अनुलोम तथार् प्रतिलोम विवार्ह क्यार् है?

हिन्दुओं में विवार्ह-सार्थी चुनार्व में अनेक निषेधें क पार्लन कियार् जार्तार् है उनमें अनुलोम यार् प्रतिलोम के नियम भी महत्त्वपूर्ण हैं। इन नियमों क पार्लन लगभग सभी हिन्दू करते हैं।

अनुलोम विवार्ह

जब एक उच्च वर्ण, जार्ति, उपजार्ति, कुल एवं गोत्र के लडके क विवार्ह ऐसी लड़की से कियार् जार्य जिसक वर्ण, जार्ति, उपजार्ति, कुल एवं वंश के लडके से नीचार् हो तो ऐसे विवार्ह को अनुलोम विवार्ह कहते हैं। दूसरे शब्दों में इस प्रकार के विवार्ह में लड़क उच्च सार्मार्जिक समूह क होतार् है और लड़की निम्न सार्मार्जिक समूह की। उदार्हरण के लिए, एक ब्रार्ह्मण लडके क विवार्ह क्षत्रिय यार् वैश्य लड़की से होतार् है तो इसे हम अनुलोम विवार्ह कहेंगे। वैदिक काल से लेकर स्मृति काल तक अनुलोम विवार्ह क प्रचलन रहार् है। मनुस्मृति में लिखार् है एक ब्रार्ह्मण को अपने से निम्न तीन वर्णों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र की कन्यार् से क्षत्रिय को अपने से निम्न दो वर्णों वैश्य एवं शूद्र कन्यार् से और वैश्य अपने वर्ण के अतिरिक्त शूद्र कन्यार् से भी विवार्ह कर सकतार् है, किन्तु मनु पार्णिग्रहण संस्कार करने की स्वीकृति केवल सवर्ण विवार्ह के लिए ही देते हैं। यार्ज्ञवल्क्य ने भी ब्रार्ह्मण को चार्र, क्षत्रिय को तीन, वैश्य को दो, एवं शूद्र को एक विवार्ह करने की बार्त कही है। मनु ने एक अन्य स्थार्न पर शुद्र कन्यार् से द्विज लडके क विवार्ह अनुचित भी बतार्यार् है। ऐसे विवार्ह से द्विज क वर्ण दूषित हो जार्तार् है, उसके परिवार्र क स्तर गिर जार्तार् है। और उसकी सन्तार्न को शूद्र की स्थिति प्रार्प्त होती है। ऐसे विवार्ह से उत्पन्न सन्तार्न को मनु ‘पाषव’ ;एक जीवित शुद्ध की संज्ञार् देते हैं तथार् उसे सम्पत्ति में भी कोई अधिकार नहीं होतार् है। प्रार्चीन समय में अनुलोम विवार्ह क विस्तार्र वर्णों तक थार्, किन्तु जब वर्ण अनेक जार्तियों एवं उपजार्तियों में बंट गये और उनमें रक्त शुधतार् एवं ऊँच-नीच की भार्वनार् पनपी तथार् जैन एवं बौध धर्म क उदय हुआ तो कुलीन विवार्ह (Hypergamy) क प्रचलन हुआ। कुलीन विवार्ह क तार्त्पर्य है एक जार्ति अथवार् उपजार्ति में विवार्ह करने पर वधु के लिए वर उच्च कुल यार् गार्ँव से प्रार्प्त कियार् जार्तार् है। कुलीन विवार्ह क सर्वार्धिक प्रचलन बंगार्ल में रहार् है जहार्ँ उच्च कुल के लडके क विवार्ह निम्न कुल की कई लड़कियों से होतार् थार्। डॉ. रार्धकृष्णन् क मत है कि भार्रत में अनुलोम विवार्हों क प्रचलन दसवीं शतार्ब्दी तक रहार् है।

अनुलोम विवार्ह

रिजले क मत है कि प्रार्रम्भ में अन्तर्वर्ण विवार्हों क प्रचलन इण्डो-आर्यन प्रजार्ति में िस्त्रार्यों की कमी पूरी करने के लिए हुआ और जैसे ही उनकी आवश्यकतार् की पूर्ति हो गयी उन्होंने ऐसे विवार्हों पर प्रितबन्ध् लगार् दियार्।

अनुलोम विवार्ह के प्रभार्व व हार्नियार् 

  1. उच्च कुलों में लड़कों की कमी-जो कुछ सार्मार्जिक दृष्टि से ऊँचार् मार्नार् जार्तार् है उस कुल के लड़कों से नीचार् समझार् जार्ने वार्ले कुल के लोग अपनी कन्यार् क विवार्ह करनार् चार्हते हैं, परिणार्मस्वरूप ऊँचे कुल की लड़कियों के लिए वर क अभार्व हो जार्तार् है और उन्हें अविवार्हित ही रहनार् पड़तार् है। 
  2. नीच कुलों में लड़कियों की कमी-नीच कुल के सभी लोग जब अपनी कन्यार् क विवार्ह उच्च कुल में कर देते हैं तो नीच कुल में लड़कों के लिए कन्यार् क अभार्व हो जार्तार् है, और कई लड़कों को अविवार्हित ही रहनार् पड़तार् है। 
  3. बहुपति एवं बहुपत्नी विवार्ह क जन्म-ऊँचे कुल के लडके से नीचे कुल के सभी लोग अपनी कन्यार् क विवार्ह करनार् चार्हते हैं। ऐसी स्थिति में उच्च कुल में बहुपत्नी विवार्ह क प्रचलन होगार्, दूसरी ओर नीचे कुल में लड़कियों क अभार्व होने पर बहुपति विवार्ह क प्रचलन होगार्। 
  4. वर-मूल्य प्रथार्-जब नीचे कुल वार्ले उच्च कुल के लड़कों को वर के रूप में प्रार्प्त करनार् चार्हते हैं तो लड़कों क अभार्व हो जार्तार् है। ऐसी स्थिति में वर-मूल्य प्रथार् प्रचलन बढ़ जार्तार् है। 
  5. बेमेल विवार्ह-अनुलोम विवार्ह के कारण ऊँचे कुल में लड़की क विवार्ह कभी-कभी प्रौढ़ यार् वृद व्यक्ति के सार्थ भी कर दियार् जार्तार् है। बंगार्ल एवं बिहार्र में उच्च कुलों के कई लड़कों के तो सौ तक पत्नियार्ँ होती हैं जिन्हें यार्द रखने के लिए रजिस्टर रखनार् होतार् है। कई  बार्र तो वधु की आयु वर की पुत्री के बरार्बर होती है। 
  6. बार्ल-विधवार्ओं में वृद्धि-अनुलोम विवार्ह के कारण उच्च कुल के पुरुषों के कई  पत्नियार्ँ होती हैं। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जार्ने पर समार्ज में बार्ल-विधवार्ओं की संख्यार् बढ़ जार्ती है। 
  7. बार्ल-विवार्ह क प्रचलन-अनुलोम विवार्ह में प्रत्येक पितार् यह चार्हतार् है कि उसकी कन्यार् क विवार्ह उच्च कुल के लडके से हो अत: ज्योंही कोई  योग्य वर मिलार् कि कन्यार् क विवार्ह कर दियार् जार्तार् है। कई बार्र तो चार्र-पार्ँच वर्ष से कम आयु की कन्यार्ओं क भी विवार्ह कर दियार् जार्तार् है। 
  8. कन्यार्-मूल्य क प्रचलन-अनुलोम विवार्ह के कारण नीच कुलों में कन्यार्ओं क अभार्व हो जार्तार् है जिसके फलस्वरूप कन्यार्-मूल्य क प्रचलन होतार् है।
  9. सार्मार्जिक बुरार्इयार्ँ-अनुलोम विवार्ह प्रथार् में समार्ज में रूढ़िवार्दितार् तथार् सार्मार्जिक पार्रिवार्रिक एवं वैयक्तिक जीवन में अनेक समस्यार्ओं को जन्म दियार् है। निम्न कुल की लड़कियों क देर तक विवार्ह न होने पर समार्ज में भ्रष्टार्चार्र व नैतिक पतन की समस्यार् पैदार् होती है। कई कन्यार्एँ तो जब उनके मार्तार्-पितार् द्वार्रार् वर-मूल्य नहीं जुटार्यार् जार्तार् तो वे सार्मार्जिक निन्दार् से तंग आकर आत्महत्यार् तक कर लेती हैं।

प्रतिलोम विवार्ह

अनुलोम विवार्ह क विपरीत रूप प्रतिलोम विवार्ह है। इस प्रकार के विवार्ह में लड़की उच्च वर्ण, जार्ति, उपजार्ति, कुल यार् वंश की होती है और लड़क निम्न वर्ण, जार्ति, उपजार्ति, कुल यार् वंश का। इसे परिभार्षित करते हुए कपार्ड़ियार् लिखते हैं, एक निम्न वर्ण के व्यक्ति क उच्च वर्ण की स्त्री के सार्थ विवार्ह प्रतिलोम विवार्ह कहलार्तार् थार्।उदार्हरण के लिए, यदि एक ब्रार्ह्मण लड़की क विवार्ह किसी क्षत्रिय, वैश्य अथवार् शूद्र लडके से होतार् है तो ऐसे विवार्ह को हम प्रतिलोम विवार्ह कहेंगे। इस प्रकार के विवार्ह में स्त्री की स्थिति निम्न हो जार्ती है। हिन्दू विवार्ह अधिनियम, 1949 एंव 1955 के हिन्दू विवार्ह अधिनियम में अनुलोम एवं प्रतिलोम विवार्ह दोनों को ही वैध् मार्नार् गयार् है।

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