अल्पविकसित देश क आशय एवं विशेषतार्एं

मोटे तौर पर विश्व के देशों को दो भार्गों में बार्ंटार् जार्तार् है – विकसित तथार् अल्पविकसित अथवार् धनी तथार् निर्धन रार्ष्ट्र। निर्धन देशों को कई नार्मों से पुकारार् जार्तार् है जैस निर्धन, पिछड़े, अल्प विकसित, अविकसित और विकासशील देश। वैसे तो यह सभी शब्द पर्यार्यवार्ची है परन्तु इनके प्रयोग में मतभेद रहार् है। उदार्हरण के तौर पर मार्यर एवं बार्ल्डविन और बार्रबरार् वाड ने ‘अल्प-विकसित’ के बजार्य ‘निर्धन’ शब्द को वार्रीयतार् दी है क्योंकि उनके मतार्नुसार्र अल्प विकसित शब्द अल्प विकास के अत्यधिक असमार्न स्वरों (स्तरों) को एक सार्थ जोड़ देतार् है। अल्पविकसित देशों के लिए ‘पिछड़ार्’ शब्द भी उपयुक्त नहीं है क्योंकि पिछड़ार् और निर्धन, यह दोनों शब्द इन देशों के लोगों की भार्वनार् एवं आत्म गौरव को ठेस पहुंचार्ते हैं। प्रो0 गुन्नार्र मिर्डल ने इसी कारण एक अधिक गतिशील एवं व्यार्पक शब्द ‘अल्प विकसित’ क समर्थन कियार् है हमार्री रार्य में यह अधिक उपयुक्त हैं क्योंकि यह शब्द विकास की दो चरम सीमार्ओं-अविकसित और विकसित – के मध्य में स्थित होने के कारण इन देशों को अगले छोर पर पहुंचने के लिये प्रेरित करतार् है। यहॉ आपको यह बतार्नार् आवष्यक है कि हार्ल के वर्षों में ऐसे देशों के लिये तुलनार्त्मक रूप में एक अधिक सम्मार्नजनक शब्द ‘विकासशील देश’ क प्रयोग होने लगार् है। भले ही यह शब्द कर्णप्रिय है परन्तु सही अर्थों में यह शब्द एक अवरूद्ध अर्थव्यवस्थार् के बजार्य विकास की ओर पलार्यन करती हुई अर्थ व्यवस्थार् क प्रतीक है। उदार्हरणाथ, एक अल्प विकसित देश मे जन्म व मृत्युदर दोनों ऊंची होती हैं जबकि विकासशील देश में ऊचीं जन्म दर के बार्वजूद मृत्युदर घटने लगती है। हार्ल ही में इन देशों के लिये एक नयार् शब्द ‘तीसरार् विश्व’ प्रयुक्त होने लगार् है। बहरहार्ल इस विवार्द को यहीं विरार्म देते हुए हम इन सभी शब्दों क प्रयोग पर्यार्यवार्ची के रूप में करेंगे।

अल्पविकसित तथार् विकासशील अर्थव्यवस्थार्

अल्प विकास यार् अल्प विकसित देश को परिभार्षित करनार् काफी कठिन है। प्रो0 सिंगर क भी मत है कि ‘एक अल्प विकसित देश ‘जिरार्फ’ की भार्ंति है जिसक वर्णन करनार् कठिन है। लेकिन जब हम इसे देखते हैं तो समझ जार्ते हैं।’ वैसे अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् के अनेक मार्पदण्ड प्रस्तुत किये गए हैं जैसे निर्धनतार्, अज्ञार्नतार्, निम्न प्रति व्यक्ति आय, रार्ष्ट्रीय आय क असमार्न वितरण, जनसंख्यार् भूमि अनुपार्त, प्रशार्सनिक अयोग्यतार्, सार्मार्जिक बार्धार्यें इत्यार्दि।

  1. प्रो0 डब्ल्यू0 डब्ल्यू0 सिंगर – क मत है कि अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् को परिभार्षित करने क कोई भी प्रयार्स, समय को बर्बार्द करनार् है। फिर भी किसी एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए यह आवश्यक होगार् कि कुछ प्रचलित परिभार्षार्ओं क अध्ययन कर लियार् जार्ए।
  2. संयुक्त रार्ष्ट्र संघ – की एक विज्ञप्ति के अनुसार्र ‘‘अल्प विकसित देश वह है जिसकी प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय अमेरिका, कनार्डार्, आस्ट्रेलियार् तथार् पश्चिम यूरोपीय देशों की प्रति व्यक्ति वार्स्तविक आय की तुलनार् में कम है।’’
  3. प्रो0 मेकलियोड – के मतार्नुसार्र ‘‘एक अल्प विकसित देश अथवार् क्षेत्र वह है जिसमें उत्पत्ति के अन्य सार्धनों की तुलनार् में उद्यम एवं पूंजी क अपेक्षार्कृत कम अनुपार्त है परन्तु जहार्ं विकास सम्भार्व्यतार्यें विद्यमार्न हैं और अतिरिक्त पूंजी को लार्भजनक कार्यों में विनियोजित कियार् जार् सकतार् है।’’
  4. प्रो0 जे0 आर0 हिक्स – के शब्दों में ‘‘एक अल्प विकसित देश वह देश है जिसमें प्रौद्योगिकीय और मौद्रिक सार्धनों की मार्त्रार्, उत्पार्दन एवं बचत की वार्स्तविक मार्त्रार् की भार्ंति कम होती है, जिसके फलस्वरूप प्रति श्रमिक को औसत पुरस्कार उस रार्शि से बहुत कम मिलतार् है जो प्रार्विधिक विकास की अवस्थार् में उसे प्रार्प्त हो पार्तार् है।’’

यह परिभार्षार् केवल प्रार्वधिक घटक पर ध्यार्न देने के कारण एकांगी मार्नी जार्ती है। प्रार्विधिक घटक के अलार्वार् कुछ अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक, प्रार्कृतिक, सार्मार्जिक घटकों को दृष्टि में नहीं रखार् गयार् है।

  1. प्रो0 ऑस्कर लैंज – की दृष्टि में ‘एक अल्प-विकसित अर्थव्यवस्थार् वह अर्थव्यवस्थार् है जिसमें पूंजीगत वस्तुओं की उपलब्ध मार्त्रार् देश की कुल श्रम शक्ति को आधुनिक तकनीक के आधार्र पर उपयोग करने के लिये पर्यार्प्त नहीं है।’’
  2. ऑस्कर लैंज एवं नर्कसे के विचार्र मेकलियोड की भार्ंति ही त्रुटिपूर्ण है। आर्थिक विकास के लिए पूंजी एक आवश्यक शर्त है परन्तु एक मार्त्र नहीं। परिभार्षार् में अन्य आवश्यक तत्वों की ओर संकेत नहीं कियार् गयार् है।
  3. जैकब वार्ईनर – के अनुसार्र ‘अल्प विकसित देश वह देश है जिसमें अधिक पूंजी अथवार् अधिक श्रम-शक्ति अथवार् अधिक उपलब्ध सार्धनों अथवार् इन सबको उपयोग करने की पर्यार्प्त संभार्वनार्यें हों, जिससे कि वर्तमार्न जनसंख्यार् के रहन सहन के स्तर को ऊंचार् उठार्यार् जार् सके, और यदि प्रति व्यक्ति आय पहले से ही काफी अधिक है तो रहन सहन क स्तर को कम किये बिनार्, अधिक जनसंख्यार् क निर्वार्ह कियार् जार् सके। 
  4. यूजीन स्टैले – के विचार्रार्नुसार्र ‘अल्प विकसित देश वह देश है जहार्ं जनसार्धार्रण में दरिद्रतार् व्यार्प्त है जो अत्यन्त स्थार्यी व पुरार्तन है, जो किसी अस्थार्यी दुर्भार्ग्य क परिणार्म नहीं है, बल्कि उत्पार्दन के घिसे पिटे परम्परार्गत तरीकों और अनुपयुक्त सार्मार्जिक व्यवस्थार् के कारण हैं। जिसक अभिप्रार्य यह है कि दरिद्रतार् केवल प्रार्कृतिक सार्धनों की कमी के कारण नहीं होती है और इसे अन्य देशों में श्रेष्ठतार् के आधार्र पर परखे हुए तरीकोंं द्वार्रार् सम्भवत: कम कियार् जार् सकतार् है।’
  5. भार्रतीय योजनार् आयोग – के अनुसार्र ‘एक अल्प विकसित देश वह देश है जहार्ं पर एक ओर अप्रयुक्त मार्नवीय शक्ति और दूसरी ओर अवशोषित प्रार्कृतिक सार्धनों क कम यार् अधिक मार्त्रार् में सह अस्तित्व क पार्यार् जार्नार् है।’

सार्मार्न्यतयार् एक अल्प विकसित देष वह है जहार्ं जनसंख्यार् की वृद्धि की दर अपेक्षार्कृत अधिक हो, पर्यार्प्त मार्त्रार् में प्रार्कृतिक सार्धन उपलब्ध होंं, परन्तु उनक पूर्णरूपेण विदोहन न हो पार्ने के कारण उत्पार्दकतार् व आय क स्तर नीचार् हो। सरल शब्दों में, वह देश अल्प विकसित देश मार्नार् जार्एगार् जिसक आर्थिक विकास सम्भव तो हो, किन्तु अपूर्ण हो।

अल्पविकसित तथार् विकासशील अर्थव्यवस्थार् की विशेशतार्यें

एक विकासशील यार् अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् वार्ले देश में कौन सी आधार्र भूत विशेषतार्एं पार्यी जार्ती हैं, इस सम्बन्ध में सर्वमार्न्य विशेषतार्एं बतार्नार् कठिन है। इसक कारण यह है कि भिन्न भिन्न विकासशील यार् अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार्ओं में भिन्न भिन्न विशेषतार्एं पार्यी जार्ती हैं। मार्नर एवं बार्ल्डबिन ने अपनी पुस्तक “Economic Development” में अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् के छ: आधार्रभूत लक्षण बतार्ये हैं :-

  1. प्रार्थमिक उत्पार्दन की प्रधार्नतार्
  2. जनसंख्यार् दबार्व,
  3. अल्प विकसित प्रार्कृतिक सार्धन,
  4. जनसंख्यार् क आर्थिक दृष्टि से पिछड़ार् होनार्
  5. पूंजी क अभार्व
  6. विदेशी व्यार्पार्र की उन्मुखतार्।

हावे लिबिन्सटीन ने अल्प विकसित देशों की चार्र विशेषतार्एं बतार्यी हैं।

  1. आर्थिक, 
  2. जनसंख्यार् सम्बन्धी, 
  3. प्रार्विधिक तथार् 
  4. सार्ंस्कृतिक एवं रार्जनीतिक। 

उपर्युक्त विवेचन के आधार्र पर हमने एक अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् की विशेषतार्ओं को छ: भार्गों में बार्ंटार् है। 1. आर्थिक विशेषतार्एं, 2. जनसंख्यार् सम्बन्धी विशेषतार्एं, 3. तकनीकी विशेषतार्एं, 4. सार्मार्जिक विशेषतार्एं, 5. रार्जनीतिक विशेषतार्एं एवं 6. अन्य विशेषतार्एं।

आर्थिक विशेषतार्एं

  1. कृषि की प्रधार्नतार् – अल्प विकसित देशों की सबसे प्रमुख विशेषतार् अधिकांश जनतार् क कृषि में लगे रहनार् है। यहार्ं कृषि से अर्थ कृषि, बार्गवार्नी, जंगल कटार्ई, पशुपार्लन व मछली पार्लन आदि से है। भार्रत, इण्डोनेशियार्, पार्किस्तार्न, आदि देशों को अल्प विकसित मार्नार् जार्तार् है, क्योंकि भार्रत की 51.2 प्रतिशत जनसंख्यार्, इण्डोनेशियार् की 57 प्रतिशत जनसंख्यार् एवं पार्किस्तार्न की 56 प्रतिशत जनसंख्यार् कृषि कार्यों में लगी है, जबकि विकसित देश फ्रार्ंस, कनार्ड़ार्, अमरीक एवं ब्रिटेन की कुल जनसंख्यार् क प्रतिशत बहुत कम है, जैसे फ्रार्ंस की 5 प्रतिशत, कनार्ड़ार् की 3 प्रतिशत, अमरीक की 1 प्रतिशत व ब्रिटेन की 2 प्रतिशत। यही कारण है कि अल्प विकसित देशों की रार्ष्ट्रीय आय, निर्यार्त व्यार्पार्र व उद्योग कृषि पर आधार्रित होते हैं।
  2. प्रार्कृतिक सार्धनों क अल्प उपयोग – अल्प विकसित देशों में प्रार्कृतिक सार्धनों के प्रचुर मार्त्रार् में उपलब्ध होने के बार्द भी उनक उपयोग यार् तो होतार् ही नही है और यदि होतार् भी है तो बहुत ही कम मार्त्रार् में। कभी-कभी तो अल्प विकसित देशों को इस बार्त क पतार् ही नहीं होतार् कि उनके देश में प्रार्कृतिक सार्धन उपलब्ध है।
  3. प्रति व्यक्ति आय क निम्न स्तर – इन देशों में प्रति व्यक्ति आय क स्तर निम्न होतार् है। World Development Report, 2009 के अनुसार्र भार्रत की प्रति व्यक्ति आय 950 डॉलर है, जबकि भार्रत की तुलनार् में प्रति व्यक्ति आय अमेरिक में 46040 डॉलर, जार्पार्न में 37670 डॉलर तथार् यू0 के0 में 42740 डार्लर है।
  4. पूंजी निर्मार्ण क निम्न स्तर – यहार्ं पूजी निर्मार्ण क स्तर निम्न है। अल्प विकसित देशों में घरेलू निवेश की दर रार्ष्ट्रीय आय की 5 से 10 प्रतिशत तक होती है, जबक विकसित देशों में यह 20 से 25 प्रतिशत तक की होती है। वर्तमार्न में भार्रत में पूंजी निर्मार्ण की दर 39.1 प्रतिशत है।
  5. सम्पत्ति एवं आय वितरण में असमार्नतार् – अल्प विकसित देशों में रार्ष्ट्रीय सम्पत्ति एवं आय क बहुत बड़ार् भार्ग कुछ ही व्यक्तियों के अधिकार में होतार् है, जबकि जनसंख्यार् के बड़े भार्ग को सम्पत्ति एवं आय क छोटार् सार् हिस्सार् मिल पार्तार् है।
  6. औद्योगिक पिछड़ार्पन – अल्प विकसित देश औद्योगिक विकास की दृष्टि से पिछड़े हुए होते हैं। इसक अर्थ यह है कि यहार्ं आधार्रभूत उद्योगों क अभार्व होतार् है। यहार्ं कुछ उद्योग जो उपभोक्तार् वस्तु यार् कृषि वस्तु बनार्ते हैं उनक ही विकास हो पार्तार् है। औद्योगिक पिछड़ेपन की पुष्टि इस अनुमार्न से हो जार्ती है कि 74 प्रतिशत जनसंख्यार् वार्ले देश विश्व औद्योगिक उत्पार्दन में केवल 20 प्रतिशत क ही योगदार्न देते हैं शेष 80 प्रतिशत उत्पार्दन विकसित देशों में ही होतार् है।
  7. अल्प रोजगार्र व बेरोजगार्री – इन अल्प विकसित देशों में अल्प रोजगार्र के सार्थ-सार्थ बेरोजगार्री भी होती है। जिन लोगों को काम मिलार् हुआ होतार् भी है उनको भी पूरे समय के लिए काम नहीं मिलतार् है। इन देशों में कुछ लोग सदार् ही बेरोजगार्र बने रहते हैं। उनके लिए समार्ज के पार्स कोई कार्य नहीं होतार् है। इसक मुख्य कारण औद्योगीकरण की कमी एवं पूजी निवेश क अभार्व है।
  8. बैंकिंग सुविधार्ओं क अभार्व – अल्प विकसित देशों में बैंकिंग सुविधार्ओं क अभार्व रहतार् है। ग्रार्मीण क्षेत्रों में तो बैंकिग सुविधार्एं ही कम होती हैं। ऐसार् अनुमार्न लगार्यार् गयार् है कि अल्प विकसित देशों में यह प्रतिशत 60 तक होतार् है।
  9. आर्थिक दुष्चक्र –अल्प विकसित देशों में आर्थिक दुष्चक्रों की प्रधार्नतार् रहती है। वहार्ं पूंजी की कमी से उत्पार्दन कम होतार् है। इससे वार्स्तविक आय कम होती है। अत: वस्तुओं की मार्ंग कम रहती है। इन सबक परिणार्म यह होतार् है कि सार्धनों क उचित विकास नहीं हो पार्तार् है इस प्रकार यह कुचक्र चलतार् रहतार् है और इससे अर्थव्यवथार् निरन्तर प्रभार्वित होती रहती है।
  10. विदेशी व्यार्पार्र में अस्थिरतार् – अल्प विकसित देशों के कच्चे मार्ल क निर्यार्त व पक्के मार्ल क आयार्त कियार् जार्तार् है। कच्चे मार्ल की वस्तुओं के मूल्य अन्तर्रार्ष्ट्रीय बार्जार्र में स्थिर नहीं रहते हैं। इससे विदेशी मुद्रार् अर्जन में घटार् बढ़ी होती रहती है जिससे देश की अर्थव्यवस्थार् भी स्थिर नहीं रहती है।
  11. ऊंची जन्म व मृत्यु दरें – अल्प विकसित देशों में जन्म दर व मृत्यु दर अपेक्षार्कृत ऊंची रहती है। एक अनुमार्न के अनुसार्र विकसित देशों में जन्म दर व मृत्यु दर क्रमश: 15 से 20 प्रति हजार्र व 9 से 10 प्रति हजार्र होती है, जबकि अल्प विकसित देशों मे यह दरें क्रमश: 30 से 40 प्रति हजार्र व 15 से 30 प्रति हजार्र तक होती है। अल्प विकसित देशों में ऊंची जन्म दर के कारण हैं – सार्मार्जिक धार्रणार् एवं विश्वार्स, पार्रिवार्रिक मार्न्यतार्, बार्ल विवार्ह, विवार्ह की अनिवायतार्, भार्ग्यवार्दितार्, मनोरंजन सुविधार्ओं क अभार्व, निम्न आय व निम्न जीवन-स्तर, निरोधक सुविधार्ओं क अभार्व आदि। इसी प्रकार यहार्ं ऊंची मृत्युदर के कारण हैं – अकाल व महार्मार्री, लोक स्वार्स्थ्य सुविधार्ओं क अभार्व, स्त्री शिक्षार् क अभार्व, पौष्टिक आहार्र क अभार्व आदि। भार्रत में वर्तमार्न में जन्म दर 23.1 व मृत्युदर 7.4 प्रति हजार्र है।
  12. ग्रार्मीण जनसंख्यार् की अधिकतार् – अल्प विकसित देशों में अधिकांश जनसंख्यार् ग्रार्मीण क्षेत्रों में रहती है जिसक मुख्य व्यवसार्य कृषि होतार् है। भार्रत की 65 प्रतिशत जनसंख्यार् गार्ंवों में व शेष शहरों में रहती है।
  13. जनसंख्यार् क आधिक्य – अल्प विकसित देशों में जनसंख्यार् क घनत्व अधिक होतार् है, जबकि विकसित देशों में उतनार् नहीं होतार् है। सार्थ ही अल्प विकसित देशों में जनसंख्यार् तीव्र गति से बढ़ती है। अत: यहार्ं जनसंख्यार् क आकार व घनत्व अधिक होतार् है। 
  14. आश्रितों की अधिकतार् – अल्प विकसित देशों में एक परिवार्र में आश्रितों की मार्त्रार् अधिक होती है। इसक अर्थ यह है कि इन देशों में कमार्ने वार्ले कम होते हैं, जबकि खार्ने वार्ले अधिक। इसक कारण यह है कि यहार्ं बच्चों व बूढ़ों की संख्यार् विकसित देशों की तुलनार् में अधिक होती है।
  15. अकुशल जनशक्ति की अधिकतार् – अल्प विकसित देशों में अकुशल जनशक्ति की अधिकतार् रहती है। इसके कारण शिक्षार् व प्रशिक्षण क अभार्व, प्रति व्यक्ति निम्न आय, संयुक्त परिवार्र प्रणार्ली, रूढ़िवार्दितार्, भार्ग्यवार्दितार्, आत्मसन्तोष की भार्वनार् आदि है। 
  16. निम्न प्रत्यार्शित आयु – विकसित देशों की तुलनार् में अल्प विकसित देशों की प्रत्यार्शित आयु (Life exectanpcy) कम होती है। विकसित देशों में प्रत्यार्शित आयु औसतन 74 से 82 वर्ष होती है, जैसे जार्पार्न में 81 वर्ष, स्विटजरलैण्ड में 80 स्वीडन में 79 वर्ष, अमरीक में 77 वर्ष, ब्रिटेन में 77 वर्ष फ्रार्ंस में 79 वर्ष। अल्प विकसित देशों में यह 40 से 60 वर्ष ही है। भार्रत में प्रत्यार्शित आयु 63.5 वर्ष है।

तकनीकी विशेषतार्एं

  1. पुरार्नी उत्पार्दन विधि – अल्प विकसित देशों में वही पुरार्नी उत्पार्दन विधि ही पार्यी जार्ती है जिसे उन्नत देश छोड़ चुके हैं। उदार्हरण के लिए अल्प विकसित देशों में कृषि उत्पार्दन पुरार्ने तरीके से ही होतार् है, जबकि उन्नत देश टै्रक्टर व आधुनिक मशीनों क प्रयोग करते हैं। कृषि के क्षेत्र में ही नहीं, लगभग सभी क्षेत्रों में अल्प विकसित देशों में पुरार्नी उत्पार्दन विधि ही पार्यी जार्ती है।
  2. तकनीकी शिक्षार् क अभार्व – अल्प विकसित देशों मे तकनीकी शिक्षार् सम्बन्धी सुविधार्ओं क अभार्व होतार् है तथार् उनके द्वार्रार् अनुसंधार्न व शोध कार्यों पर बहुत कम व्यय कियार्जार्तार् है। इसके कारण अशिक्षार्, श्रम की गतिशीलतार् क अभार्व, परम्परार्वार्दी दृष्टिकोण तथार् औद्योगिकरण की कमी है।
  3. अपर्यार्प्त संचार्र एवं आवार्गमन सुविधार्एं – अल्प विकसित देशों में संचार्र एवं आवार्गमन के सार्धन अपर्यार्प्त होते हैं जिससे व्यार्पार्र सीमित मार्त्रार् में ही होतार् है तथार् श्रमिकों में गतिशीलतार् की कमी पार्यी जार्ती है।
  4. कुशल श्रमिकों क अभार्व – श्रमिकों की कुशलतार् बढाऱ्ने के लिए अल्प विकसित देशों में प्रशिक्षण सुविधार्ओं क अभार्व रहतार् है। इससे देश में कुशल श्रमिक कम मार्त्रार् में ही मिल पार्ते हैं।

सार्मार्जिक विशेषतार्एं

  1. सार्क्षरतार् की कमी – अल्प विकसित देशों में सार्क्षरतार् की कमी पार्यी जार्ती है। दूसरे शब्दों में, इन देशों में व्यार्पक निरक्षरतार् होती है। जिसक प्रतिशत 70 यार् इससे भी ऊपर होतार् है। विकसित देशों में निरक्षरतार् क प्रतिशत 5 से भी कम होतार् है। इस निरक्षरतार् के कारण ही यहार्ं के निवार्सी रूढ़िवार्दी, अन्धविश्वार्सी एवं भार्ग्यवार्दी होते हैं जो नवीन परिवर्तनों क धर्म के नार्म पर विरोध करते हैं। 2001 की जनगणनार् के अनुसार्र भार्रत में सार्क्षरतार् की दर 64.3 प्रतिशत है।
  2. जार्तिवार्द – इन देशों में वर्ग भेद व जार्तिवार्द की भार्वनार् व्यार्प्त होती है। जिसके परिणार्मस्वरूप यहार्ं के व्यक्तियों की सार्मार्जिक स्थिति भिन्न भिन्न होती है तथार् प्रत्येक जार्ति की अपनी परम्परार्एं एवं रीति रिवार्ज होती हैं।
  3. रीति रिवार्ज की प्रधार्नतार् – अल्प विकसित देशों में रीति रिवार्ज की प्रधार्नतार् होती है जिनको प्रत्येक व्यक्ति आंखें मूंदकर मार्नतार् है और समय समय पर उन्हीं रिवार्जों के अनुसार्र कार्य करतार् है जिसक परिणार्म यह होतार् है कि फिजूलखर्ची को बढ़ार्वार् मिलतार् है जिससे निवार्सी निर्धन व ऋणग्रस्त बने रहते हैं।
  4. स्त्रियों को निम्न स्थार्न – अल्प विकसित देशोंं में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नही होती है, उनक समार्ज में कोई महत्वपूर्ण स्थार्न नहीं होतार् है। उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रतार् नहीं होती है। उनमें सार्क्षरतार् भी कम होती है। वे अपनार् पेट भरने के लिए पुरूषों पर निर्भर रहती हैं।

रार्जनीतिक विशेषतार्एं

  1. अधिकारों के प्रति ज्ञार्न न होनार् – अल्प विकसित देशों में जनतार् अपने अधिकारों के प्रति ज्ञार्नवार्न नहीं होती है। अत: उसमें अधिकारों के प्रति जार्गरूकतार् नहीं पार्यी जार्ती है। इसक कारण यह है कि यहार्ं के लोग अपनी दरिद्रतार् को ईश्वरीय देन मार्नते हैं।
  2. दुर्बल रार्ष्ट्र – अल्प विकसित देश विकसित देशों के मुकाबले दुर्बल होते हैं और ऐसे देशों पर सदार् ही विदेशी रार्ष्ट्रों क आधिपत्य किसी न किसी रूप में बनार् रहतार् है।
  3. आधुनिक सेनार् क अभार्व – ऐसे देशों के पार्स आधुनिक अस्त्रों से लैस सेनार् क अभार्व होतार् है।
  4. प्रशार्सनिक अकुशलतार् – इन रार्ष्ट्रों में प्रशार्सनिक कुशलतार् एवं ईमार्नदार्री क अभार्व होतार् है। रार्जनीतिक नेतार् भी इस सम्बन्ध में कोई अच्छार् उदार्हरण प्रस्तुत नहीं करते हैं। अत: यहॉं कालार्बार्जार्री, भ्रष्टार्चार्र व बेईमार्नी विस्तृत रूप में पार्यी जार्ती है।

अन्य विशेषतार्एं

  1. दोषपूर्ण वित्तीय संगठन – अल्प विकसित देशों में वित्तीय संगठन दोषपूर्ण होतार् है। इन देशों में परोक्ष कर अधिक लगार्ये जार्ते हैं। मुद्रार् बार्जार्र असंगठित होतार् है। बैंकिंग व्यवस्थार् प्रभार्वशार्ली नहीं होती है। सरकारी आय के सार्धन भी सीमित होते हैं। 
  2. स्थिर व्यार्वसार्यिक ढार्ंचार् – इन देशों में व्यार्वसार्यिक ढार्ंचार् स्थिर रहतार् है। इसक अर्थ यह है कि इन देशों ने व्यवसार्यिक ढार्ंचार् एक जैसार् रहतार् है, उसमें परिवर्तन नहीं होतार् है।

विकसित तथार् अल्प विकसित देश में अंतर

डॉ0 स्टीफैन ने इस दृष्टि से एक अल्प विकसित अर्थव्यवस्थार् को ‘अनाथिक संस्कृति’ क नार्म दियार् है। उनक मत है कि ‘परम्परार्गत सार्मार्जिक मनोवृत्ति मार्नवी सार्धनों के पूर्ण उपयोग को कुंठित करती है जिसके फलस्वरूप एक रूढ़िवार्दी मार्नव समार्ज भौतिक पर्यार्वरण में बदलार्व लार्ने और उपभोग में अतिरिक्त वृद्धि के प्रति उदार्सीन हो जार्तार् है।’

विकास के अंग  विकसित देश अल्प-विकसित देश
आर्थिक स्थिति  उच्च प्रति व्यक्ति GNP,
औसत 25000 डॉलर।
निम्न प्रति-व्यक्तिGNP,औसतन
1100 डॉलर।
कृषि  जसंख्यार् क लगभग 2:5
प्रतिशत कृषि कार्य में संलग्न। 
जनसंख्यार् क औसतन 50-65
प्रतिशत कृषि में लगार् होनार्।
उद्योग बृहत स्तरीय उत्पार्दन  व्यवस्थार् लघु-स्तरीय उत्पार्दन ढार्ंचार्।
प्रार्विधिक स्तर उन्नत प्रार्विधिक-स्तर विशेष
कर पूंजी प्रधार्न तकनीकी का
प्रयोग कियार् जार्नार्। 
तकनीकी द्वैतवार्द, मुख्यतयार् श्रम
प्रधार्न तकनीकी क प्रयोग
कियार् जार्नार्।
जनसंख्यार्  सन्तुलित जनसंख्यार् कार्यशील
जनसंख्यार् क अधिक प्रतिशत 
जन्म-दर ऊंची व मृत्युदर क कम होनार् अकार्यशील जनसंख्यार् क अधिक प्रतिशत। 
रोजगार्र  लगभग पूर्ण रोजगार्र। व्यार्पक बेरोजगार्री। संरचनार्त्मक
एवं अदृश्य बेरोजगार्री 
बचत निवेश रार्ष्ट्रीय आय के अनुपार्त में
बचत तथार् निवेश क उच्च
स्तर।
रार्ष्ट्रीय आय के अनुपार्त में बचत
तथार् निवेश क नीचार् स्तर। 
प्रार्कृतिक सार्धन पर्यार्प्त प्रार्कृतिक सार्धन और  उनक पूर्ण शोषण  कियार्
जार्नार्।
पर्यार्प्त प्रार्कृतिक सार्धन, परन्तु
पूर्ण विदोहन सम्भव न होनार्।
निर्यार्त  निर्यार्त पर कम निर्भरतार्।  निर्यार्त पर अधिक निर्भरतार्।
पूंजीनिर्मार्ण प्रति व्यक्ति ऊंचार् पूंजी अनुपार्त प्रति व्यक्ति कम पूंजी अनुपार्त।


यद्यपि उपरोक्त विवरण से विकसित और अल्प विकसित यार् विकासशील अर्थव्यस्थार् में अंतर स्वत: स्पष्ट तथार् विद्याथियों की सुविधार् हेतु हमने विभिन्न विकास अंगों के रूप में इन दोनों प्रकार की अर्थ व्यवस्थार्ओं में अंतर क एक संक्षिप्त-सार्र प्रस्तुत कियार् है।

भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् क स्वरूप

क्यार् भार्रत एक अल्प विकसित अर्थ व्यवस्थार् है ? अल्प विकसित देशों की सार्मार्न्य विशेषतार्ओं के संदर्भ में अब हम भार्रत की आर्थिक स्थिति क अवलोकन करेंगे। भार्रत में प्रति व्यक्ति आय (GNP) 460 डॉलर है जबकि विकसित देशों क औसत लगभग 27500 डॉलर है। जन संख्यार् की वृद्धि-दर घटने के बार्वजूद हमार्रार् देश निरन्तर जनार्धिक्य की ओर बढ़ रहार् है। पहले की तरह कृषि आज भी आजीविक क प्रमुख आधार्र है। पिछड़ार् प्रार्विधिक स्तर, धीमार् पूंजी- निर्मार्ण और निम्न – उत्पार्दकतार् हमार्रे अल्प विकसित क प्रमार्ण हैं। आज सबसे बड़ी समस्यार् देश में चार्रो ओर फैली व्यार्पक बेरोजगार्री की है। आजीविक क अभार्व, आर्थिक विकास के बजार्ए पिछड़ेपन क प्रतीक है। देश में लगभग 26 प्रतिशत जनसंख्यार् निर्धनतार् रेखार् के नीचे हैं जिसमें से 10 प्रतिशत जनसंख्यार् अति निर्धन है। भार्रत संसार्र के सर्वार्धिक ऋणी देशों में से एक है। ‘विश्व बैंक रिपोर्ट’ के अनुसार्र विदेशी ऋणो के मार्मले में भार्रत क स्थार्न 1970 में पहलार्, 1980 में छठार्, 1990 में तीसरार्, 1995 में छठार् और 1999 में 10वार्ं थार्। जरार् सोचिए, हम किस विकास की बार्त कर रहे है ? हार्ं! विकास अवश्य हुआ है, पर केवल देश को दिशार्-निर्देश देने वार्ले भ्रष्ट कर्णधार्रों का।

भार्रत के अल्प विकास क एक पुख्तार् प्रमार्ण और भी है। ‘विश्व बैंक’ प्रतिवर्ष संसार्र के 133 प्रमुख देशों क प्रति व्यक्ति GNP के आधार्र पर उनके विकास की अवस्थार् क निर्धार्रण करतार् है। आय स्तर के आधार्र पर सभी देश तीन वर्गों में बार्ंटे गये हैं – निम्न आय देश, मध्यम आय देश और उच्च आय देश। रिपोर्ट 2002 के अनुसार्र , भार्रत निम्न आय देशों में शार्मिल थार् और विकासक्रम में उसक 96वार्ं स्थार्न थार्। अर्थार्त कुल 133 देशों में से 95 देश उससे अधिक धनी थे और केवल 37 देश उससे गरीब थे। विडम्बनार् तो यह है कि वर्ष 1995 में भार्रत क स्थार्न 113वार्ं, 1990 में 111वार्ं और 1983 में 123वार्ं थार्। स्पष्ट है कि भार्रत तीन दशक पहले भी निम्न आय देश थार् और आज भी एक स्थार्यी सदस्य के रूप में उसी लक्ष्मण रेखार् पर टिक हुआ है। जबकि उसकी बिरार्दरी के कई देश निम्न आय स्तर को लार्ंघ कर मध्य आय क्रम में शार्मिल हो चुके हैं।

वर्ष 2000 में भार्रत की 26 प्रतिशत जनसंख्यार् निर्धनतार् रेखार् से नीचे थी।

अंतर्रार्ष्ट्रीय निर्धनतार् रेखार् के अर्थ में, वर्ष 1999 में भार्रत की (i) 44 प्रतिशत जनसंख्यार् की प्रतिदिन आय 1 डॉलर से कम थी और (ii) 86 प्रतिशत जनसंख्यार् की आय 2 डॉलर से कम थी। ‘क्रय शक्ति समतार्’ के अर्थ में, वर्ष 2000 में भार्रत की प्रति व्यक्ति GNI 2390 डॉलर है जबकि विकासशील देशों क औसत 3890 डॉलर और उच्च आय देशों क औसत 27450 डॉलर है। भार्रत में वर्ष 1999 में ‘शिशु मृत्युदर’ 90 प्रति हजार्र थी। जबकि विकासशील देशों क औसत 85 और विकसित देशों क औसत 6 प्रति हजार्र थार्। मार्तृ मृत्युदर भार्रत में 440 प्रति लार्ख है। जबकि चीन में 95, श्रीलंक में 30, मलेशियार् में 34, जार्पार्न में 18 और कनार्ड़ार् में 6 है। भार्रत में वर्ष 1999 में वयस्क निरक्षरतार् 44 प्रतिशत थी जबकि चीन में 17, इथोपियार् में 63, पार्किस्तार्न में 55 और विकसित देशों में शून्य प्रतिशत है।

मार्नव तथार् लिंग विकास के सम्बन्ध में भार्रत की वैश्विक स्थिति इस प्रकार है। भार्रत क वर्ष 2001 में मार्नव विकास सूचकांक 0.571 थार् जबकि नावे क 0.939, चीन क 0.718 और बार्ंग्लार्देश क 0.470 थार्। भार्रत क लिंग विकास सूचकांक 0.533 थार् जबकि नावे क 0.937, चीन क 0.715 और बार्ंग्लार्देश क 0.309 थार्। वार्स्तव में, यह कुछ ऐसे मार्नदण्ड हैं जो भार्रत के अल्प विकसित देश की ओर संकेत करते हैं।

परन्तु इस तस्वीर क दूसरार् पहलू भी है। पिछले कुछ वर्षों से भार्रत विकास की स्थैतिक अवस्थार् से निकल कर प्रार्वैगिक अवस्थार् में प्रवेश कर चुक हैं। विकास प्रवृत्तियार्ं जन्म ले रही हैं। एक तरफ उद्योगों में विविधितार् आई है तो दूसरी ओर कृषि में हरित क्रार्न्ति क आभार्स होने लगार् है। बढ़ती हुई बचतें तथार् निवेश वृद्धि, पूंजी निर्मार्ण क संकेत है। खार्द्यार्नों में आत्मनिर्भरतार्, प्रार्विधिक विकास, बृहत औद्योगिक क्षमतार्, सड़कों व रेलों के बिछार्ये गये जार्ल, अध: संरचनार् क विकास, अणु परीक्षण-1997 एवं 2002 के सफल उपग्रह प्रक्षेपण हमार्रे आर्थिक विकास एवं प्रगति के सक्षम प्रमार्ण हैं। 1990-2000 के दशक में भार्रत के GDP की विकास दर 6 प्रतिशत रही है। जो पूरे विश्व में केवल कुछ गिने चुने देश ही हार्सिल कर पार्ये हैं। इसी दशक में GDP क विश्व औसत 2.6 प्रतिशत, विकासशील देशों क 3.6 प्रतिशत और उच्च आय देशों क औसत 2.5 प्रतिशत रहार् है। अत: यह कहार् जार् सकतार् है कि भार्रत अल्प विकास की सीमार्ओं को लार्ंघकर एक अग्रणी विकासशील देश के रूप में अगले उच्चतम पढ़ार्व के लिए निरन्तर प्रयत्नशील है।

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