अश्वगंधार् की खेती कैसे करें
अश्वगंधार् (असगंध) जिसे अंग्रेजी में विन्टर चैरी कहार् जार्तार् है तथार् जिसक वैज्ञार्निक नार्म विदार्नियार् सोम्नीफेरार् (Withania somnifera)है, भार्रत में उगाइ जार्ने वार्ली महत्वपूर्ण औषधीय फसल है जिसमें कर्इ तरह के एल्केलॉइड्स पार्ये जार्ते है। अश्वगंधार् को शक्तिवर्धक मार्नार् जार्तार् है। भार्रत के अलार्वार् यह औषधीय पौधार् स्पेन, फेनार्री आर्इलैण्ड, मोरक्को, जाडन, मिस्र, पूर्वी अफ्रीका, बलुचिस्तार्न (पार्किस्तार्न) और श्रीलंक में भी पार्यार् जार्तार् है। भार्रतवर्ण में यह पौधार् मुख्यतय: गुजरार्त, मध्यप्रदेश, रार्जस्थार्न, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजार्ब, हरियार्णार् के मैदार्नों, महार्रार्ष्ट्र, पश्चिमी बंगार्ल, कर्नार्टक, केरल एवं हिमार्लय में 1500 मीटर की ऊँचाइ तक पार्यार् जार्तार् है। मध्य प्रदेश में इस पौधे की विधिवत् खेती मन्दसौर जिले की भार्नपुरार्, मनार्सार्, एवं जार्दव तथार् नीमच जिले में लगभग 3000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जार् रही है।

अश्वगंधार् के पौधे
अश्वगंधार् के पौधे

अश्वगंधार् के पौधे 1 से 4 फीट तक ऊँचे होते है। इसके तार्जे पत्तों तथार् इसकी जड़ को मसल कर सूँघने से उनमें घोड़े के मूत्र जैसी गंध आती है। संभवत: इसी वजह से इसक नार्म अश्वगंधार् पड़ार् होगार्। इसकी जड़ मूली जैसी परन्तु उससे काफी पतली (पेन्सिल की मोटाइ से लेकर 2.5 से 3.75 अश्वगंधार् के पौधे से0मी0 मोटी) होती है तथार् 30 से 45 से0मी0 तक लम्बी होती है। यद्यपि यह जंगली रूप में भी मिलती है परन्तु उगाइ गर्इ अश्वगंधार् ज्यार्दार् अच्छी होती है।

अश्वगंधार् में विथेनिन और सोमेनीफेरीन एल्केलाइड्स पार्ए जार्ते हैं जिनक उपयोग आयुर्वेद तथार् यूनार्नी दवार्इयों के निर्मार्ण में कियार् जार्तार् है। इसके बीज, फल, छार्ल एवं पत्तियों को विभिन्न शार्रीरिक व्यार्धियों के उपचार्र में प्रयुक्त कियार् जार्तार् है। आयुर्वेद में इसे गठियार् के दर्द, जोड़ों की सूजन, पक्षार्घार्त तथार् रक्तचार्प आदि जैसे रोगों के उपचार्र में इस्तेमार्ल किए जार्ने की अनुशंसार्, की गर्इ है। इसकी पत्तियार्ँ त्वचार्रोग, सूजन एवं घार्व भरने में उपयोगी होती हैं। विथेनिन एवं सोमेनीफेरीन एल्केलार्इड्स के अलार्वार् निकोटीन सोमननी विथनिनाइन एल्केलार्इड भी इस पौधे की जड़ों में पार्यार् जार्तार् है। अश्वगंधार् पर आधार्रित शक्तिवर्धक औषधियार्ँ बार्जार्र में टेबलेट, पार्वडर एवं कैप्सूल फाम में उपलब्ध हैं। इन औषधियों को भार्रत की समस्त अग्रणी आयुर्वेदिक कम्पनियों द्वार्रार् शक्तिवर्धक कैप्सूल यार् टेबलेट फाम में विभिन्न ब्रार्ण्डों जैसे वीटार्-एक्स गोल्ड, शिलार्जीत, रसार्यन वटी, थ्री-नॉट-थ्री, थर्टीप्लस, एनर्जिक-31 आदि के रूप में विक्रय कियार् जार्तार् है। इन औषधियों में लगभग 5-10 मिलीग्रार्म अश्वगंध पार्वडर क उपयोग एक कैप्सूल यार् टेबलेट में कियार् जार्तार् है। जिसक बार्जार्र विक्रय मूल्य 10 से 15 रूपये प्रति कैप्सूल होतार् है, जबकि अश्वगंधार् की तैयार्र फसल क विक्रय मूल्य मार्त्रार् 40. 00 रूपये से 80.00 रूपये प्रति किलो तक मिलतार् है। अर्थार्त् अश्वगंधार् फसल के बिक्री मूल्य की तुलनार् में अश्वगंधार् से तैयार्र औषधि क विक्रय मूल्य लगभग दस गुनार् अधिक होतार् है। मध्यप्रदेश में उत्पन्न होने वार्ली समस्त अश्वगंधार् की फसल स्थार्नीय मण्डियों के मार्ध्यम से न्यूनतम 4000 रूपये प्रति क्विंटल पर अन्य प्रदेशों में स्थार्पित औषधि निर्मार्ण कम्पनियों को भेजी जार्ती है। मध्यप्रदेश के मन्दसौर जिले में स्थार्पित एक कम्पनी द्वार्रार् औषधि क निर्मार्ण न करते हुए केवल अश्वगंधार् पार्वडर को तैयार्र करके ही बड़ी कम्पनियों को बेचार् जार्तार् है। मध्यप्रदेश में अश्वगंधार् क इतने व्यार्पक स्तर पर उत्पार्दन कियार् जार् रहार् है कि यहार्ँ पर अश्वगंधार् पर आधार्रित औषधियों को निर्मित करने अथवार् अश्वगंधार् क पार्वडर तैयार्र करने की इकाइयार्ँ स्थार्पित करने की भी व्यार्पक संभार्वनार् है। इसके सार्थ-सार्थ इसकी व्यवसार्यिक खेती को भी एक लार्भकारी स्वरोजगार्र के रूप में अपनार्यार् जार् सकतार् है।

अश्वगंधार् के औषधीय उपयोग 

अश्वगंधार् क पत््र यके भार्ग-जडे़ पत्ते, फल, बीज आदि औषधीय उपयोग हेतु प्रयुक्त कियार् जार्तार् है परन्तु सर्वार्धिक औषधीय उपयोग इसकी जड़ों के हैं तथार् बार्जार्र में सर्वार्धिक मार्ंग भी इसकी जड़ों की ही है। वस्तुत: एक टॉनिक के रूप में इसकी जड़ें प्रत्येक व्यक्ति के लिए चार्हे वह स्त्री हो यार् पुरुष, बच्चे हों यार् वृद्ध, सबके लिए उपयोगी होती है। अश्वगंधार् की जड़ के चूर्ण क तीन महीने तक सेवन करने से कमजोर बच्चों के शरीर क सही विकास होतार् है तथार् उनक शरीर हष्टपुष्ट बनतार् है। सार्मार्न्य व्यक्ति द्वार्रार् लेने पर उनके शरीर में स्फूर्ति, शक्ति, चैतन्यतार् तथार् कांति आ जार्ती है। इसी प्रकार यह सभी प्रकार के वीर्य विकारों को मिटार् करके बल-वीर्य बढ़ार्तार् है तथार् धार्तुओं को पुष्ट करतार् है। इसके सेवन से शरीर क दुबलार्पन मिटतार् है तथार् यह मार्ंसवर्धन क कार्य भी करतार् है। यह नस-नार्ड़ियों को तो सुसंगठित करतार् ही है परंतु इसके सेवन से मोटार्पार् नहीं आतार्। गठियार्, धार्तु, मूत्र तथार् पेट के रोगों के निवार्रण में इसने अपनी उपयोगितार् सर्वत्र सिद्ध की है। खार्ंसी, श्वार्स तथार् खुजली के उपचार्र में भी यह उपयोगी पार्यार् गयार् है। इसके नियमित सेवन से व्यक्ति में रोग प्रतिरोधक क्षमतार् बढ़ती है, उसे लंबे समय तक चिरयौवन की प्रार्प्ति होती है तथार् वृद्धार्वस्थार् के रोग व्यक्ति से काफी समय तक दूर रहते हैं। महिलार्ओं की बीमार्रियों में भी यह काफी उपयोगी पार्यार् गयार् है। इसके नियमित उपयोग से नार्री की गर्भधार्रण क्षमतार् बढ़ती है, प्रसवोपरार्ंत उनमें दूध की वृद्धि होती है तथार् उनकी श्वेत प्रदर, कमरदर्द एवं सार्मार्न्य शार्रीरिक कमजोरी आदि से जुड़ी समस्त समस्यार्एं दूर होती हैं।

अश्वगंधार् के चिकित्सीय उपयोगों के वैज्ञार्निक परिणार्म जार्नने हेतु कर्इ शोधकर्तार्ओं ने विभिन्न रोगों के उपचार्रों हेतु इसक उपयोग कियार् है। इनमें से डॉ. कुप्पुरार्जन तथार् उनके सहयोगियों ने वर्ष 1980 में 50 से 60 वर्ष के बीच के पुरुषों पर अश्वगंधार् क प्रभार्व देखने के उद्देश्य से उन्हें एक वर्ष तक अश्वगंधार् के मूल क एक-एक ग्रार्म चूर्ण दिन में तीन बार्र एक वर्ष तक दियार्। इस एक वर्ष के अध्ययन में उन्होंने पार्यार् कि जिन व्यक्तियों को अश्वगंधार् चूर्ण दियार् गयार् थार् उनके हिमोग्लोविन तथार् लार्ल रक्त कणों की संख्यार् में उन व्यक्तियों की तुलनार् में जिन्हें अश्वगंधार् चूर्ण नहीं दियार् गयार् थार्, उल्लेखनीय सुधार्र देखार् गयार्। रक्त से संबंधित इन सुधार्रों के सार्थ-सार्थ इन व्यक्तियों के बार्लों क कालार्पन भी बढ़ार्, उनकी झुकी हुर्इ कमर की हार्लत में भी सुधार्र हुआ तथार् उनके खड़े होने क तरीक भी सुधरार्। अश्वगंधार् के सेवन से इन व्यक्तियों क सीरम कालेस्ट्रॉल भी कम हुआ। इसी प्रकार विद्यार् प्रभु तथार् उनके सहयोगियों नें वर्ष 1990 में पार्यार् कि अश्वगंधार् के सेवन से व्यक्ति की सार्मार्न्य बुद्धि क विकास होतार् है जबकि उमार् देवी तथार् उनके सहयोगियों ने 1993 में पार्यार् कि अश्वगंधार् कैंसर से लड़ने की क्षमतार् विकसित करतार् है। वर्ष 1982 में किए गए एक अध्ययन में बी.पी.शॉ एवं एल. एन. मैती ने अमलपित्त पर अश्वगंधार् क प्रभार्व जार्नने हेतु ऐसे 91 व्यक्तियों को अश्वगंधार् क सेवन करवार्यार् गयार् जो गैस्ट्रार्इटस, एसिडिटी तथार् अल्सर से पीड़ित थे। इस अध्ययन के अंतर्गत इन व्यक्तियों को अश्वगंधार् तथार् मुलैठी क नियमित सेवन करवार्ने पर यह पार्यार् गयार् कि इससे इन व्यक्तियों की गैस्ट्रार्इटस, एसिडिटी तथार् अल्सर जैसे समस्यार्ओं में उल्लेखनीय सुधार्र हुआ। इससे पूर्व वर्ष 1977 में श्री एस.पी. सिंह तथार् उनके सहयोगियों ने अपने शोधकार्य में पार्यार् कि अश्वगंधार् दर्दनार्शक होने के सार्थ-सार्थ जोड़ों के दर्द के उपचार्र में भी लार्भकारी है तथार् इसमें सूजन कम करने के गुण भी पार्ए जार्ते हैं। अश्वगंधार् के सेवन से उत्तेजनार् तथार् अवसार्द भी कम होते हैं। ये निष्कर्ष एक महत्वपूर्ण अध्ययन 1979 में श्री आर.एच. सिंह ने एक बड़े समूह पर किए गए प्रयोगों के आधार्र पर निकाले।

उच्च रक्तचार्प पर अश्वगंधार् क क्यार् प्रभार्व पड़तार् है यह जार्नने के लिए कर्इ शोध कार्य हो चुके हैं परन्तु इस संदर्भ में श्री सी.एल. मल्होत्रार् तथार् उनके सहयोगियों द्वार्रार् वर्ष 1962 तथार् 1965, एवं श्री अहमार्दार् एफ द्वार्रार् वर्ष 1990 में किए गए अध्ययन अपेक्षार्कश्त ज्यार्दार् व्यवस्थित थे। इन दोनों ही शोधकर्त्तार्ओं ने यह पार्यार् कि अश्वगंधार् के सेवन से विभिन्न समूहों के उच्च रक्तचार्प में उल्लेखनीय कमी आर्इ। इसी प्रकार एस.लक्कड़ ने वर्ष 1981 में घुटने के अस्थिसंधि रोग (Osteoarthitis) से पीड़ित एक समूह को एक निश्चित अवधि तक अश्वगंधार् क सेवन करवार्ने पर यह पार्यार् कि समूह में से 61 प्रतिशत व्यक्तियों को इससे काफी अधिक लार्भ हुआ। महिलार्ओं की बीमार्रियों के उपचार्र में अश्वगंधार् के सेवन क प्रभार्व जार्नने हेतु र्इ. रार्ज्यलक्ष्मी ने वर्ष 1980 में महिलार्ओं के एक समूह के सार्थ किए गए एक अध्ययन में यह पार्यार् कि ल्यूकोरियार् से पीड़ित जिन महिलार्ओं को अश्वगंधार् क सेवन करवार्यार् गयार् थार् उनमें से 80 प्रतिशत महिलार्ओं की ल्यूकोरियार् की समस्यार् पूर्णतयार् समार्प्त हो गर्इ तथार् काफी समय तक यह दोबार्रार् नहीं देखी गयी। इस प्रकार जहार्ं विभिनन बीमार्रियों के उपचार्र में अश्वगंधार् की उपयोगितार् पाइ गर्इ है वहीं वैज्ञार्निक रूप से संचार्लित किए गए अध्ययनों एवं शोधकार्यों में भी यह सिद्ध हो चुक है कि अश्वगंधार् के नियमित सेवन से हिमोग्लोविन तथार् लार्ल रक्त कणों की संख्यार् में वृद्धि होती है; इससे दुर्बलतार् दूर होती है; सार्मार्न्यत: व्यक्ति की बुद्धि क विकास होतार् है; कैन्सर से लड़ने की क्षमतार् विकसित होती है; गैस्ट्रार्इटस, एसि डिटी, अल्सर में सुधार्र होतार् है तथार् स्त्रियों की बीमार्रियों विशेषतयार् ल्यूकोरियार् से निजार्त मिलती है। इस प्रकार अश्वगंधार् एक अत्यधिक उपयोगी औषधीय पौधार् है जिसकी रार्ष्ट्रीय तथार् अंतर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जार् रही मार्ंग की पूर्ति इसकी वृहद स्तर पर खेती करके ही की जार् सकती है।

अश्वगंधार् की खेती की विधि 

अश्वगंधार् मूलत: शुष्क प्रदेशों क औषधीय पौधार् है। संभवतयार् यह कहनार् अनुचित नहीं होगार् कि वर्तमार्न में जिन औषधीय पौधों की खेती काफी बड़े स्तर पर हो रही है उनमें अश्वगंधार् अपनार् प्रमुख स्थार्न रखतार् है। एक अनुमार्न के अनुसार्र वर्तमार्न में हमार्रे देश के विभिन्न भार्गों में लगभग 4000 हैक्टेयर के क्षेत्र में इसकी खेती हो रही है जिसके कर्इ गुनार् अधिक बढ़ार्ए जार् सकने की संभार्वनार्एं हैं। वर्तमार्न में इसकी व्यार्पक स्तर पर खेती मध्य प्रदेश के विभिन्न भार्गों के सार्थ-सार्थ रार्जस्थार्न, महार्रार्ष्ट्र, गुजरार्त, आंध्र प्रदेश, कर्नार्टक आदि रार्ज्यों में होने लगी है। इन क्षेत्रों में हुए किसार्नों के अनुभवों के आधार्र पर अश्वगंधार् की कृषि तकनीक निम्नार्नुसार्र समझी जार् सकती है-

अश्वगंधार् क जीवन चक्र 

अश्वगंधार् एक बहुवष्रीय पौधार् है तथार् यदि इसके लिए निरंतर सिंचाइ आदि की व्यवस्थार् होती रहे तो यह कर्इ वर्षों तक चल सकतार् है परंतु इसकी खेती एक 6-7 मार्ह की फसल के रूप में ली जार् सकती है। प्रार्य: इसे देरी की खरीफ (सितम्बर मार्ह) की फसल के रूप में लगार्यार् जार्तार् है तथार् जनवरी-फरवरी मार्ह में इसे उखार्ड़ लियार् जार्तार् है। इस प्रकार इसे एक 6-7 मार्ह की फसल के रूप में मार्नार् जार् सकतार् है जिसकी बिजाइ क सर्वार्धिक उपयुक्त समय सितम्बर क महीनार् होतार् है।

उपयुक्त जलवार्यु 

अश्वगंधार् शुष्क एवं समशीतोष्ण क्षेत्रों क पौधार् है। इसकी सही बढ़त के लिए शुष्क मौसम ज्यार्दार् उपयुक्त होतार् है। प्रार्य: इसे अगस्त-सितम्बर मार्ह में लगार्यार् जार्तार् है तथार् फरवरी मार्ह में इसे उखार्ड़ लियार् जार्तार् है। इस दौरार्न इसे दो यार् तीन हल्की सिंचाइयों की आवश्यकतार् होती है। यदि शीत ऋतु के दौरार्न 2-3 बार्रिशें निश्चत अंतरार्ल पर पड़ जार्एं तो अतिरिक्त सिंचाइ की आवश्यकतार् नहीं रहती तथार् फसल भी अच्छी हो जार्ती है। वैसे इस फसल को ज्यार्दार् सिंचाइ की आवश्यकतार् नहीं होती तथार् यदि बिजाइ के समय भूमि में उचित नमी (उगार्व के लिए) हो तथार् पौधों के उगार्व के बार्द बीच में (पौधे उगने के 35-40 दिन बार्द) यदि एक बार्रिश/सिंचाइ हो सके तो इससे अच्छी फसल प्रार्प्त होने की अपेक्षार् की जार् सकती है।

भूमि क प्रकार

एक जड़दार्र फसल होने के कारण अश्वगंधार् की खेती उन मिट्टियों में ज्यार्दार् सफल हो सकती है जो नर्म तथार् पोली हों तार्कि इनमें फसल की जड़ें ज्यार्दार् गहराइ तक जार् सकें। इस प्रकार रेतीली दोमट मिट्टियार्ं तथार् हल्की लार्ल मिट्टियार्ं इसकी खेती के लिए उपयुक्त मार्नी जार्ती हैं प्रार्य: 5.6 से 8.5 पी.एच तक की मिट्टियों में इसकी सही बढ़त होती है तथार् इनसे उत्पार्दन भी काफी अच्छार् मिलतार् है। यह भूमि ऐसी होनी चार्हिए जिसमें से जल निकास की समुचित व्यवस्थार् हो तथार् पार्नी भूमि में न रुकतार् हो। अश्वगंधार् की खेती के संदर्भ में यह बार्त विशेष रूप से देखी गर्इ है कि यह भार्री मश्दार्ओं की अपेक्षार् हल्की मश्दार्ओं में ज्यार्दार् उत्पार्दन देती है। प्रार्य: देखार्गयार् है कि भार्री मश्दार्ओं में पौधे तो काफी बड़े-बड़े हो जार्ते हैं (हर्बेज बढ़ जार्ती है) परंतु जड़ों क उत्पार्दन अपेक्षार्कश्त कम ही मिलतार् है। इस प्रकार अश्वगंधार् की खेती के लिए कम उपजार्ऊ, उचित जल निकास वार्ली, रेतीली-दोमट अथवार् हल्की लार्ल रंग की मिट्टी जिसमें पर्यार्प्त जीवार्ंश की मार्त्रार् हो, उपयुक्त मार्नी जार्ती है।

अश्वगंधार् की प्रमुख उन्नतशील किस्में 

अश्वगंधार् की मुख्यतयार् दो किस्में ज्यार्दार् प्रचलन में हैं जिन्हें ज्यार्दार् उत्पार्दन देने वार्ली किस्में मार्नार् जार्तार् है ये किस्में हैं- जवार्हर असगंध-20, जवार्हर असगंध-134 तथार् डब्ल्यू. एस.-90-100, वैसे वर्तमार्न में अधिकांशत: जवार्हर असगंध-20 किस्म किसार्नों में ज्यार्दार् लोकप्रिय है।

अश्वगंधार् की रार्सार्यनिक सरंचनार् 

अश्वगंधार् में अनेकों प्रकार के एल्केलार्इड्स पार्ए जार्ते हैं जिनमें मुख्य हैं- विथार्निन तथार् सोमनीफेरेन। इनके अतिरिक्त इनके पत्तों में पार्ंच एलकेलार्इड्स (कुल मार्त्रार् 0.09 प्रतिशत) भी पार्ए जार्ने की पुष्टि हुर्इ है, हार्लार्ंकि अभी उनकी सही पहचार्न नहीं हो पाइ है। इनके सार्थ-सार्थ विदार्नोलार्इड्स, ग्लार्यकोसार्इड्स, ग्लूकोज तथार् कर्इ अमीनों एसिड्स भी इनमें पार्ए गए हैं। क्लोनोजेनिक एसिड, कन्डेन्स्ड टैनिन तथार् फ्लेवेलनार्यड्स की उपस्थिति भी इसमें देखी गर्इ है। अश्वगंधार् क मुख्य उपयोगी भार्ग इसकी जड़ें होती हैं। भार्रतीय परिस्थितियों में प्रार्प्त होने वार्ली अश्वगंधार् की जड़ों में 0.13 से 0.31 प्रतिशत तक एल्केलार्इड्स पार्ए जार्ते हैं (जबकि किन्हीं दूसरी परिस्थितियों में इनकी मार्त्रार् 4.3 प्रतिशत तक भी देखी गर्इ है) इसकी जड़ों में से जिन 13 एल्केलार्इड्स को पृथक कियार् जार् सकतार् है, वे हैं- कोलीन, ट्रोपनोल, सूडोट्रोपनोल, कुसोकाइज्रीन, 3-ट्रिगलोज़ार्इट्रोपार्नार्, आइसोपैलीटरीन, एनार्फ्रीन, एनार्हार्इग्रीन, विदार्सोमनार्इन तथार् कर्इ अन्य स्ट्रार्योयडल लैक्टोन्स। एल्केलार्इड्स के अतिरिक्त इसकी जड़ों में स्टॉर्च, रीड्यूसिंग सुगर्म, हैन्ट्रियार्कोन्टेन, ग्लार्इकोसार्इड्स, डुल्सिटॉल, विदार्निसिल, एक अम्ल तथार् एक उदार्सीन कम्पार्उन्ड भी पार्यार् जार्तार् है

बिजाइ से पूर्व खेती की तैयार्री 

यद्यपि वतर्मार्न में अश्वगंधार् की खेती कर रहे अधिकांश किसार्नों द्वार्रार् इस फसल के संदर्भ में केाइ विशेष तैयार्री नहीं की जार्ती तथार् इसे एक ‘‘नॉनसीरियस’’ फसल के रूप में लियार् जार्तार् है, परंतु व्यवसार्यिकतार् तथार् अधिकाधिक उत्पार्दन की दृष्टि से यह आवश्यक होगार् यदि सभी कृषि क्रियार्एं व्यवस्थित रूप से की जार्ए। इसके लिए सर्वप्रथम जुलाइ-अगस्त मार्ह में एक बार्र आड़ी-तिरछी जुताइ करके खेत तैयार्र कर लियार् जार्तार् है। तदुपरार्ंत प्रति एकड़ एक से दो ट्रार्ली गोबर खार्द डार्लनार् फसल की अच्छी बढ़त के लिए उपयुक्त रहतार् है। यद्यपि अश्वगंधार् की फसल को खार्द की अधिक मार्त्रार् की आवश्यकतार् नहीं पड़ती परंतु फिर भी 1 से 2 टन प्रति एकड़ तो खार्द डार्लनी ही चार्हिए। हार्ं यदि पूर्व में ली गर्इ फसल में ज्यार्दार् खार्द डार्लार् गयार् हो तो इसके पूर्वार्वशेष (रैसीड्यूज़) से भी काम चलार्यार् जार् सकतार् है। खार्द खेत में मिलार् दिए जार्ने के उपरार्न्त खेत में पार्टार् चलार् दियार् जार्तार् है।

अश्वगंधार् के बीज

बिजाइ की विधि 

अश्वगंधार् की बिजाइ दोनों प्रकार से की जार् सकती है- (क) सीधी खेत में बुआर्इ तथार् (ख) नर्सरी बनार्कर पौधों को खेत में ट्रार्ंसप्लार्ंट करनार्। इन दोनों विधियों के विवरण निम्नार्नुसार्र हैं-

(क) सीधी खेत में बिजाइ : सीधी खेत में बिजाइ करने के विधि में मुख्यतयार् दो प्रक्रियार्एं अपनाइ जार्ती हैं- (क) छिटकवार्ं विधि तथार् लार्इन से बिजाइ। ज्यार्दार्तर किसार्न इनमें से छिटकवार्ं विधि अपनार्ते हैं। क्योंकि अश्वगंधार् के बीज काफी हल्के होते हैं अत: इनमें पार्ंच गुनार् बार्लू रेत मिलार् ली जार्ती है। तदुपरार्ंत खेत में हल्क हल चलार् करके अश्वगंधार् बार्लू मिश्रित बीजों को खेत में छिड़क दियार् जार्तार् है तथार् ऊपर से पार्टार् दे दियार् जार्तार् है। एक एकड़ के लिए 5 कि.ग्रार्. बीज पर्यार्प्त होते हैं। अश्वगंधार् के पके सूख्ूखे फल अश्वगंधार् के सूख्ूखे कच्चे फल लार्इन से बिजाइ करने की दशार् में गेहूं अथवार् सोयार्बीन की बिजाइ की तरह सीड ड्रिल, देशी हल अथवार् दुफन से बिजाइ की जार्ती है। दोनों में से विधि चार्हे जो भी अपनार्एं परंतु यह ध्यार्न रखनार् चार्हिए कि बीज जमीन में ज्यार्दार् गहरार् (3 से 4 से.मी. से ज्यार्दार् गहरार् नहीं) न जार्ए। इस विधि से बिजाइ करने पर लार्इन से लार्इन की दूरी 30 से.मी. तथार् पौधे तथार् पौधे से पौधे की दूरी 4 से.मी. रखनी उपयुक्त रहती है।

(ख) नर्सरी बनार्कर खेत में पौधे लगार्नार् : इस विधि से बिजाइ करने की दशार् में सर्वप्रथम रेज्ड नर्सरी बेड्स बनार्ए जार्ते हैं जिन्हें खार्द आदि डार्लकर अच्छी प्रकार तैयार्र कियार् जार्तार्है। तदुपरार्ंत इन बेड्स में 4 कि.ग्रार्. प्रति एकड़ की दर से अश्वगंधार् क बीज डार्लार् जार्तार् है जिसे हल्की मिट्टी डार्ल करके दबार् दियार् जार्तार् है। लगभग 10 दिनों में इन बीजों क उगार्व हो जार्तार् है तथार् छ: सप्तार्ह के उपरार्ंत जब ये पौधे लगभग 5-6 सें.मी. ऊंचे हो जार्ए तब इन्हें बड़े खेत में ट्रार्ंसप्लार्ंट कर दियार् जार्तार् है।

कौन सी विधि ज्यार्दार् उपयुक्त है- सीधी बिजाइ अथवार् नर्सरी विधि? 

यद्यपि नर्सरी में पौधे तैयार्र करके इनको खते में ट्रार्सं प्लार्टं करनार् कर्इ मार्यनों में लार्भकारी हो सकतार् है परंतु जहार्ं तक उत्पार्दन तथार् जड़ों की गुणवत्तार् क प्रश्न है तो सीधी बिजाइ से प्रार्प्त उत्पार्दन ज्यार्दार् अच्छार् होनार् पार्यार् गयार् है। विभिन्न अनुसंधार्नों में यह देखार् गयार् है कि सीधी बिजाइ करने पर मूसलार् जड़ की वृद्धि अच्छी होती है तथार् बहुधार् एक शार्खार् वार्ली सीधी जड़ प्रार्प्त होती है। जबकि रोपण विधि से तैयार्र किए गए पौधों में देखार् गयार् है इनमें मूसलार् जड़ क विकास तो रुक जार्तार् है जबकि दूसरी सहार्यक जड़ों क विकास अधिक होतार् है। इस प्रकार के पौधों में सहार्यक जड़ों की औसतन संख्यार् 8 तक पाइ गर्इ है। इसी प्रकार सीधी बिजाइ करने पर जड़ों की औसतन लंबाइ 22 से.मी. तथार् मोटाइ 12 मि.मीतक पाइ गर्इ है जबकि रोपण विधि से तैयार्र पौधेार्ं में जड़ों की औसतन लंबाइ 14 सें.मी. तथार् मोटाइ 8 मि.मी. तक पाइ गर्इ है। इसके अतिरिक्त यह भी देखार् गयार् है कि सीधी बिजाइ करने पर जड़ों में रेशों की मार्त्रार् कम आती है तथार् तोड़ने पर ये जड़े आसार्नी से टूट जार्ती हैं जबकि रोपण विधि से तैयार्र पौधों की जड़ों में रेशार् अधिक पार्यार् जार्तार् है तथार् ये जड़ें आसार्नी से टूट नहीं पार्ती हैं। इस प्रकार इन अनुसंधार्नों के परिणार्मों के आधार्र पर यह निष्कर्ष निकालार् जार्तार् है कि अश्वगंधार् की बिजाइ हेतु रोपण (नर्सरी) विधि की अपेक्षार् सीधी बिजाइ करनार् प्रत्येक दृष्टि से ज्यार्दार् लार्भकारी है। अत: किसार्नों द्वार्रार् यही विधि अपनार्ने की सलार्ह दी जार्ती हैं।

बिजाइ से पूर्व बीजों क उपचार्र 

अश्वगंधार् के सदंर्भ में डाइ बकै अथवार् सीड रॉटिंग बीमार्रियार्ं काफी सार्मार्न्य हैं तथार् इनसे उगते ही पौधे झुलसने से लगते हैं। जिससे प्रार्रंभ में ही पौधों की संख्यार् काफी कम हो जार्ती है। इस रोग के निवार्रण की दृष्टि से आवश्यक होगार् यदि बीजों क उपयुक्त उपचार्र कियार् जार्ए। इसके लिए बीजों क कैप्टॉन, थीरम अथवार् डार्यथेन एम-45 से 3 ग्रार्म प्रति कि.ग्रार्. बीज की दर से उार्पचार्र करने से इन रोगों से बचार्व हो सकतार् है। जैविक विधियों के अंतर्गत बीज क गौमूत्र से उपचार्र कियार् जार्नार् उपयोगी रहतार् है। बार्योवेद शोध संस्थार्न, इलार्हार्बार्द ने अपने शोध प्रयोगों के उपरार्न्त पार्यार् कि ट्रार्इकोडरमार् 5 ग्रार्म प्रति कि.ग्रार्. बीज क शोधन सबसे उपयुक्त है बार्योनीमार् 15 कि.ग्रार्. प्रति एकड़ के प्रयोग जहार्ं एक ओर विभिन्न रोगों के नियन्त्रण में सहार्यक हैं वहीं जड़ों के विकास में भी सहार्यक है से बीज उपचार्रित करने के भी काफी अच्छे परिणार्म देखे गये हैं।

पौधों क विरलन 

सीधी विधि विशेषतयार् छिटकवार्ं विधि से बिजाइ करने की दशार् में प्रार्य: पौधों क विरलीकरण करनार् आवश्यक हो जार्तार् है। यह विरलीकरण बिजाइ के 25-30 दिन के बार्द कर दियार् जार्नार् चार्हिए। यह विरलीकरण इस प्रकार कियार् जार्नार् चार्हिए कि पौधे से पौधे की दूरी 4 से.मी. तथार् कतार्र से कतार्र की दूरी 30 से.मी. से ज्यार्दार् न रहे।

खरपतवार्र नियत्रंण 

अन्य फसलार् ें की तरह अश्वगंधार् की फसल में भी खरपतवार्र आ सकते हैं जिनके नियंत्रण हेतु हार्थ से ही निंराइ-गुड़ाइ की जार्नी चहिए। यह निंराइ कम से कम एक बार्र अवश्य की जार्नी चार्हिए तथार् जब पौधे लगभग 40-50 दिन के हो जार्एं तब खेत की हार्थ से निंराइ कर दी जार्नी चार्हिए। पौधों के विरलीकरण तथार् खरपतवार्र नियंत्रण क कार्य सार्थ-सार्थ भी कियार् जार् सकतार् है।

खार्द की आवश्यकतार् 

अश्वगंधार् की फसल को ज्यार्दार् खार्द की आवश्यकतार् नहीं पड़ती तथार् यदि इससे पूर्व में ली गर्इ फसल में खार्द क काफी उपयोग कियार् गयार् हो तो उस फसल में प्रयुक्त खार्द के बचार्व से ही अश्वगंधार् की फसल ली जार् सकती है। इस फसल को ज्यार्दार् नार्इट्रोजन की आवश्यकतार् नहीं पड़ती क्योंकि ज्यार्दार् नार्इट्रोजन देने से पौधे पर ‘‘हर्बेज’’ तो काफी आ सकती है परंतु जड़ों क पर्यार्प्त विकास नहीं हो पार्तार्। वैसे इस फसल के लिए जो खार्द की प्रति एकड़ अनुशंसित मार्त्रार् है, वह है- 8 किग्रार्. नार्इट्रोजन, 24 कि.ग्रार्. फार्स्फोरस तथार् 16 कि.ग्रार्. पोटार्श। इन अवयवों की पूर्ति जैविक विधि से तैयार्र खार्दों से भी की जार् सकती है।

फसल से संबंधित प्रमुख बीमार्रियार्ं तथार् रोग 

अश्वगंधार् की फसल में मुख्यतयार् मार्हू-मोलार् क प्रकोप हो सकतार् है जिसे मैटार्सिस्टोक्स की 1.50 मिली मार्त्रार् एक लीटर पार्नी में मिलार्कर छिड़काव करने से नियंत्रित कियार् जार् सकतार् है। इसके अतिरिक्त होने वार्ले रोग अथवार् बीमार्रियार्ँं जिनमें जड़ सड़ने, पौध गलन तथार् झुलसार् रोग प्रमुख हैं (विशेषतयार् जब मौसम में आर्दतार् तथार् गर्मी अधिक हो) के नियंत्रण क सर्वार्धिक उपयुक्त उपचार्र है बीजों को उपचार्रित करके बिजाइ करनार् जिसक विवरण पीछे दियार् गयार् है। इसके उपरार्ंत भी जब पौधे बड़े हो जार्एं (20-25) दिन के तो 15-15 दिन के अंतरार्ल पर गौमूत्र अथवार् डयथेन एम-45 क छिड़काव कियार् जार्नार् फसल को अधिकांश रोगों से मुक्त रखेगार्। अश्वगंधार् की फसल पर कीट व्यार्धी क कोर्इ विशेष असर नहीं होतार् है। कभी-कभी इस फसल में मार्हू कीट तथार् पौध झुलसार् व पर्ण झुलसार् लग सकतार् है जिसके नियंत्रण हेतु क्रमश: मैलार्थियार्न यार् मोनोक्रोटोफार्स एवं बीज उपचार्र के अलार्वार् डार्यथेन एम-45, 3 ग्रार्म प्रति लीटर पार्नी घोल में दोयम दर्जेे की जड़ अच्छी गुण्ुणवत्तार् वार्ली जड़ अश्वगंधार् की पूण्ूर्ण तिकसित जड़ तैयार्र कर बुआर्इ के 30 दिन के उपरार्न्त छिड़काव कियार् जार् सकतार् है। आवश्यकतार् पड़ने पर 15 दिन के अन्दर पुन: छिड़काव कियार् जार्नार् उपयोगी होतार् है।

सिंचाइ की व्यवस्थार् 

अश्वगंधार् काफी कम सिंचाइ में अच्छी उपज देने वार्ली फसल है। एक बार्र अच्छी प्रकार उग जार्ने (बिजाइ के समय भूमि में पर्यार्प्त नमी होनी चार्हिए) के उपरार्ंत बार्द में इसे मार्त्र दो सिंचाइयों की आवश्यकतार् होती है- एक उगने के 30-35 दिन के बार्द तथार् दूसरी उससे 60-70 दिन के उपरार्ंत। इससे अधिक सिंचाइ की आवश्यकतार् इस फसल को नहीं होती।

फसल क पकनार् तथार् जडाऱ्ें की खुदाइ (हार्रवेस्टिगं) 

बिजाइ के लगभग 5-5) मार्ह के उपरार्ंत (प्रार्य: फरवरी मार्ह की 15 तार्रीख के करीब) जब अश्वगंधार् की पत्तियार्ंँ पीली पड़ने लगे तथार् इनके ऊपर आए फल (बेरियार्) पकने लगे अथवार् फलों के ऊपर की परत सूखने लगे तो अश्वगंधार् के पौधों को उखार्ड़ लियार् जार्नार् चार्हिए। यदि सिंचाइ की व्यवस्थार् हो तो पौधों को उखार्ड़ने से पूर्व खेत में हल्की सिंचाइ दी जार्नी चार्हिए। हार्लार्ंकि यदि सिंचाइ की व्यवस्थार् हो तथार् फसल को निरंतर पार्नी दियार् जार्तार् रहे तो पौधे हरे ही रहेंगे परंतु फसल को अधिक समय तक खेत में लगार् नहीं रहने दियार् जार्नार् चार्हिए क्योंकि इससे जड़ों में रेशे की मार्त्रार् बढ़ेगी जोकि फसल की गुणवत्तार् को प्रभार्वित करेगी। उखार्ड़ने के तत्काल बार्द जड़ों को पौधों (तने) से अलग कर दियार् जार्नार् चार्हिए तथार् इनके सार्थ लगी रेत मिट्टी को सार्फ कर दियार् जार्नार् चार्हिए। काटने के उपरार्ंत इन्हें लगभग 10 दिनों तक छार्यार् वार्ले स्थार्न पर सुखार्यार् जार्तार् है तथार् जब ये जड़ें तोड़ने पर ‘‘खट’’ की आवार्ज से टूटने लगें तो समझ लियार् जार्नार् चार्हिए कि ये बिक्री के लिए तैयार्र हैं।

जडाऱ्ें की ग्रेडिंग

सुखार्ने के बार्द यूं तो वैसै भी जडें बेची जार् सकती हैं परंतु उत्पार्दन क सही मूल्य प्रार्प्त करने की दृष्टि से यह उपयुक्त होतार् है कि जड़ों को ग्रेडिंग करके बेचार् जार्ए। इस दृष्टि से जड़ों को निम्नार्नुसार्र 3-4 ग्रेड़ों में श्रेणीक त कियार् जार् सकतार् है-

  • ‘अ’ ग्रेड़ – इस श्रेणी में म ख्यतयार् जड क ऊपर वार्लार् भार्ग आतार् है जो प्रार्य: चमकीलार् तथार् हल्के छिलके वार्लार् होतार् है। जड़ क यह भार्ग अंदर से ठोस तथार् सफेद होतार् है तथार् इसमें स्टाच अधिक तथार् एल्केलार्इड्स कम पार्ए जार्ते हैं। इस भार्ग की औसत लंबाइ 5 से 7 सेमी. तथार् इसक व्यार्स 10 से 12 मि.मी. रहतार् है।
  • ‘ब’ ग्रेड़ – इस श्रेणी में जड क बीच वार्लार् हिस्सार् आतार् है। जड़ के इस भार्ग की औसतन लंबाइ 3.5 से.मी. तथार् इसक व्यार्स 5 से 7 मिमी. रहतार् है। इस भार्ग में स्टाच कम होती है जबकि इसमें एल्केलार्इड्स ज्यार्दार् होते हैं।
  • ‘स’ ग्रेड़ – जड़ के निचले आखिरी किनार्रे क श्रेणीकरण ‘स’ गे्रड में कियार् जार्तार् है।

इसके अतिरिक्त पतले रेशे भी इसी श्रेणी में आते हैं। इस भार्ग में एल्केलार्इड्स की मार्त्रार् काफी अधिक होती हैं। तथार् ‘‘एक्सट्रेक्स’’ निर्मार्ण की दृष्टि से जड़ क यह भार्ग सर्वार्धिक उपयुक्त होतार् है। इसके अतिरिक्त अधिक मोटी, ज्यार्दार् काष्ठीय, कटी-फटी तथार् खोखली जड़ों तथार् उनके टुकड़ों को ‘द’ श्रेणी में रखार् जार्तार् है। इस प्रकार श्रेणीकरण कर लेने से फसल क अच्छार् मूल्य मिल जार्तार् है।

अश्वगंधार् के जडें

उत्पार्दन तथार् प्रार्प्तियार्ं

मध्य प्रदेश के मंदसौर तथार् नीमच जिले में किसार्नों द्वार्रार् बड़े स्तर पर की जार् रही अश्वगंधार् की फसल के परिणार्म दर्शार्ते हैं कि यहार्ं पर किसार्न औसतन एक से डेढ़ क्विंटल जड़ें प्रति एकड़ प्रार्प्त करते हैं। हार्लार्ंकि वस्तुस्थिति देखने पर यह अंदार्जार् स्वयं ही लगार्यार् जार् सकतार् है कि इन क्षेत्रों में अश्वगंधार् की खेती अधिकांशत: ‘‘नॉन सीरियसली’’ की जार्ती है तथार् उपयुक्त कृषि क्रियार्ओं पर कोर्इ विशेष ध्यार्न नहीं दियार् जार्तार्। यदि समस्त उपयुक्त कृषि क्रियार्एं अपनार्ते हुए अश्वगंधार् की खेती की जार्ए तो एक एकड़ से औसतन 2 क्विंटल जड़ें किसार्न को प्रार्प्त हो सकती हैं। इनके सार्थ-सार्थ प्रति एकड़ लगभग 25 से 30 कि.ग्रार्. बीज भी किसार्न को प्रार्प्त होतार् है। जहार्ं तक इससे होने वार्ली प्रार्प्तियों क प्रश्न है तो अश्वगंधार् की फसल से तीन प्रकार की प्रार्प्तियार्ं हो सकती हैं- जड़ की बिक्री से प्रार्प्तियार्ं, बीज की बिक्री से प्रार्प्तियार्। एक औसत दर के अनुसार्र अश्वगंधार् की जड़ें 5500 रु. प्रति क्विंटल की दरसे बिक सकती है जिनसे 1.5 क्विंटल उत्पार्दन होने पर लगभग 8250 रु. की प्रार्प्तियार्ं होंगी। बीज की बिक्री 40 रु. प्रति किग्रार्. की दर से लगभग 1000रु. की प्रार्प्ति होती है। हार्लार्ंकि अभी अश्वगंधार् के पत्तों क निश्चित बार्जार्र नहीं है तथार् जरूरी नहीं कि इनकी मार्ंग हो ही परंतु यदि इनकी बिक्री हो जार्ए तो लगभग 1000 से 1500 रु. की अतिरिक्त प्रार्प्तियार्ं हो सकती हैं। वैसे जड़ तथार् बीज की बिक्री से प्रति एकड़ लगभग 9250 रु. की प्रार्प्तियार्ं हो सकती हैं जिसमें से यदि 1545 रु. क व्यय कम कर दियार् जार्ए तो किसार्न को इस एक एकड़ की फसल से लगभग 7705 रु. क शुद्ध लार्भ होगार्।

अश्वगंधार् की बिक्री की व्यवस्थार् 

अश्वगंधार् उन कछु गिनी-चनु ी फसलों में से है जिनक विपणन आसार्न तथार् सुनिश्चित है। एक तरफ जहार्ं स्थार्नीय बार्जार्रों में लगभग अधिकांश वैद्य इसकी खरीदी करते हैं वहीं अश्वगंधार् क एक्सट्रेक्ट बनार्ने वार्ली कर्इ इकाइयार्ं इसके थोक खरीददार्र हैं। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश के नीमच तथार् मंदसौर जिलों में यह कृषि उपज मंडियों के मार्ध्यम से भी बेचार् जार् सकतार् है। इस प्रकार अश्वगंधार् क विपणन काफी आसार्न है।

अश्वगंधार् की खेती के आर्थिक पहलू

छ: मार्ह की अवधि की अश्वगंधार् की खेती पर प्रति एकड़ लगभग 6,000/- रू0 की लार्गत आती है जबकि इसके उत्पार्दों से लगभग 20,000/- रू. की प्रार्प्तियार्ँ होती है। यदि खेती कार्बनिक पद्धति से की जार्ए तो फसल की 30 प्रतिशत अधिक कीमत मिल सकती है। अश्वगंधार् एक बहुउपयोगी औषधीय फसल है जिसे कृषक वर्ग व्यवसार्यिक खेती के रूप में अपनार्कर अधिकाधिक लार्भ प्रार्प्त कर सकतार् है। अश्वगंधार् की खेती से सम्बन्धित प्रति एकड आय-व्यय क ब्यौरार् क्र. लार्गत क ब्यौरैरार् 1. खेत की तैयार्री पर व्यय 500/- 2. बीज की लार्गत 500/- (5 किग्रार्0 बीज 500 रू0 प्रति किग्रार्0 की दर से) 3. खार्द तथार् कीटनार्णकों की लार्गत 500/- 4. पार्नी देने निराइ, गुड़ाइ तथार् पौध संरक्षण पर व्यय 500/- 5. जड़ें इकट्ठी कर सार्फ करने, ग्रेडिंग करने तथार् पैकिंग पर व्यय 1,000/- योगेगेग 3,000/- ख. प्रार्प्तियार्ँ 1. जड़ों की बिक्री से प्रार्प्तियार्ँ 12,000/- (तीन कुन्तल जड़ें 4,000/-रू0 प्रति कुन्तल की दर से) 2. बीजों के रूप में प्रार्प्तियार्ँ 2,000/- (20 किग्रार्0 बीज 100/- रू0 प्रति किग्रार्0 की दर से) योगेगेग 14,000/- ग. लार्भ प्र्िर्िरति एकड़ 11,000/-

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