अनुवार्द की प्रक्रियार्, स्वरूप एवं सीमार्एँ

अनुवार्द के स्वरूप, अनुवार्द-प्रक्रियार् एवं अनुवार्द की सीमार्ओं के बार्रे में की चर्चार् की जार् रही है। सबसे महत्त्वपूर्ण है- ‘अनुवार्द की प्रक्रियार्’। अनुवार्द के व्यार्वहार्रिक पहलु को जार्नने के लिए अनुवार्द-प्रक्रियार् को समझनार् जरूरी है। इसलिए प्रस्तुत अध्यार्य में नार्इडार्, न्यूमाक और बार्थगेट- तीनों विद्वार्नों द्वार्रार् प्रतिपार्दित अनुवार्द-प्रक्रियार् को सोदार्हरण प्रस्तुत कियार् गयार् है।

अनुवार्द के स्वरूप 

अनुवार्द के स्वरूप के सन्दर्भ में विद्वार्नों में मतभेद है। कुछ विद्वज्जन अनुवार्द की प्रकृति को ही अनुवार्द क स्वरूप मार्नते हैं, जब कि कुछ भार्षार्विज्ञार्नी अनुवार्द के प्रकार को ही उसके स्वरूप के अन्तर्गत स्वीकारते हैं। इस सम्बन्ध में डॉ. रवीन्द्रनार्थ श्रीवार्स्तव क मत ग्रहणीय है। उन्होंने अनुवार्द के स्वरूप को सीमित और व्यार्पक के आधार्र पर दो वगोर्ं में बार्ँटार् है। इसी आधार्र पर अनुवार्द के सीमित स्वरूप और व्यार्पक स्वरूप की चर्चार् की जार् रही है।

1. अनुवार्द क सीमित स्वरूप 

अनुवार्द के स्वरूप को दो संदर्भों में बार्ँटार् जार् सकतार् है-

  1. अनुवार्द क सीमित स्वरूप तथार् 
  2. अनुवार्द क व्यार्पक स्वरूप 

अनुवार्द की सार्धार्रण परिभार्षार् के अंतर्गत पूर्व में कहार् गयार् है कि अनुवार्द में एक भार्षार् के निहित अर्थ को दूसरी भार्षार् में परिवर्तित कियार् जार्तार् है और यही अनुवार्द क सीमित स्वरूप है। सीमित स्वरूप (भार्षार्ंतरण संदर्भ) में अनुवार्द को दो भार्षार्ओं के मध्य होने वार्लार् ‘अर्थ’ क अंतरण मार्नार् जार्तार् है। इस सीमित स्वरूप में अनुवार्द के दो आयार्म होते हैं-

  1. पार्ठधर्मी आयार्म तथार् 
  2. प्रभार्वधर्मी आयार्म 

पार्ठधर्मी आयार्म के अंतर्गत अनुवार्द में स्रोत-भार्षार् पार्ठ केंद्र में रहतार् है जो तकनीकी एवं सूचनार् प्रधार्न सार्मग्रियों पर लार्गू होतार् है। जबकि प्रभार्वधर्मी अनुवार्द में स्रोत-भार्षार् पार्ठ की संरचनार् तथार् बुनार्वट की अपेक्षार् उस प्रभार्व को पकड़ने की कोशिश की जार्ती है जो स्रोत-भार्षार् के पार्ठकों पर पड़ार् है। इस प्रकार क अनुवार्द सृजनार्त्मक सार्हित्य और विशेषकर कवितार् के अनुवार्द में लार्गू होतार् है।

2. अनुवार्द क व्यार्पक स्वरूप 

अनुवार्द के व्यार्पक स्वरूप (प्रतीकांतरण संदर्भ) में अनुवार्द को दो भिन्न प्रतीक व्यवस्थार्ओं के मध्य होने वार्लार् ‘अर्थ’ क अंतरण मार्नार् जार्तार् है। ये प्रतीकांतरण तीन वर्गों में बार्ँटे गए हैं-

  1. अंत:भार्षिक अनुवार्द (अन्वयार्ंतर), 
  2. अंतर भार्षिक (भार्षार्ंतर), 
  3. अंतर प्रतीकात्मक अनुवार्द (प्रतीकांतर)

‘अंत:भार्षिक’ क अर्थ है एक ही भार्षार् के अंतर्गत। अर्थार्त् अंत:भार्षिक अनुवार्द में हम एक भार्षार् के दो भिन्न प्रतीकों के मध्य अनुवार्द करते हैं। उदार्हरणाथ, हिन्दी की किसी कवितार् क अनुवार्द हिन्दी गद्य में करते हैं यार् हिन्दी की किसी कहार्नी को हिन्दी कवितार् में बदलते हैं तो उसे अंत:भार्षिक अनुवार्द कहार् जार्एगार्। इसके विपरीत अंतर भार्षिक अनुवार्द में हम दो भिन्न-भिन्न भार्षार्ओं के भिन्न-भिन्न प्रतीकों के बीच अनुवार्द करते हैं।

अंतर भार्षिक अनुवार्द में अनुवार्द को न केवल स्रोत-भार्षार् में लक्ष्य-भार्षार् की संरचनार्ओं, उनकी प्रकृतियों से परिचित होनार् होतार् है, वरन् उनकी सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक परम्परार्ओं, धामिक विश्वार्सों, मार्न्यतार्ओं आदि की सम्यक् जार्नकारी भी उसके लिए बहुत जरूरी है। अन्यथार् वह अनुवार्द के सार्थ न्यार्य नहीं कर पार्एगार्। अंतर प्रतीकात्मक अनुवार्द में किसी भार्षार् की प्रतीक व्यवस्थार् से किसी अन्य भार्षेत्तर प्रतीक व्यवस्थार् में अनुवार्द कियार् जार्तार् है।

अंतर प्रतीकात्मक अनुवार्द में प्रतीक-1 क संबंध तो भार्षार् से ही होतार् है, जबकि प्रतीक-2 क संबंध किसी दृश्य मार्ध्यम से होतार् है। उदार्हरण के लिए अमृतार् प्रीतम के ‘पिंजर’ उपन्यार्स को हिन्दी फिल्म ‘पिंजर’ में बदलार् जार्नार् अंतर-प्रतीकात्मक अनुवार्द है।

अनुवार्द-प्रक्रियार् 

‘प्रक्रियार्’ शब्द अंग्रेजी के ‘process’ क पर्यार्य है, जो ‘प्रक्रियार्’ के संयोग से बनकर ‘विशिष्ट क्रियार्’ क बोध करार्तार् है । किसी कार्य की प्रक्रियार् यार् विशिष्ट क्रियार् को जार्नने क अर्थ होतार् है, कार्य को कैसे सम्पार्दित कियार् जार्ए। इस अर्थ में अनुवार्द कर्म में हम स्रोत-भार्षार् से लक्ष्य-भार्षार् तक पहुँचने के लिए जिन क्रमबद्ध सोपार्नों से होकर गुज़रते हैं, उन सुनिश्चित व सोद्देश्य सोपार्नों को ‘अनुवार्द-प्रक्रियार्’ कहार् जार्तार् है। अनुवार्द प्रक्रियार् की चर्चार् की शुरुआत ख्यार्त भार्षार्विज्ञार्नी नोअम चॉमस्की(Noam Chomsky) के निष्पार्दक व्यार्करण (Generative
Grammar) से करते हैं।

1. नोअम चॉमस्की (Noam Chomsky) की गहन संरचनार् एवं तल संरचनार् 

चॉमस्की अपने निष्पार्दक व्यार्करण द्वार्रार् वार्क्य के संरचनार्त्मक विवरण को निर्धार्रित करते हैं जिसे आरेख के द्वार्रार् समझार् जार् सकतार् है :

अनुवार्द : स्वरूप, प्रक्रियार् एवं सीमार्एँ

उनके अनुसार्र संरचनार् की दृष्टि से भार्षार् के दो तत्त्व होते हैं :

  1. तल संरचनार् और 
  2. गहन संरचनार् 

तल संरचनार् से तार्त्पर्य है भार्षार् की बार्हरी स्वन प्रक्रियार् तथार् गहन संरचनार् से आशय है तल संरचनार् में निहित अर्थ तत्त्व। चॉमस्की गहन संरचनार् को एक नैसर्गिक अवयव मार्नते हुए भार्षार्ओं के बीच अन्तर को केवल तल संरचनार् क अन्तर मार्नते हैं। चॉमस्की ने यहार्ँ जो आधार्र से गहन संरचनार् और पुन: गहन संरचनार् से तल संरचनार् की दोहरी गतिविधि की विवेचनार् की है, वह अनुवार्द-प्रक्रियार् में स्रोत-भार्षार् के विकोडीकरण तथार् लक्ष्य-भार्षार् में उसके पुन: कोडीकरण को समझने में सहार्यक है। अत: ऊपर के आरेख को अनुवार्द की प्रक्रियार् में निम्नलिखितार्नुसार्र बदलार् जार् सकतार् है :

अनुवार्द : स्वरूप, प्रक्रियार् एवं सीमार्एँ

2. नार्इडार् (Nida) द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द-प्रक्रियार् 

नार्इडार् ने चॉमस्की के ‘गहन संरचनार्’ एवं ‘तल संरचनार्’ के आधार्र पर अनुवार्द-प्रक्रियार् में निम्नलिखित तीन सोपार्नों क उल्लेख कियार् है :

  1. विश्लेषण (Analysis) 
  2. अन्तरण (Transference) 
  3. पुनर्गठन (Restructuring) 

नार्इडार् द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द-प्रक्रियार् को निम्नलिखित आरेख के मार्ध्यम से भलीभार्ँति समझार् जार् सकतार् है :

    नार्इडार् द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द-प्रक्रियार्

    नार्इडार् द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द-प्रक्रियार् क मूल आधार्र भार्षार् विश्लेषण के सिद्धार्न्त है। उनके मतार्नुसार्र पहले सोपार्न में अनुवार्दक मूल-पार्ठ यार् स्रोत-भार्षार् क विश्लेषण करतार् है। नार्इडार् मूल-पार्ठ के विश्लेषण के लिए एक सुनिश्चित भार्षार् सिद्धार्न्त की बार्त करते हैं। यह विश्लेषण भार्षार् के दोनों स्तर, बार्ह्य संरचनार् पक्ष तथार् आभ्यन्तर अर्थपक्ष पर होतार् है, जिसमें मूल-पार्ठ क शार्ब्दिक अनुवार्द तैयार्र हो जार्तार् है। विश्लेषण से प्रार्प्त अर्थबोध क लक्ष्य-भार्षार् में अन्तरण अनुवार्द क दूसरार् सोपार्न होतार् है। यह अन्तरण सोपार्न में स्रोत-भार्षार् के सन्देश को लक्ष्य-भार्षार् की भार्षिक अभिव्यक्ति में पुनर्विन्यस्त कियार् जार्तार् है। तीसरे और अन्तिम सोपार्न में लक्ष्य-भार्षार् की अभिव्यक्ति प्रणार्ली और कथन रीति के अनुसार्र उसक निर्मार्ण होतार् है। नार्इडार् के मतार्नुसार्र अनुवार्दक को ‘स्रोत-भार्षार् पार्ठ में निहित अर्थ यार् सन्देश के विश्लेषण तथार् लक्ष्य-भार्षार् में उसके पुनर्गठन’ दो ध्रुवों के मध्य निरन्तर सम्यक् और सटीक तार्लमेल बिठार्नार् होतार् है।
               

     क                                                              ख 

     स्रोत-भार्षार्————-अनुवार्दक————लक्ष्य-भार्षार् विश्लेषण…………………………………………………………………..पुनर्गठन 

    (आरेख : 4) 

    3. न्यूमाक (New mark) द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द प्रक्रियार् 

    न्यूमाक द्वार्रार् प्रतिस्थार्पित अनुवार्द-प्रक्रियार् नार्इडार् के सोपार्नों से मिलती जुलती अवश्य है किन्तु वह नार्इडार् के चिन्तन से अधिक व्यार्पक है। नीचे दिए गए आरेख से यह बार्त स्पष्ट हो जार्एगी : 2 1 3 —- अन्तरक्रमिक अनुवार्द ——- (आरेख : 5) न्यूमाक अनुवार्द-प्रक्रियार् को दो स्तरों पर आँकते हैं : 1- पहलार् स्तर है : अन्तरक्रमिक अनुवार्द, जिसे खंडित रेखार् द्वार्रार् जोड़ार् गयार् है, क्योंकि अन्तरक्रमिक अनुवार्द शब्द-प्रति-शब्द अनुवार्द होतार् है, जो कि भ्रार्मक है। 2- दूसरार् स्तर है : मूल पार्ठ क अर्थ बोधन और लक्ष्य-भार्षार् में उस अर्थ क अभिव्यक्तिकरण। न्यूमाक द्वार्रार् प्रस्तार्वित बोधन की प्रक्रियार्, नार्इडार् के विश्लेषण की प्रक्रियार् से इस दृष्टि से भिन्न है कि इसमें विश्लेषण से प्रार्प्त अर्थ के सार्थ-सार्थ अनुवार्दक द्वार्रार् मूल-पार्ठ की व्यार्ख्यार् क भार्व भी सम्मिलित है। 

    4. बार्थगेट (Bathgate) क चिन्तन 

    अनुवार्द-प्रक्रियार् के सम्बन्ध मे बार्थगेट क चिन्तन बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। बार्थगेट ने अनुवार्द-प्रक्रियार् में जिन सोपार्नों की परिकल्पनार् की है, वह सुचिन्तित, आधुनिक एवं वैज्ञार्निक हैं। ये सोपार्न हैं : 

    स्रोत-भार्षार्

    समन्वयन 

    विश्लेषण 

    समझ बोधन 

    अभिव्यक्तिकरण  

    स्रोत-भार्षार् 

    पार्रिभार्षिक अभिव्यक्ति 

    पुनर्गठन 

    पुनरीक्षण 

    पर्यार्लोचन 

    लक्ष्य-भार्षार् 

    कहने की ज़रूरत नहीं कि ये सभी सोपार्न नार्इडार् और न्यूमाक द्वार्रार् प्रस्तार्वित सोपार्नों से अधिक संगत और वैज्ञार्निक हैं। परन्तु इसमें दियार् गयार् पहलार् सोपार्न ‘समन्वयन’ और अन्तिम सोपार्न ‘पर्यार्लोचन’, दोनों को अवार्न्तर परिकल्पनार् कहार् जार् सकतार् है। क्योंकि न तो स्रोत-भार्षार् पार्ठ के समन्वयन की ज़रूरत है न ही पुनरीक्षण के बार्द पर्यार्लोचन की आवश्यकतार्। ‘पुनरीक्षण’ ही एक प्रकार क ‘पर्यार्लोचन’ है। 

    5. अनुवार्द-प्रक्रियार् में नार्इडार्, न्यूमाक और बार्थगेट 

    अनुवार्द-प्रक्रियार् एक आन्तरिक प्रक्रियार् है, जो अनुवार्दक के मन-मस्तिष्क में घटित होती है। इसे शब्दबद्ध करने के पीछे यह बतलार्नार् है कि अनुवार्द कर्म में सार्मार्न्यत: अनुवार्दक को कौन-कौन से चरण से होकर गुज़रनार् होतार् है। सार्धार्रणत: अनुवार्द कर्म में निम्नलिखित पार्ँच सोपार्न होते हैं : 

    स्रोत-भार्षार् 

    विश्लेषण

     बोधन 

    भार्षिक अन्तरण 

    पुनर्गठन 

    पुनरीक्षण 

    लक्ष्य-भार्षार्  

    उपर्युक्त प्रक्रियार् में न्यूमाक, नार्इडार् एवं बार्थगेट द्वार्रार् प्रस्तार्वित सोपार्नों को शार्मिल कियार् गयार् है। अब अनुवार्द के इन सोपार्नों के व्यार्वहार्रिक प्रयोग के लिए ‘होरी की गार्य अभी नहीं आर्इ है’ क अंग्रेजी अनुवार्द करते हैं। यह पंक्ति प्रेमचन्द की महार्न् कृति ‘गोदार्न’ क निचोड़ है जो भार्रतीय किसार्न की तत्कालीन व वर्तमार्न स्थिति को दर्शार्ती है। ‘गोदार्न की विषय-वस्तु से परिचित अनुवार्दकों के लिए इस पंक्ति क अनुवार्द करनार् आसार्न होगार् जबकि इसके विपरीत ‘गोदार्न’ से अपरिचित अनुवार्दक के लिए अपेक्षार्कृत कठिन हो सकतार् है। वह निहित सन्दर्भ को न समझकर, इसक शार्ब्दिक अनुवार्द कर देगार् : ‘Hori’s cow has not come yet.’ जो कि सही अनुवार्द नहीं है। मगर ‘गोदार्न’ की विषय वस्तु से परिचित अनुवार्दक जब इसक अनुवार्द करेगार्, तो वह निम्नलिखित सोपार्नों से होकर गुज़रेगार् : 

    स्रोत-भार्षार्

                  होरी की गार्य अभी नहीं आर्इ है । 

                  1. विश्लेषण- 

                       Hori’s cow has not come yet.

                  2. बोधन- 

                       Hori’ dream has not fulfilled yet.

                  3. भार्षिक अन्तरण- 

                       Hori, i.e.Indian farmers are still there where they were.

                  4. पुनर्गठन- 

                       No change occured in Indian farmers’ status.

                  5. पुनरीक्षण- 

                       Status of Indian farmers has not been changed yet. 

    लक्ष्य-भार्षार् 

                Status of Indian farmers has not been changed yet.  

    क्योंकि ‘होरी की गार्य अभी नहीं आर्इ है’ इस पंक्ति के मार्ध्यम से किसार्नों की दुर्दशार्, उनकी मज़बूरी और त्रार्सदी को अभिव्यक्त कियार् गयार् है। आज भी हजार्रों किसार्न लार्चार्री की ज़िदगी जीने को विवश हैं। अनुवार्द में यही विवशतार् व लार्चार्री झलकनी चार्हिए। 

    उपर्युक्त प्रस्तार्वित प्रक्रियार् अनुवार्द कर्म में निहित भार्षिक अन्तरण की प्रक्रियार् को समझने में ज़रूर सहार्यक हैं मगर ज़रूरी नहीं कि हर अनुवार्दक अनुवार्द के दौरार्न इन सब प्रक्रियार्ओं से होकर गुज़रे। यह अनुवार्दक के ज्ञार्न, कौशल और अनुभव पर निर्भर करतार् है और हो सकतार् है कि कोर्इ अनुभवी अनुवार्दक इन सोपार्नों को एक छलार्ंग में पार्र कर ले। दुभार्षियार् इसक सर्वोत्तम उदार्हरण है। दरअसल अनुवार्द क चिन्तन क्षेत्र इतनार् विस्तृत है कि इसे किसी यंत्रवत प्रक्रियार् की सीमार् में नहीं बार्ँधार् जार् सकतार्। 

    अनुवार्द की सीमार्एँ 

    अनुवार्द और अनुवार्द-प्रक्रियार् की जिन विलक्षणतार्ओं को अनुवार्द विज्ञार्नियों ने बार्र-बार्र रेखार्ंकित कियार् है, उन्हीं के परिपार्श्र्व से हिन्दी अनुवार्द की अनेकानेक समस्यार्एँ भी उभरी हैं। बकौल प्रो. बार्लेन्दु शेखर तिवार्री हिन्दी के उचित दार्य की संप्रार्प्ति में जिन बहुत सार्री समस्यार्ओं को रार्ह क पत्थर समझार् जार् रहार् है उनमें अनुवार्द की समस्यार्एँ अपनी विशिष्ट पहचार्न रखती हैं। 

    अनुवार्द से भार्षार् क संस्कार होतार् है, उसक आधुनिकीकरण होतार् है। वह दो भिन्न संस्कृतियों को जोड़ने वार्लार् संप्रेषण सेतु है। एक भार्षार् को दूसरी भार्षार् में अन्तरण की प्रक्रियार् में अनुवार्दक दो भिन्न संस्कृति में स्थित समतुल्यतार् की खोज करतार् है। एतदर्थ उसे पर्यार्यवार्ची शब्दों के विविध रूपों से जूझनार् पड़तार् है। इसी खोज और संतुलन बनार्ने की प्रक्रियार् में कभी-कभी एक ऐसार् भी मोड़ आतार् है जहार्ँ अनुवार्दक को निरार्श होनार् पड़तार् है। समतुल्यतार् यार् पर्यार्यवार्ची शब्द हार्थ न लगने की निरार्शार्। अननुवार्द्यतार् (untranslatability) की यही स्थिति अनुवार्द की सीमार् है। जरूरी नहीं कि हर भार्षार् और संस्कृति क पर्यार्यवार्ची दूसरी भार्षार् और संस्कृति में उपलब्ध हो। प्रत्येक शब्द की अपनी सत्तार् और सन्दर्भ होतार् है। कहार् तो यह भी जार्तार् है कोर्इ शब्द किसी क पर्यार्यवार्ची नहीं होतार्। प्रत्येक शब्द एवं रूप क अपनार्-अपनार् प्रयोग गत अर्थ-सन्दर्भ सुरक्षित है। इस दृष्टि से एक शब्द को दूसरे की जगह रख देनार् भी एक समस्यार् है। स्पष्ट है कि हर रूप की अपनी-अपनी समस्यार्एँ हैं और इन समस्यार्ओं के कारण अनुवार्द की सीमार्एँ बनी हुर्इ हैं। इसी को ध्यार्न में रखते हुए कैटफोर्ड ने अनुवार्द की सीमार्एँ दो प्रकार की बतार्यी हैं- 

    1. भार्षार्परक सीमार्एँ और 
    2. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक सीमार्एँ 

    भार्षार्परक सीमार् से अभिप्रार्य यह है कि स्रोत-भार्षार् के शब्द, वार्क्यरचनार् आदि क पर्यार्यवार्ची रूप लक्ष्य-भार्षार् में न मिलनार्। सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक अभिव्यक्तियों के अन्तरण में भी काफी सीमार्ओं क सार्मनार् करनार् पड़तार् है क्योंकि प्रत्येक भार्षार् क सम्बन्ध अपनी सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक व्यवस्थार् से जुड़ार् हुआ है। परन्तु पोपोविच क कहनार् है कि भार्षार्परक समस्यार् दोनों भार्षार्ओं की भिन्न संरचनार्ओं के कारण उठ सकती है किन्तु सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक समस्यार् सर्वार्धिक जटिल होती है। इसके सार्थ ही उन्होंने यह भी कहार् है कि भार्षार्परक और सार्मार्जिक -सार्ंस्कृतिक समस्यार्एँ एक-दूसरे के सार्थ गुँथी हुर्इ हैं, अत: इसक विवेचन एक दूसरे को ध्यार्न में रखकर कियार् जार्नार् चार्हिए। बहरहार्ल, इस चर्चार् से यह स्पष्ट हो गयार् कि अनुवार्द की सीमार्ओं को तीन वर्गों में विभार्जित कियार् जार् सकतार् है :

    1. भार्षार्परक सीमार्एँ,
    2. सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक सीमार्एँ और 
    3. पार्ठ-प्रकृतिपरक सीमार्एँ 

    1. अनुवार्द की भार्षार्परक सीमार्एँ 

    जैसार् कि ऊपर संकेत कियार् जार् चुक है कि प्रत्येक भार्षार् की अपनी संरचनार् एवं प्रकृति होती है। इसीलिए स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार् के भार्षिक रूपों में समार्न अर्थ मिलने की स्थिति बहुत कम होती है। कर्इ बार्र स्रोत-भार्षार् के समार्न वार्क्यों में सूक्ष्म अर्थ की प्रार्प्ति होती है लेकिन उनक अन्तरण लक्ष्य-भार्षार् में कर पार्नार् सम्भव नहीं होतार्। उदार्हरणाथ इन दोनों वार्क्यों को देखें : ‘लकड़ी कट रही है’ और ‘लकड़ी काटी जार् रही है’। सूक्ष्म अर्थ भेद के कारण इन दोनों क अलग-अलग अंग्रेजी अनुवार्द संभव नहीं होगार्। फिर किसी कृति में अंचल-विशेष यार् क्षेत्र-विशेष के जन-जीवन क समग्र चित्रण अपनी क्षेत्रीय भार्षार् यार् बोली में जितनार् स्वार्भार्विक यार् सटीक हो पार्तार् है उतनार् भार्षार् के अन्य रूप में नहीं। जैसे कि फणीश्वरनार्थ रेणु क ‘मैलार् आँचल’। इस उपन्यार्स में अंचल विशेष के लोगों की जो सहज अभिव्यक्ति मिलती है उसे दूसरी भार्षार् में अनुवार्द करनार् बहुत कठिन कार्य है। इसके अतिरिक्त भार्षार् की विभिन्न बोलियार्ँ अपने क्षेत्रों की विशिष्टतार् को अपने भीतर समेटे होती हैं। यह प्रवृत्ति ध्वनि, शब्द, वार्क्य आदि के स्तरों पर देखी जार् सकती है। जैसे चीनी, जार्पार्नी आदि भार्षार्एँ ध्वन्यार्त्मक न होने के कारण उनमें तकनीकी शब्दों को अनूदित करनार् श्रम सार्ध्य होतार् है। अनुवार्द करते समय नार्मों के अनुवार्द की समस्यार् भी सार्मने आती है। लिप्यन्तरण करने पर उनके उच्चार्रण में बहुत अन्तर आ जार्तार् है। स्थार्न विशेष भी भार्षार् को बहुत प्रभार्वित करतार् है। उदार्हरण के लिए एस्किमो भार्षार् में बर्फ के ग्यार्रह नार्म हैं जिसे दूसरी भार्षार् में अनुवार्द करनार् सम्भव नहीं है। 

    वार्स्तव में हिन्दी में अनुवार्द की समस्यार्एँ इस भार्षार् के मूलभूत चरित्र की न्यूनतार्ओं और विशिष्टतार्ओं से जुड़ी हुर्इ हैं। वस्तुत: हिन्दी जैसी विशार्ल हृदय भार्षार् में अनुवार्द की समस्यार्एँ अपनी अलग पहचार्न रखती हैं। भिन्नाथकतार्, न्यूनाथकतार्, आधिकारिकतार्, पदार्ग्रह, भिन्नार्शयतार् और शब्दविकृति जैसे दोष ही हिन्दी में अनुवार्द कार्य के पथबार्धक नहीं हैं, बल्कि हिन्दी के अनुवार्दक को अपनी रचनार् की संप्रेषणीयतार् की समस्यार् से भी जूझनार् पड़तार् है। निम्नलिखित आरेख से बार्तें स्पष्ट हो जार्एगीं- 

    अनुवार्द की भार्षार्परक सीमार्एँ

    2. अनुवार्द की सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक सीमार्एँ 

    अनुवार्द की सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक सीमार्एँ

    उपर्युक्त संस्कृति-चक्र से स्पष्ट है कि भार्षार् और संस्कृति क अटूट सम्बन्ध होतार् है। अनुवार्द तो दो भिन्न संस्कृतियों को जोड़ने वार्लार् संप्रेषण-सार्ंस्कृतिक सेतु है। एक भार्षार् को दूसरी भार्षार् में अन्तरण की प्रक्रियार् में अनुवार्दक दो भिन्न संस्कृति में स्थित समतुल्यतार् की खोज करतार् है। वार्स्तव में मार्नव अभिव्यक्ति के एक भार्षार् रूप में भौगोलिक, ऐतिहार्सिक और सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक तत्त्वों क समार्वेश हो जार्तार् है जो एक भार्षार् से दूसरी भार्षार् में भिन्न होते हैं। अत: स्रोत-भार्षार् के कथ्य को लक्ष्य-भार्षार् में पूर्णतयार् संयोजित करने में अनुवार्दक को कर्इ बार्र असमर्थतार् क सार्मार्नार् करनार् पड़तार् है। यह बार्त अवश्य है कि समसार्ंस्कृतिक भार्षार्ओं की अपेक्षार् विषम सार्ंस्कृतिक भार्षार्ओं के परस्पर अनुवार्द में कुछ हद तक अधिक समस्यार्एँ रहती हैं। ‘देवर-भार्भी’, ‘जीजार्-सार्ली’ क अनुवार्द यरू ोपीय भार्षार् में नहीं हो सकतार् क्योंकि भार्व की दृष्टि से इसमें जो सार्मार्जिक सूचनार् निहित है वह शब्द के स्तर पर नहीं आँकी जार् सकती। इसी प्रकार भार्रतीय संस्कृति के ‘कर्म’ क अर्थ न तो ‘action’ हो सकतार् है और न ही ‘performance’ क्योंकि ‘कर्म’ से यहार्ँ पुनर्जन्म निर्धार्रित होतार् है जबकि ‘action’ और ‘performance’ में ऐसार् भार्व नहीं मिलतार्। 

    3. अनुवार्द की पार्ठ-प्रकृतिपरक सीमार्एँ 

    अनुवार्द की आवश्यकतार् क अनुभव हिन्दी में इसी कारण तीव्रतार् से कियार् गयार् कि भार्षार्ओं के पार्रस्परिक आदार्न-प्रदार्न से हिन्दी को समृद्ध होने में सहार्यतार् मिलेगी और भार्षार् के वैचार्रिक तथार् अभिव्यंजनार्मूलक स्वरूप में परिवर्तन आएगार्। हिन्दी में अनुवार्द के महत्त्व को मध्यकालीन टीकाकारों ने पार्ंडित्य के धरार्तल पर स्वीकार कियार् थार्, लेकिन यूरोपीय सम्पर्क के पश्चार्त् हिन्दी को अनुवार्द की शक्ति से परिचित होने क वृहत्तर अनुभव मिलार्। हिन्दी में अनुवार्द की परम्परार् भले ही अनुकरण से प्रार्रम्भ हुर्इ, लेकिन आज ज्ञार्न-विज्ञार्न की विभिन्न शार्खार्ओं में अनुवार्द की विभिन्न समस्यार्ओं ने हिन्दी क रार्स्तार् रोक रखार् है। विभिन्न विषयों तथार् कार्यक्षेत्रों की भार्षार् विशिष्ट प्रकार की होती है। प्रशार्सनिक क्षेत्र में कर्इ बार्र ‘sanction’ और ‘approval’ क अर्थ सन्दर्भ के अनुसार्र एक जैसार् लगतार् है, अत: वहार्ँ दोनों शब्दों में भेद कर पार्नार् सम्भव नहीं है। इसी प्रकार जीवविज्ञार्न में ‘poison’ और ‘venom’ शब्दों क अर्थ एक है किन्तु ये अपने विशिष्ट गुणों के कारण भिन्न हो जार्ते हैं। अत: पार्ठ की प्रकृति के अनुसार्र पार्ठ क विन्यार्स करनार् पड़तार् है। जब तक पार्ठ की प्रकृति और उसके पार्ठक क निर्धार्रण नहीं हो पार्तार् तब तक उसक अनुवार्द कर पार्नार् सम्भव नहीं हो पार्तार्।

    कुल मिलार्कर कहार् जार् सकतार् है कि हर भार्षार् की अपनी संरचनार्त्मक व्यवस्थार् और सार्मार्जिक-सार्ंस्कृतिक परम्परार् होती है। इसके सार्थ-सार्थ विभिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होने के कारण उसक अपनार् स्वरूप भी होतार् है। यही कारण है कि अनुवार्द की प्रक्रियार् में स्रोत-भार्षार् और लक्ष्य-भार्षार् की समतुल्यतार् के बदले उसक न्यूनार्नुवार्द यार् अधिअनुवार्द ही हो पार्तार् है। 

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