अभिवृत्ति की अवधार्रणार्, विशेषतार्एं एवं निर्मार्ण

अभिवृत्ति सार्मार्जिक मनोविज्ञार्न क एक केन्द्रीय विषय है। सार्मार्जिक मनोवैज्ञार्निकों की रूचि विगत कर्इ दशकों से अभिवृत्ति में रही है, क्योंकि ऐसार् मार्नार् जार्तार् है कि मनुष्य के व्यवहार्र को अभिवृत्ति बहुत प्रभार्वित करती है। अभिवृत्ति क अभिप्रार्य सार्मार्जिक विश्व के किसी पक्ष के हमार्रे मूल्यार्ँकन से है (फैजियार् व रॉस्कॉस-एवोल्डसेन, 1994( ट्रेसर व माटिन, 1996)- सार्मार्जिक विश्व के कोर्इ और हर तत्व मुद्दे, विचार्र, व्यक्ति, सार्मार्जिक समूह, वस्तु-के प्रति हम जिस हद तक सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक प्िर तक्रियार्एँ रखते है।

अभिवृत्ति के मनोविज्ञार्न में निम्नार्ँकित आधार्रभूत समस्यार्एँ है। (शेरिफ और शेरिफ 1969 : 333)- अभिवृि त्त के क्यार् गुण है। अवलोकित व्यवहार्र के किस तरीके से किसी अभिवृत्ति को जार्नार् जार् सकतार् है? वैध अभिवृत्ति सूचकों को प्रार्प्त करने के लिए किस प्रकार की शोध प्रक्रियार्ओं की आवश्यकतार् होती है? एक दी गर्इ वस्तु के प्रति एक व्यक्ति की अभिवृत्ति दूसरे व्यक्ति की अभिवृत्ति से तुलनार् करने के लिए कौन सी उपयुक्त पैमार्नार् है? शेरिफ और शेरिफ क मार्ननार् है कि किसी भी चीज क मार्प करने के लिए हमें मार्प की जार्ने वार्ली वस्तु की विशेषतार्ओं को जार्ननार् चार्हिए।

एक बार्र अभिवृत्ति क निर्मार्ण हो जार्ने पर उसमें परिवर्तन लार्नार् अत्यन्त कठिन हो जार्तार् है। प्रस्तुत अध्यार्य में हम अभिवृत्ति की अवधार्रणार् को विविध विद्वार्नों की परिभार्षार्ओं द्वार्रार् समझने क प्रयार्स करेंगे। हम यह भी जार्नने क प्रयार्स करेंगे कि अभिवृत्तियों क निर्मार्ण कैसे होतार् है, क्यार् वे सचमुच मार्नव व्यवहार्र को प्रभार्वित करती हैं, अभिवृत्तियो के क्यार्-क्यार् गुण हैं और क्यार् वे सचमुच कभी-कभी परिवर्तित होती है, इत्यार्दि।

अभिवृत्ति की अवधार्रणार् 

अभिवृत्ति के सन्दर्भ में विविध सैद्धार्न्तिक दृष्टिकोणों/उपार्गमों के चलते मनोवैज्ञार्निकों तथार् समार्ज-मनोवैज्ञार्निकों में उसकी कोर्इ एक सर्वमार्न्य परिभार्षार् के सन्दर्भ में एकमत्य नहीं है। आलपोर्ट (1935) ने अभिवृत्ति को परिभार्षित करते हुए लिखार् है कि, ‘‘अभिवृत्ति मार्नसिक तथार् स्नार्युविक तत्परतार् की एक स्थिति है, जो अनुभव द्वार्रार् निर्धार्रित होती है और जो उन समस्त वस्तुओं तथार् परिस्थितियों के प्रति हमार्री प्रतिक्रियार्ओं को प्रेरित व निर्देशित करती है, जिनसे कि वह अभिवृत्ति सम्बन्धित है।’’

आलपोर्ट की उपरोक्त परिभार्षार् को विश्लेषित कियार् जार्ये तो स्पष्ट होतार् है कि यह मार्नसिक एवं स्नार्युविक तत्परतार् की एक स्थिति है तथार् किसी वस्तुओं यार् परिस्थितियों के सन्दर्भ में व्यक्ति के मन के भार्व पक्ष यार् मूल्यार्ंकन पक्ष को अभिव्यक्त करती है। चूँकि यह अनुभवों द्वार्रार् निर्धार्रित होती है अत: जन्मजार्त नहीं होती अपितु मनुष्य के अनुभवों द्वार्रार् निर्धार्रित यार् प्रार्प्त की जार्ती है। आलपोर्ट ने मूल रूप से अभिवृत्ति को विशिष्ट प्रकार से अनुक्रियार् करने के एक समुच्चय (सेट) के रूप में मार्नार् है।

उन्होंने इसके पार्ँचों महत्वपूर्ण पक्षों को अपनी परिभार्षार् में समार्हित कियार् है। ये पार्ँचों पक्ष हैं- (1) अभिवृत्ति को मूर्तरूप में देखनार् संभव नहीं है। इसके दो मुख्य पक्ष होते हैं- मार्नसिक तथार् स्नार्युविक। (2) अभिवृत्ति प्रतिक्रियार् करने की तत्परतार् है। यह कोर्इ प्रतिक्रियार् नहीं है, अपितु प्रतिक्रियार् करें की मार्नसिक तत्परतार् है। (3) यह संगठित होती हैं। इसके विविध संघटकों-संज्ञार्नार्त्मक, भार्वार्त्मक तथार् क्रियार्त्मक के मध्य घनिष्ट सम्बन्ध होतार् है। (4) अभिवृत्ति अनुभव के आधार्र पर अर्जित की जार्ती है; और (5) अभिवृत्तियों क निर्देशित यार् गत्यार्त्मक प्रभार्व पड़तार् है। यह व्यवहार्र की दिशार् निर्धार्रित करने के सार्थ-सार्थ एक खार्स तरह क व्यवहार्र करने की शक्ति भी प्रदार्न करती है।

बी. कुप्पुस्वार्मी (1975 : 109) ने भी अभिवृत्ति को स्पष्ट करते हुए उसके समस्त अवयवों पर प्रकाश डार्लार् है। उनक कहनार् है कि, ‘‘अभिवृत्ति एक ऐसी स्थार्यी प्रणार्ली है, जिसमें एक संज्ञार्नार्त्मक अवयव, एक अनुभूति सम्बन्धी अवयव तथार् एक सक्रिय प्रवृत्ति सम्मिलित होती है। अभिवृत्ति में भार्वनार्त्मक अवयव भी सम्मिलित है। यही कारण है कि जब भी कभी कोर्इ अभिवृत्ति बनती है तो यह परिवर्तन की प्रतिरोधी हो जार्ती है। यह सार्मार्न्यत: नये तथ्यों के प्रति अनुक्रियार् नही करती। अभिवृत्ति में आस्थार्ओं और मूल्यार्ँकनों क भी समार्वेश होतार् है। उच्चतर जार्ति क कोर्इ व्यक्ति किसी हरिजन के बार्रे में प्रार्य: प्रतिकूल अभिवृत्ति रखतार् है। किसी पार्किस्तार्नी यार् चीनी के बार्रे में किसी भार्रतीय की अभिवृत्ति प्रतिकूल होती है। इन अभिवृत्तियों में अन्य समूहों के बार्रे में कुछ जार्नकारी (संज्ञार्नार्त्मक अवयव), अप्रियतार् की कुछ भार्वनार्एँ (प्रभार्वी, मूल्यार्ँकनार्त्मक अवयव) तथार् आक्रमण आदि से बचने की एक पूर्व प्रवृत्ति (क्रियार्त्मक अवयव) क समार्वेश होतार् है।’’

बी. कुप्पुस्वार्मी (1975 : 110) क मार्ननार् है कि, ‘‘हमार्री अभिवृत्तियार्ँ प्रार्थमिक रूप से सार्मार्जिक प्रभार्वों से उत्पन्न होती है। जन्म से ही मार्नव प्रार्णी ऐसी सार्मार्जिक संस्थार्ओं के जार्ल में उलझ जार्तार् ह,ै जो भौतिक जगत् के रूप में उसके परिवेश क निर्मार्ण करती है। प्रथम सार्मार्जिक इकार्इ के रूप में परिवार्र क किसी व्यक्ति के अभिवृत्ति निर्मार्ण पर अत्यधिक प्रभार्व पड़तार् है। यही कारण है कि बार्द में प्रार्प्त होने वार्ले अनुभव आसार्नी से हम अभिवृत्तियों में बदल नहीं सकते क्योंकि अभिवृत्तियार्ँ व्यक्तियों, समूहों और अन्य सार्मार्जिक वस्तुओं के प्रति हमार्री अनुक्रियार्ओं को एक संगति पद्र ार्न करती हं,ै इसक भी यही कारण है।’’

क्रच एवं क्रचफील्ड तथार् अन्य (1962) के अनुसार्र ‘‘व्यक्ति क सार्मार्जिक व्यवहार्र उसकी अभिवृत्तियों को प्रतिबिम्बित करतार् है- यह किसी सार्मार्जिक वस्तु के प्रति धनार्त्मक यार् ऋणार्त्मक मूल्यार्ंकनों, संवेगार्त्मक भार्वों तथार् पक्ष यार् विपक्ष के क्रियार्त्मक झुकावों की अपेक्षार्कृत स्थार्यी पद्धतियार्ँ है। ‘‘ अभिवृत्ति को परिभार्षित करते हुए क्रच एवं क्रचफील्ड (1948 : 152) ने लिखार् है कि, ‘‘व्यक्ति की दुनियार् के किसी पक्ष से सम्बन्धित अभिप्रेरणार्त्मक, संवेगार्त्मक, प्रत्यक्षार्त्मक और संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं के एक सुस्थिर संगठन को अभिवृत्ति के रूप में परिभार्षित कियार् जार् सकतार् है। ‘‘स्पष्ट है कि अभिवृत्ति अभिप्रेरणार्त्मक, संवेगार्त्मक, प्रत्यक्षार्त्मक तथार् संज्ञार्नार्त्मक प्रक्रियार्ओं क एक संगठन होती है।

वी.वी. अकोलकर (1960 : 231) ने अभिवृत्ति की अति संक्षिप्त परिभार्षार् देते हुए लिखार् है कि, ‘‘किसी वस्तु यार् व्यक्ति के विषय में अभिवृत्ति उस वस्तु यार् व्यक्ति के विषय में एक विशेष ढंग से सोचने, अनुभव करने और क्रियार् करने की तत्परतार् की दशार् है।’’ दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि किसी वस्तु यार् व्यक्ति के बार्रे में विशेष तरह से सोचने, अनुभव करने यार् क्रियार् करने की तत्परतार् की स्थिति को अभिवृत्ति कहते हैं।

उपरोक्त परिभार्षार्ओं के विश्लेषण से अभिवृत्तियों के कुछ प्रमुख आयार्म स्पष्ट होते हैं। एच.सी. ट्रार्इण्डिस (1971 : 13) ने किसी अभिवृत्ति-विषय के प्रति व्यवहार्र के दो प्रमुख आयार्मों क उल्लेख कियार् है- (i) सकारार्त्मक बनार्म् नकारार्त्मक और (ii) सम्पर्क इच्छुक बनार्म् सम्पर्क से बचनार्।

सकारार्त्मक अभिवृत्ति 

(उसी दिशार् में जार्ने वार्ली) 

सम्पर्क से बचनार् सम्पर्क इच्छुक (दूर जार्ने वार्लार् का)     十         (उसी दिशार् में जार्नेवार्लार् going toward) 

नकारार्त्मक अभिवृत्ति 

(विपरीत दिशार् में जार्ने वार्ली) 

कुप्पुस्वार्मी (1975रू110) ने इसमें एक चौथार् प्रकार्य और जोड़ दियार् है और वह है कि अभिवृत्तियों से लोगों को समूह के अनुरूप बनने और इस प्रकार समूह से अधिकाधिक पुरस्कार प्रार्प्त करने में भी सहार्यतार् मिलती है। काट्ज (1960) ने अभिवृत्तियों द्वार्रार् व्यक्तित्व सम्बन्धी चार्र प्रकार्यों क उल्लेख कियार् है- (i) समार्योजन सम्बन्धी प्रकार्य, जो बहुमत की अभिवृित्त् से सहमत होकर अधिकाधिक पुरस्कार और दण्ड की प्रार्प्ति में सहार्यक होतार् है, (ii) अहम्-रक्षार्त्मक प्रकार्य, जो व्यक्ति को अपने सम्बन्ध में अप्रिय मूलभूत सत्यों को स्वीकार करने की क्षमतार् प्रदार्न करने में सहार्यक होतार् है; (iii) मूल्य अभिव्यक्तार्त्मक प्रकार्य, जिनमें अभिवृत्तियों के प्रकट होने पर व्यक्ति को प्रसन्नतार् होती है, क्योंकि उससे उन मूल्यों क पतार् चलतार् है, जिनक वह समर्थन करतार् है, जैसे शार्काहार्री यार् नशार्बन्दी इत्यार्दि, (iv) ज्ञार्नार्त्मक प्रकार्य, जो व्यक्ति के संसार्र को एक सुव्यवस्थित रूप प्रदार्न करने और इसे समझने की उसकी आवश्यकतार् पर आधार्रित होते हैं।

स्मिथ और उसके सहयोगियों (1956) ने अभिवृत्ति के एक अन्य प्रकार क उल्लेख कियार् है। वह है कुछ आन्तरिक समस्यार्ओं को बार्ºयीकरण प्रदार्न करनार् यार्नि किसी मुद्दे से सम्बन्धित अपनी प्रतिक्रियार्ओं को बार्हरी समूहों की दिशार् में मोड़ देनार्।

अभिवृत्ति की विशेषतार्एँ 

आलपोर्ट (1935), बी. कुप्पुस्वार्मी (1975) क्रच एवं क्रचफील्ड तथार् अन्य (1962) इत्यार्दि की परिभार्षार्ओं एवं व्यार्ख्यार्ओं से अभिवृत्ति के जिस स्वरूप क पतार् चलतार् है, उससे इसकी निम्नार्ंकित विशेषतार्एँ स्पष्ट होती है। इन विशेषतार्ओं में से कर्इ क ऊपर पहले ही उल्लेख कियार् जार् चुक है। अभिवृत्ति की पहली विशेषतार् यह है कि, यह एक मार्नसिक एवं स्नार्यविक अवस्थार् है, दूसरी विशेषतार् यह है कि यह प्रतिक्रियार् करने की एक तत्परतार् है। तीसरी विशेषतार् यह है कि यह एक जटिल एवं हस्तक्षेपीय यार् मध्यस्थ अवधार्रणार् है। जटिल और संगठित इसलिए है कि, इसमें जो संघटक हं-ै भार्वनार्त्मक, संज्ञार्नार्त्मक और व्यवहार्रार्त्मक, ये तीनों अत्यन्त जटिल होते हैं। इसलिए अभिवृत्ति भी जटिल होती है। कर्इ संघटकों के कारण यह संगठित होती है। जहार्ँ तक मध्यस्थ यार् हस्तक्षेपीय अवधार्रणार् की बार्त है अभिवृत्ति स्वतंत्र चर क न केवल परिणार्म होती है अपितु स्वयं में भी स्वतंत्र चर (किसी व्यवहार्र यार् प्रतिक्रियार् क निर्धार्रक होने के कारण) होती है। अभिवृत्ति की चौथी विशेषतार् यह है कि, यह अर्जित की जार्ती है। व्यक्ति अपने जीवन काल में विविध कारकों के सहयोग से अभिवृत्तियों को अर्जित करतार् यार् सीखतार् है। पार्ँचवीविशेषतार् यह है कि अभिवृत्ति बहुधार् स्थार्यी होती है। विशेष परिस्थितियों में इसमें परिवर्तन भी पार्यार् जार्तार् है। इसकी अन्तिम छठी विशेषतार् यह है कि इसमें एक दिशार् और तीव्रतार् होती है। दिशार् यार् तो सकारार्त्मक होती यार् नकारार्त्मक। सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक अभिवृत्ति में तीव्रतार् के आधार्र पर अन्तर होतार् है। जैसे किन्हीं दो व्यक्तियों में किसी के प्रति घृणार् यार् पसन्दगी की मार्त्रार् कम यार् ज्यार्दार् हो सकती है। सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक अभिवृत्ति में अनुकूल यार् प्रतिकूल व्यवहार्र यार् प्रतिक्रियार् के पेर्र क गुण होते है।

अभिवृत्ति की उपरोक्त विशेषतार्ओं के आधार्र पर हम इसके पार्ँच पहलूओं क उल्लेख कर सकते हैं- दिशार्, तीव्रतार्, केन्द्रीयतार्, प्रमुखतार् तथार् सुसंगति।

शेरिफ और शेरिफ (1969 : 334-335) ने अन्य आन्तरिक कारकों से अभिवृत्ति में विभेद के आधार्रों क उल्लेख कियार् है। उनक कहनार् है कि, अभिवृत्ति किसी साथक वस्तु, व्यक्ति यार् घटनार् के प्रति सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक विशेषतार्, सुसंगति और व्यवहार्र के चुने हुए तरीकों से ज्ञार्त होती है। जबकि उस तरह के सभी व्यवहार्र के तरीके किसी अभिवृत्ति को अभिव्यक्त करते हैं। उदार्हरण के लिए, किसी भी नवजार्त सार्मार्न्य शिशु को, जब वह भूखार् हो और स्तन दियार् जार्ये, तो वह अपनार् सिर उस ओर करके स्तनपार्न करने लगतार् है। इस प्रकार के व्यवहार्र की व्यार्ख्यार् के लिए अभिवृत्ति जैसी अवधार्रणार् की जरूरत नहीं है।

अभिवृत्तियों को अस्थार्यी समुच्चयों यार् अपेक्षार्ओं, स्थितियों और जैवकीय दशार्ओं यार् अभिप्रेरकों से विभेद करने के लिए अलग आधार्रों की आवश्यकतार् है। निम्नार्ंकित आधार्रों से विभेद स्पष्ट होगार्- (i) अभिवृत्तियार्ँ सहज (जन्मजार्त) नहीं होती है, (ii) अभिवृत्तियार्ँ सार्वयव की अस्थार्यी दशार्एँ नहीं होती हैं अपितु निमिर्त हो जार्ने पर ज्यार्दार् यार् कम बनी रहती हैं (iii) अभिवृत्तियार्ँ व्यक्ति और वस्तु के सम्बन्धों को स्थार्पित करती हैं। (iv) व्यक्ति वस्तु सम्बन्धों में अभिप्रेरणार्त्मक प्रभार्वी गुण होते हैं, (v) अभिवृत्ति निर्मार्ण में छोटी यार् बड़ी मार्त्रार् में विशिष्ट मदों की श्रेणियों क निर्मार्ण जुड़ार् होतार् है। (vi) सार्मार्न्य अभिवृत्ति निर्मार्ण में जो सिद्धार्न्त लार्गू होते हैं वे सार्मार्जिक अभिवृत्ति निर्मार्ण में भी लार्गू होते हैं।

अभिवृत्ति निर्मार्ण 

अभिवृत्ति क निर्मार्ण कैसे होतार् है? हम कैसे अपनी क्रियार् के बार्रे में मत धार्रण करते हैं। सार्मार्जीकरण के दार्रै ार्न कैसे एक खार्स प्रकार की अभिवृत्ति निमिर्त होती है? व्यक्तिगत अनुभवों से बनने वार्ली अभिवृत्ति कैसी होती है? सार्मार्जिक तुलनार् के आधार्र पर भी क्यार् मनोवृत्तियों क निर्मार्ण होतार् है? इत्यार्दि अनेकों प्रश्न हैं जो अभिवृत्ति निर्मार्ण को जार्नने-समझने के लिए विशेष रूचि उत्पन्न करते हैं।

अभिवृत्तियार्ँ आती कहार्ँ से हैं? क्यार् वे हमार्रे सार्थ पैदार् होती हैं? जन्मजार्त होती हैं यार् अर्जित की जार्ती हैं? यार् क्यार् आप जीवन के एक लम्बे काल के दौरार्न अनुभवों से इसे सीखते हैं? पुन: ये प्रश्न, हमें इसके बार्रे में सोचने को बार्ध्य करते हैं। पहले ही इस सन्दर्भ में विस्ततृ चर्चार् की जार् चुकी है कि अभिवृत्तियार्ँ सीखी जार्ती है। हमने आलपोर्ट और शेरिफ एवं शेरिफ के विचार्रों से इसकी विशेषतार्ओं और आधार्रों को जार्नार् है।

सार्मार्जिक अधिगम मनोवृत्ति क एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है, लेकिन सप्रमार्ण यह ज्ञार्त हुआ है कि मनोवृत्तियों पर अनुवार्ंशिक कारकों क भी प्रभार्व पड़तार् है। रॉबर्ट ए. बैरन एवं डौन बार्यर्न (2004) ने इस सन्दर्भ में व्यार्पक विश्लेषण कियार् है।

अभिवृत्तियों के निर्मार्ण क सबसे महत्वपूर्ण स्रोत सार्मार्जिक सीख है। सार्मार्जिक सीख वह प्रक्रियार् है, जिसके द्वार्रार् हम अन्य लोगों से नर्इ जार्नकारी, व्यवहार्र के तरीके यार् मनोवृत्तियार्ँ ग्रहण करते हैं। रॉबर्ट ए. बैरन तथार् डॉन बार्यर्न (2004 : 108) ने इसे और भी स्पष्ट करते हुए लिखार् है कि, ‘‘हमार्रे अनेक मत उन परिस्थितियों में ग्रहण किये जार्ते हैं जहार्ँ हम दूसरों के सार्थ परस्पर क्रियार् करते हैं, यार् सिर्फ उनके व्यवहार्र क निरीक्षण करते हैं।’’

हमार्री अधिकांश अभिवृत्तियार्ँ उस समूह से विकसित होती है, जिससे हम सम्बद्ध होते है। बार्ल्यार्वस्थार् से ही बच्चार् परिवार्र में सार्मार्जीकरण की प्रक्रियार् के दौरार्न विविध वस्तुओं, व्यक्तियों इत्यार्दि के प्रति सकारार्त्मक एवं नकारार्त्मक अभिवृत्ति को निर्मित करतार् है। परिवार्र के सार्थ-सार्थ व्यक्ति अपने संगी-सार्थियों और समूह के अन्य सदस्यों से भी सार्मार्जिक सीख के द्वार्रार् अभिवृत्तियों को निर्मित करतार् चलतार् है। उदार्हरण के लिए बच्चे कुछ खार्द्य पदार्थार्ंर्,े खिलौनों, वस्तुओं के प्रति सकारार्त्मक अभिवृत्ति विकसित करते हैं और कुछ के प्रति नकारार्त्मक अभिवृत्ति विकसित करते हैं। हमार्री अभिवृत्तियार्ँ बड़े होने पर भी निमिर्त होती रहती है। कुछ अभिवृत्तियों में आंशिक परिवतर्न होतार् हैं। कुछ में और भी बदलार्व आतार् है। अभिवृत्तियों के बनने, विकसित होने, परिवर्तित होने की प्रक्रियार् चलती रहती है। जहार्ँ एक ओर बहुसंख्यक अभिवृत्तियार्ँ उस समूह के प्रभार्व से निर्मित होती है, जिसके हम सदस्य होते हैं। वहीं कुछ अभिवृत्तियों क निर्मार्ण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार्र पर भी होतार् है। व्यक्तिगत अनुभवों विशेषकर ऐसार् अनुभव जो किसी त्रार्सदी से सम्बन्धित हो से बनी अभिवृत्ति अपेक्षार्कृत ज्यार्दार् तीव्र होती है।

बी. कुप्पुस्वार्मी (1975 : 118) क कहनार् है कि, ‘‘अभिवृत्ति-निर्मार्ण प्रार्थमिक रूप से बार्ल्यकालीन और किशोरवय की अधिगम प्रक्रियार् यार् सीखने की प्रक्रियार् के रूप में ही आरम्भ होतार् है। जब एक बार्र अभिवृत्ति बन जार्ती है तो संज्ञार्नार्त्मक संगति के सिद्धार्न्त क प्रभार्व अधिकाधिक महत्व क होतार् है। व्यक्ति में अब प्रार्थमिक निष्क्रियतार् जार्री नही रह सकती। वह अब तक जो कुछ सीख चुक होतार् है, उसके अनुसार्र ही नर्इ सूचनार् क संस्कार करनार् आरम्भ कर देतार् है। वह असंगत सूचनार् को अस्वीकार करने और उस सूचनार् को अधिक उत्सार्ह के सार्थ ग्रहण करने लगतार् है, जो उसकी अभिवृत्ति की दृष्टि से संगत होती है।

अभिवृत्ति निर्मार्ण को समझने के लिए मनोवैज्ञार्निकों एवं समार्ज-मनोवैज्ञार्निकों ने व्यार्पक अध्ययन कियार् है। सार्मार्न्यत: इस सम्बन्ध में दो महत्वपूर्ण उपार्गमों-सीखनार् (Learning) और पुनबर्लन (Rein-forcement) के अन्तर्गत ही विषय को समझने के लिए वैज्ञार्निक अध्ययन किए गए हैं।

दूसरों से अभिवृत्तियार्ँ सार्मार्जिक सीख के द्वार्रार् ग्रहण की जार्ती है। सार्मार्जिक सीख की तीन प्रक्रियार्ओं क उल्लेख रॉबर्ट ए. बैरन तथार् डॉन बार्यर्न (2004 : 108-110) ने कियार् है-

  1. अनुबंधित अनुक्रियार् (सार्हचर्य पर आधार्रित सीख)
  2. सार्धन अनुकूलन (सही मत धार्रण करने के लिए सीख)
  3. निरीक्षणार्त्मक सीख (उदार्हरण से सीखनार्)।

सार्मार्जिक सीख क उपरोक्त तीनों प्रक्रियार्ओं के विवरण से हम अभिवृत्ति निर्मार्ण को आसार्नी से समझ सकते हैं।

सार्हचर्य पर आधार्रित सीख यार्नि अनुबंधित अनुक्रियार् को हम मनोविज्ञार्न के उस सिद्धार्न्त से समझ सकते हैं जिसमें यह बतार्यार् गयार् है कि जब एक उद्दीपक लगार्तार्र दूसरे के पहले आतार् है, तो पहले वार्लार् शीघ्र दूसरे के लिए संकेतक बन जार्तार् है। एक उदार्हरण के द्वार्रार् इसे समझार् जार् सकतार् है। एक बच्चार् अपने पितार् को एक खार्स जार्ति के व्यक्ति यार् धामिक व्यक्ति को देखकर नार्क भार्ं ै सिकोड़ते यार् बड़बड़ार्ते हुए देखतार् हैं। तो धीरे-धीरे वो बच्चार् भी जो पहले उस जार्ति यार् धर्म के व्यक्ति के प्रति उदार्सीन थार्, प्रतिकूल मनोवृत्ति निर्मित कर लेतार् है। स्पष्ट है कि लगार्तार्र प्रतिकूल यार् अनुकूल संवेगार्त्मक प्रतिक्रियार्ओं से सार्मनार् होते रहने क बच्चे पर तद्नुरूप प्रभार्व पड़तार् है। इस तरह अनुबंधित अनुक्रियार् सीखने क एक आधार्रभूत रूप है, जिसमें एक उद्दीपन, प्रार्रम्भ में उदार्सीन, किसी अन्य उद्दीपन के सार्थ बार्र-बार्र दुहरार्ये जार्ने पर प्रतिक्रियार् पैदार् करने की क्षमतार् ग्रहण कर लेतार् है। एक तरह से एक उद्दीपन दूसरे के घटित होने यार् प्रस्तुत होने के लिए संकेत हो जार्तार् है।

क्रार्ँस्निक व अन्य (1992) ने अपने एक अध्ययन से यह स्पष्ट कियार् है कि अभिवृत्ति अवचेतन अनुबन्ध (अनुबन्धित अनुक्रियार् जो उद्दीपनों के प्रति चेतन जार्गरुकतार् की अनुपस्थिति में होती है) के द्वार्रार् प्रभार्वित हो सकती है।

अनुबन्धित अनुक्रियार् को एक उदार्हरण तथार् रेखार्चित्र द्वार्रार् बैरन तथार् बार्यर्न (2004 : 109) ने सरलतम रूप में स्पष्ट कियार् है।

प्रार्रम्भिक              स्थिति मार्ँ-बार्प में संवेगार्त्मक उदार्सी

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य              ↓
             ↓
कोर्इ प्रबल प्रतिक्रियार्              नहीं बच्ची उदार्स हो जार्ती है

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य एवं
मार्ँ-बार्प की उदार्सी का
बार्र-बार्र युग्मित होनार्

अल्पसंख्यक समूह के सदस्य              मार्ँ-बार्प में संवेगार्त्मक उदार्सी
             ↓                                                    ↓
बच्ची उदार्स हो जार्ती हैं              बच्ची उदार्स हो जार्ती है

चित्र : अभिवृत्ति की अनुबन्धित अनुक्रियार् प्रार्रम्भ में एक छोटी बच्ची की किसी अल्पसंख्यक समूह के सदस्यों की दृश्य विशेषतार्ओं के प्रति कम यार् कोर्इ संवेगार्त्मक प्रतिक्रियार् नहीं होती है। यदि वह अपनी मार्ँ को इन व्यक्तियों की उपस्थिति में जब प्रतिकूल प्रतिक्रियार् करते देखती है तो वह भी धीरे-धीरे उनके प्रति प्रतिकूल प्रतिक्रियार् सीख जार्ती है।

सार्मार्जिक सीख की दूसरी प्रक्रियार् ‘सार्धन अनुकूलन’ होती है, इसके अन्तर्गत सही मत धार्रण करने के लिए सीख को रखार् जार्तार् है और भी स्पष्ट करने के लिए यह कहार् जार् सकतार् है कि सार्धन अनुकूलन सीख क वह मूलभूत रूप है, जिसमें सकारार्त्मक परिणार्म पैदार् करनेवार्ली यार् नकारार्त्मक परिणार्म को नकारने वार्ली प्रतिक्रियार्ओं को मजबूत बनार्यार् जार्तार् है, इसे सक्रिय सम्बद्ध अनुक्रियार् भी कहार् जार्तार् है। (बैरन एवं बार्यर्न 2004 : 110) इस प्रक्रियार् में पुरस्कार, प्रशंसार्, प्यार्र के द्वार्रार् एक बच्चे की अभिवृत्तियों को निर्मित कियार् जार्तार् है। ऐसे व्यवहार्रों को बच्चार् बार्र-बार्र करने लगतार् है, जिसके अनुसरण से उसको प्यार्र प्रशंसार् यार् पुरस्कार मिलतार् है। ऐसे व्यवहार्र जो सकारार्त्मक परिणार्म देते है। वे पुष्ट होते हैं, वहीं ऐसे व्यवहार्र जिनको करने पर प्रशंसार्, प्यार्र, पुरस्कार कुछ नहीं मिलतार् है, को दबार् दियार् जार्तार् है। परिवार्र में बड़े बुजुर्ग, मार्ँ-बार्प एवं अन्य वयस्क सदस्य बच्चों की अभिवृत्तियों को निर्मित करने में सक्रिय भूमिक निभार्ते हैं। इसीलिए अधिकांश बच्चे बार्ल्यार्वस्थार् में अपने पार्रिवार्रिक मूल्यों के अनुरूप ही विचार्रों को रखते हैं, यद्यपि कुछ बच्चे ऐसार् नहीं भी करते हैं। कालार्न्तर में बड़े हो जार्ने पर उनकी अभिवृत्ति अन्य कारकों द्वार्रार् प्रभार्वित होकर परिवर्तित हो जार्ती है यार् सकती है। अमेरीकी हाइस्कूल के छार्त्रों पर जेनिंग्स और नीमी (1968) ने अध्ययन कियार् है। उनके अध्ययन से स्पष्ट हुआ कि 76 प्रतिशत हाइस्कूल के छार्त्र उसी रार्जनीतिक दल के समर्थक थे, जिनके समर्थक उनके मार्तार्-पितार् थे। मार्त्र दस प्रतिशत छार्त्र ही ऐसे थे जिनकी पसन्दगी अपने मार्तार्-पितार् से अलग थी। इसके विपरीत न्यूकाम्ब (1943) ने स्पष्ट कियार् है कि युवार् छार्त्र यार् व्यक्ति जब परस्पर मतों से प्रभार्वित होने लगते हैं, तो उनकी अभिवृत्ति भी परिवर्तित हो जार्ती है।

उपरोक्त उपार्गमों से स्पष्ट है कि इसमें दण्ड और पुरस्कार अभिवृत्ति निर्मार्ण में भूमिक अदार् करते हैं। बच्चार् यार् एक मनुष्य उन व्यवहार्रों को सीखतार् है जिनके करने से किसी पुनर्बलन की प्रार्प्ति होती है। अभिवृत्तियों की अभिव्यक्ति मौखिक रूप से ज्यार्दार् होती है, इसलिए प्रशंसार्, डार्ँट तथार् निन्दार्, शक्तिशार्ली पुनर्बलन क कार्य करती है। सीख की तीसरी प्रक्रियार्, जिसके द्वार्रार् अभिवृत्तियों क निर्मार्ण होतार् है, उसे निरीक्षणार्त्मक सीख कहार् जार्तार् है। इसमें व्यक्ति दूसरों को देखकर नये प्रकार के व्यवहार्र यार् विचार्र ग्रहण करतार् है। बच्चों के द्वार्रार् धूम्रपार्न करनार् और उनके प्रति अनुकूल विचार्र रखनार् निरीक्षणार्त्मक सीख क एक सरलतम उदार्हरण है। बच्चों, युवार्ओं एवं व्यस्क सदस्यों द्वार्रार् जनसंचार्र मार्ध्यमों (प्रिंट एवं इलेक्ट्रार्निक दोनों ही) से अभिवृत्तियों को निर्मित करनार् भी इसके अन्तर्गत ही आतार् है।

अभिवृ़ित्तयों क निर्मार्ण सार्मार्जिक सीख के द्वार्रार् ही नहीं होतार् है, अपितु सार्मार्जिक तुलनार् द्वार्रार् भी होतार् है। व्यक्ति सार्मार्जिक यथाथतार् के बार्रे में अपने विचार्रों की सत्यतार् जार्नने के लिए सार्मार्जिक तुलनार् क सहार्रार् लेतार् है। व्यक्ति अपने विचार्रों की तुलनार् बार्कि लोगों से करते हैं। यदि बार्कि लोगों के विचार्र भी उससे मिलते जुलते हैं तो वह निश्चिंत हो जार्तार् है कि उसके विचार्र सही हैं। सार्मार्जिक तुलनार् की प्रक्रियार् अभिवृत्तियों के परिवर्तन लार्ती है और नर्इ अभिवृत्तियों को निर्मित भी करती हैं। फेस्टिंगर (1954) ने अपनी पुस्तक में सार्मार्जिक तुलनार् द्वार्रार् अभिवृत्ति निर्मार्ण पर प्रकाश डार्लार् है। मैओ, ऐसेस व बेल (1994); शेव (1993) इत्यार्दि के अध्ययनों से स्पष्ट होतार् है कि दूसरे लोगों से किसी समूह के बार्रे में नकारार्त्मक विचार्र सुनकर व्यक्ति बगैर उनसे मिले ही उस समूह के प्रति नकारार्त्मक अभिवृत्ति निर्मित कर लेते हैं।

अभिवृत्तियार्ँ जन्मजार्त नहीं होतीं अपितु सीखी यार् निमिर्त की जार्ती है। कर्इ विद्वार्नों अर्वे व अन्य (1989), केलर व अन्य (1992) इत्यार्दि के अध्ययनों से यह प्रमार्णित होतार् है कि अभिवृत्ति निर्मार्ण में आनुवार्ंशिक कारकों क भी योगदार्न होतार् है। इस मत की पुष्टि समरूप जुड़वार् बच्चों की अभिवृत्तियों में समार्नतार् द्वार्रार् की गयी है। ऐसार् पार्यार् गयार् है कि समरूप जुड़वो की मनोवृत्ति भिन्न जुड़वों की अपेक्षार् अधिक सह-सम्बन्धित थी सार्थ ही परिणार्मों ने यह भी प्रमार्णित कियार् कि कुछ मनोवृत्तियों क निर्मार्ण आनुवार्ंशिक कारकों द्वार्रार् भी होतार् है।

अभिवृत्ति के संघटक तत्त्व 

अभिवृत्ति जिन तत्वों से संरचित होती है, उन्हें ही अभिवृत्ति के संघटक तत्व कहार् जार्तार् है। अभिवृत्ति की परिभार्षार्ओं से ही उसके संघटक तत्त्वों क अनुमार्न लग जार्तार् है, चार्हे यह परिभार्षार् आलपोर्ट की हो यार् क्रच एवं क्रचफील्ड तथार् अन्य की हो। वार्स्तव में अभिवृत्ति उन तीन संघटकों क स्थार्यी तंत्र है जिन्हें संज्ञार्नार्त्मक, भार्वार्त्मक तथार् क्रियार्त्मक संघटक के रूप में जार्नार् जार्तार् है। अभिवृत्ति के तीनों संघटकों क संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है।

मनुष्य प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति यार् अन्यों के प्रति प्रत्यक्षीकरण जिस किसी भी रूप में करते हैं (शार्ब्दिक अथवार् मौखिक यार् गैर मौखिक), वह संज्ञार्नार्त्मक संघटक को इंगित करतार् है। कुछ ब्रार्ह्मणों क दलितों के प्रति एक विशेष प्रकार की धार्रणार् अभिवृत्ति के संज्ञार्नार्त्मक संघटक क बोध करार्ती है। अभिवृत्ति-वस्तु (जो उपरोक्त उदार्हरण में दलित है) के प्रति सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक विश्वार्स, अभिवृत्ति क संज्ञार्नार्त्मक यार् प्रत्यक्षार्त्मक संघटक है। यह विश्वार्स बहुधार् स्थिर प्रकृति क होतार् है। इसमें परिवर्तन भी होतार् है और इसकी तीव्रतार् कम यार् ज्यार्दार् हो सकती है। अभिवृत्ति प्रतिक्रियार् करने की तत्परतार् की मार्नसिक एवं स्नार्विक स्थिति है, यह अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति विश्वार्स को अभिव्यक्त करती है।

अभिवृत्ति क दूसरार् संघटक भार्वार्त्मक संघटक है। भार्वनार्एँ एवं संवेग इसके अन्तर्गत आती है। जो अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति के भार्वों (पसन्दगी अथवार् नार्पसन्दगी) को अभिव्यक्त करती है। भार्वार्त्मक संघटक किसी भी अभिवृत्ति क महत्वपूर्ण हिस्सार् होतार् है। किसी अभिवृत्ति-वस्तु को अत्यधिक पसन्द करनार्, कम पसन्द करनार् यार् किसी अभिवृत्ति वस्तु को अत्यधिक नार्पसन्द करनार्, थोड़ार् नार्पसन्द करने क भार्व यह स्पष्ट करतार् है कि इसकी तीव्रतार् में व्यक्ति-व्यक्ति में अन्तर हो सकतार् है।

अभिवृत्ति क तीसरार् संघटक तत्त्व क्रियार्त्मक संघटक होतार् है। चूँकि यह अभिवृत्ति वस्तु के प्रति व्यक्ति की क्रियार् को अभिव्यक्त करतार् है, अत: इसे व्यवहार्र-संघटक भी कहार् जार्तार् है। अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति कैसार् व्यवहार्र करतार् है? क्यार् वह उससे दूरी बनार् लेतार् है यार् आक्रार्मक व्यवहार्र करतार् है यार् उससे घनिष्ठतार् बढ़ार् लेतार् है? यह सब अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति की सकारार्त्मक अथवार् नकारार्त्मक धार्रणार् पर निर्भर करतार् है। अभिवृत्ति वस्तु के प्रति पसन्दगी यार् नार् पसन्दगी व्यवहार्र के एक विशेष रूप को प्रदर्शित करती है। क्रियार्त्मक संघटक के अन्तर्गत अभिवृत्ति वस्तु से दूरी बनार् लेनार्, निकटतार् स्थार्पित करनार्, प्रेम करनार्, आक्रार्मक व्यवहार्र करनार्, शक्ति क प्रयोग करनार् इत्यार्दि सम्मिलित होतार् है।

उपरोक्त तीनों ही संघटक की किसी अभिवृत्ति वस्तु में उपस्थिति को एक उदार्हरण द्वार्रार् ही स्पष्ट कियार् जार् सकतार् है। मार्न लीजिए कि एक अत्यन्त परम्परार्गत ब्रार्ह्मण की अभिव्यक्ति-वस्तु एक दलित व्यक्ति है। दलित व्यक्ति (अभिव्यक्ति-वस्तु) को देखते ही उसक विश्वार्स तार्जार् हो जार्तार् है कि वह एक गन्दार् व्यक्ति है यह विश्वार्स संज्ञार्त्मक संघटक है, फिर उसके गन्दे होने के प्रति विश्वार्स के कारण वह उसे नार्पसन्द करतार् है जो भार्वार्त्मक संघटक है, नार्पसन्दगी के चलते वह उससे पर्यार्प्त दूरी बनार् लेतार् है। यह दूरी बनार् लेनार् क्रियार्त्मक संघटक है। इसी तरह से प्रत्येक अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति मनुष्य क व्यवहार्र संचार्लित होतार् रहतार् है।

अभिवृत्ति के संघटकों क विश्लेषण यह भ्रम पैदार् कर सकतार् है कि यह मनुष्य के व्यवहार्र की ही तीन स्थितियार्ँ है। वार्स्तविकतार् यह है कि अभिवृत्ति और व्यवहार्र में अन्तर है। 1930 के दौरार्न प्रसिद्ध सार्मार्जिक मनोवैज्ञार्निक रिचर्ड टी लार् पियरे ने गहन शोध कार्य करके यह प्रमार्णित कियार् कि अभिवृत्ति और व्यवहार्र में अन्तर है। अभिवृत्ति मनुष्य के व्यवहार्र को प्रभार्वित करती है लेकिन यह भी सच है कि अभिवृत्तियार्ँ हमार्रे बार्हरी व्यवहार्र में कभी-कभी परिलक्षित नहीं भी होती हैं। आधुनिक काल में भी अभिवृत्ति और व्यवहार्र के मध्य सम्बन्धों के विविध पक्षों पर शोध कार्य जार्री है। लार् पियरे (1934) क अध्ययन स्पष्ट करतार् है कि मनोवृत्ति और व्यवहार्र में पर्यार्प्त अन्तर है। इसे आप एक सरल उदार्हरण से आसार्नी से समझ सकते हैं कि लोग बोलते कुछ है। और करते कुछ हैं। इतनार् ही नहीं जटिलतार् तब बढ़ सकती है जब हम यह कहते हैं कि मनुष्य सोचतार् कुछ है, बोलतार् कुछ है और करतार् कुछ है। वार्स्तविकतार् यह है कि, ‘‘अनेक कारक मनोवृत्ति व व्यवहार्र के मध्य सम्बन्ध के मॉडरेटर के रूप में काम करते हैं, और इस सम्बन्ध के सार्मथ्र्य को भी प्रभार्वित करते हैं।

  1. परिस्थितिजन्य निरोध हमें अपनी मनोवृत्ति को बार्ºय रूप से अभिव्यक्त करने से रोकते है। इसके अतिरिक्त हम वैसी स्थितियों को पसन्द करते हैं जो हम अपनी मनोवृत्तियों को व्यक्त करने की अनुमति देती है। और इससे ये मत भी मजबूत होते हैं। 
  2. मनोवृत्तियों के अनेक पहलू भी मनोवृत्ति-व्यवहार्र सम्बन्ध को मॉडरेट करते हैं। इनके अन्तर्गत मनोवृत्ति-उत्पत्ति (कैसे मनोवृत्ति क निर्मार्ण होतार् है), मनोवृत्ति-सार्मथ्र्य (इसके अन्दर मनोवृत्ति अभिगम्यतार् एवं महत्व शार्मिल है), और मनोवृत्ति विशिष्टतार् आते हैं। 
  3. मनोवृत्ति अनेक तंत्रों के द्वार्रार् व्यवहार्र को प्रभार्वित करती है। जब हम अपनी मनोवृत्ति को सार्वधार्नीपूर्वक विचार्र देते हैं, तो हमार्री मनोवृत्ति से उत्पन्न अभिप्रार्य व्यवहार्र की बहुत अधिक भविष्यवार्णी करतार् है। वैसी स्थितियों में जहार्ँ हम सोचे-समझे विचार्र में संलग्न रहते हं,ै मनोवृत्ति उस स्थिति के बार्रे में हमार्रे प्रत्यक्षीकरण क निर्मार्ण कर व्यवहार्र को प्रभार्वित करती है। तत्परतार्, वैयक्तिक मार्नदण्ड एवं आदिरूप भी मनोवृत्ति-व्यवहार्र सम्बन्ध पर असर डार्लते हैं।’’

पूर्वार्ग्रह और अभिवृत्ति परिवर्तन 

यह सच है कि अभिवृत्तियों में स्थार्यित्त्व होतार् है। यद्यपि इनमें परिवर्तन भी देखार् जार् सकतार् हैं। परिवर्तन के विविध कारक होते है। अभिवृत्ति के संज्ञार्नार्त्मक संघटक में परिवर्तन भार्वनार्त्मक संघटक और क्रियार्त्मक संघटक में भी परिवर्तन लार्तार् है।

अभिवृत्ति-वस्तु के प्रति पूर्वार्ग्रह सकारार्त्मक यार् नकारार्त्मक विश्वार्स को बल देतार् है। सार्मार्न्यत: पूर्वार्ग्रह नकारार्त्मक अभिवृत्ति को इंगित करतार् है, परिणार्मस्वरूप क्रियार् भी नकारार्त्मक ही होती है।

पूर्वार्ग्रह और अभिवृत्ति परिवर्तन की चर्चार् के पूर्व पूर्वार्ग्रह के अर्थ को जार्ननार् जरूरी है। पूर्वार्ग्रह किसी व्यक्ति यार् सार्मार्जिक समूह के सदस्यों के प्रति नकारार्त्मक मनोवृत्ति क द्योतक है। सार्मार्जिक मनोवैज्ञार्निकों ने पूर्वार्ग्रह और विभेदीकरण में अन्तर कियार् है। विभेदीकरण पूर्वार्ग्रह क क्रियार्त्मक पक्ष है। इसे क्रियार्त्मक पूर्वार्ग्रह भी कह सकते हैं। नकारार्त्मक मनोवृत्ति से नकारार्त्मक व्यवहार्र (विभेदीकरण) होतार् है।

उच्च जार्तियों क दलितों के प्रति पूर्वार्ग्रह होतार् है, पुरुषों क महिलार्ओं के प्रति पूर्वार्ग्रह होतार् है, गोरों क कालों के प्रति पूर्वार्ग्रह देखार् जार्तार् है, इसी तरह से पूर्वार्ग्रह के अनेक आधार्र होते हैं।

अभिवृत्तियार्ँ सीधे अनुभव के मार्ध्यम से बदल जार्ती है। इसलिए कभी-कभी जब हम किसी के प्रति पूर्वार्ग्रही होते हैं और वो हमार्रे पूर्वार्ग्रह के आधार्रों को अपनी योग्यतार् कुशलतार् यार् अन्य आधार्रों पर तोड़ देतार् है तो हमार्री पूर्वार्ग्रही अभिवृत्ति भी परिवर्तित हो जार्ती है। पूर्वार्ग्रह और नयार् अनुभव मनुष्य के संज्ञार्न के मध्य प्रत्यार्शार् और अनुभव यार् वार्स्तविकतार् के मध्य असंगति उत्पन्न कर देतार् है। इस असंगति को सार्मार्न्यत: मनुष्य पुनव्र्यवस्थित करते हुए अपनी अभिवृत्ति में परिवर्तन करतार् है। यह परिवर्तन आंशिक भी हो सकतार् है, पूर्ण भी हो सकतार् है और एक बार्र में ही हो सकतार् है, यार् कर्इ बार्र के बार्द हो सकतार् है। अति सार्फ-सुथरे दलित से मिलकर यार् अति धामिक दलित से मिलकर यार् अति धामिक दलित से मिलकर यार् अति सार्त्विक दलित से मिलकर पूर्वार्ग्रही सोच इसलिए प्रभार्वित होती है कि अनुभव पूर्व धार्रणार्ओं से पूर्णत: अलग है। सोच और अनुभव की असंगति यार् प्रत्यार्शार् और अनुभव असंगति अभिवृत्ति परिवर्तन क कारण बनती है।

भार्रत में महिलार्ओं के प्रति पूर्वार्ग्रह एक विशेष प्रकार की अभिवृत्ति को अभिव्यक्त करतार् रहार् है। आधुनिक काल में उनके प्रति पूर्वार्ग्रह और परिणार्मस्वरूप अभिवृत्तियों में व्यार्पक परिवर्तन आ रहार् है। अभिवृत्तियों के संज्ञार्नार्त्मक संघटक की अपेक्षार् क्रियार्त्मक संघटक में ज्यार्दार् परिवर्तन परिलक्षित हो रहार् है, और इसके प्रमुख कारण को आसार्नी से समझार् जार् सकतार् है, वह है कानूनी प्रार्वधार्न। व्यक्ति विशेष, समूह विशेष, जार्ति विशेष इत्यार्दि के प्रति एक विशेष प्रकार क नकारार्त्मक क्रियार्त्मक पक्ष कानून द्वार्रार् प्रतिबन्धित हो जार्ने के कारण उसमें परिवर्तन स्पष्ट परिलक्षित है।

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