अथर्ववेद क अर्थ, स्वरूप, शार्खार्एं

वेदों को भार्रतीय सार्हित्य क आधार्र मार्नार् जार्तार् है अर्थार्त् परवर्ती संस्कृत में विकसित प्रार्य: समस्त विषयों क श्रोत-वेद ही है। काव्य दर्शन, धर्मशार्स्त्र, व्यार्करण आदि सभी दोनों पर वेदों की गहरी क्षार्प है। इन सभी विषयों क अनुशीलन वैदिक ऋचार्ओं से ही आरम्भ है। वेद से भार्रतीयों क जीवन ओतप्रोत है। हमार्री उपार्सनार् के भार्जन देवगण हमार्रे संस्कारों, की दशार् बतार्ने वार्ली पद्धति, हमार्रे मस्तिष्क को प्रेरित करने वार्ली विचार्रधार्रार् इन सबक उद्भव स्थार्न वेद ही हैं अत: हमार्रे हृदय में वेद के प्रति यदि प्रगार्ढ़ श्रद्धार् है तो कोर्इ आश्चर्य क विषय नहीं है, परन्तु वेदों क महत्व इतनार् संकिर्ण तथार् सीमित नहीं है। मार्नव जार्तियों के विचार्रों को लिपिबद्ध करने वार्ले गौरवमय ग्रन्थों से सबसे प्रार्चीन है।

इन वेदों में अथर्ववेद एक भूयसी विशिष्टतार्ार् से संवलित है। अन्यतीन वेद परलोक अर्थार्त् स्वर्गलोक के प्रार्प्ति के सार्धन है वही अथर्ववेद इहलोक फल देने वार्लार् है। मनुष्य जीवन को सुखमय तथार् दु:ख से रहित करने के लिए जीन सार्धनों की आवश्यकतार् है उनकी सिद्धि ही अथर्ववेद क मूल प्रतिपार्द्य विषय है। यज्ञ के निष्पार्दन में जिन चार्र ऋत्विज की आवश्यकतार् होती है उनमें अन्यतम-ब्रह्मार् क सार्क्षार्त् सम्बन्ध इसी वेद से है। उनमें अन्यतम-ब्रह्मम क सार्क्षार्त् सम्बन्ध इसी वेद से है। यह ब्रह्मार् यज्ञ क अध्यक्ष होतार् है। इसके लिये उसे मार्नस बल से पूर्ण होनार् आवश्यक है। वे चार्रों वेदों क ज्ञार्तार् होतार् है। परन्तु प्रधार्न वेद अथर्ववेद ही होतार् है। ऐतरेय ब्रार्ह्मण के अनुसार्र यज्ञ के दो माग है-वार्क् तथार् मन। वचन के द्वार्रार् वेदत्रयी यज्ञ के एक पक्ष को संस्कृत बनार्नी है दूसरे पक्ष क संस्काार्र ब्रह्मार् करतार् है और मन के द्वार्रार् करतार् है। इन कथनों से स्पष्ट है कि अथर्ववेद की आवश्यकतार् हमार्रे जीवन के लिए कितनी है?

अथर्ववेद क अर्थ 

अथर्ववेद के उपलब्ध अनेक अभिधार्नों में अथर्ववेद, ब्रह्मवेद, अंगिरोवेद, अथर्वार्ष्रिस वेद आदि नार्म मुख्य है। ‘अथर्व’ शब्द की व्यार्ख्यार् तथार् निर्वचन निरूक्त (11/2/17) तथार् गोपथ-ब्रार्ह्मण (1/4) में मिलतार् है। ‘पर्व’ धार्तु कौटिलय तथार् हिंसार्वार्ची है। अतएव ‘अथर्व’ शब्द क अर्थ है अकुटिलतार् तथार् अंहिसार् वृत्ति से मन की स्थिरतार् प्रार्प्त करने वार्लार् व्यिक्तार्। इस व्युत्पत्ति की पुष्टि में योग के प्रतिपार्दक अनेक प्रसंग स्वयं इस वेद में मिलते है (अथर्व 6/1;10/2/26-28)। होतार् वेद आदि नार्मों की तुलनार् पर ब्रह्मकर्म के प्रतिपार्दक होने से अथर्ववेद ‘ब्रह्मवेद’ कहलार्तार् है ब्रह्मवेद नार्म क यही मुख्य कारण है। ब्रह्मज्ञार्न क अंशत: प्रतिपार्दन है, परन्तु वह बहुत कम है। ‘अथर्वार्गिष्रस’ पद की व्यार्ख्यार् करने से प्रतीत होतार् है कि यह वेद दो ऋषियों के द्वार्रार् दृष्ट मन्त्रों क समुदार्य प्रस्तुत करतार् हैं अथर्व-दृष्ट मन्त्र शार्न्ति पुष्टि कर्मयुक्त है तथार् अष्रिस-दृष्ट मन्त्र आभिचार्रिक है। इसलिए वार्युपुरार्ण (65/27) तथार् ब्रह्मार्ण्ड पुरार्ण (2/1/36) में अथर्ववेद को घोर कृत्यार्विधि से युक्त तथ प्रत्यंगिरस योग से युक्त होने से कारण ‘द्विशरीर शिरार्:’ कहार् गयार् है। ‘प्रत्यष्रिसयोग’ क तार्त्पर्य अभिचार्र क प्रतिविधार्न अर्थार्त् शार्न्तिपुष्टि कर्म है। इन अभिधार्न से स्पष्ट है कि अथर्ववेद में दो प्रकार के मन्त्र संकलित हैं-शार्न्ति-पौष्ठिक कर्मवार्ले तथार् आभिचार्रिक कर्मवार्ले। ‘आंगिरसकल्प’ में मार्रण, मोहन, उच्चार्टन आदि प्रख्यार्त “ार्ट्कर्मों क विधार्न बतलार्यार् गयार् है; ऐसार् नार्रदीय पुरार्ण क कथन है (5/7)

आंगिरसे कल्पे “ार्ट्कर्मार्णि सविस्तरम्। 

अभिचार्र-विधार्नेन निर्दिष्टार्नि स्वयंभुवार्।। 

एक तथ्य विचार्रणीय हैं अवेस्तार् क ‘अर्थवन्’ शब्द अर्थवन् क ही प्रतिनिधि है और बहुत सम्भव है दोनों क समार्न अर्थ है-ऋग्नि क परिचार्रक ऋत्विक्। फलत: उसके द्वार्रार् दृष्ट मन्त्रों में शार्न्ति तथार् पुष्टिकारक मन्त्रों क अन्तर्भार्व होनार् स्वार्भार्विक है।

तैत्तिरीय ब्रार्ह्मण (3/12/9/1) में ‘अथर्वणार्-मष्रिसार्ं प्रतीची’ में दोनों के मिलित स्वरूप क वर्णन है। सम्भवत: इन दोनों ऋषियों के द्वार्रार् दृष्अ मन्त्रसमूह पृथक् सत्तार् भी धार्रण करतार् थार्। इस दृष्टि से गोपथब्रार्ह्मण के एक ही प्रकरण में ‘आथर्वणी वेदोSभवत्’ और ‘आंगिरसो वेदोSभवत्’ वार्क्य मिलते है (11/5,11/18) शतपथ ब्रार्ह्मण (13/4/3/2) में भी इन दोनों क पृथक्-उल्लेख कियार् गयार् है। सर्वत्र हो ‘अथर्वार्ष्रिस’ अभिधार्न उपलब्ध है जिससे अथर्वार् ऋषि के अभ्यर्हित होने क संकेत मिलतार् है। इससे यह तथ्य निकालार् जार् सकतार् है कि इस वेद में शार्न्तिक पौष्टिक मन्त्रों की सत्तार् प्रथमत: थी जिनमें आभिचार्रिक मन्त्रों क योग पीछे कियार् गयार्।

अथर्ववेद क स्वरूप 

अथर्ववेद के स्वरूप की मीमार्ंसार् करने से पतार् चलतार् है कि यह दो धार्रार्ओं के मिश्रण क परिणतफल है। इनमें से एक है अथर्वधार्रार् और दूसरी है अिष्रोधार्रार्। अथर्व द्वार्रार् दृष्ट मन्त्र शार्न्ति पुष्टि कर्म से सम्बद्ध है। इसक संकेत भार्गवत 3/24/24 में भी उपलब्ध होतार् है-’अथर्वणेSदार्त् शार्न्ति ययार् यज्ञो वितन्यते।’ अिष्रोधार्रार् अभिचार्रिक कर्म से सम्बन्ध रखती है और यह इस वेद के जन-सार्मार्ार्न्य में प्रिय होने क संकेत है। शार्न्तिक कर्म से सम्बद्ध होने से अथर्व क सम्बन्ध श्रौतयार्ग से आरम्भ से ही है। पीछे आभिचार्रिक कर्मों क भी सम्बन्ध होने से यह रार्जार् के पुरोहित वर्ग के लिए नितार्न्त उपार्देय वेद हो गयार्। ऋग्ग्वेदत्रयी तथार् अथर्व क पाथक्य स्पष्टत: ग्रन्थों में कियार् गयार् हैं वेदत्रयी जहार्ँ ‘पार्रत्रिक’ पार्रलौकिक फलों क दार्तार् है, वहार्ँ अथर्व ‘ऐहलौकिक’ है। एक विशेष तथ्य ध्यार्तव्य हैं जयन्तभट्अ ने न्यार्यमज्जरी में अथर्ववेद को ‘प्रथम वेद’ मार्नार् है-’तत्रवेदार्श्चत्वार्र:, प्रथमोSथर्ववेद:’। नगर खण्ड भी इसे आद्य वेद बतलार्तार् है तथार् युक्ति देतार् है कि सावलौकिक कार्यसिद्धि में अथर्व ही मुख्यरूपेण प्रयुक्त होतार् है और इसीलिए वह ‘आद्य’ कहलार्तार् है। जयन्त भट्ट ने अथर्ववेद के प्रार्थम्य पर विस्तार्र से विचार्र कियार् है।

रार्जार् के लिए अथर्ववेद क सविशेष महत्त्व है। रार्जार् के लिए शार्न्तिक पौष्टिक कर्म तथार् तुलार्पुरुषार्दि महार्दार्न की महती आवश्यकतार् होती है ओर इन सबक विधार्न अथर्ववेद की निजी सम्पत्ति है। इस विषय में पुरार्ण तथार् स्मृति ग्रन्थों क प्रमार्ण प्रचुर मार्त्रार् में उपलब्ध होतार् हैं विष्णु पुरार्ण क स्पष्ट कथन है कि रार्जार्ओं को पौरोहित्य, शार्न्तिक, पौष्टिक आदि कर्म अथर्व-वेद के द्वार्रार् करार्नार् चार्हिए। मत्स्यपुरार्ण क कथन है कि पुरोहित को अथर्व मन्त्र तथार् ब्रार्ह्मण में पार्रंगत होनार् चार्हिये (पुरोहितं तथार् अथर्व-मन्त्र-ब्रार्ह्मण-पार्रगम्) कालिदार्स के वचनों द्वार्रार् इस तथ्य की पुष्टि होती है। कालिदार्स ने वसिष्ठ के लिए ‘अथर्व निधि’ क विशेषण दियार् है जिसक तार्त्पर्य है कि रघुवंशियों के पुरोहित वसिष्ठ अथर्व मन्त्रों तथार् क्रियार्ओं के भण्डार्र थे (रघुव्म् 1/59)। रार्जार् आज अथर्ववेद के वेत्तार् गुरु वसिष्ठ द्वार्रार् अभिषेक संस्कार किये जार्ने पर शत्रुओं के लिए दुर्धर्ष हो गयार् (8/3)। यहार्ँ पर कालिदार्स ने वसिष्ठ को अथर्व-वेत्तार् कहार् है (स बभूव दुरार्सद: परैर्गुरुणार्Sथ्र्वविदार् कृतिक्रिय: 8/3) ‘अथर्वपरिशिष्ट’ में लिखार् है कि अथर्ववेद क ज्ञार्तार् शार्न्तिकर्मक पार्रगार्मी जिस रार्ष्ट्र में निवार्स करतार् है वह रार्ष्ट्र उपद्रवार्ं से हीन होकर वृद्धि को प्रार्प्त करतार् है। इस सब प्रमार्णों क निष्कर्ष है कि रार्जपुरोहित को अथर्ववेद के मन्त्रों क तथार् तत्सम्बन्धों अनुष्ठार्नों क ज्ञार्तार् अवश्य होनार् चार्हिए। इन्हीं कारणों से अथर्ववेद ऐहलौकिक मार्नार् जार्तार् है, जहार्ँ अन्य तीनों वेद पार्रलौकिक (पार्रत्रिक) मार्ने गये है।

अथर्ववेद की शार्खार्एं- 

अथर्ववेद को छोड़कर अन्य तीन वेदों की केवल एक ही संहितार् पाइ जार्ती है जो मुद्रित और प्रकाशित है। परन्तु अथर्ववेद की तीन संहितार्ओं क पतार् चलतार् है। अथर्ववेदीय कौशिक सूत्र के दार्रिल भार्ष्य में इने त्रिविध संहितार्ओं के नार्म तथार् स्वरूप क परिचय दियार् गयार् हैं इन संहितार्ओं के नार्म है (1) आष्र्ार्ी संहितार् (2) आचाय संहितार् (3) विधिप्रयोग संहितार्। इन तीनों संहितार्ओं में ऋषियों के द्वार्रार् परम्परार्गत प्रार्प्त मन्त्रों के संकलन होने से इस संहितार् कहार् जार्तार् है। अथर्ववेद क आजकल जो विभार्जन काण्ड, सूक्त तथार् मन्त्र रूप् ार् में प्रकाशित हुआ है इसी शौनकीय संहितार् को ही ऋषि-संहितार् कहते है। दूसरी संहितार् क नार्म आचाय संहितार् है जिसक विवरण दार्रिलभार्ष्य में इस प्रकार पार्यार् जार्तार् है। ‘‘येन उपनीय शिष्यं पार्ठयति सार् आचाय-संहितार्’’। अर्थार्त् उपनयन संस्कर करने के पश्चार्त गुरु जिस प्रकार से शिष्य को वेद क अध्यार्पन करतार् है वही आचाय-संहितार् कही जार्ती हैं उदार्हरण के लिए अथर्ववेद क यह मन्त्र लियार् जार् सकतार् है। शौनकीय अथर्वसंहितार् के प्रथम काण्ड के तृतीय सूक्त क प्रथम मन्त्र इस प्रकार है :-

‘‘विद्यार् शरस्य पितरं पर्जन्यं शतवृष्ण्यम्। तेनार् ते तन्वे शं करं पृथिव्यार्ं ते निषेचनं वहिष्टे अस्तु बार्लिति। 1/3/1’’ परन्तु इसी सूक्त क दूसरार् मन्त्र यह है-विद्यार् शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम्। ते नार् ते तन्वे……..अस्तु बार्लिति। तीसरार् मन्त्र भी ऐसार् ही है जिसमें ‘विद्यार् शरस्य पितरं’’ तो आदि तेनार् ते तन्वे……अस्तु बार्लिति’’ अन्त में है। इन तीनों मन्त्रों के अनुशीलन से पतार् चलतार् है कि प्रथम मंत्र में ‘पर्जन्यं शतवृष्णयम’। दूसरे मन्त्र में ‘मित्रे शतवृष्ण्यम्’ और तीसरे मन्त्र में ‘वरुर्ण शतवृष्ण्यम्’ अंश ही केवल नवीन है। इसके अतिरिक्त इन मन्त्रों के ‘विद्यार् शरस्य पितर’ आदि में ओर ‘‘ते नार् ते तन्वे शंकरं पृथिव्यार्ं तो निषेचनं बहिष्टे वार्लिति’ यह मन्त्र क अंश अन्त में प्रत्येक मन्त्र में आवृत्त कियार् गयार् है। अत: आचाय अपने शिष्यों को पढ़ार्ते समय केवल मन्त्र में आये हुए नवीन अंशों क ही अध्यार्पन करतार् थार्। इन्हीं नवीन मन्त्रों क संग्रह आचार्य्र संहितार् है। इस आचायसंहितार् के पदपार्ठ से युक्त हस्तलिखित प्रति प्रार्प्त हुर्इ है।

विधि-प्रयोग संहितार् वह है जिसमें मन्त्रों के प्रयोग किसी विशिष्ट विधि के अनुष्ठार्न के लिए किये जार्ते हं।ै इस अनुष्ठार्न के अवसर पर एक ही मन्त्र के विभिन्न पदों के विभक्त करके नये-नये मन्त्र किये जार्ते हैं। यथार् – आष्र्ार्ी संहितार् क मन्त्र यह है-

‘‘ऋतुभ्यष्ट्वSर्तवेभ्यो, मार्द्भ्यो संवत्सरेभ्य:। 

धार्त्रे विधार्त्रै समृधे भूतस्य पतये यजे।।’’ 

अब इस मन्त्र को विभक्त करके आठ मन्त्र अनुष्ठार्न के लिये तैयार्र कियार् जार्ते हैं। जैसे-

  1. ऋतुभय: त्वार् यजे स्वार्हार्। 
  2. आर्तवेभ्य: त्वार् यजे स्वार्हार्।
  3. मार्द्भ्य: त्वार् यजे स्वार्हार्।
  4. संवत्सरेभ्य: त्वार् यजे स्वार्हार्। 

इसी प्रकार से धार्त्रे, समृधे, ओर भूतस्य पतये के बार्द भी ‘तवार् यजे स्वार्हार्’ जोड़ार् जार्येगार्। विधि में प्रयुक्त होने वार्ले इन मन्त्रों क समुदार्य ‘विधि-प्रयोग संहितार्’ कहार् जार्तार् है।

विधि-प्रयोग संहितार् क यह पहिलार् प्रकार है। इसी भार्ँति से इसके चार्र प्रकार और भी होते हैं। दूसरे प्रकार में नये शब्द मन्त्रों में जोड़े जार्ते है। तीसरे प्रकार में किसी विशिष्ट मन्त्र क आवर्तन उस सूक्त के प्रति मन्त्र के सार्थ कियार् जार्तार् है। इस प्रकार से सूक्त के मन्त्रों की संख्यार् द्विगुणित कर दी जार्ती हैं चौथे प्रकार में किसी सूक्त में आये हुए मन्त्रों के क्रम क परिवर्तन कर दियार् जार्तार् है। पार्ँचवें प्रकार में किसी मन्त्र के अर्ध भार्ग को ही सम्पूण मन्त्र मार्नकर प्रयोग कियार् जार्तार् है। इस प्रकार आष्र्ार्ी संहितार् के मन्त्रों क विधि-प्रयोग संहितार् में पार्ँच प्रकार से प्रयोग यार् उपयोग कियार् जार्तार् है।

इससे स्पष्ट है कि ऋषिसंहितार् ही मूल संहितार् है। आचाय संहितार् में इसक संक्षेपीकरण कर दियार् जार्तार् है जबकि विधि-प्रयोग संहितार् में इसक विस्तृतीकरण प्रार्प्त होतार् है। आचाय दार्रिल के कौशिक सूत्र के भार्ष्य के अनुसार्र अथर्व संहितार् के उपर्युक्त तीन प्रकारों क यह विश्लेषण कियार् गयार् है।

अथर्व में विज्ञार्न 

अथर्ववेद के भीतर आयुर्वेद के सिद्धार्न्त तथार् व्यवहार्र की अनेक महनीय जिज्ञार्स्यार् बार्तें भरी हुर्इ हैं, जिनके अनुशीलन से आयुर्वेद की प्रार्चीनतार्, प्रार्मार्णिकतार् तथार् व्यार्पकतार् क पूरार् परिचय हमें मिलतार् है। रोग, शार्रीरिक प्रतीकार तथार् औषध के विषय में अनेक उपयोगी एवं वैज्ञार्निक तथ्यों की उपलब्धि अथर्ववेद की आयुर्वेदिक विशिष्टतार् बतलार्ने के लिये पर्यार्प्त मार्नी जार् सकती है। तक्म रोग (ज्वर) क सार्मार्ार्न्य वर्णन (6/21/1-3), सतत-शार्रद-ग्रैश्म-शीत-वाषिक-तृतीय आदि ज्वर के प्रभेदों क निर्देश (1/25/4-5), बलार्स रोग क अस्थि तथार् हृदय की पीड़ार् करनार् (6/14/1-3), अपचित (गण्डमार्लार्) के एनी-श्येनी-कृष्णार् आदि भेदों क निदर्शन (6/83/1-3) यक्ष्मार्, विद्रव, वार्तीकार आदि नार्नार् रोगों क वर्णन (9/13/1-22) इस संहितार् में स्थार्न-स्थार्न पर कियार् गयार् है। प्रतीकार के विषय में आधुनिक प्रणार्ली की शल्यचिकित्सार् क निर्देश अतीव विस्मयकारी प्रतीत होतार् है, जैसे-मूत्रघार्त होने पर शरशलार्क आदि के द्वार्रार् मूत्र क नि:सार्रण (1/3/19) सुख प्रसव के लिए योनिभेदन (1/11/1-6) जल-घार्वन के द्वार्रार् व्रण क उपचार्र (5/17/1-3) आदि। नार्नार् कृतियों के द्वार्रार् नार्नार् प्रकार के रोगों की उत्पत्ति क सिद्धार्न्त प्रार्चीन आयुर्वेद को आधुनिक वैद्यकशार्स्त्र के सार्थ सम्बद्ध कर रहार् है। रोग कारक नार्नार् कृमियों क वर्णन (2/31/1-5), नेत्र, नार्सिक तथार् दार्ँतों में प्रवेश करने वार्ले कृमियों के नार्म तथार् निरसन क उपार्य (5/23/1-13) तथार् सूर्य-किरणार्ं के द्वार्रार् इनक नार्श (4/37/1-12) आदि अनेक विषय वैज्ञार्निक आधार्र पर निर्मित प्रतीत होते हैं। रोगों के निवार्रणाथ तथार् सर्पविष के दूरीकरणाथ नार्नार् ओषधियों, औषधों तथार् मणियों क निर्देश यहार्ँ मिलतार् है। आश्चर्य की बार्त है कि ‘विषस्य विषमौषम्’ क सिद्धार्न्त भी अथर्व के एम मन्त्र में (7/88/1) पार्यार् जार्तार् है। इसीलिए तो आयुर्वेद अथर्ववेद क उपवेद मार्नार् जार्तार् है।

अनेक भौतिक विज्ञार्नों के तथ्य भी यहार्ँ यत्र-तत्र बिखरे मिलते हैं। उन्हें पहचार्नने तथार् मूल्यार्ंकन करने के लिए वेदज्ञ होने के अतिरिक्त विज्ञार्नवेत्तार् होनार् भी नितार्न्त आवश्यक है। एक दो पदों यार् मन्त्रों में निगूढ़ वैज्ञार्निक रहस्यों क उद्घार्टन कियार् गयार् है। जिसे वैज्ञार्निक की शिक्षित तथार् अभ्यस्त दृष्टि ही देख सकती है। एक विशिष्ट उदार्हरण ही इस विषय-संकेत के लिए पर्यार्प्त होगार्। अथर्ववेद के पच्चम काण्ड के पच्चम सूक्त में लार्क्षार् (लार्ख) क वर्णन है, जो वैज्ञार्निकों की दृष्टि में नितार्न्त प्रार्मार्णिक तथ्यपूर्ण तथार् उपार्देय है। आजकल रार्ँची (बिहार्ार्र) में भार्रत सरकार की ओर से ‘लार्ख’ के उत्पार्दन तथार् व्यार्वहार्रिक उपयोग के विषय में एक अन्वेषण-संस्थार् कार्य कर रही है। उसकी नवीन वैज्ञार्निक खोजों के सार्थ इस सूक्त में उल्लिखित तथ्यों की तुलनार् करने पर किसी भी निष्पक्ष वैज्ञार्निक को आश्चर्य हुए बिनार् नहीं रह सकतार्। आधुनिक विज्ञार्न के द्वार्रार् समर्पित और पुष्ट की गर्इ सूक्त-निर्दिष्ट बार्तें संक्षेप में ये हैं-

  1. लार्ह (लार्ख, लार्क्षार्) किसी वृक्ष क निस्यन्द नहीं है, प्रत्युत उसे उत्पन्न करने क श्रेय कीट-विशेष को (मुख्यतयार् स्त्री-कीट को) हैं। वह कीट यहार्ँ ‘शिलार्ची’ नार्म से व्यवहृत कियार् गयार् है। उसक पेट लार्ल रष् क होतार् है और इसी से वह स्त्री (कीट) संखियार् खार्ने वार्ली मार्नी गयी हैं यह कीट अश्र्वस्य, न्यग्रोध, घव, खदिर आदि वृक्षों पर विशेषत: रह कर लार्क्षार् को प्रस्तुत करतार् है 4/5/5। 
  2. स्त्री कीट के बड़े होने पर अण्डार् देने से पहिले उसक शरीर क्षीण हो जार्तार् है और उसके कोष में पीलार्पन विशेषत: आ जार्तार् है। इसीलिए यह कीट यहार्ँ ‘हरिण्यवर्णार्’ तथार् ‘सूर्यवर्णार्’ कही गर्इ है (5/5/6)। इसके शरीर के ऊपर रोंये अधिक होते है। इसीलिए यह ‘लोमश वक्षणार्’ कही गर्इ हैं लार्ह की उत्पत्ति विशेष रूप से वर्षार् काल की अँधेरी रार्तों में होती है और इसी लिए इस सूक्त में रार्त्रि मार्तार् तथार् आकाश पितार् बतलार्यार् है (1/5/1)। 
  3. कीड़े दो प्रकार के होते हैं-(क) सरार् ¾ रेंगनेवार्ले; (ख) पतत्रिणी ¾ पंखयुक्त, उड़ने वार्ले (पुरुष कीट)। शरार् नार्मक (स्त्री) कीड़े वृक्षों तथार् पौधों पर रेंगते हं ै और इससे वे ‘स्परणी’ कहलार्ते हैं।

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