अनुवार्द की महत्तार् एवं आवश्यकतार्
उत्तर-आधुनिक युग में अनुवार्द की महत्तार् व उपार्देयतार् को विश्वभर में स्वीकारार् जार् चुक है। वैदिक युग के ‘पुन: कथन’ से लेकर आज के ‘ट्रार्ंसलेशन’ तक आते-आते अनुवार्द अपने स्वरूप और अर्थ में बदलार्व लार्ने के सार्थ-सार्थ अपने बहुमुखी व बहुआयार्मी प्रयोजन को सिद्ध कर चुक है। प्रार्चीन काल में ‘स्वार्ंत: सुखार्य’ मार्नार् जार्ने वार्लार् अनुवार्द कर्म आज संगठित व्यवसार्य क मुख्य आधार्र बन गयार् है। दूसरे शब्दों में कहें तो अनुवार्द प्रार्चीन काल की व्यक्ति परिधि से निकलकर आधुनिक युग की समष्टि परिधि में समार् गयार् है। आज विश्वभर में अनुवार्द की आवश्यकतार् जीवन के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में अवश्य महसूस की जार् रही है। और इस तरह अनुवार्द आज के जीवन की अनिवाय आवश्यकतार् बन गयार् है।

बीसवीं शतार्ब्दी के अवसार्न और इक्कीसवीं सदी के स्वार्गत के बीच आज जीवन क कोर्इ भी ऐसार् क्षेत्र नहीं है जहार्ँ पर हम चिन्तन और व्यवहार्र के स्तर पर अनुवार्द के आग्रही न हों। भार्रत में अनुवार्द की परम्परार् पुरार्नी है किन्तु अनुवार्द को जो महत्त्व 21वीं सदी के उत्तराद्ध में प्रार्प्त हुआ वह पहले नहीं हुआ थार्। सन् 1947 में भार्रत के स्वतंत्र होने के पश्चार्त् देश की आर्थिक एवं रार्जनीतिक स्थिति में परिवर्तन आयार्। विश्व के अन्य देशों के सार्थ भार्रत के आर्थिक एवं रार्जनीतिक समीकरण बदले। रार्जनैतिक और आर्थिक कारणों के सार्थ विज्ञार्न एवं प्रोद्यौगिकी क विकास भी इस युग की प्रमुख घटनार् है जिसके फलस्वरूप विभिन्न भार्षार्-भार्षी समुदार्यों में सम्पर्क की स्थिति उभर कर सार्मने आयी। आज विश्व के अधिकांश बड़े देशों में एक प्रमुख भार्षार् के सार्थ-सार्थ अन्य कर्इ भार्षार्एँ भी गौण भार्षार् के रूप में समार्न्तर चल रही हैं। अतएव एक ही भौगोलिक सीमार् की रार्जनैतिक, प्रशार्सनिक इकार्इ के अन्तर्गत भार्षार्यी बहुसंख्यक भी रहते हैं और भार्षार्यी अल्पसंख्यक भी। अत: विभिन्न भार्षार्भार्षियों के बीच उन्हीं की अपनी भार्षार् में सम्पर्क स्थार्पित कर लोकतंत्र में सबकी हिस्सेदार्री सुनिश्चित की जार् सकती है। वस्तुत: अन्तर्रार्ष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के बीच रार्जनैतिक, आर्थिक, सार्ंस्कृतिक तथार् विज्ञार्न एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़ती हुर्इ आदार्न-प्रदार्न की अनिवायतार् ने अनुवार्द एवं अनुवार्द कार्य के महत्त्व को बढ़ार् दियार् है।

हमार्रे देश में अनुवार्द क महत्त्व प्रार्चीन काल से ही स्वीकृत है। प्रो. जी. गोपीनार्थन ने ठीक ही लक्ष्य कियार् थार् कि अनुवार्द आज व्यक्ति की सार्मार्जिक आवश्यकतार् बन गयार् है। आज के सिमटते हुए संसार्र में सम्प्रेषण मार्ध्यम के रूप में अनुवार्द भी अपनार् निश्चित योगदार्न दे रहार् है। भार्रत जैसे बहुभार्षी देश में अनुवार्द की उपार्देयतार् स्वयं सिद्ध है। भार्रत के विभिन्न प्रदेशों के सार्हित्य में निहित मूलभूत एकतार् के स्वरूप को निखार्रने के लिए अनुवार्द ही एक मार्त्र अचूक सार्धन है। इस तरह अनुवार्द द्वार्रार् मार्नव की एकतार् को रोकनेवार्ली भौगोलिक और भार्षार्यी दीवार्रों को ढहार्कर विश्वमैत्री को और सुदृढ़ बनार् सकते हैं।

21वीं सदी में अनुवार्द की महत्तार् 

21वीं शतार्ब्दी के मौजूदार् दौर में अनुवार्द एक अनिवाय आवश्यकतार् बन गयार् है। भार्रत जैसे बहुभार्षार्-भार्षी देश के जन-समुदार्यों के बीच अंत:संप्रेषण के संवार्हक के रूप में अनुवार्द क बहुआयार्मी प्रयोजन सर्वविदित है। यदि आज के इस युग को ‘अनुवार्द क युग’ कहार् जार्ए तो कोर्इ अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि आज जीवन के हर क्षेत्र में अनुवार्द की उपार्देयतार् को सहज ही सिद्ध कियार् जार् सकतार् है। धर्म-दर्शन, सार्हित्य-शिक्षार्, विज्ञार्न-तकनीकी, वार्णिज्य व्यवसार्य, रार्जनीति-कूटनीति, आदि सभी क्षेत्रों से अनुवार्द क अभिन्न संबंध रहार् है। अत: चिंतन और व्यवहार्र के प्रत्येक स्तर पर आज मनुष्य अनुवार्द पर आश्रित है। इतनार् ही नहीं विश्व-संस्कृति के विकास में भी अनुवार्द की महत्त्वपूर्ण भूमिक रही है। विश्व के विभिन्न प्रदेशों की जनतार् के बीच अंत:संप्रेषण की प्रक्रियार् के रूप में, उनके बीच भार्वार्त्मक एकतार् को कायम रखने में, देश-विदेश के नवीन ज्ञार्न-विज्ञार्न, शोध-चिंतन को दुनियार् के हर कोने तक ही नहीं, आम जनतार् तक भी पहुँचार्ने में तथार् दो भिन्न संस्कृतियों को नजदीक लार्कर एक सूत्र में पिरोने में अनुवार्द की महती भूमिक को नकारार् नहीं जार् सकतार्। प्रो. जीगोपीनार्थन के शब्दों में, ‘अनुवार्द मार्नव की मूलभूत एकतार् की व्यक्ति-चेतनार् एवं विश्व-चेतनार् के अद्वैत क प्रत्यक्ष प्रमार्ण है’। अत: मौजूदार् शतार्ब्दी में अनुवार्द ने अपनी संकुचित सार्हित्यिक परिधि को लार्ँघकर प्रशार्सन, विज्ञार्न, प्रौद्योगिकी, तकनीकी, चिकित्सार्, कलार्, संस्कृति, अनुसंधार्न, पत्रकारितार्, जनसंचार्र, दूरस्थ शिक्षार्, प्रतिरक्षार्, विधि, व्यवसार्य आदि हर क्षेत्र में प्रवेश कर यह सार्बित कर दियार् है कि अनुवार्द समकालीन जीवन की अनिवायतार् है।

हिन्दी अब बार्जार्र-तंत्र की, व्यवसार्य-व्यार्पार्र की, संचार्र-तंत्र की तथार् शार्सकीय व्यवस्थार् की भार्षार् बन रही है। हिन्दी भार्षार् में और हिन्दी भार्षार् से अनुवार्द की परम्परार् अब सुदीर्घ होने के सार्थ-सार्थ पुख्तार् और उल्लेखनीय भी होती जार् रही है। लोठार्र लुत्से की बार्त पर गोर करें तो हमें हिन्दी, मरार्ठी, बार्ंग्लार्, तमिल, तेलुगू यार् कन्नड़ लेखकों को उनकी भार्षार् के नहीं, भार्रतीय लेखक के रूप में देखनार् चार्हिए। तभी भार्रतीय भार्षार्एँ भार्रत में और फिर विश्व में प्रतिष्ठार् प्रार्प्त करेंगी। ओड़िआ क लेखक सार्रे ओड़िशार् में प्रतिष्ठार् प्रार्प्त कर ले तो यह कोर्इ छोटी बार्त नहीं होगी, लेकिन ओड़िआ क लेखक पूरे भार्रत में प्रतिष्ठार् हार्सिल करे तो यह उससे भी बड़ी बार्त होगी और उसके लिए चुनौती भी। और जो लेखक इस चुनौती को स्वीकार कर उसमें खरे उतरते हैं, वे सचमुच बड़े, बहुत बड़े लेखक सिद्ध होते हैं। इसके लिए जरूरी है कि भार्रतीय भार्षार्ओं में अनुवार्द की प्रक्रियार् को तेज कियार् जार्ए। अनुवार्द के बिनार् हमार्रार् कोर्इ भी लेखक यूरोप-अमेरिक तो दूर अपने ही देश में भार्रतीय लेखक के रूप में प्रतिष्ठित नहीं हो सकतार्। उदार्हरण के लिए फकीर मोहन सेनार्पति, प्रतिभार् रार्य, सीतार्कान्त महार्पार्त्र आदि अगर हिन्दी में अनूदित न होते तो क्यार् भार्रतीय लेखक के रूप में इतने बड़े पैमार्ने पर देश और दुनियार् में स्वीकार्य हो सकते थे ? निश्चय ही नहीं। अनुवार्द की तार्कत पार्कर ही कोर्इ बड़ार् लेखक और भी बड़ार् सिद्ध होतार् और अपनी सार्मथ्र्य को दिग-दिगंत तक फैलार् पार्तार् है। अनुवार्द के बगैर वह, वह सिद्ध नहीं हो सकतार्, जो दरअसल वह होतार् है और यह काम अनुवार्दक ही कर सकतार् है। ऐसे में अनुवार्द की महत्तार् को जन-जन तक पहुँचार्नार् और अनुवार्दकों को सम्मार्नजनक स्थार्न दिलार्नार् जरूरी हो गयार् है तार्कि भार्रतीय सार्हित्य और मनीषार् को दूसरों तक पहुँचार् कर रार्ष्ट्रीय सेतु क निर्मार्ण कियार् जार् सके।

अनुवार्द आज के व्यार्वसार्यिक युग की अपेक्षार् ही नहीं अनिवायतार् भी बन गयार् है। यह एक सेतु है। सार्ंस्कृतिक सेतु। सार्ंस्कृतिक एकतार्, परस्पर आदार्न-प्रदार्न तथार् ‘विश्वकुटुम्बकम्’ के स्वप्न को सार्कार करने की दृष्टि से अनुवार्द की भूमिक उल्लेखनीय रही है। इस प्रकार वर्तमार्न युग में अनुवार्द की महत्तार् और उपयोगितार् केवार्ल भार्षार् और सार्हित्य तक ही सीमित नहीं है, वह हमार्री सार्ंस्कृतिक, ऐतिहार्सिक और रार्ष्ट्रीय संहति और ऐक्य क मार्ध्यम है जो भार्षार्यी सीमार्ओं को पार्र करके भार्रतीय चिन्तन और सार्हित्य की सर्जनार्त्मक चेतनार् की समरूपतार् के सार्थ-सार्थ, वर्तमार्न तकनीकी और वैज्ञार्निक युग की अपेक्षार्ओं की पूर्तिकर हमार्रे ज्ञार्न-विज्ञार्न के आयार्मों को देश-विदेश में संपृक्त करती है। दूसरे शब्दों में, अनुवार्द विश्व-संस्कृति, विश्व-बंधुत्व, एकतार् और समरसतार् स्थार्पित करने क एक ऐसार् सेतु है जिसके मार्ध्यम से विश्व ज्ञार्न-विज्ञार्न के क्षेत्र में क्षेत्रीयतार्वार्द के संकुचित एवं सीमित दार्यरे से बार्हर निकल कर मार्नवीय एवं भार्वार्त्मक एकतार् के केन्द्र बिन्दु तक पहुँच सकतार् है और यही अनुवार्द की आवश्यकतार् और उपयोगितार् क सशस्त एवं प्रत्यक्ष प्रमार्ण है।

आज जब सार्रार् विश्व सार्मार्जिक पुनव्र्यवस्थार् पर एक नये सिरे से विचार्र कर रहार् है और व्यक्ति तथार् समार्ज को एक नव्य स्वतंत्र दृष्टि मिली है वहीं हम भी व्यक्ति और देश को विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने क प्रयत्न कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अनुवार्द क महत्त्व और भी बढ़ जार्तार् है। किसी समार्ज और देश की अभिव्यक्ति भार्षार् की सीमार् के कारण एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रह जार्ए और दूसरों तक न पहँुच पार्ए तो विश्व स्तर पर एक नव्य सार्मार्जिक पुनव्र्यवस्थार् की बार्त साथक कैसे हो सकती है!

अनुवार्द की आवश्यकतार् 

बीसवीं शतार्ब्दी में देशों के बीच की दूरियार्ँ कम होने के परिणार्मस्वरूप विभिन्न वैचार्रिक धरार्तलों और आर्थिक, औद्योगिक स्तरों पर पार्रस्परिक भार्षिक विनिमय बढ़ार् है और इस विनिमय के सार्थ-सार्थ अनुवार्द क प्रयोग और अधिक कियार् जार्ने लगार् है। आज के वैज्ञार्निक युग में अनुवार्द बहुत महत्त्वपूर्ण हो गयार् है। यदि हमें दूसरे देशों के सार्थ कंधे से कंधार् मिलार्कर चलनार् है तो हमें उनके यहार्ँ विज्ञार्न के क्षेत्र में, सार्मार्जिक एवं सार्ंस्कृतिक क्षेत्र में हुर्इ प्रगति की जार्नकारी होनी चार्हिए और यह जार्नकारी हमें अनुवार्द के मार्ध्यम से मिलती है। विश्व की कुछ श्रेष्ठ कृतियों को अनुवार्द के कारण ही सम्मार्न मिलार्। रवीन्द्रनार्थ टैगोर की ‘गीतार्ंजलि’ को नोबेल पुरस्कार उनके द्वार्रार् किए गए अनुवार्द कार्य पर ही मिलार्। शेक्सपियर, बर्नार्ड शार्, अरस्तू, मार्क्र्स, गोर्की आदि जैसे विश्व के महार्न् सार्हित्यकारों एवं दर्शनशार्स्त्रियों को हम अनुवार्द के मार्ध्यम से ही जार्नते हैं। बहुत पहले हमार्रे रार्ष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने ‘अनुवार्द की आवश्यकतार्’ पर बल देते हुए स्पष्ट कर दियार् थार्-

‘‘सज्जनो, भगीरथ प्रयत्न फलें आपके 

ले जार् सकते हैं यहार्ँ गंगार् से प्रवार्ह को। 

आप अनुवार्द की ही योजनार्एँ कर दें 

तो कह सकें हम सगर्व विश्व-भर के 

वार्ड़्मय में जो है वह चुन लियार् हमने 

और जो हमार्रार् अपनार् है, अतिरिक्त है।’’ 

आधुनिक युग में जैसे-जैसे स्थार्न और समय की दूरियार्ँ कम होती गर्इं वैसे-वैसे द्विभार्षिकतार् की स्थितियों और मार्त्रार् में वृद्धि हुर्इ और इसके सार्थ-सार्थ अनुवार्द में भी। अन्य भार्षार्-शिक्षण में अनुवार्द विधि क प्रयोग न केवल पश्चिमी देशों में वरन् पूर्वी देशों में भी निरन्तर कियार् जार्तार् रहार् है। हम यहार्ँ जीवन और समार्ज के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में अनुवार्द की आवश्यकतार् की चर्चार् करेंगे।

1. रार्ष्ट्रीय एकतार् में अनुवार्द की आवश्यकतार् 

भार्रत जैसे विशार्ल रार्ष्ट्र की एकतार् के प्रसंग मे अनुवार्द की आवश्यकतार् असंदिग्ध है। भार्रत की भौगोलिक सीमार्एँ न केवल कश्मीर से कन्यार्कुमार्री तक बिखरी हुर्इ हैं बल्कि इस विशार्ल भूखण्ड में विभिन्न विश्वार्सों एवं सम्प्रदार्यों के लोग रहते हैं जिनकी भार्षार्एँ एंव बोलियार्ँ एक दूसरे से भिन्न हैं। भार्रत की अनेकतार् में एकतार् इन्हीें अर्थों में है कि विभिन्न भार्षार्ओं, विभिन्न जार्तियों, विभिन्न सम्प्रदार्यों एवं विभिन्न विश्वार्सों के देश में भार्वार्त्मक एवं रार्ष्ट्रीय एकतार् कहीं भी बार्धित नहीं होती। एक समय में महार्रार्ष्ट्र क जो व्यक्ति सोचतार् है वही हिमार्चल क निवार्सी भी चिन्तन करतार् है। भार्रत के हजार्रों वर्षों के अद्यतन इतिहार्स चिन्तन ने इस धार्रणार् को पुष्ट कियार् है कि मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन से लेकर आज के प्रगतिशील आन्दोलन तक भार्रतीय सार्हित्य की दिशार् एक रही है। यह बार्त अनुवार्द के द्वार्रार् ही सम्भव हो सकी कि जिस समय गोस्वार्मी तुलसीदार्स रार्म के चरित्र पर महार्काव्य लिख रहे थे, हिन्दी के समार्नार्न्तर ओड़िआ में बलरार्म, बार्ंग्लार् में कृत्तिवार्स, तेलुगु में पोतनार्, तमिल में कम्बन तथार् हरियार्णवी में अहमदबख्श अपने-अपने सार्हित्य में रार्म के चरित्र को नयार् रूप दे रहे थे। स्वतंत्रतार् आन्दोलन में जिस सार्म्रार्ज्यवार्द और सार्मन्तवार्द के विरोध की चिंगार्री सुलगी थी उसक उत्कर्ष छार्यार्वार्दी दौर की विभिन्न भार्रतीय भार्षार्ओं की कवितार् में मिलतार् है।

2. संस्कृति के विकास में अनुवार्द की आवश्यकतार् 

दुनियार् के जिन देशों में विभिन्न जार्तियों एवं संस्कृतियों क मिलन हुआ है वहार्ँ सार्मार्सिक संस्कृति के निर्मार्ण में अनुवार्द की महत्त्वपूर्ण भूमिक रही है। अनुवार्द की परम्परार् के अध्ययन से पतार् चलतार् है कि र्इसार् के तीन सौ वर्ष पूर्व रोमन लोगों क ग्रीक के लोगों से सम्पर्क हुआ जिसके फलस्वरूप ग्रीक से लैटिन में अनुवार्द हुए। इसी प्रकार ग्यार्रहवीं, बार्रहवीं शतार्ब्दी में स्पेन के लोग इस्लार्म के सम्पर्क में आए और बड़े पैमार्ने पर योरपीय भार्षार्ओं में अरबी क अनुवार्द हुआ। भार्रत में भी विभिन्न जार्तियों एवं विश्वार्सों के लोग आए। आज की भार्रतीय संस्कृति जिसे हम सार्मार्सिक संस्कृति कहते हैं उसके निर्मार्ण में हजार्रों वर्षों के विभिन्न धर्मों, मतों एवं विश्वार्सों की सार्धनार् छिपी हुर्इ है। इन सभी मतों एवं विश्वार्सों को आत्मसार्त कर जिस भार्रतीय संस्कृति क निर्मार्ण हुआ है उसके पीछे अनुवार्द की महत्त्वपूर्ण भूमिक असंदिग्ध है।

3. सार्हित्य के अध्ययन में अनुवार्द की आवश्यकतार् 

सार्हित्य के अध्ययन में अनुवार्द क महत्त्व आज व्यार्पक हो गयार् है। सार्हित्य यदि जीवन और समार्ज के यथाथ को प्रस्तुत करतार् है तो विभिन्न भार्षार्ओं के सार्हित्य के सार्मूहिक अध्ययन से किसी भी समार्ज, देश यार् विश्व की चिन्तन-धार्रार् एवं संस्कृति की जार्नकारी मिलती है। अनुवार्द क महत्त्व निम्नलिखित सार्हित्यों के अध्ययन में सहार्यक है-

  1. भार्रतीय सार्हित्य क अध्ययन।
  2. अन्तर्रार्ष्ट्रीय सार्हित्य क अध्ययन।
  3. तुलनार्त्मक सार्हित्य क अध्ययन।

भार्रतीय सार्हित्य के अध्ययन से यह पतार् चलतार् है कि विभिन्न सार्हित्यक, सार्ंस्कृतिक एवं रार्जनैतिक आन्दोलनों में हिन्दी एवं हिन्दीतर भार्षार् के सार्हित्यकारों क स्वर प्रार्य: एक जैसार् रहार् है। मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन, स्वतन्त्रतार् आन्दोलन तथार् नक्सलबार्ड़ी आन्दोलनों को प्रार्य: सभी भार्रतीय भार्षार्ओं के सार्हित्य में अभिव्यक्ति मिली है।

अन्तर्रार्ष्ट्रीय सार्हित्य के अनुवार्द से ही यह तथ्य प्रकाश में आयार् कि दुनियार् के विभिन्न भार्षार्ओं में लिखे गए सार्हित्य में ज्ञार्न क विपुल भण्डार्र छिपार् हुआ है। भार्रत में अन्तर्रार्ष्ट्रीय सार्हित्य क अनुवार्द तो भार्रत में सूफियों के दाशनिक सिद्धार्न्तों के प्रचलन के सार्थ ही शुरू हो गयार् थार्; किन्तु इसे व्यवस्थित स्वरूप आधुनिक युग में ही प्रार्प्त हुआ। शेक्सपियर, डी.एच. लॉरेंस, मोपार्सार्ँ तथार् सात्र जैसे चिन्तकों की रचनार्ओं के अनुवार्द से भार्रतीय जनमार्नस क सार्क्षार्त्कार हुआ एवं कालिदार्स, रवीन्द्रनार्थ टैगोर एवं प्रेमचन्द की रचनार्ओं से विश्व प्रभार्वित हुआ।

दुनियार् के विभिन्न भार्षार्ओं के अनुवार्द द्वार्रार् ही तुलनार्त्मक सार्हित्य के अध्ययन में सहार्यतार् मिलती है। तुलनार्त्मक सार्हित्य द्वार्रार् इस बार्त क पतार् लगार्यार् जार्तार् है कि देश, काल और समय की भिन्नतार् के बार्वजूद विभिन्न भार्षार्ओं के रचनार्कारों के सार्हित्य में सार्म्य और वैषम्य क्यों है ? अनुवार्द के द्वार्रार् ही जो तुलनीय है वह तुलनार्त्मक अध्ययन क विषय बनतार् है। प्रेमचन्द और गोर्की, निरार्लार् और इलियट तथार् रार्जकमल चौधरी एवं मोपार्सार्ँ के सार्हित्य क तुलनार्त्मक अध्ययन अनुवार्द के फलस्वरूप ही सम्भव हो सका।

4. व्यवसार्य के रूप में अनुवार्द की आवश्यकतार् 

वर्तमार्न युग में अनुवार्द ज्ञार्न की ऐसी शार्खार् के रूप में विकसित हुआ है जहार्ँ इज्जत, शोहरत एवं पैसार् तीनों हैं। आज अनुवार्दक दूसरे दर्जे क सार्हित्यकार नहीं बल्कि उसकी अपनी मौलिक पहचार्न है। विज्ञार्न और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हुए विकास के सार्थ भार्रतीय परिदृश्य में कृषि, उद्योग, चिकित्सार्, अभियार्न्त्रिकी और व्यार्पार्र के क्षेत्र में क्रार्न्तिकारी परिवर्तन हुआ है। इन क्षेत्रों में प्रयुक्त तकनीकी शब्दार्वली क भार्रतीयकरण कर इन्हें लोकोन्मुख करने में अनुवार्द की महत्त्वपूर्ण भूमिक है।

बीसवीं शतार्ब्दी क उत्तराद्ध रोजगार्र के क्षेत्र में अनुवार्द को महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन करतार् है। संविधार्न में हिन्दी को रार्जभार्षार् क दर्जार् दिए जार्ने के पश्चार्त् केन्द्र सरकार के कार्यार्लयों, सावजनिक उपक्रमों, संस्थार्नों और प्रतिष्ठार्नों में रार्जभार्षार् प्रभार्ग की स्थार्पनार् हुर्इ जहार्ँ अनुवार्द कार्य में प्रशिक्षित हिन्दी अनुवार्दक एवं हिन्दी अधिकारी कार्य करते हैं। आज रोजगार्र के क्षेत्र में अनुवार्द सबसे आगे है। प्रति सप्तार्ह अनुवार्द से सम्बन्धित जितने पद यहार्ँ विज्ञार्पित होते हैं अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं।

5. नव्यतम ज्ञार्न-विज्ञार्न के क्षेत्रों में अनुवार्द की आवश्यकतार् 

औद्योगीकरण एवं जनसंचार्र के मार्ध्यमों में हुए अत्यार्धुनिक विकास ने विश्व की दिशार् ही बदल दी है। औद्योगिक उत्पार्दन, वितरण तथार् आर्थिक नियन्त्रण की विभिन्न प्रणार्लियों पर पूरे विश्व में अनुसंधार्न हो रहार् है। नर्इ खोज और नर्इ तकनीक क विकास कर पूरे विश्व में औद्योगिक क्रार्न्ति मची हुर्इ है। इस क्षेत्र में होने वार्ले अद्यतन विकास को विभिन्न भार्षार्-भार्षी रार्ष्ट्रों तक पहुँचार्ने में भार्षार् एवं अनुवार्द की महत्त्वपूर्ण भूमिक है।

वैज्ञार्निक अनुसंधार्नों को तीव्र गति से पूरे विश्व में पहुँचार् देने क श्रेय नव्यतम विकसित जनसंचार्र के मार्ध्यमों को है। आज विज्ञार्न, प्रौद्योगिकी, चिकित्सार्, कृषि तथार् व्यवसार्य आदि सभी क्षेत्रों में जो कुछ भी नयार् होतार् है वह कुछ ही पलों में टेलीफोन, टेलेक्स तथार् फैक्स जैसी तकनीकों के मार्ध्यम से पूरे विश्व में प्रचार्रित एवं प्रसार्रित हो जार्तार् है। आज जनसंचार्र के मार्ध्यमों में होने वार्ले विकास ने हिन्दी भार्षार् के प्रयुक्ति-क्षेत्रों को विस्तृत कर दियार् है। विज्ञार्न, व्यवसार्य, खेलकूद एवं विज्ञार्पनों की अपनी अलग शब्दार्वली हैं। संचार्र मार्ध्यमों में गतिशीलतार् बढ़ार्ने क कार्य अनुवार्द द्वार्रार् ही सम्भव हो सक है तथार् गार्ँव से लेकर महार्नगरों तक जो भी अद्यतन सूचनार्एँ हैं वे अनुवार्द के मार्ध्यम से एक सार्थ सबों तक पहुँच रही हैं। कहने की आवश्यकतार् नहीं कि अनुवार्द ने आज पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दियार् है। 

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