अर्थव्यवस्थार् क अर्थ, विशेषतार्एं एवं प्रकार

अर्थव्यवस्थार् मार्नवीय आवश्यकतार्ओं की संतुष्टि करने के लिये एक मार्नव निर्मित संगठन है। ए.जे. ब्रार्उन के अनुसार्र, ‘‘अर्थव्यवस्थार् एक ऐसी पद्धति है जिसके द्वार्रार् लोग जीविक प्रार्प्त करते हैं।’’ जिस विधि से मनुष्य जीविक प्रार्प्त करने क प्रयार्स करतार् है वह समय तथार् स्थार्न के सम्बन्ध में भिन्न होती है। प्रार्चीनकाल में, ‘जीविक प्रार्प्त करनार्’ सरल थार् परन्तु सभ्यतार् के विकास के सार्थ यह अत्यंत जटिल हो गयार् है। यहार्ं यह ध्यार्न देनार् अत्यंत महत्वपूर्ण है कि जिस विधि से व्यक्ति जीविक अर्जन करतार् है वह वैध तथार् न्यार्यपूर्ण होनी चार्हिए। अन्यार्यपूर्ण तथार् अवैध कार्य जैसे लूटपार्ट, तस्करी से भी किसी को आय अर्जित हो सकती है परन्तु इसे लार्भदार्यक आर्थिक गतिविधि अथवार् जीविक प्रार्प्त करने की पद्धति की श्रेणी में नहीं लेनार् चार्हिये। इसलिये यह कहनार् उपयुक्त होगार् कि अर्थव्यवस्थार् एक संरचनार् है जहार्ं सार्री आर्थिक गतिविधियार्ं पूरी होती है।

अर्थव्यवस्थार् की मुख्य विशेषतार्एं

अर्थव्यवस्थार् की कुछ मुख्य विशेषतार्एं है :-

  1. आर्थिक संस्थार्एं मार्नव निर्मित होती है। अत: अर्थव्यवस्थार् वैसी ही होती है, जैसी हम उसे बनार्ते हैं।
  2. आर्थिक संस्थार्एं सृजित, विघटित, प्रतिस्थार्पित अथवार् परिवर्तित हो सकती हैं। उदार्हरण के लिये यू.एस.एस.आर. में 1917 में सार्म्यवार्द ने पूंजीवार्द को विस्थार्पित कर दियार् तथार् 1989 में भूतपूर्व यू.एस.एस.आर. में आर्थिक सुधार्रों की श्रृंखलार् के मार्ध्यम से सार्म्यवार्द ध्वस्त हो गयार्। भार्रत में स्वतंत्रतार् प्रार्प्ति के पश्चार्त 1947 में आर्थिक तथार् सार्मार्जिक सुधार्रों द्वार्रार् हमने जमींदार्री पद्धति क उन्मूलन कर दियार् तथार् अनेक भूमि सुधार्र लार्गू किये।
  3. आर्थिक गतिविधियों के स्तर में परिवर्तन होतार् रहतार् है।
  4. उत्पार्दक तथार् उपभोक्तार् समार्न व्यक्ति होते हैं। इस प्रकार उनकी भूमिक दोहरी होती है। उत्पार्दकों के रूप में वे कार्य करते हैं तथार् कुछ वस्तुओं तथार् सेवार्ओं क उत्पार्दन करते हैं और उसी को उपभोक्तार्ओं के रूप में उपभोग करते हैं।
  5. उत्पार्दन, उपभोग तथार् निवेश अर्थव्यवस्थार् की अति आवश्यक गतिविधियार्ं होती हैं।
  6. आधुनिक जटिल अर्थव्यवस्थार्ओं में हम मुद्रार् को विनिमय के मार्ध्यम के रूप में प्रयोग करते हैं।
  7. आजकल अर्थव्यवस्थार् मे सरकारी हस्तक्षेप को अवार्ंछनीय समझार् जार्तार् है तथार् सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थार्ओं में कीमतों एवं बार्जार्र शक्तियों की स्वतंत्र रूप से कार्य करने की वरीयतार् में वृद्धि हो रही है।

अर्थव्यवस्थार् के प्रकार

जैसार् कि आप जार्नते हैं, अर्थव्यवस्थार् एक मार्नव-निर्मित संगठन है, जिसक समार्ज की आवश्यकतार्ओं के अनुसार्र सृजन, विघटन तथार् उसमें परिवर्तन कियार् जार्तार् है। हम विभिन्न प्रकार की आर्थिक पद्धतियों में निम्नलिखित मार्नदण्डों के आधार्र पर भेद कर सकते हैं।

उत्पार्दन के सार्धनों अथवार् संसार्धनों के स्वार्मित्व तथार् नियंत्रण के आधार्र पर

संसार्धनों पर निजी व्यक्तियों क पूर्ण स्वार्मित्व हो सकतार् है। उन्हें इनक प्रयोग कर मन चार्हार् लार्भ कमार्ने की छूट हो सकती है। अथवार् ये सार्मूहिक स्वार्मित्व (सरकारी नियंत्रण) में हो सकते हैं तथार् सम्पूर्ण समार्ज के सार्मूहिक कल्यार्ण के लिये इनक उपयोग कियार् जार् सकतार् है। व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् के स्तर तथार् लार्भ के उद्देश्य की कसौटी के आधार्र पर अर्थव्यवस्थार्ओं क नार्मकरण इस प्रकार हो सकतार् है:

  • (अ) पूंजीवार्दी अथवार् स्वतंत्र उद्यम अर्थव्यवस्थार्
  • (ब) समार्जवार्दी अथवार् केन्द्रीय नियोजित अर्थव्यवस्थार्
  • (स) मिश्रित अर्थव्यवस्थार्

अब हम इनकी मुख्य विशेषतार्ओं की संक्षेप में चर्चार् करेंगे।

(अ) पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार्

पूंजीवार्दी यार् स्वतंत्र उद्यम अर्थव्यवस्थार् अर्थव्यवस्थार्ओं क प्रार्चीनतम स्वरूप है। प्रार्चीन अर्थशार्स्त्री आर्थिक मार्मलों में ‘पूर्ण स्वतंत्रतार्’ के पक्षधर थे। वे आर्थिक कार्यों में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम स्तर तक सीमित रखनार् चार्हते थे। पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार् की मुख्य विशेषतार्एं निम्नलिखित हैं;

  1. निजी संपत्ति – पूंजीवार्दी प्रणार्ली में प्रत्येक व्यक्ति को संपत्ति क स्वार्मी होने क अधिकार होतार् है। व्यक्ति अपनी संपत्ति को पार्कर उसे अपने परिवार्र के लार्भाथ प्रयोग करने को स्वतंत्र होते हैं। भूमि, मशीनों, खार्नों, कारखार्नों के स्वार्मित्व, लार्भ कमार्ने और धन संग्रह करने पर कोई रूकावट नहीं लगार्ई जार्ती है। व्यक्ति की मृत्यु के पश्चार्त उसकी संपत्ति उसके कानूनी उत्तरार्धिकारियों के नार्म अन्तरित हो जार्ती है। इस प्रकार उत्तरार्धिकार क नियम निजी संपत्ति व्यवस्थार् को जीवित रखतार् है।
  2. उद्यम की स्वतंत्रतार् – पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार् में सरकार नार्गरिकों की उत्पार्दक गतिविधियों में समन्वय लार्ने क प्रयार्स नहीं करती। सभी व्यक्ति अपनार् व्यवसार्य चुनने को स्वतंत्र होते हैं। उद्यम की स्वतंत्रतार् क अर्थ है कि सभी फर्में संसार्धन प्रार्प्त कर उन्हें अपनी किसी वस्तु और सेवार् के उत्पार्दन में लगार्ने के लिये स्वतंत्र होती हैं। ये फर्में अपने इच्छित बार्जार्रों में अपनार् उत्पार्दन बेचने को भी स्वतंत्र होती हैं। इसी प्रकार प्रत्येक श्रमिक अपनार् रोजगार्र और रोजगार्रदार्तार् चुनने को स्वतंत्र रहतार् है। छोटी व्यवसार्यिक इकाइयों में उनके मार्लिक स्वयं ही उत्पार्दन से जुड़े जोखिम उठार्ते हैं तथार् लार्भ अथवार् हार्नि उठार्ते हैं। किन्तु आधुनिक निगमित व्यवसार्य में जोखिम अंशधार्रियों के हिस्से में आते हैं और व्यवसार्य क संचार्लन वेतनभोगी ‘निदेशक’ करते हैं। अत: लार्भ कमार्ने के लिये अपनी पूंजी को प्रयोग कर अपनार् ही नियंत्रण होनार् आवश्यक नहीं रह गयार् है। सरकार यार् कोई अन्य संस्थार् श्रमिकों के किसी उद्योग में आने यार् उससे बार्हर जार्ने पर कोई बंधन नहीं लगार्ती। प्रत्येक श्रमिक वही रोजगार्र चुनतार् है जहार्ं से उसे अधिकतम आय प्रार्प्त हो सके।
  3. उपभोक्तार् प्रभुत्व – पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार् में उपभोक्तार् रार्जार् के समार्न होतार् है। उपभोक्तार् अधिकतम संतुष्टिदार्यक वस्तुओं और सेवार्ओं पर अपनी आय खर्च करने को पूरी तरह स्वतंत्र होते हैं। पूंजीवार्दी व्यवस्थार्ओं में उत्पार्दन कार्य उपभोक्तार्ओं द्वार्रार् किये गये चयनों के अनुसार्र किये जार्ते हैं। उपभोक्तार् की निर्बार्ध स्वतंत्रतार् को ही उपभोक्तार् की सत्तार् क नार्म दियार् जार्तार् है।
  4. लार्भ क उद्देश्य – पूंजीवार्द में मागदर्शन करने क सिद्धार्न्त स्वयं क हित होतार् है। उद्यमी जार्नते हैं कि अन्य उत्पार्दक सार्धनों को भुगतार्न के बार्द लार्भ अथवार् हार्नि उनकी होगी। अत: वे सदैव लार्गत को न्यूनतम और आगम को अधिकतम करने क प्रयार्स करते रहते हैं तार्कि उनको मिलने वार्लार् अन्तर (लार्भ) अधिकतम हो जार्ए। इसी से पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार् कुशल और स्वयं नियंत्रित अर्थव्यवस्थार् बन जार्ती है।
  5. प्रतियोगितार् – पूंजीवार्दी पद्धति में किसी व्यवसार्य में फर्मों के प्रवेश और उसकी निकासी पर कोई प्रतिबंध नहीं होतार् है। प्रत्येक वस्तु और सेवार् के बहुत से उत्पार्दक बार्जार्र में वस्तु की आपूर्ति कर रहे होते हैं। इस कारण कोई फर्म सार्मार्न्य से अधिक लार्भ नहीं कमार् पार्ती। प्रतियोगितार् पूंजीवार्द की एक आधार्रभूत विशेषतार् है और इसी के कारण उपभोक्तार् क शोषण से बचार्व होतार् है। यद्यपि आजकल फर्मों के बड़े आकार और उत्पार्द विभेदन के कारण बार्जार्र में कुछ एकाधिकारी प्रवृत्तियार्ं पनप रही हैं, फिर भी फर्मों की बड़ी संख्यार् और उनके बीच कड़ी प्रतियोगितार् सार्फ दिखार्ई पड़ जार्ती है।
  6. बार्जार्रों और कीमतों क महत्व – पूंजीवार्द की निजी संपत्ति, चयन की स्वतंत्रतार्, लार्भ क उद्देश्य और प्रतियोगितार् की विशेषतार्एं ही बार्जार्र की कीमत प्रणार्ली के सुचार्रू रूप से काम करने के लिये उपयुक्त परिस्थितियों क निर्मार्ण करती हैं। पूंजीवार्द मूलत: बार्जार्र आधार्रित व्यवस्थार् है जिसमें प्रत्येक वस्तु की एक कीमत होती है। उद्योगों में मार्ंग और आपूर्ति की शक्तियार्ं ही कीमत क निर्धार्रण करती हैं। जो फर्में उस निश्चित कीमत के अनुसार्र अपने उत्पार्दन को ढार्ल पार्ती हैं वही समार्न्य लार्भ कमार्ने में सफल रहती हैं। अन्यों को उद्योग से पलार्यन करनार् पड़तार् है। प्रत्येक उत्पार्दक उन्हीं वस्तुओं क उत्पार्दन करेगार् जिनसे उसे अधिकतम लार्भ मिल सके।
  7. सरकारी हस्तक्षेप क अभार्व – स्वतंत्र बार्जार्र अथवार् पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार् में समन्वयकारी संस्थार् क कार्य कीमत प्रणार्ली करती है। सरकारी हस्तक्षेप और सहार्रे की कोई आवश्यकतार् नहीं होती। सरकार की भूमिक बार्जार्र व्यवस्थार् के स्वतंत्र और कुशल संचार्लन में सहार्यतार् करती है।

(ब) समार्जवार्दी अर्थव्यवस्थार्

समार्जवार्दी यार् केन्द्रीय नियोजित अर्थव्यवस्थार्ओं में समार्ज के सभी उत्पार्दक संसार्धनों पर समार्ज के बेहतर हितों की पूर्ति के लिये सरकार क स्वार्मित्व और नियंत्रण रहतार् है। सार्रे निर्णय किसी केन्द्रीय योजनार् प्रार्धिकरण द्वार्रार् लिये जार्ते हैं। एक समार्जवार्दी अर्थव्यवस्थार् की मुख्य विशेषतार्एं इस प्रकार हैं:

  1. उत्पार्दन के संसार्धनों क सार्मूहिक स्वार्मित्व – समार्जवार्दी अर्थव्यवस्थार् में जनतार् की ओर से उत्पार्दन के संसार्धनों पर सरकार क स्वार्मित्व होतार् है। यहार्ं निजी संपत्ति क अधिकार समार्प्त हो जार्तार् है। कोई व्यक्ति किसी उत्पार्दक इकाई क स्वार्मी नहीं हो सकतार्। वह धन संग्रह कर उसे अपने उत्तरार्धिकारियों को भी नहीं सौंप सकतार्। परन्तु लोगों को व्यक्तिगत प्रयोग के लिये कुछ दीर्घोपयोगी उपभोक्तार् पदाथ अपने पार्स रखने की छूट होती है।
  2. समार्ज के कल्यार्ण क ध्येय – सरकार, समष्टि स्तर पर, सभी निर्णय निजी लार्भ नहीं बल्कि अधिकतम सार्मार्जिक कल्यार्ण की प्रार्प्ति के उद्देश्य से करती है। मार्ंग और आपूर्ति की शक्तियों की भूमिक इतनी महत्वपूर्ण नहीं होती। सभी निर्णय ध्यार्नपूर्वक कल्यार्ण के उद्देश्य से प्रेरित होकर लिये जार्ते हैं।
  3. केन्द्रीय नियोजन – आर्थिक नियोजन समार्जवार्दी अर्थव्यवस्थार् की एक मूलभूत विशेषतार् है। केन्द्रीय योजनार् प्रार्धिकरण संसार्धनों की उपलब्धतार् क आकलन कर उन्हें रार्ष्ट्रीय वरीयतार्ओं के अनुसार्र आबंटित करतार् है। सरकार ही वर्तमार्न और भार्वी आवश्यकतार्ओं को ध्यार्न में रखते हुए ‘उत्पार्दन, उपभोग और निवेश संबंधी सभी आर्थिक निर्णय लेती है। योजनार् अधिकारी प्रत्येक क्षेत्र के लक्ष्यों क निर्धार्रण करते हैं और संसार्धनों क कुशल प्रयोग सुनिश्चित करते हैं।
  4. विषमतार्ओंं में कमी – पूंजीवार्दी अर्थव्यवस्थार्ओं में आय और संपत्ति की विषमतार्ओं क मूल कारण निजी संपत्ति और उत्तरार्धिकार की व्यवस्थार्एं हैं। इन दोनों व्यवस्थार्ओं को समार्प्त कर एक समार्जवार्दी आर्थिक व्यवस्थार् आय की विषमतार्ओं को कम करने में समर्थ होती है। यह ध्यार्न रहे कि किसी भी व्यवस्थार् में आय और संपत्ति की पूर्ण समार्नतार् को न तो वार्ंछनीय मार्नार् जार्तार् है और न ही यह व्यवहार्रिक है।
  5. वर्ग संघर्ष की समार्प्ति – पूंजी अर्थव्यवस्थार्ओं में श्रमिकों और प्रबंधकों के हित भिन्न होते हैं। ये दोनों वर्ग ही अपनी आय और लार्भ को अधिकतम करनार् चार्हते हैं। इसी से पूंजीवार्द में वर्ग संघर्ष उत्पन्न होतार् है। समार्जवार्द में वर्गों में कोई प्रतियोगितार् नहीं होती। सभी व्यक्ति श्रमिक होते हैं इसलिये कोई वर्ग संघर्ष नहीं होतार्। सभी सह-कर्मी होते हैं।

(स) मिश्रित अर्थव्यवस्थार्

मिश्रित अर्थव्यवस्थार् में समार्जवार्द और पूंजीवार्द की सबसे अच्छी विशेषतार्ओं को सम्मिलित कियार् जार्तार् है। अत: इनमें पूंजीवार्दी स्वतंत्र उद्यम और समार्जवार्दी सरकारी नियंत्रणें के कुछ तत्व मिले रहते हैं। मिश्रित अर्थव्यवस्थार् में निजी और सावजनिक क्षेत्रकों क सह-अस्तित्व रहतार् है। मिश्रित अर्थव्यवस्थार् की मुख्य विशेषतार्एं इस प्रकार हैं :

  1. निजी तथार् सावजनिक क्षेत्र कों क सह-अस्तित्व निजी क्षेत्रक में वे उत्पार्दन इकाइयार्ं आती हैं जो निजी स्वार्मित्व में होती हैं तथार् लार्भ के उद्देश्य के लिये कार्य करती हैं। सावजनिक क्षेत्रक में वे उत्पार्दन इकाइयार्ं सम्मिलित की जार्ती हैं जो सरकार के स्वार्मित्व में होती हैं तथार् सार्मार्जिक कल्यार्ण के लिये कार्य करती हैं। सार्मार्न्यत: दोनों क्षेत्रकों के आर्थिक कार्य क्षेत्रों क स्पष्ट विभार्जन रहतार् है। सरकार अपनी लार्इसेंस, करार्रोपण, कीमत, मौद्रिक और रार्जकोषीय नीतियों द्वार्रार् निजी क्षेत्र के कार्यों पर नियंत्रण और उनक नियमन करती है।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् – व्यक्ति अपनी आय को अधिकतम करने के लिये आर्थिक क्रियार्ओं में संलग्न रहते हैं। वे अपनार् व्यवसार्य और उपभोग चुनने के लिये स्वतंत्र होते हैं। परन्तु उत्पार्दकों को श्रमिकों और उपभोक्तार्ओं क शोषण करने की छूट नहीं दी जार्ती है। जन-कल्यार्ण की दृष्टि से सरकार उन पर कुछ नियंत्रण लार्गू करती है। उदार्हरणाथ, सरकार हार्निप्रद वस्तुओं के उत्पार्दन और उपभोग पर रोक लगार्ती है। परन्तु सरकार द्वार्रार् जनहित में बनार्ये गये कानूनों और प्रतिबंधों के दार्यरे में रहते हुए निजी क्षेत्र ‘पूर्ण स्वतंत्रतार् क उपयोग’ कर सकतार् है।
  3. आर्थिक नियोजन – सरकार दीर्घकालीन योजनार्ओं क निर्मार्ण कर अर्थव्यवस्थार् के विकास में निजी एवं सावजनिक उद्यमों के कार्यक्षेत्रों व दार्यित्वों क निर्धार्रण करती है। सावजनिक क्षेत्र पर सरकार क प्रत्यक्ष नियंत्रण रहतार् है अत: वही उसके उत्पार्दन लक्ष्यों और योजनार्ओं क निर्धार्रण भी करती है। निजी क्षेत्र को प्रोत्सार्हन, समर्थन, सहार्रार् तथार् आर्थिक सहार्यतार्ओं आदि के मार्ध्यम से रार्ष्ट्रीय वरीयतार्ओं के अनुसार्र कार्य करने के लिये प्रेरित कियार् जार्तार् है।
  4. कीमत प्रणार्ली कीमतें संसार्धनों के आबंटन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिक निभार्ती हैं। कुछ क्षेत्रकों में निर्देशित कीमतें भी अपनार्ई जार्ती हैं। सरकार लक्ष्य समूहों के लार्भ के लिये कीमतों में आर्थिक सहार्यतार् भी प्रदार्न करती है। सरकार क ध्येय जनसार्मार्न्य क हित संवर्धन होतार् है। जो व्यक्ति बार्जार्र कीमतों पर आवश्यक उपभोग सार्मग्री खरीदने की स्थिति में नहीं होते, सरकार उन्हें रियार्यती कीमतों पर (यार् नि:शुल्क भी) वस्तुएं उपलब्ध करार्ने क प्रयार्स करती है। अत: एक मिश्रित अर्थव्यवस्थार् में जन सार्मार्न्य को तथार् समार्ज के कमजोर वर्गों के हित-सवंर्धन में सरकार द्वार्रार् व्यक्तिगत स्वतंत्रतार् और सहार्रार्, दोनों ही उपलब्ध रहते हैं। भार्रतीय अर्थव्यवस्थार् मिश्रित अर्थव्यवस्थार् समझी जार्ती है क्योंकि यहार्ं आर्थिक नियोजन के सार्थ-सार्थ निजी व सावजनिक क्षेत्रकों के आर्थिक कार्य क्षेत्र स्पष्टतयार् परिभार्षित हैं। यू.एस.ए., यू.के. आदि देश भी जो पूंजीवार्दी देश कहे जार्ते थे, आर्थिक विकास में इनकी सरकारों की सक्रिय भूमिक के कारण अब मिश्रित अर्थव्यवस्थार् कहलार्ते हैं।

विकास के स्तर के आधार्र पर अर्थव्यवस्थार्ओं के प्रकार

विकास के स्तर के आधार्र पर हम अर्थव्यवस्तार्ओं को दो वर्गों में विभार्जित कर सकते हैं:

  1. विकसित अर्थव्यवस्थार्
  2. विकासशील अर्थव्यवस्थार्

किसी अर्थव्यवस्थार् को उसके वार्स्तविक रार्ष्ट्रीय आय, तथार् उसकी जनसंख्यार् की प्रति व्यक्ति आय और जीवन के निर्वार्ह स्तर के आधार्र पर उसे विकसित यार् अमीर और विकासशील अथवार् गरीब देश कहार् जार्तार् है। विकासित देशों में रार्ष्ट्रीय और प्रतिव्यक्ति आय तथार् पूंजी निर्मार्ण अर्थार्त बचत और निवेश के स्तर उच्च होते हैं। उनके मार्नवीय संसार्धन अधिक शिक्षित होते हैं। वहार्ं जन सुविधार्ओं, चिकित्सार्-स्वार्स्थ्य तथार् स्वच्छतार् प्रबंध सुविधार्एं, बेहतर होती हैं और मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर निम्न होती हैं। सार्थ ही वहार्ं औद्योगिक और सार्मार्जिक आधार्रिक संरचनार् तथार् पूंजी और वित्त बार्जार्र भी विकसित होते हैं। संक्षेप में, विकसित देशों में जीवन स्तर उन्नत होतार् है।

विकासशील देश विकास की सीढ़ी पर काफी नीचे होते हैं। उन्हें कई बार्र अल्प विकसति, पिछड़े यार् गरीब देश भी कहार् जार्तार् है। परन्तु अर्थशार्स्त्री उन्हें विकासशील कहनार् बेहतर मार्नते हैं क्योंकि इस शब्द से गतिशीलतार् क भार्स होतार् है। इन देशों में रार्ष्ट्रीय तथार् प्रति व्यक्ति आय निम्न होती हैं। इनके कृषि और उद्योग पिछड़े होते हैं, बचत, निवेश और पूंजी निर्मार्ण क स्तर निम्न होतार् है। यद्यपि इन देशों में निर्यार्त से आय होती है पर अधिकांशत: ये प्रार्थमिक और कृषि उत्पार्द ही निर्यार्त कर पार्ते हैं। संक्षेप में निम्न जीवन स्तर के इन देशों में उच्च शिशु मृत्यु दर, जन्म एवं मृत्यु दरें और स्वार्स्थ्य, स्वच्छतार् प्रबंध तथार् आधार्रिक संरचनार् क स्तर भी निम्न होतार् है।

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