प्रतीत होती है। इसके सार्थ-सार्थ मेयर ने मनोरोगों की उत्पत्ति में सार्मार्जिक कारकों की भूिमार् को भी स्वीकार कियार्। इसलिये रेनी ने इनके सिद्धार्न्त क नार्म ‘‘मनोजैविक सार्मार्जिक सिद्धार्न्त’’ भी रखार् है। मेयर की मार्न्यतार् थी मनोरोगों की सफलतार्पूर्वक चिकित्सार् तभी संभव है जब उसके दैहिक पदाथों जैसे कि हामोन्स, विटार्मिन्स एवं शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियार्विधि को संतुलित एवं नियंत्रित करने के सार्थ-सार्थ रोगी के घर के वार्तार्वरण के अन्त:पार्रस्परिक संबंधों में भी सुधार्र कियार् जार्ये। वार्स्तव में देखार् जार्ये तो मेयर के अनुसार्र मनोरोगियों क उपचार्र रोगी तथार् चिकित्सक के मध्य एक प्रकार क पार्रस्परिक प्रशिक्षण हैं और इसकी सफलतार् इनके परस्पर सौहार्दर््रपूर्ण संबंधों पर निर्भर करती है। मनोरोगों के उपचार्र हेतु आज भी इस प्रकार की विधियों क सफलतार्पूर्वक प्रयोग कियार् जार् रहार् है।

इस प्रकार हम सकह सकते हैं कि मेयर के अनुसार्र मनोरोगों के अध्ययन हेतु एक समग्र दृष्टिकोण क होनार् अत्यार्वश्यक है।

आज क असार्मार्न्य मनोविज्ञार्न : सन् 1951 से अब तक 

जैसार् कि स्पष्ट है कि 20वीं शतार्ब्दी के पूवार्द्ध्र तक केवल मार्नसिक अस्पतार्लों में ही मार्नसिक रोगियों क उपचार्र कियार् जार्तार् थार्, किन्तु समय के सार्थ धीरे-धीरे इन मार्नसिक अस्पतार्लों की सच्चाइ लोगों के समन समक्ष प्रकट होने लगी और इस बार्त क पतार् चलार् कि चिकित्सार् के नार्म पर इन अस्पतार्लों में रोगियों के सार्थ कितनार् अमार्नवीय व्यवहार्र कियार् जार्तार् है। जिनकों स्नेह और आत्मीयतार् की आवश्यकतार् है, उनके सार्थ अत्यन्त घृणित और क्रूर बर्तार्व कियार् जार्तार् है। इसके परिणार्मस्वरूप रोग ठीक होने की बजार्य और बढ़ जार्तार् है और कभी-कभी तो रोगी की मृत्यु तक हो जार्ती थी। प्रसिद्ध विद्वार्न् किश्कर (Kisker, 1985) ने ऐसे मार्नसिक अस्पतार्लों की स्थिति क वर्णन करते हुये कहार् है कि ‘‘मार्नसिक रोगियों को इन अस्पतार्लों में एक छोटे से कमरे में झुण्ड बनार्कर रखार् जार्नार्, ऐसे कमरों में शौचार्लय भी नहीं होनार्, धूप और हवार् भी लगभग न के बरार्बर मिलनार्, आधार् पेट खार्नार् दियार् जार्नार्, कमसिन लड़कियों को अस्पतार्ल से बार्हर भेजकर शार्रीरिक व्यार्पार्र करार्यार् जार्नार्, अस्पतार्ल अधिकारियों द्वार्रार् गार्ली-गलौज करनार् आदि काफी सार्मार्न्य थार्।’’

इसके परिणार्मस्वरूप मार्नसिक अस्पतार्लों में रोगियों को रखने और उनक इलार्ज करवार्ने के प्रति लोगों की मनोवृत्ति में बदलार्व आयार् और इन मार्नसिक अस्पतार्लों स्थार्न सार्मुदार्यिक मार्नसिक स्वार्स्थ्य केन्द्र (Community mental health centres) ने ले लियार्। इन स्वार्स्थ्य केन्द्रों क प्रमुख उद्देश्य मार्नसिक रोगियों की मार्नवीय तरीके से चिकित्सार् करनार् है। मार्नसिक स्वार्स्थ्य केन्द्रों द्वार्रार् मुख्यत: निम्न कार्य किये जार्ते हैं-

  1. चौबीस घंटार् आपार्तकालीन देखभार्ल
  2. अल्पकालीन अस्पतार्ली सेवार्
  3. आंशिक अस्पतार्ली सेवार्
  4. बार्ह्य रोगियों की देखभार्ल
  5. प्रशिक्षण एवं परार्मर्थ कार्यक्रम आदि।

अमेरिक तथार् कनार्डार् में ऐसे अनेक केन्द्र हैं और इन्हें अपने कार्यों के लिये सरकार से भी पर्यार्प्त सहार्यतार् मिलती है। आजकल इन देशों में मार्नसिक स्वार्स्थ्य केन्द्रों क एक नवीन रूप विकसित हुआ है। इसे संकट काल हस्तक्षेप केन्द्र (Crisis intervention centre) कहार् जार्तार् है। जैसार् कि नार्म से ही स्पष्ट हे इन केन्द्रों को प्रमुख उद्देश्य जरूरतमंद मनोरोगियों को तुरंत सहार्यतार् पहुँचार्नार् होतार् है। इन केन्द्रों की विशेष बार्त यह है कि इनमें उपचार्र हेतु पहले से समय लेनार् आवश्यक नहीं होतार् है एवं सभी वर्ग के लोगों की यथार्संभव सहार्यतार् हेतु तुरंत आवश्यक कदम उठार्ये जार्ते हैं। वर्तमार्न समय में संकटकाल हस्तक्षेप केन्द्र क भी एक नयार् रूप ‘‘हॉटलार्इन दूरभार्ष केन्द्र’’ (Hatlinetelephone centre) के रूप में विकसित हुआ है। इन केन्द्रों में चिकित्सक दिन यार् रार्त में किसी समय केवल टेलीफोन से सूचनार् प्रार्प्त करके भी सहार्यतार् करने हेतु तैयार्र रहते हैं। इनक प्रमुख उद्देश्य मनोरोगियों की अधिकाधिक देखभार्ल एवं सेवार् करनार् होतार् है। इस तरह क पहलार् दूरभार्ष केन्द्र सर्वप्रथम लोस एन्जिल्स के चिल्ड्रेन अस्पतार्ल में खोलार् गयार्, जिसकी सफलतार् से प्रभार्वित होकर विश्व के विभिन्न देशों में ऐसे केन्द्र तेजी से खुल रहे हैं।

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